आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111 : हिमवान् देव का सत्कार और पर्वत की प्रशंसा
चक्रवर्ती भरत ने हिमवान् देव के वचनों की प्रशंसा कर सभी देवों का सत्कार किया और उन्हें विदा किया। किन्नर देव हिमवान् की विजय के मंगलगीत गा रहे थे। हिमवान् के वनों का शीतल वायु और स्थल कमलिनियों का रज भरत की सेवा कर रहा था। उनकी कीर्ति हिमवान् के लतागृहों में फैली। भरत ने पर्वत की ऊँचाई, विस्तार, और रत्नों की समानता को स्वयं से तुलनीय माना। पुरोहित ने हिमवान् की शोभा और भरत की उदारता की तुलना की, जिससे भरत संतुष्ट हुए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
मानयन्निति तद्वाक्यं स तानमरसत्तमान् । व्यसर्जयत्स्वसात्कृत्य यथास्वं कृतमा ननान् ॥१०२॥
इस प्रकारके उस देवके वचनोंकी प्रशंसा करते हुए भरतने उन सब उत्तम देवो का सत्कार किया और सब को अपने आधीन कर विदा कर दिया ॥१०२॥
“Praising the words of that deity, Bharata honored all the noble gods, received them with due reverence, and after bringing them under his allegiance, graciously dismissed them.” ॥102॥
श्लोक ( Shlok ) 103
हिमवज्जयशंसीनि मङ्गलान्यस्य किन्नराः । जगुस्तत्कुञ्जदेशेषु स्वैरमारब्धमूर्च्छना ॥१०३॥
उस समय अपने इच्छानुसार स्वरोंका चढ़ाव-उतार करनेवाले किन्नर देव उस पर्वतके लतागृहोंके प्रदेशों में ‘भरतने हिमवान् देवको जीत लिया है’ इस बातको सूचित करने-वाले मंगलगीत गा रहे थे ॥ १०३॥
“At that time, the celestial Kinnaras—masters of modulating tones at will—sang auspicious songs within the vine-covered groves of the mountain, proclaiming that ‘Bharata has conquered the deity of Himavat.'” ॥103॥
श्लोक ( Shlok ) 104
असकृत किन्नरस्त्रीणामाधुन्वानाः स्तनावृतीः । सरोवीचिभिदो मन्दमायववुस्तद्वनानिलाः ॥१०४॥
उस समय वहां किन्नर देवोंकी स्त्रियोंके स्तन ढकनेवाले वस्त्रोंको बार-बार हिलाता हुआ तथा तालाबकी तरंगोंको छिन्न भिन्न करता हुआ उस हिमवान् पर्वतके वनोंका वायु धीरे धीरे बह रहा था ।। १०४।।
“At that time, a gentle breeze flowed through the forests of Mount Himavat, repeatedly fluttering the garments that veiled the breasts of the Kinnara maidens and scattering the ripples upon the lotus-filled ponds.” ॥104॥
श्लोक ( Shlok ) 105
स्थलाब्जिनीघनाद्विप्वक् किरन् किजल्कजं रज. । हिमी हिमाद्रिकुञ्जेभ्यस्तं सिषेवे समीरणः ॥१०५॥
स्थल कमलिनियोंके वनके चारों ओर केशरसे उत्पन्न हुआ रज फैलाता हुआ तथा हिमवान् पर्वतके लतागृहोंसे आया हुआ शीतल वायु महाराज भरतकी सेवा कर रहा था ।। १०५।।
“The cool breeze, born from the vine-groves of Mount Himavat and perfumed with pollen scattered from the forest of ground-lotuses, gently swept around, as if rendering devoted service to King Bharata.” ॥105॥
श्लोक ( Shlok ) 106
स्थलाम्भोरुहिणीवास्य कीर्तिः साकं जयश्रिया । हिमाचलनिकुञ्जेषु पप्रथे दिग्जयार्जिता ॥१०६॥
दिग्विजय करनेसे प्राप्त हुई भरतकी कीति जयलक्ष्मीके साथ साथ स्थलकमलिनियोंके समान हिमवान् पर्वतके लतागृहोंमें फैल रही थी ॥१०६॥
“The glory of Bharata, earned through his conquest of the quarters, spread through the vine-groves of Mount Himavat like the blossoming ground-lotuses, accompanied by the radiant goddess of victory.” ॥106॥
श्लोक ( Shlok ) 107
हिमाचलस्थलेष्वस्य धृतिरासीत् प्रपश्यतः । कृतोपहारकृत्येषु स्थलाम्भोजेर्विकस्वरैः ॥१०७॥
जिन्होंने फूले हुए स्थल कमलोंसे उपहारका काम किया है ऐसे हिमवान् पर्वतके स्थलोंमें चारों ओर देखते हुए भरतको बहुत ही संतोष होता था ।।१०७।।
“As Bharata beheld the lands of Mount Himavat, where the blooming ground-lotuses offered themselves as gifts, a deep contentment arose within him.” ॥107॥
श्लोक ( Shlok ) 108
तमुच्चैर्वृत्तिमाक्रान्तदिक्चक्रं विधृतायतिम् । स्वमिवानल्पस्त्रर्द्धिं हिमार्द्रिं बह्वमंस्त मः ॥१०८॥
वह हिमवान् पर्वत ठीक भरतके समान था क्योंकि जिस प्रकार भरत उच्चैवृत्ति अर्थात् उत्कृष्ट व्यवहार धारण करनेवाले थे उसी प्रकार वह पर्वत भी उच्चैर्वृत्ति अर्थात् बहुत ऊँचा था, जिस प्रकार भरतने अपने तेजसे समस्त दिशाएँ व्याप्त कर ली थी उसी प्रकार उस पर्वतने भी अपने विस्तार से समस्त दिशाएँ व्याप्त कर ली थीं, जिस प्रकार भरत आयति अर्थात् उत्तम भवितव्यता (भविष्यत्काल) धारण करते थे उसी प्रकार वह पर्वत भी आयति अर्थात् लम्बाई धारण कर रहा था और जिस प्रकार भरतके पास अनेक रत्नरूपी सम्पदाएँ थीं उसी प्रकार उस पर्वत के पास भी अनेक रत्नरूपी सम्पदाएँ थीं। इस प्रकार अपनी समानता रखनेवाले उस हिमवान् पर्वतको भरतने बहुत कुछ माना था-आदरकी दृष्टिसे देखा था ।॥ १०८॥
“That Mount Himavat was verily akin to Bharata himself: as Bharata possessed lofty conduct, so was the mountain of lofty height; as Bharata, with his brilliance, had pervaded all quarters, so too did the mountain encompass the directions with its vast expanse; as Bharata bore the promise of a noble future, so did the mountain stretch forth in length; and as Bharata was endowed with countless gem-like virtues, so too was the mountain rich in manifold treasures. Thus, perceiving in Himavat a reflection of his own greatness, Bharata beheld it with deep reverence and esteem.” ॥108॥
श्लोक ( Shlok ) 109
अत्रान्तरे गिरीन्द्रेऽस्मिन् व्यापारितदृशं प्रभुम् । विनोदयितुमित्युच्चै पुरोधा गिरमभ्यधात् ॥१०९।॥
इसी बीचमें, जब कि महाराज भरत अपनी दृष्टि हिमवान् पर्वतपर डाले हुए थे उसकी शोभा निहार रहे थे तब पुरोहित उन्हें आनन्दित करनेके लिये नीचे लिखे अनुसार उत्कृष्ट वचन कहने लगा ॥१०९।।
“In that very moment, as King Bharata cast his gaze upon Mount Himavat, beholding its resplendent beauty, the royal priest, desiring to delight him, began to speak noble and uplifting words as follows.” ॥109॥
श्लोक ( Shlok ) 110
हिमवानयमुत्तुङ्गः सङ्गतः सततं श्रिया । कुलक्षोणीभृतां धुर्यो धत्ते युष्मदनुक्रियाम् ॥११०॥
हे प्रभो, यह हिमवान् पर्वत बहुत ही उत्तुङ्ग अर्थात् ऊँचा है, सदा श्री अर्थात् शोभा से सहित रहता है और कुलक्षोणीभूत् अर्थात् कुलाचलोंमें श्रेष्ठ है इसलिये आपका अनुकरण करता है-आपकी समानता धारण करता है क्योंकि आप भी तो उत्तुङ्ग अर्थात् उदारमना हैं, सदा श्री अर्थात् राज्यलक्ष्मीसे सहित रहते हैं और कुलक्षोणीभृत् अर्थात् वंशपरम्परासे आये हुए राजाओंमें श्रेष्ठ हैं ॥ ११०॥
“O Lord, this lofty Mount Himavat is ever adorned with splendour and stands foremost among all noble mountains; thus does it emulate Your Majesty—for You too are lofty in spirit, ever graced with royal fortune, and supreme among the sovereigns of your noble lineage.” ॥110॥
श्लोक ( Shlok ) 111
अहो महानयं शैलो दुरारोहो दुरुत्तरः। शरसन्धानमात्रेण सिद्धो युष्मन्महोदयात्॥ १११॥
अहा, कितना आश्चर्य है कि यह बड़ा भारी पर्वत, जो कि कठिनाईसे चढ़ने योग्य है और जिसका पार होना अत्यन्त कठिन है, डोरीपर बाण रखते ही आपके पुण्य प्रतापसे आपके वश हो गया है ॥ १११।।
“Ah! How wondrous indeed—that this mighty mountain, arduous to ascend and well-nigh impossible to cross, has, by the sheer force of your righteous glory, come under your sway the very moment you placed the arrow upon the bowstring.” ॥111॥
श्लोक 112 से 121
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
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