आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 82 to 92
श्लोक ( Shlok ) 82
राजा शान्तः पुरः श्रेष्ठी’ ‘चानयोर्निकटे चिरम् । श्रुत्वा सद्धर्मसद्भावं दानाद्युद्योगमाययौ ॥८२॥
सब अन्तःपुरके साथ साथ राजा लोकपाल और सेठ कुबेरकान्त भी उन आर्यि-काओंके समीप गये और चिरकालतक समीचीनधर्मका अस्तित्व सुनकर दान देना आदि उद्योग-को प्राप्त हुए ॥८२॥
“Accompanied by the entire royal harem, King Lokapāla and the merchant Kubera-kānta too approached those noble Āryikās. Listening for a long time to their profound exposition of the true and noble Dharma, they were inspired to engage in acts of charity and other virtuous endeavors.” ॥82॥
श्लोक ( Shlok ) 83
कदाचिच्छ्रे ष्ठिनो गेहं जङ्घाचारणयोर्युगम् । प्राविशद् भक्तितो स्थापयतां तौ दम्पती मुदा ॥८३॥
किसी एक दिन सेठ कुबेरकान्तके घर दो जंघाचारण मुनि पधारे। दोनों ही दम्पतियोंने बड़ी भक्ति और आनन्दके साथ उनका पडगाहन किया ।।८३।।
“One day, two wandering ascetics of the Janghacharana order arrived at the home of the merchant Kubera-kānta. Both he and his wife, filled with deep devotion and joy, reverently welcomed them.” ॥83॥
श्लोक ( Shlok ) 84 – 85
“तदृष्टिमात्रविज्ञातप्राग्भवं तत्पदाम्बुजम् । कपोतमिथुनं पक्षैः परिस्पृश्याभिनम्य तत् ॥८४॥”गलितान्योन्यसम्प्रीति बभूवालोक्य तन्मुनी । जातसंसारनिर्वेंगौ निर्गत्यापगतौ गृहात् ॥८५।।
उन मुनियोंके दर्शन मात्रसे ही जिसने अपने पूर्वभवके सब समाचार जान लिये हैं ऐसे कबूतर कबूतरी (रति-वर-रतिषेणा) के जोड़ेने अपने पंखोंसे मुनिराजके चरणकमलोंका स्पर्श कर उन्हें नमस्कार किया और परस्परकी प्रीति छोड़ दी। यह देखकर उन मुनियोंको भी संसारसे वैराग्य हो गया और दोनों ही निराहार सेठके घरसे निकलकर बाहर चले गये ।।८४-८५।।
“At the very sight of those ascetics, the pair of pigeons—Rativara and Ratisheṇa—instantly recalled all the events of their past lives. With their wings, they tenderly touched the lotus feet of the venerable monks in reverent obeisance, and in that moment, they renounced their mutual attachment. Witnessing this, the ascetics themselves were moved to profound renunciation of the world; both departed from the merchant’s house, fasting, and withdrew to the outside.” ॥84–85॥
श्लोक ( Shlok ) 86
प्रियदत्तेङगितज्ञेतदवगत्यान्यदा तु ताम् । रतिषेणामपृच्छत्ते नाम प्राग्जन्मनीति किम् ॥८६॥
इशारोंको समझनेवाली प्रियदत्ताने यह सब जानकर किसी समय रतिषेणा कबूतरीसे पूछा कि पूर्वजन्म-में तुम्हारा क्या नाम था ? ॥८६॥
“Perceiving the subtle signs of Priyadattā’s understanding, she one day inquired of Ratisheṇā, saying, ‘Tell me—what was your name in your former birth?’” ॥86॥
श्लोक ( Shlok ) 87
सा तुण्डेनालिखन्नाम रतिवेगेति वीक्ष्य तत्। ममैषा पूर्वभार्येति कपोतः प्रीतिमीयिवान् ॥८७।।
उसने भी चोंचसे ‘रतिवेगा’ यह नाम लिख दिया । उसे देखकर यह पूर्वजन्मकी मेरी स्त्री है यह जानकर कबूतर बहुत प्रसन्न हुआ ॥८७॥
“She too inscribed her name, ‘Rativegā,’ with her beak. Seeing this, the pigeon realized with great joy, ‘She is my wife from a former birth.’” ॥87॥
श्लोक ( Shlok ) 88
तथा रतिवरः पृष्टः स्वनाम “प्रियदत्तया । सुकान्तोऽस्म्यहमित्येषोऽप्यक्षराण्यलिखद् भुवि ॥ ८८॥
इसी प्रकार प्रियदत्ताने रतिवर कबूतरसे भी उसके पूर्वजन्मका नाम पूछा तब उसने भी मैं पूर्व जन्ममें सुकान्त नामका था ऐसे अक्षर जमीनपर लिख दिये ॥८८॥
“In the same manner, Priyadattā asked the pigeon Rativara his name from their past birth. He too inscribed letters upon the ground, declaring, ‘In my former life, I was named Sukānta.’” ॥88॥
श्लोक ( Shlok ) 89
तन्निरीक्ष्य ममैवायं पतिरित्यभिलाषुका । रतिषेणाऽप्यगात्तेन सङ्गमं विध्यनुग्रहात् ॥८९॥
उन्हें देखकर और यह मेरा ही पति है यह जानकर उसीके साथ रहनेकी अभिलाषा करती हुई रतिषेणा भी दैवके अनुग्रहसे उसी के साथ समागमको प्राप्त हुई-दोनों साथ साथ रहने लगे ।।८९।।
“Beholding him and realizing, ‘This is my very own husband,’ Ratisheṇā, filled with the desire to dwell with him once more, was, by the grace of destiny, reunited with him. Thereafter, the two lived together in companionship once again.” ॥89॥
श्लोक ( Shlok ) 90
तत्सभार्वातनामेतत् श्रुत्वा प्रीतिरभूदलम् । पुनः शुश्रूषवश्चासन् कथाशेष” सकौतुकाः ॥९०॥
यह सब सुनकर सभामें बैठे हुए सभी लोगोंको बहुत भारी प्रसन्नता हुई और कथाका शेष भाग सुननेकी इच्छा करते हुए सभी लोग बड़ी उत्कण्ठासे बैठे रहे ।।९०।।
श्लोक ( Shlok ) 91 – 92
अन्यच्चाकर्णितं दृष्टमावाभ्यां यदि चेत्त्वया । ज्ञायते तच्च वक्तव्यमित्युक्तवति कौरवे ॥९१॥निजवागमुताम्भोभिः सिञ्चन्ती तां सभां शुभाम् । सुलोचनाऽब्रवीत् सम्यग्ज्ञायते श्रूयतामिति ॥९२॥
‘इसके सिवाय हम दोनोंने और भी जो कुछ देखा या सुना है उसे यदि जानती हो तो कहो’ इस प्रकार जयकुमारके कहनेपर अपने ‘वचनामृतरूपी जलसे उस शुभ सभाको सींचती हुई सुलोचना कहने लगी’- ‘हाँ, अच्छी तरह जानती हूँ, सुनिये ॥ ९१-९२॥
“Then Jayakumar said, ‘Besides this, if you know anything more of what we both have seen or heard, speak of it.’ Thereupon, Sulochana—sprinkling that auspicious assembly with the nectarous waters of her words—began to speak: ‘Yes, I know it well. Listen carefully.’” ॥91–92॥
श्लोक 93 से 100
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81