आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361
श्लोक 362 से 367 जयकुमार की महिमा और पर्व का समापन
जयकुमार की विजयलक्ष्मी सूर्य की तरह चमकी। उसने सुलोचना के साथ विवाह की इच्छा प्रकट की और यशरूपी सेहरा धारण किया। यह पर्व विजय के लिए जिनेन्द्र की शरण लेने का महत्व दर्शाता है। गुणभद्राचार्य द्वारा रचित त्रिषष्टिलक्षण महापुराण का यह चवालीसवाँ पर्व जयकुमार की विजय के साथ समाप्त होता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 362 to 367
श्लोक ( Shlok ) 362
इत्थं भवन्तमतिभक्तिपथं निनीषोः प्रागेव बन्धकलयः प्रलयं व्रजन्ति ।पश्चादनश्वरमयाचितमप्यवश्यं सम्पत्स्यतेऽस्य विलसद्गुणभद्रभद्रम् ॥३६२॥
हे शोभायमान गुणोंसे कल्याण करनेवाले जिनेन्द्र, इस प्रकार जो आपको अतिशय भक्तिके मार्गमें ले जाना चाहता है उसके कर्मबन्धके सब दोष पहले हीसे प्रलयको प्राप्त हो जाते हैं और फिर पीछेसे कभी नष्ट नहीं होनेवाला मोक्षरूपी, कल्याण बिना मांगे ही अवश्य प्राप्त होजाता है ।॥३६२।।
O Lord Jina, radiant with auspicious virtues and the bestower of supreme welfare—For one who is led upon the path of intense devotion unto You,all the faults of karmic bondage are dissolved from the very outset,and thereafter, unasked and inevitable, comes the unfailing blessing of liberation itself.362
श्लोक ( Shlok ) 363
परिणतपरितापात्स्वेदधारी विलक्षो विगलितविभुभावो विह्वलीभूतचेताः ।अधित विधिविधानं चिन्तयश्चक्रिसूनु-विरहविधुरवृत्ति वीरलक्ष्मीवियोग ॥३६३॥
प्राप्त हुए संतापसे जिसे पसीना आ रहा है, जो लज्जित हो रहा है, ‘मैं सबका स्वमी हूँ’ ऐसा अभिप्राय जिसका नष्ट हो गया है, जिसका चित्त विह्वल हो रहा है, और जो भाग्यकी गतिका विचार कर रहा है ऐसे अर्ककीतिने वीरलक्ष्मीका वियोग होनेपर उसके विरहसे विधुर वृत्ति धारण की थी ।॥ ३६३॥
Overcome by suffering, perspiring from anguish, abashed and humbled—his former pride of being “lord of all” now utterly broken—his mind bewildered and absorbed in pondering the strange turns of fate,Arkakīrti, bereft of Vīralakṣmī, assumed the forlorn state of one widowed by the loss of heroic glory.363
श्लोक ( Shlok ) 364
येषामयं जितसुरः समरे सहाय-स्तानप्यहं कृतरतिः समुपासयामि ।धुर्योऽयमेव यदि काऽत्र ‘विलम्बनेति मत्वेव भङ्क्षु समियाय जयं जयश्रीः ॥३६४॥
देवोंको जीतनेवाला यह जयकुमार युद्धमें जिनकी सहायता करता है मैं उनकी भी बड़े प्रेमसे उपासना करती हूँ, फिर यदि यह ही सबमें मुख्य हो तो इसमें विलम्ब क्यों करना चाहिये ऐसा मानकर ही मानो विजयलक्ष्मी जयकुमार के पास बहुत शीघ्र आ गई थी ।॥ ३६४।॥
“He, who aids even the victors of the gods in battle—such a Jayakumāra I already revere with deepest love. And if he is indeed foremost among all, why should I delay any longer?”Thinking thus, it was as though Vijayalakṣmī herself came swiftly and willingly to dwell with Jayakumāra.364
श्लोक ( Shlok ) 365
सबहुतरमराजन्प्रोच्छ्रितान् शत्रुपांसून् *द्रुतमिति शमयित्वा वृष्टिभिः सायकानाम् । उपगतहरिभूमिः प्राप्य भूरिप्रतापं दिनकर इव कन्या” सम्प्रयोगाभिलाषी ॥३६५।।
इस प्रकार बाणोंकी वर्षासे ऊपर उठी हुई शत्रुरूपी धूलिको शीघ्र ही नष्ट कर पराक्रमके द्वारा सिंहका स्थान प्राप्त करनेवाला और अब कन्याके संयोगका अभिलाषी जयकुमार उस सूर्यकी तरह बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा था जोकि सिंह राशिपर रहकर कन्या राशिपर आना चाहता है ॥ ३६५॥
Thus, having scattered the dust of enemies—raised high by a storm of arrows—and won the lion’s place through his valour,
Jayakumāra now longed for union with the maiden.
He shone resplendently, like the sun itself—having passed through Siṁha (Leo), now desirous of entering Kanyā (Virgo).365
श्लोक ( Shlok ) 366
सौभाग्येन यदा स्ववक्षसि धृता माला तदेवापरं वीरो वीघ्रमवार्यवीर्यविभवो विभ्रश्य विश्वद्विषः।वीरश्रीविहितं दधौ स शिरसाऽम्लानं यशः शेखरं लक्ष्मीवान् विदधाति साहससखः किंवा न पुण्योदये ॥३६६।।
जिसकी पराक्रमरूपी सम्पत्ति का कभी कोई निवारण नहीं कर सकता ऐसे शूरवीर जयकुमारने जिस समय सौभाग्यके वश से अपने वक्षःस्थलपर माला धारण की थी उसी समय सब शत्रुओंको नष्ट कर वीरलक्ष्मीका बना हुआ तथा कभी नहीं मुरझानेवाला यशरूपी दूसरा सेहरा भी उसने अपने मस्तकपर धारण किया था, सो ठीक ही है क्योंकि जो लक्ष्मीमान् है, साहसका मित्र है और जिसके पुण्यका उदय है वह क्या नहीं कर सकता है ? ।।३६६।।
At the very moment when the valiant Jayakumāra—whose wealth of prowess none could withstand—wore the garland upon his chest under the sway of good fortune,he also, by vanquishing all his foes, adorned his brow with another wreath: the unfading Veeralakṣmī, the glory of heroism.And rightly so—for what is impossible for one who possesses fortune, is a friend of courage, and is blessed by the rising tide of merit?366
श्लोक ( Shlok ) 367
‘जयोऽ यात्सोऽयश्च प्रभवति गुणेभ्यो गुणगणः सदाचारात्सोऽपि तव विहितवृत्तिः श्रुतमपि ।प्रणीतं सर्वज्ञैर्विदितसकलास्ते खलु जिना-स्ततस्तान् विद्वान् सँश्रयतु जयमिच्छन् जय इव ॥३६७।।
इस संसारम विजय पुण्यसे होती है, वह पुण्य गुणोंसे होता है, गुणोंका समह सदाचारसे होता है, उस सदाचारका निरूपण शास्त्रोंमें है, शास्त्र सर्वज्ञ देवके कहे हुए हैं और सर्वज्ञ सब पदार्थोंको जाननेवाले जिनेन्द्रदेव हैं इसलिये विजयकी इच्छा करनेवाले विद्वान् पुरुष जयकुमारके समान उन्हीं जिनेन्द्रदेवोंका आश्रय करें-उन्हींकी सेवा करें ।॥३६७।।
In this world, victory arises from merit,merit springs from virtue,
virtue is born of righteous conduct,righteous conduct is revealed through the scriptures,and the scriptures are the word of the omniscient Lord,who alone knows all substances—He is the Jinendra.Therefore, let the wise who seek true victory take refuge in that very Lord,and, like Jayakumāra, render devoted service unto Him.367
इत्यार्षे त्रिषष्टिलक्षणश्रीमहापुराणसङग्रहे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते जयविजयवर्णनं नाम चतुश्चत्वारिंशत्तमं पर्व
इस प्रकार गुणभद्राचार्यविरचित त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके हिन्दी भाषानुवादमें जयकुमारकी विजयका वर्णन करनेवाला चवालीसवां पर्व समाप्त हुआ ।
Thus ends the forty-fourth canto,describing the victory of Jayakumāra,in the Hindi translation of the Triṣaṣṭilakṣaṇa Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the venerable Guṇabhadra Āchārya.
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन
पर्व 45 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361