आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164
श्लोक 165 से 181 जय-स्तुति
भरत ने भगवान की जय-स्तुति की, उन्हें कर्म-विजेता, सर्वज्ञ, और मोक्षदाता कहा। उनकी बाह्य विभूति वैराग्य को प्रभावित नहीं करती। उन्होंने भगवान को तीनों लोकों का स्वामी, अनन्त गुणों से युक्त, और अरिहंत कहा। गर्भ, दीक्षा, और मोक्ष कल्याणकों की प्रशंसा की। भगवान को वीतराग, स्वयंभू, और संसार-पारक कहकर नमस्कार किया। उनकी स्तुति से सभा पवित्र हुई।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 33 – Shlok 165 to 181
श्लोक ( Shlok ) 165
बहिविभूतिरित्युच्चैराविष्कृतमहोदयाः । लक्ष्मीमाध्यात्मिकीं व्यक्तं व्यनक्ति जिन तावकीम् ॥१६५॥
हे जिनेन्द्र, जिससे आपका महान् अभ्युदय या ऐश्वर्य प्रकट हो रहा है ऐसी यह आपकी अतिशय उत्कृष्ट बाह्य विभूति आपकी अन्तरङग लक्ष्मीको स्पष्ट रूपसे प्रकट कर रही है ।। १६५।।
O Lord Jinendra, this most sublime external glory of Yours—through which Your magnificent splendour and supreme majesty shine forth—clearly reveals the inner wealth of Your divine virtue and spiritual prosperity. ॥165॥
श्लोक ( Shlok ) 166
सभापरिच्छदः सोऽयं सुरैस्तव विनिर्मितः । वैराग्यातिशयं नाथ नोपहन्त्य प्रतर्कितः ॥ १६६॥
हे नाथ, जिसके विषयमें कोई तर्क-वितर्क नहीं कर सकता ऐसी यह देवोंके द्वारा रची हुई आपके समवसरण की विभूति आपके वैराग्यके अतिशय को नष्ट नहीं कर सकती है। भावार्थ-समवसरण सभाकी अनुपम विभूति देखकर आपके हृदयमें कुछ भी रागभाव उत्पन्न नहीं होता है ।।१६६।।
O Lord, this splendour of Your divine Samavasaraṇa—fashioned by the gods themselves and beyond the reach of all disputation or debate—cannot in the least diminish the intensity of Your supreme detachment.
Indeed, even amidst such unparalleled magnificence, not the slightest trace of attachment arises in Your heart. ॥166॥
श्लोक ( Shlok ) 167
इत्यत्यद्भुत्तमाहात्म्या स्त्रिजगद्वल्लभो भवान् । स्तुत्योपतिष्ठमानं मां पुनीतात्पूतशासनः ॥१६७॥
इस प्रकार जिनकी अद्भुत महिमा है, जो तीनों लोकोंके स्वामी हैं, और जिनका शासन अतिशय पवित्र है ऐसे आप स्तुतिके द्वारा उपस्थान (पूजा) करनेवाले मुझे पवित्र कीजिये ॥१६७।।
O Lord, whose wondrous glory is beyond compare, who reigns as the sovereign of the three worlds, and whose dominion is supremely pure—do sanctify me, who stands before You in devotion, offering praises as an act of worship. ॥167॥
श्लोक ( Shlok ) 168
अलं स्तुतिप्रपञ्चेन तवाचिन्त्यतमा गुणाः । जयेशान नमस्तुभ्यमिति संक्षेपतः स्तुवे ॥ १६८॥
हे भगवन्, आपकी स्तुतिका प्रपञ्च करना व्यर्थ है क्योंकि आपके गुण अत्यन्त अचिन्त्य हैं इसलिये मैं संक्षेपसे इतनी ही स्तुति करता हूं कि हे ईशान, आपकी जय हो और आपको नमस्कार हो ॥१६८।।
O Lord, to elaborate upon Your praise is but a futile endeavor, for Your virtues are utterly inconceivable. Therefore, in brief, I offer this single hymn: Victory unto You, O Supreme One, and salutations at Your divine feet. ॥168॥
श्लोक ( Shlok ) 169
जयेश जय निर्दग्धकर्मेन्धनजयाजर । जय लोकगुरो सार्व जयताज्जय जित्वर ॥१६९।।
हे ईश, आपकी जय हो, हे कर्मरूप ईंधनको जलानेवाले, आपकी जय हो, हे जरारहित, आपकी जय हो, हे लोकोंके गुरु, आपकी जय हो, हे सबका हित करने वाले, आपकी जय हो, और हे जयशील, आपकी जय हो ।॥ १६९॥
Victory unto You, O Lord! Victory unto You, O Destroyer of the fuel-like karma! Victory unto You, O One untouched by decay! Victory unto You, O Preceptor of all worlds! Victory unto You, O Benefactor of all beings! And victory unto You, O Ever-Victorious One! ॥169॥
श्लोक ( Shlok ) 170
जय लक्ष्मीपते जिष्णो जयानन्तगुणोज्ज्वल । जय विश्वजगद्बन्धो जय विश्वजगद्धित ॥१७०॥
अनन्तचतुष्ट्यरूप लक्ष्मीके स्वामी जयनशील, आपकी जय हो । हे अनन्तगुणोंसे उज्ज्वल, आपकी जय हो। हे समस्त जगत् के बन्धु, आपकी जय हो । हे समस्त जगत् का हित करनेवाले, आपकी जय हो ।॥१७०॥
Victory unto You, O Ever-Victorious Lord, Master of the divine wealth that is the fourfold infinity! Victory unto You, O Radiant One, resplendent with boundless virtues! Victory unto You, O Universal Friend of all beings! Victory unto You, O Benevolent One, who ever works for the welfare of the entire cosmos! ॥170॥
श्लोक ( Shlok ) 171
जयाखिलजगद्वेदिन् जयाखिलसुखोदय । जयाखिलजगज्ज्येष्ठ जयाखिलजगद्गुरो ॥१७१॥
हे समस्त जगत्को जाननेवाले, आपकी जय हो । हे समस्त सुखोंको प्राप्त करनेवाले, आपकी जय हो । हे समस्त जगत में श्रेष्ठ आपकी जय हो । हे समस्त जगत्के गुरु, आपकी जय हो ॥१७१॥
Victory unto You, O Knower of all worlds! Victory unto You, who has attained all supreme bliss! Victory unto You, the most exalted in all the realms of existence! Victory unto You, the Supreme Preceptor of the entire universe! ॥171॥
श्लोक ( Shlok ) 172
जय निर्जितमोहारे जय तर्जितमन्मथ । जय जन्मजरातङ्कविजयिन् विजितान्तक ॥१७२।।
हे मोहरूपी शत्रुको जीतनेवाले, आपकी जय हो । हे कामदेवको भर्त्सना करने वाले, आपकी जय हो। हे जन्मजरारूपी रोगको जीतनेवाले, आपकी जय हो। हे मृत्युको जीतनेवाले, आपकी जय हो । १७२॥
Victory unto You, O Conqueror of the enemy that is delusion! Victory unto You, who has vanquished the god of desire! Victory unto You, who has triumphed over the affliction of birth and decay! Victory unto You, who has overcome death itself! ॥172॥
श्लोक ( Shlok ) 173
जय निर्मद निर्माय जय निर्मोह निर्मम । जय निर्मल निर्द्वन्द्व जय निष्कल’ पुष्कल ॥१७३॥
हे मद रहित, मायारहित, आपकी जय हो । हे मोह रहित, ममता रहित, आपकी जय हो। हे निर्मल और निर्द्वन्द्व, आपकी जय हो । हे शरीर-रहित, और पूर्ण ज्ञानसहित, आपकी जय हो ।॥ १७३॥
Victory unto You, O One free from pride and untouched by illusion! Victory unto You, devoid of delusion and untainted by attachment! Victory unto You, ever pure and beyond all dualities! Victory unto You, who is without body and endowed with perfect knowledge! ॥173॥
श्लोक ( Shlok ) 174
जय प्रबुद्ध सन्मार्ग जय दुर्मार्गरोधन । जय कर्मारिमर्माविद्धर्मचक्र जयोद्धुर ॥१७४।॥
हे समीचीन मार्गको जाननेवाले, आप की जय हो । हे मिथ्या मार्गको रोकनेवाले, आपकी जय हो । हे कर्मरूपी शत्रुओंके मर्मको बेधन करनेवाले, आपकी जय हो । हे धर्मचक्रके द्वारा विजय प्राप्त करनेमें उत्कट, आपकी जय हो ॥१७४।।
Victory unto You, O Knower of the righteous path! Victory unto You, who halts the course of falsehood and error! Victory unto You, who pierces the very heart of the enemy that is karma! Victory unto You, who is ever fervent in triumph through the wheel of Dharma! ॥174॥
श्लोक ( Shlok ) 175
जयाध्वरपते यज्वन् जय पूज्य महोदय । जयोद्धुर जयाचिन्त्य सद्धर्म रथसारथे ॥१७५॥
हे यज्ञके अधिपति, आपकी जय हो। हे कर्मरूप ईधन को ध्यानरूप अग्नि में होम करनेवाले, आपकी जय हो। हे पूज्य तथा महान् वैभवको धारण करनेवाले, आपकी जय हो । हे उत्कृष्ट दयारूप चिह्नसे सहित तथा हे समीचीन धर्मरूपी रथके सारथि, आपकी जय हो ।। १७५।।
Victory unto You, O Lord of the sacred fire! Victory unto You, who offers the fuel of karma into the fire of meditation! Victory unto You, who bears the supreme and exalted glory! Victory unto You, who is adorned with the highest symbol of compassion, and who serves as the charioteer of the righteous path, the true chariot of Dharma! ॥175॥
श्लोक ( Shlok ) 176
जय निस्तीर्णसंसारपारावारगुणाकर । जय निःशेषनिष्पीतविद्यारत्नाकर प्रभो ॥१७६॥
हे संसाररूपी समुद्रको पार करनेवाले, हे गुणोंकी खानि, आपकी जय हो । हे समस्त विद्यारूपी समुद्रका पान करनेवाले, हे प्रभो, आपकी जय हो ॥ १७६॥
Victory unto You, O One who has crossed the ocean of worldly existence! Victory unto You, O Treasure-house of virtues! Victory unto You, O Lord, who has drunk deeply from the ocean of all knowledge! ॥176॥
श्लोक ( Shlok ) 177
नमस्ते परमानन्तसुखरूपाय तायिने । नमस्ते परमानन्दमयाय परमात्मने ॥१७७॥
आप उत्कृष्ट अनन्त सुखरूप हैं तथा सबकी रक्षा करनेवाले हैं इसलिये आपको नमस्कार हो । आप परम आनन्दमय और परमात्मा हैं इसलिये आपको नमस्कार हो ।। १७७।।
Salutations to You, O Lord, who are the embodiment of supreme and infinite bliss, and who is the protector of all beings! Salutations to You, O Supreme One, the source of eternal joy and the ultimate reality! ॥177॥
श्लोक ( Shlok ) 178
नमस्ते भुवनोद्भासिज्ञानभाभारभासिने । नमस्ते नयनानन्दिपरमौदरिकत्विषे ॥ १७८।।
आप समस्त लोकको प्रकाशित करनेवाले ज्ञानकी दीप्तिके समूहसे देदीप्यमान हो रहे हैं इसलिये आपको नमस्कार हो । आपके परमौदारिक शरीरकी कान्ति नेत्रोंको आनन्द देनेवाली है इसलिये आपको नमस्कार हो ॥१७८॥
Salutations to You, O Lord, who shines resplendent with the radiance of knowledge, illuminating all the worlds! Salutations to You, whose divine and boundless form is a source of delight to the eyes, its brilliance granting joy to all who behold it! ॥178॥
श्लोक ( Shlok ) 179
नमस्ते मस्तकन्यस्तस्वहस्ताञ्जलिकुड्मलैः । स्तुताय त्रिदशाधीशैः स्वर्गावतरणोत्सवे ॥१७९॥
हे देव, स्वर्गावतरण अर्थात् गर्भकल्याणकके उत्सवके समय इन्द्रोंने अपने हाथों की अञ्जलिरूपी बिना खिले कमल अपने मस्तकपर रखकर आपकी स्तुति की थी इसलिये आपको नमस्कार हो ।॥ १७९॥
Salutations to You, O Lord, whom the gods praise with reverence! At the time of Your divine descent and the auspicious celebration of the birth of the cosmic welfare, Indra himself, placing his hands in prayer like unopened lotus buds upon his head, offered his homage to You. ॥179॥
श्लोक ( Shlok ) 180
नमस्ते प्रचलन्मौलिघटिताञ्जलिबन्धनैः । नुताय मेरुशैलाग्रस्नाताय सुरसत्तमैः ॥१८०॥
अपने नम्र हुए मस्तकपर दोनों हाथ जोड़कर रखनेवाले उत्तम उत्तम देवोंने जिनकी स्तुति की है तथा सुमेरु पर्वतके अग्रभागपर जिनका जन्माभिषेक किया गया है ऐसे आपके लिये नमस्कार है ॥ १८०।।
Salutations to You, O Lord, to whom the finest of the deities, having humbled their heads and folded their hands in reverence, have offered their praise! Salutations to You, upon whom the sacred anointing of birth was performed at the very peak of Mount Meru, the seat of the gods! ॥180॥
श्लोक ( Shlok ) 181
नमस्ते मुकुटोपाग्रलग्नहस्तपुटोद्भटैः । लौकान्तिकैरधीष्टाय परिनिष्क्रमणोत्सवे ॥ १८१॥
दीक्षाकल्याणकके उत्सवके समय अपने मुकुट के समीप ही हाथ जोड़कर लगा रखनेवाले लौकान्तिक देवोंने जिनका अधिष्ठान अर्थात् स्तुति की है ऐसे आपके लिये नमस्कार हो ॥१८१॥
Salutations to You, O Lord, whom the celestial deities, placing their folded hands near their crowns in humble reverence, have glorified during the auspicious occasion of Your initiation ceremony! Salutations to You, whose divine presence is the very foundation of their praise and devotion! ॥181॥
श्लोक 182 से 191
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164
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