Hindi Translation of Adi purana Parv 29
श्लोक 1 से 11 : चक्रवर्ती भरत का प्रस्थान और सेना की भव्यता
अथानन्तर-चक्रवर्ती भरत समस्त इष्ट वस्तुओंको सिद्ध करनेवाली जिनेन्द्रदेवकी पूजा कर दक्षिण दिशाको जीतनेकी इच्छा करते हुए समुद्र के किनारे किनारे चले ।।१।। जिस समय चक्रवर्ती जा रहा था उस समय तुरहीके शब्दोंसे मिली हुई बड़े बड़े नगाड़ोंकी गंभीर ध्वनि समुद्रकी गर्जनाको भी ढक रही थी ।।२।। हाथियोंकी चिग्वाड़ोंसे मिले हुए प्रस्थानके समय बजनेवाले नगाड़ोंके शब्द समस्त दिशाओं तथा शत्रुओंके हृदयोंको क्षोभ प्राप्त करा रहे थे ॥३॥ जीतनेकी इच्छा करनेवाले चक्रवर्तीकी वायुसे उड़ती हुई विजय-पताकाएं ऐसी सुशो-भित हो रही थीं मानो ज्वारसे उठी हुई समुद्रकी लहरोंको ही बुला रही हों ॥४।। उस सेनाके एक ओर (दक्षिणकी ओर) तो लवण समुद्र था और दूसरी (उत्तर की ओर उपसागर था उन दोनोंके बीच जाता हुआ वह सेनाका समूह ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो तीसरा समुद्र ही हो ।।५।। हाथी, घोड़े, रथ, पियादे, देव और विद्याधर यह छह प्रकारकी चक्रवर्तीकी सेना आकाश और पृथिवीके अन्तरालको व्याप्त कर सब ओर फैल गई थी ॥६॥ सेनामें सबसे आगे दण्डरत्न और उसके पीछे चक्ररत्न चलता था तथा इन दोनोंके द्वारा साफ किये हुए मार्गमें सुखपूर्वक चक्रवर्तीकी सेना चलती थी ।।७।। चक्रवर्तीका वह एक चक्र ही शत्रुओंके समूहको नष्ट करनेके लिये करोंतके समान था तथा दण्ड ही दण्ड देने योग्य शत्रुओंके लिये दूसरे यमदण्डके समान था ।।८।। सम्म्राट् भरत समुद्रके समीप समीप किनारेकी वेदीके पास पास किनारेके अनुसार अपनी सेनाके द्वारा दिशाओंको गुंजाते हुए सचेत करते हुए चले ॥९॥ अपनी अलंघनीय सेनाको समुद्रके किनारे किनारे चलाते हुए चक्रवर्ती भरत अपनी आज्ञा-रूपी लताको राजारूपी पर्वतोंके मस्तकपर चढ़ाते जाते थे ।।१०।। महाराज भरतके शत्रु उनके सेनापतियोंके समान थे, क्योंकि जिस प्रकार महाराजके चलनेकी इच्छा होते ही सेनापति पहले ही चलनेके लिये तैयार हो जाते हैं उसी प्रकार उनके शत्रु भी महाराजको चलनेके लिये तत्पर सुनकर स्वयं चलनेके लिये तत्पर हो जाते थे अर्थात् स्थान छोड़कर भागनेकी तैयारी करने लगते थे अथवा भरत की ही शरणमें आनेके लिये उद्यत हो जाते थे, जिस प्रकार महाराज के नगरसे बाहर निकलते ही सेनापति उनसे पहले बाहर निकल आते हैं उसी प्रकार उनके शत्रु भी महाराजको नगरसे बाहिर निकला हुआ सुनकर स्वयं अपने नगरसे बाहर निकल आते थे अर्थात् नगर छोड़कर बाहर जानेके लिये तैयार हो जाते थे अथवा भरतसे मिलनेके लिये अपने नगरोंसे बाहर निकल आते थे और जिस प्रकार महाराजके प्रस्थान करते ही सेनापति उनसे पहले प्रस्थान कर देते हैं उसी प्रकार उनके शत्रु भी महाराजका प्रस्थान सुनकर उनसे पहले ही प्रस्थान कर देते थे अर्थात् अन्यत्र भाग जाते थे अथवा चक्रवर्तीसे मिलने के लिये आगे बढ़ आते थे ।।११।।
श्लोक 12 से 21 : शत्रुओं का भय और पराजय
चक्रवर्ती भरत नगरसे बाहर निकला यह सुनकर जो व्याकुल हो जाते थे, चक्रवर्ती आया यह सुनकर जो भयभीत हो जाते थे और वह समीप आया यह सुनकर जो अस्थिरचित्त हो जाते थे ऐसे शत्रु राजा लोग उन्हें जगह जगह प्रणाम करते ॥१२॥ जिस प्रकार किसी महानदीके बलवान् वेगके विरुद्ध खड़ा हुआ वृक्ष निर्मूल हो जाता है-जड़ सहित उखड़ जाता है उसी प्रकार जो राजा उस बलवान् चक्रवर्तीके विरुद्ध खड़ा होता था उसके सामने विनयभाव धारण नहीं करता था वह निर्मूल हो जाता था-वंशसहित नष्ट हो जाता था ॥१३॥ एक पराक्रम ही जिसे प्रिय है ऐसा वह भरत जब कि दर्पणमें उलटे पड़े हुए अपने प्रतिविम्बको भी सहन नहीं करता था तब शत्रुओंको किस प्रकार सहन करता ? ॥१४॥ कितने ही विरोधी राजाओंने तो उनकी सेनाका शब्द सुनते ही बहुत दूर भागकर हरिणकी वृत्ति प्रारम्भ की थी ।।१५।। और कितने ही वैभवशाली बड़े बड़े राजाओंने भयसे अपने अपने देश छोड़कर छत्र चमर आदि राज्य-चिह्नों को उस प्रकार छोड़ दिया था जिस प्रकार कि बड़े बड़े फणाओंको धारण करनेवाले सर्प अपने वलयाकार आसनको छोड़कर कांचली छोड़ देते हैं ।।१६।। जिस प्रकार दुष्ट सर्पोको मंत्रके जोरसे उठाकर वामीमें डाल देते हैं उसी प्रकार भरतने अन्य कितने ही भोगी-विलासी दुष्ट राजाओंको मंत्र (मंत्रियोंके साथ की हुई सलाह). के जोरसे उखाड़कर किलोंमें डाल दिया था, उनके स्थानपर अन्य कुलीन राजाओंको बैठायाथा ॥१७॥ जिन्हें अन्य कोई शरण नहीं थी और जो अपना संताप नष्ट करना चाहते थे ऐसे कितने ही राजाओंने सुख तथा शान्ति देनेवाली भरतके चरणरूपी वृक्षोंकी छायाका आश्रय लिया था ॥१८॥ जिस प्रकार समीप आया हुआ ग्रीष्म ऋतु वृक्षोंके पत्र अर्थात् पत्तोंका नाश कर देता है और उनकी छाया अर्थात् छांहरीका अभाव कर देता है उसी प्रकार समीप आये हुए भरतने कितने ही राजाओंके पत्र अर्थात् हाथी घोड़े आदि वाहनों (सवारियों) का नाश कर दिया था और उनकी छाया अर्थात् कान्तिका अभाव कर दिया था । भावार्थ-भरतके समीप आते ही कितने ही राजा लोग वाहन छोड़कर भाग जाते थे तथा उनके मुखकी कान्ति भयसे नष्ट हो जाती थी ।।१९।। महाराज भरतके समीप आते ही शत्रु राजाओंका सब तेज (पक्ष में गर्मी) नष्ट हो गया था, उनके भारी भारी श्वासोच्छ्वास चलने लगे थे और वे अन्तःकरण में व्याकुल हो रहे थे, केवल उनका मरना ही बाकी रह गया था ।। २० ।। जिस पुरुषने भरतके साथ शत्रुता करनेकी इच्छा की थी वह पहले ही नष्ट हो चुका था, सो ठीक ही है क्योंकि अग्नि को बुझानेकी इच्छा करनेवाला पतंगा क्या कभी सकुशल रह सकता है ? अर्थात् नहीं ॥२१॥
श्लोक 22 से 31 : शत्रुओं का धन-हरण और प्रजा का कल्याण
महाराज भरतने शत्रुओंके हीरा मोती आदि रत्न तथा सवारी आदि सब धन छीन लिया था और इस प्रकार उन्होंने समस्त अरि अर्थात् शत्रुओंके समूहको स्पष्ट रूपसे अरि अर्थात् धन-रहित कर दिया था ।। २२ ।। अपने आप समस्त धन भेंट कर चक्रवर्तीको नमस्कार करनेवाले राजा लोग यद्यपि पहले शत्रु थे तथापि पीछेसे वे बड़े भारी अधिकारी हुए थे ।॥२३॥ जो पृथिवी पहले भरतकी सेनासे आक्रान्त होकर भयभीत हो रही थी वही पृथिवी अब अपने धनसे भरत को संतोष प्राप्त कराकर निर्भय हो गई थी ॥२४॥ उच्च कुलोंमें उत्पन्न हुए अनेक राजाओं ने भरतेश्वरके लिये अपनी कुल-परम्परासे चला आया धन देकर फिरसे अपनी पृथिवी प्राप्त की थी सो ठीक ही है क्योंकि कुल्य अर्थात् कुल-परम्परासे आया हुआ धन और कुल्या अर्थात् नहरमें उत्पन्न हुआ जल ये दोनों ही पृथिवीसे उत्पन्न हुए पदार्थ, जीतनेकी इच्छा करनेवाले राजाके होते हैं ।। २५।। जिस राजाके रहते हुए प्रजा कर के बोझसे दब कर दुःखी हो रही थी, भरतने उसे हटाकर उसके पदपर किसी अन्य नीतिमान् राजाको बैठाया था ।।२६।। उन्होंने अहंकारी राजाओंको दण्डित किया था और सत्कार अथवा उत्तम कार्य करनेवाले राजाओं पर अनुग्रह किया था सो ठीक ही है क्यों कि प्रजाका हित करनेकी इच्छासे क्षत्रियोंका यह ऐसा न्याय ही है ॥२७॥ राजा भरतने जगत्की स्थितिके लिये केवल प्रजाके विषयमें ही योग (नवीन वस्तुको प्राप्त करना) और क्षेम (प्राप्त हुई वस्तुकी रक्षा करना) की चिन्ता नहीं की थी किन्तु प्रजाकी रक्षा करनेवाले राजाओंके विपयमें भी प्रायः उन्हें योग और क्षेमकी चिन्ता रहती थी ॥२८॥ किसी एक देशके राजाकी प्रजा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्ण रूप मानी जाती है परन्तु चक्रवर्तीकी प्रजा नम्रीभूत हुए राजा लोग ही माने जाते हैं इस-लिये चक्रवर्तीको प्रजके साथ साथ राजाओंकी चिन्ता करना भी उचित है ।। २९॥ भरतके समस्त कार्योंको सिद्ध करनेवाला एक पुण्य ही मुख्य साधन था, और चक्ररत्न उस पुण्यकी पुष्टि करनेवाला था, पुण्य और चक्ररत्न ये दोनों ही उसके साध्य (सिद्ध करने योग्य विजय रूप कार्य) की सिद्धि के अंग थे, बाकी हाथी घोड़े आदि सेनाके अंग केवल वैभवके लिये थे ॥३०॥ इस प्रकार मण्डलेश्वर राजाओंसे बलपूर्वक प्रणाम कराते हुए चक्रवर्तीने उनका केवल मान भंग ही किया था, अपनी सेवाके लिये जो उनका प्रेम था उसे नष्ट नहीं किया था ।। ३१।।
श्लोक 32 से 41 : राजाओं का सम्मान और क्षेत्रों की विजय
प्राणोंकी रक्षाके समान भरतकी आज्ञाको अपने मस्तकपर धारण करते हुए अनेक राजा लोग प्रत्येक पड़ावपर आकर उन्हें प्रणाम करते थे ॥ ३२॥ प्रणाम करनेवाले राजाओंको महाराज भरतने बहुत अधिक फल देकर अनुगृहीत किया था सो ठीक ही है क्योंकि कल्पवृक्षकी सेवा क्या कभी फलरहित अथवा थोड़ा फल देनेवाली हुई है ? ।। ३३ ।। सम्राट् भरतने कितने ही राजाओंकी ओर देखकर, कितने ही राजाओंकी ओर मुसकराकर, कितने ही राजाओंकी ओर हंसकर, कितने ही राजाओंके साथ विश्वासपूर्वक वार्तालाप कर, और कितने ही राजाओं का सन्मान कर उन्हें प्रसन्न किया था ।। ३४।। उन्होंने कितने ही राजाओंपर मुसकराकर अपनी प्रसन्नता प्रकट की थी, कितने ही राजाओंपर वार्तालाप कर अपना विश्वास प्रकट किया था, कितने ही राजाओंपर हंसकर अपना हर्ष प्रकट किया था और कितने ही राजाओंपर प्रेमपूर्ण दृष्टि डालकर अपना प्रेम प्रकट किया था ।। ३५।। उन्होंने नम्रीभूत राजाओंको संतुष्ट किया था और विरोधी राजाओंको अच्छी तरहसे संतप्त किया था सो ठीक ही है क्योंकि पृथिवीको जीतनेके लिये शान्ति और प्रताप ये दो ही राजाओंके योग्य गुण माने गये हैं ।॥३६॥ राजा भरत नमस्कार करनेवाले पुरुषपर अपनी प्रसन्न दृष्टिसे प्रसन्नता प्रकट करते थे और साथ ही शत्रुके ऊपर भौंह टेढ़ी कर क्रोध प्रकट करते जाते थे इसलिये यह उक्ति सच मालूम होती है कि राजा लोग नट तुल्य होते हैं ।॥ ३७॥ उत्तम उत्तम मणियोंको भेंट कर नमस्कार करते हुए अंग देशके राजाओंपर, ऊंचे ऊंचे हाथियोंको भेंट कर नमस्कार करते हुए वंग देशके राजाओं पर और मणि तथा हाथी दोनोंको भेंट कर नमस्कार करते हुए कलिंग देशके राजाओंपर वह भरत बहुत ही प्रसन्न हुए थे ।॥ ३८॥ भरतेश्वरके प्रसादकी इच्छा करनेवाले मगध देशके राजा उनके उत्कृष्ट गुण गा रहे थे इसलिये वे ठीक मागध अर्थात् बन्दीजनोंके समान जान पड़ते थे ॥३९॥ भरत महाराजके सेनापतिने कुरु, अवंती, पांचाल, काशी, कोशल और वैदर्भ देशोंके राजाओंको बिना किसी परिश्रमके अपनी ओर खींच लिया था अर्थात् अपने वश कर लिया था ।।४०।। मद्र, कच्छ, चेदि, वत्स, सुह्य, पुण्ड्र, औण्ड्र और गौड़ देशोंमें जा जा कर सेनापतिने सब जगह भरत महाराजकी आज्ञा सुनाई थी ॥४१॥
श्लोक 42 से 51 : रत्नों की प्राप्ति और नदियों का भ्रमण
उसने दशार्ण, कामरूप, काश्मीर, उशीनर और मध्यदेशके समस्त राजाओंको बहुत शीघ्र वश कर लिया था ॥४२॥ वहां के राजाओं ने जिनसे मदके निर्भरने झर रहे है ऐसे, पूर्व देशमें उत्पन्न होनेवाले तथा कलिंग और अंगार देशमें उत्पन्न होनेवाले, पर्वतोंके समान ऊंचे ऊंचे हाथी महाराज भरतके लिये भेंटमें दिये थे ।।४३।। जिनमें हाथी उत्पन्न होते हैं ऐसे वनोंके स्वामियोंने दिग्गजोंके साथ स्पर्द्धा करनेवाले, दशार्णक वनमें उत्पन्न हुए तथा चेदि और कसेरु देशमें उत्पन्न हुए हाथी महाराजके लिये प्रदान किये थे ।।४४।। उस समय भरतेश्वरको पृथिवीपर जहां तहां अनेक रत्न भेंटम मिल रहे थे इसलिये ऐसा जान पड़ता था मानो गर्भिणीके समान पृथिवीने चक्रवर्तीकी सेनाके बोझसे उत्पन्न हुए दुःसह क्षोभको न सह सकनेके कारण ही अनन्त रत्न उत्पन्न किये हुए हों ।॥४५।। हिमवात् पर्वतके निचले भागसे लेकर वंभार तथा गोरथ पर्वत तक सब जगह भरत महाराज के विजयी हाथी घूम रहे थे ।।४६ ।। सबको जीतनेकी इच्छा करनेवाला भरतका सेनापति अपनी विजयी सेनाके साथ साथ बंग, अंग, पुंड्र, मगध, मालव, काशी और कोशल देशोंमें सब जगह घूमा था ॥४७॥ भरतकी संमतिसे वह सेनापति कालिद, कालकूट, भीलोंका देश, और मल्ल देशमें भी पहुंचा था ॥४८।। उनकी सेनाके हाथी सुमागधी, गंगा, गोमती, कपीवती और रेवस्या नदीको तैरकर जहां-तहां घूम रहे थे ॥४९॥ पूर्व दिशाके पास पास जानेवाले उनकी सेनाके हाथी अत्यन्त गहरी गंभीरा, कालतोया, कौशिकी, कालमही, ताम्रा, अरुणा और निधुरा आदि नदियों तथा लौहित्य समुद्र और कंबुक नामके बड़े बड़े सरोवरोंमें घूमे थे ॥५०-५१॥
श्लोक 52 से 66 : नदियों और पर्वतों पर विजय
जिन्होंने अपने खुरोंसे उठी हुई धूलिसे समस्त दिशायें भर दी हैं, जो बड़े वेगशाली हैं और जिनके नथनें चंचल हो रहे हैं ऐसे महाराज भरतकी विजयी सेनाके घोड़े शोण नामके नदकी दक्षिण ओर, नर्मदा नदीकी उत्तर ओर, वीजा नदीके दोनों ओर और मेखला नदीके चारों ओर घूमे थे ।। ५२-५३।। भरत के हाथियोंने उदुम्बरी, पनसा, तमसा, प्रमृशा, शुक्तिमती और यमुना नदीका पान किया था ॥५४॥ चक्रवर्तीके घोड़ोंने पम्पा सरोवरके जलको पार किया था तथा चेदि नामके पर्वतको उल्लंघन कर चेदि नामके देशको जीता था ॥५५॥ सबको जीतनेवाले भरतके विजयी हाथी ऋष्यमूक पर्वतको उल्लंघन कर कोलाहल पर्वत तक जा पहुंचे थे और फिर माल्य पर्वतके पूर्व भागके समीप भी जा पहुंचे थे ।।५६।। भरतकी सेनाके लोगोंने लीलापूर्वक नागप्रिय पर्वतको उल्लंघन कर चेदि और कसेरु देशमें उत्पन्न हुए हाथियोंको अपने आधीन कर लिया था ।॥ ५७।। उनकी सेनाके वीर पुरुष घोड़ोंके द्वारा क्षत्रवती नदीको पार कर जिसके किनारे जंगली हाथियोंसे खूंदे गये हैं ऐसो चित्रवती नदीको प्राप्त हुए थे ॥ ५८।। जंगली हाथियोंसे भरे हुए माल्यवती नदीके किनारेके वनको घेरकर तथा यमुना नदीका पानी पीकर भरतके हाथियोंने उस ओरकी समस्त दिशाएं जीत ली थीं ।।५९।। उनकी विजयी सेनाने वेणुमती नदीके किनारे किनारे जाकर वत्स देशकी भूभिपर आक्रमण किया और फिर दशार्णा (धसान) नदीको भी उल्लंघन किया- पार किया ।।६०।। भरतकी सेनाने विशाला, नालिका, सिन्धु, पारा, निःकुन्दरी, बहुवज्रा, रम्या, सिकतिनी, कुहा, समतोया, कंजा, कपीवती, निविन्ध्या, नदियोंमें श्रेष्ठ जम्बूमती, वसुमती, समुद्र तक जानेवाली शर्करावती, शिप्रा, कृतमाला, परिजा, पनसा, अवन्तिकामा, हस्तिपानी, कागंधुनी, व्याधी, चर्मण्वती, शतभागा, नन्दा, करभवेगिनी, चुल्लितापी, रेवा, सप्तपारा, और कौशिकी इन अगाध जलसे भरी हुई नदियोंको चारों ओरसे घेरकर जिनके किनारे घोड़ोंके खुरोंसे खुद गये हैं ऐसी उन नदियोंको बहुत चौड़ा कर दिया था ।। ६१-६६।।
श्लोक 67 से 81 : पर्वतों और दुर्गम क्षेत्रों की विजय
सैनिकों-ने तैरश्चिक नामके पर्वतको लांघकर वैडूर्य नामका पर्वत जा घेरा और फिर कूटा-चलको उल्लंघन कर पारियात्र नामका पर्वत प्राप्त किया ।। ६७।। भरतकी वह सेना पुष्प गिरिके शिखरोंपर चढ़कर स्मितगिरिके शिखरोंपर जा चढ़ी और फिर वहांसे चलकर उसने गदा नामक पर्वतके लतागृहोंमें विश्राम किया ॥६८॥ भरतके सैनिकोंने ऋक्षवान् पर्वतकी गुफाओंके साथ साथ वातपृष्ठ पर्वतकी गुफाओंका आश्रय लिया और फिर वहांसे चलकर कम्बल नामक पर्वतके किनारोंपर आश्रय प्राप्त किया ।। ६९॥ वे सैनिक वासवन्त नामके महापर्वत को उल्लंघन कर असुरधूपन नामक पर्वतपर ठहरे और फिर वहांसे चलकर मदेभ तथा अंगिरेयिक पर्वतपर जा पहुंचे ॥७०॥ सेनाके लोग उन देशोंको शत्रुरहित समझकर अपने हाथियोंके द्वारा वनके प्रदेशों में हाथी पकड़ते हुए जहां तहां घूम रहे थे ॥ ७१ ॥ जो नदियां दुस्तर अर्थात् कठिनाईसे तैरने योग्य थीं वे ही नदियां सैनिकोंके द्वारा उपभुक्त होनेपर सुतर अर्थात् सुखसे तैरने योग्य हो गई थीं। इसी प्रकार जो पर्वत दुरारोह अर्थात् कठिनाईसे चढ़ने योग्य थे वे ही पर्वत सैनिकोंके द्वारा शिखरोंके चूर्ण हो जानेसे स्वारोह अर्थात् सुखपूर्वक चढ़ने योग्य हो गये थे ॥७२॥
श्लोक 82 से 90 : दक्षिण दिशा की पूर्ण विजय
देश, उनकी सीमाएं और देशोंके राजा लोग सम्राट् भरतेश्वरको फल प्रदान करने के लिये ही उत्पन्न हुए थे तथा बदलेमें भरतने भी उन्हें अनेक फलोंसे युक्त किया था। भावार्थ–सम्राट् भरत जहां जहां जाते थे वहां वहांके लोग उन्हें अनेक प्रकारके उपहार दिया करते थे और भरत भी उनके लिये अनेक प्रकारकी सुविधाएं प्रदान करते थे ।। ७३।। जो राजा लोग उपसमुद्रके उस पार रहते थे अथवा उप-समुद्रके भीतर द्वीपोंमें रहते थे उन सबको बलवान् भरतने सेनाके द्वारा अपने वश किया था तथा वनमें उत्पन्न होनेवाले हाथियोंको पकड़ पकड़-कर उनका पोपण किया था ।। ७४।॥ महाराज भरतने उन राजाओंसे अपने इच्छानुसार अनेक प्रकारके रत्न लेकर संतुष्ट हो अपनी आज्ञासे उनके स्थानोंपर उन्हींको फिरसे विराजमान किया था ।॥७५॥ जो बड़े बड़े किले पहाड़ोंके ऊपर थे और जो जमीनके नीचे बने हुए थे वे सब सेनाके द्वारा धिरकर भरतके वशीभूत हो गये थे, सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषोंको क्या असाध्य है ? ।।७६।। इस प्रकार भरतने पूर्व दिशाके समस्त राजाओंको जीतकर दक्षिण दिशाके राजाओंको जीतनेकी इच्छासे उस पृथिवीके मध्यभागसे दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान किया ।।७७।। उत्कृष्ट सेनापति सहित विजयी भरतकी सेना जहां जहां जाती थी वहां वहां के राजा लोग सामन्तों सहित मरतक झुका झुकाकर उन्हें नमस्कार करते थे ।। ७८।। दक्षिणमें भरतने त्रिकलिंग, औद्र, कच्छ, प्रातर, केरल, चेर और पुन्नाग देशोंके सब राजाओंको जीता था ।।७९।। तथा कूट, ओलिक, महिष, कमेकुर, पाण्डय और अन्तरपाण्ड्य देशके राजाओं को दण्डरत्नके द्वारा अपने वशीभूत किया था ।।८०।। सम्म्राट् भरतने इन सब राजाओंको शीघ्र ही जीतकर उनसे अपने चरणोंमें प्रणाम कराया और उनके सारभूत रत्न लेकर परम आनन्द प्राप्त किया ।॥८१॥ चक्रवर्तीकी आज्ञा धारण करता हुआ सेनापति भी कालिंगक वनके समीपवर्ती अनेक पहाड़ों, नदियों तथा देशोंमें घूमा था ।।८२।। वह अपनी सेनाओंके साथ साथ तैला, इक्षुमती, नक्ररवा, वंगा और श्वसना आदि महानदियोंको प्राप्त हुआ था।।८३।। तथा वैतरणी, माषवती और महेन्द्रका इन नदियोंको अपने सैनिकोंके साथ पार कर वह शुष्क नदीपर जा पहुंचा था ।।८४।। सप्तगोदावर नामके तीर्थ और पवित्र गोदावरीको देखता हुआ वह पवित्र हृदयवाला सेनापति मानस सरोवरको पाकर बहुत प्रसन्न हुआ ।।८५।। तदनन्तर उसने सेनाओंके साथ साथ सुप्रयोगा नदीको पार कर कृष्णवर्णा, सन्नीरा और प्रवेणी नामकी नदीको पार किया ।।८६।॥ तथा कुब्जा, धैर्या, चूर्णी, वेणा, सूकरिका और अम्बर्णा नदीको देखते हुए उसने दक्षिण दिशाके राजाओंको चक्रवर्तीकी आज्ञा सुनाई ।॥८७॥ फिर महेन्द्र पर्वतको उल्लंघन कर विन्ध्याचलके समीपवर्ती प्रदेशोंको जीतता हुआ नागपर्वतपर चढ़कर वह सेनापति मलय पर्वतपर गया ।।८८।। वहांसे अपनी सेनाके साथ साथ गोशीर्ष, दर्दुर, पाण्ड्य, कवाटक और शीतगुह नामके पर्वतोंपर पहुंचा तथा श्रीकटन, श्रीपर्वत और किष्किन्ध पर्वतोंको जीतता हुआ वहांके राजाओंसे यथायोग्य लाभ पाकर वह सेनापति अतिशय वृद्धिको प्राप्त हुआ ।।८९-९०।।
श्लोक 91 से 101 : दक्षिण देशों के राजाओं की विजय
प्रकट रूपसे धारण किये हुए आडम्बरोंसे जिनका वेष विकट तथा शूरवीरताको उत्पन्न करनेवाला है, जिन्हें हल्दी, तांबूल और अंजन बहुत प्रिय हैं, तथा जिनके यश ही धन है ऐसे कर्णाटक देशके राजाओंको, जो कठिन प्रहार करनेमें सिद्धहस्त हैं जो बड़े कृपण हैं और जो केवल शरीरकी अपेक्षा ही पाषाणके समान कठोर नहीं हैं किन्तु हृदय की अपेक्षा भी पाषाणके समान कठोर हैं ऐसे आंध्र देशके राजाओंको, जिनके प्रायः हाथियों की सेना है और जो कला-कौशल रूप धनसे सहित हैं ऐसे कलिङ्ग देशके राजाओंको, जो प्रायः कलिङ्ग देशके समान हैं, मूर्ख हैं और लड़नेवाले हैं ऐसे ओण्ड्र देशके राजाओंको, जिन्हें प्रायः झूठ बोलना बहुत प्रिय है और जिनकी चेष्टाएं कुटिल हैं ऐसे चोल देशके राजाओंको, मधुर गोष्ठी करने में प्रवीण तथा सरलतापूर्वक वार्तालाप करनेवाले केरल देशके राजाओंको, जिनके भुजदण्ड अत्यन्त बलिष्ठ हैं, जिन्होंने शत्रुओंके समूह नष्ट कर दिये हैं, जिन्हें हाथी बहुत प्रिय हैं और जो युद्धमें प्रायः धनुष तथा भाला आदि शस्त्रोंका अधिकतासे प्रयोग करत हैं ऐसे पाण्ड्य देशके राजाओंको और जिन्होंने प्रतिकूल खड़े होकर अपना पराक्रम दिखलाया है ऐसे अन्य देशके राजाओंको सेनापतिने अपनी विजयी सेनाके द्वारा आक्रमण कर अपने आधीन किया था ।।९१-९६।। उन राजाओंने सेनापतिका सत्कार कर तथा भयसहित कुछ भेंट देकर जिन्होंने उनका भविष्यत्काल अर्थात् आगे राजा बना रहने देना स्वीकार कर लिया है ऐसे चक्र-वर्तीको दूरसे ही प्रणाम किया था ।। ९७।। जिस प्रकार पुरुष करग्रह अर्थात् पाणिग्रहण संस्कार से किसी स्त्रीको वशीभूत कर लेता है उसी प्रकार चक्रवर्ती भरतने करग्रह अर्थात् टैक्स वसूलीसे दक्षिण दिशाको अपने वश कर लिया था और फिर जबरदस्ती उसके सार पदार्थोंको छीनकर दक्षिण समुद्रकी ओर प्रयाण किया था ।। ९८।। वहां वह चक्रवर्ती, जिनमें प्रायः लवंग और चन्दनकी लताएं लगी हुई हैं तथा जो इलायचीके छोटे छोटे पौधोंकी लताओंसे सहित है ऐसे किनारेके समीपवर्ती बनको देखता हुआ बहुत भारी संतोषको प्राप्त हुआ था ।।९९।। जो तालाबोंके जलको हिला रहा है, जिसमें इलायचीकी सुगन्धि मिली हुई है और जो सौम्य है ऐसे किनारेके वनकी वायु उस चक्रवर्तीकी सेवा कर रही थी ।। १००।। वायुसे हिलती हुई शाखाओंके अग्रभागसे जिसने फूलोंकी अंजलि बिखेर रखी है ऐसा वह वनका प्रदेश ऐसा जान पड़ता था मानो इस चक्रवर्तीकी अगवानी ही कर रहा हो ।। १०१ ।।
श्लोक 102 से 111 : वन में सेना का पड़ाव
वृक्षोंकी शाखाओं के अग्रभाग वायुसे हिल रहे थे और उनपर भूमर स्पष्ट शब्द कर रहे थे, जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वे वृक्ष हाथ हिला हिलाकर भूमरोंके शब्दोंके बहाने पुकार पुकारकर विश्राम करनेके लिये भरतके सैनिकोंको बुला ही रहे हों ।॥१०२॥
अथानन्तर-चक्रवर्तीने उस वनके मैदानमें समुद्रके किनारे वैजयन्त नामक महा-द्वारके निकट अपनी सेना ठहराई ।। १०३।। वह वन और भरतकी सेना दोनों ही समान थे क्योंकि जिस प्रकार वन सनाग अर्थात् मोथाके पौधौंसे सहित था उसी प्रकार सेना भी सनाग अर्थात् हाथियोंसे सहित थी, जिस प्रकार वन बहुपुन्नाग अर्थात् नागकेशरके बहुत वृक्षोंसे सहित था उसी प्रकार सेना भी बहुपुन्नाग अर्थात् अनेक उत्तम पुरुषोंसे सहित थी, जिस प्रकार वन सुमन अर्थात् फूलोंसे सहित था उसी प्रकार वह सेना भी सुमन अर्थात् देव अथवा अच्छे हृदय-बाले पुरुषोंसे सहित थी और जिस प्रकार व्रत बहुपत्ररथ अर्थात अनेक पक्षियोंसे सहित होता
है उसी प्रकार वह सेना भी अनेक सवारियों और रथोंसे सहित थी, इस प्रकार भरतकी वह सेना अपने समान बनमें ठहरी ॥१०४॥ उस बनके पार्थिव अर्थात् वृक्ष (पृथिव्यां भवः, ‘पार्थिवः’) अर्थात् राजाओं (पृथिव्या अधिपः ‘पार्थिवः’) के समान थे, क्योंकि जिस प्रकार राजा सच्छाय अर्थात् उत्तम कान्तिसे सहित होते हैं उसी प्रकार उस बनके वक्ष भी सच्छाया अर्थात् उत्तम छाया (छाँहरी) से सहित थे, जिस प्रकार राजा लोग सफल अर्थात् आयरो सहित होते हैं उसी प्रकार उस बनके वृक्ष भी सफल अर्थात् फलोंसे सहित थे। जिस प्रकार राजा लोग तुङ्ग अर्थात् ऊंची प्रकृतिके उदार होते हैं उसी प्रकार उस बनके वृक्ष भी तुंग अर्थात् ऊंचे थे, जिस प्रकार राजा लोग बहुपत्रपरिच्छद अर्थात् अनेक सवारी आदिके वैभवसे सहित होते हैं उसी प्रकार उस बनके वृक्ष भी बहुपत्रपरिच्छद अर्थात् अनेक पत्तोंके परिवारसे सहित थे और जिस प्रकार राजा लोग ताप अर्थात् दरिद्रतासम्बन्धी दुःखको नष्ट करनेवाले होते हैं उसी प्रकार उस वनके वृक्ष भी ताप अर्थात् सूर्यके घामसे उत्पन्न हुई गर्मीको नष्ट गारनेवाले थे, इस प्रकार भरतके सैनिक, राजाओंकी समानता रखनेवाले वृक्षोंका आथय बड़े प्रेमसे ले रहे थे ।।१०५।। सेनाके कितने ही लोग उत्तम छायासे सहित होनेपर भी जिनसे फल मिलने की संभावना नहीं थी ऐसे बड़े बड़े वृक्षोंको छोड़कर थोड़ी छाया वाले किन्तु फलयुक्त वृक्षों का आश्रय ले रहे थे। भावार्थ-जिस प्रकार धनाढ्य होनेपर भी उचित वृत्ति न देनेवाले कंजूस स्वामीको छोड़कर सेवक लोग अल्पधनी किन्तु उचित वृत्ति देनेवाले उदार स्वामीका आश्रय लेने लगते हैं उसी प्रकार सैनिक लोग फलरहित बड़े बड़े वृक्षोंको छोड़कर फलराहित छोटे छोटे वृक्षोंका आश्रय ले रहे थे ॥ १०६ ॥ सेनाके लोग उस समयकी थोड़ी देर रहनेवाली वाहिरकी छाया छोड़कर वृक्षोंके नीचे आगे आनेवाली छायामें बैठे थे ॥१०७।। बनस्थली के वृक्षोंकी छायासे जिनपर सूर्यका धूप रुक गया है ऐसे कितने ही सैनिक अपनी अपनी स्त्रियों सहित तालाबोंके किनारोंपर बैठे हुए थे ।।१०८।। परस्परके प्रेमसे बंधे हुए राजा लोग अपनी अपनी स्त्रियों सहित जिनके नीचे बैठे हुए हैं ऐसे वनके वृक्ष कल्पवृक्षोंरो उत्पन्न हुई शोभा को स्पष्ट रूपसे धारण कर रहे थे। भावार्थ वनके वे वृक्ष कल्पवृक्षोंके समान जान पडते थे और उनके नीचे बैठे हुए स्त्री-पुरुष भोगभूमिके आर्य तथा आर्याओंके समान माळम होते थे ।।१०९।। वहां करेंचके फल-समूहोंको हिलाते हुए वानर उन लताओंके नीचे बैठे हुए सैनिकों को व्याकुल कर रहे थे क्योंकि करेंचके फलके रोयें शरीरपर लग जानेसे खुजली उठने लगती है ।।११०।। तालाबों के समीप ही इच्छानुसार चरने योग्य तथा भापसे ही टूटनेवाले घासके अंकुरोंसे सुन्दर, चक्रवर्ती के घोड़ोंकी घुड़सालें थीं ।। १११॥
श्लोक 112 से 121 : घोड़ों और हाथियों की क्रीड़ा
जिनपरसे पलान और लगाम आदि सामग्री उतार ली गई है ऐसे घोड़े जमीनपर लोटनेकी इच्छा करते हुए, जिनमें नाकके नथने हिल रहे हैं ऐसे मुखोंसे जमीनको संघ रहे थे ॥ ११२॥ कमलोंकी सान्द्र परागसे भरे हुए, तालावके समीपवर्ती प्रदेशपर लोटकर वे घोड़े धूलि झाड़ने के लिये धीरे धीरे अपने शरीर हिला रहे थे ।॥११३॥ जो कमलोंकी परागका समूह वायुसे उड़कर आकाशमें छा गया था वह ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो घोड़ोंके लिये बहुत ऊंचा कपड़ेका मण्डप ही वनाया गया हो ।।११४।। बड़े बड़े घोड़े पृथिवीको रजस्वला अर्थात् धूलिसे युक्त (पक्षमें रजोधर्म से युक्त) देखकर ग्लानि करते हुए से उठे और शीघ्र ही सरोवरोंके जलमें घुस गये ।।११५॥ कमलकी केशरसे भरे हुए जलमें प्रविष्ट हुए घोड़ोंका अंगराग (शोभाके लिये शरीरपर लगाया हुआ एक प्रकारका लेप) यद्यपि धुल गया था तथापि उन्होंने कमलोंके परागसे अपने उस अंगरागको पुनः कर प्राप्त लिया था । भावार्थ-कमलोंकी केशरसे भरे हुए पानी में स्नान करनेसे उनके शरीरपर जो कमलोंकी केशरके छोटे छोटे कण लग गये थे उनसे अंगराग की कमी नहीं मालूम होती थी ।॥ ११६ ॥ सरोवरोंमें घुसकर स्नान करनेसे जिनका सब परि-श्रम दूर हो गया है और जिन्होंने इच्छानुसार जल पी लिया है ऐसे घोड़े कपड़ेके बड़े बड़े मंडपों में कुछ कुछ नेत्र बन्द किये हुए खड़े थे ॥११७॥ ऊंचे ऊंचे शरीरोंसे सुशोभित होनेवाले, महाराज भरतके हाथियों के डेरे नारियल और ताड़ वृक्षके वनोंमें बनाये गये थे जो कि सर्वथा उचित थे ।।११८।। जो वनकी भूमि ऊपरसे पड़ते हुए नारियलोंके समूहसे ऊंची नीची हो रही थी वही नारियलोंके एक ओर हटा देनेसे हाथियोंके योग्य स्थान बन गई थी ॥११९।। जिन्हें बहुत प्यास लगी है तथा जो वमथु अर्थात् सूंड़से निकाले हुए जलके छींटोंसे अपना परिश्रम प्रकट कर रहे हैं ऐसे हाथियोंको महावत लोग पानी पिलाने के लिये तालाबोंपर ले गये थे ।॥ १२०॥ जो धीरे धीरे चलनेसे मार्ग में उत्पन्न हुए परिश्रमको प्रकट कर रहे हैं ऐसे हाथियोंको महावत लोग नहलानेके लिये तालाबोंपर ले गये थे ।। १२१।।
श्लोक 122 से 131 : हाथियों का व्यवहार
कोई नवीन पकड़ा हुआ हाथी बार-बार प्रेरित होनेपर भी कमलिनीके पत्तोंसे ढके हुए जलमें समुद्रकी आशंकासे प्रवेश नहीं करना चाहता था ।।१२२।। बहुत दिनका पकड़ा हुआ भी कोई हाथी अपने इच्छानुसार खाने योग्य नवीन पत्तोंवाले वनको देखता हुआ विलक्षण रीतिसे उत्कण्ठित हो रहा था ।।१२३॥ कितने ही हाथियोंने इच्छानुसार न तो पानी ही पिया था और न ग्रास ही उठाये थे, वे केवल वनके संभोग-सुखोंका स्मरण कर रहे थे ।। १२४।। जिनकी सूंड़ ऊंची उठी हुई है और जिनकी बगलमें सुवर्ण की मालाएं देदीप्यमान हो रही हैं ऐसे हाथियोंको महावत लोग सरोवरोंपर ले जा रहे थे, उस समय वे हाथी ऐसे जान पड़ते थे मानो अजगर सहित नील पर्वत ही हो अथवा बिजली सहित मेघ ही हों ॥ १२५॥ जो जंगली हाथीके मदकी गन्धको धारण करनेवाले वायुसे कुपित हो रहा है ऐसे किसी हाथीको उसका महावत बड़ी कठिनाईसे जलके समीप ले जा सका था ।।१२६।। अचानक कुपित हुआ कोई हाथी अपने शिरको तिरछा हिला रहा था, वह अंकुशके वश भी नहीं होता था और महावतको खेद खिन्न कर रहा था ।। १२७।। जंगली हाथीके संभोगसे जिसमें मदकी वास फैल रही है ऐसी हथिनीको जिस प्रकार कोई मदोन्मत्त हाथी नहीं चाहता है उसी प्रकार जिसमें जंगली हाथियोंकी क्रीड़ासे मदकी गंध मिली हुई है ऐसी सरोवरीमें कोई मदोन्मत्त हाथी प्रवेश नहीं करना चाहता था ।।१२८॥ जिस पानीको पहले वनके हाथी पी चुके थे और इसीलिये जो मदकी गन्धसे भरा हुआ था ऐसे पानीको सेनाके हाथियोंने नहीं पिया था, वे केवल सूंड़से सूंघ सूंघकर उसे उछाल रहे थे ।। १२९।। जिन हाथियोंने तालाबका पानी पिया था उन्होंने अपना मद बहा बहाकर तालाबका वह पानी बढ़ा दिया था, सो ठीक ही है क्योंकि जो उन्नत अर्थात् बड़े होते हैं वे किसीका व्यर्थ ही धन लेनेकी इच्छा नहीं करते हैं ।।१३०।। कोई मदोन्मत्त हाथी यद्यपि सूंड़ ऊपर उठाकर तालाबके मध्यभागमें डूबा हुआ था तथापि आकाशमें उड़कर शब्द करते हुए भूमरोंसे ‘वह यहाँ है’, इस प्रकार साफ समझ पड़ता था । ॥१३१।।
श्लोक 132 से 141 : हाथियों की क्रीड़ा और शोभा
जो पानी पी चुका है और जिसकी गर्जना मेघों के साथ स्पर्धा कर रही है ऐसा कोई मदोन्मत्त हाथी अपने कुरलेके जलकी तेज फटकारसे कपोलोंकी खुजली शान्त कर रहा था ॥१३२॥ कितने ही हाथी सूड़ ऊंची उठाकर सू सू शब्द करते हुए ऊपरको पानी छोड़ रहे थे, उस समय आकाशकी ओर उछलता हुआ वह पानी ठीक स्फटिक मणिके बने हुए दण्डेकी शोभा धारण कर रहा था ॥१३३।। पानीमें प्रवेश करनेसे जिनका सब परिश्रम दूर हो गया है ऐसे कितने ही हाथी लीलापूर्वक मृणालके टुकड़े खाकर संतोष धारण कर रहे थे ।।१३४।। कितने ही हाथी अपने दाँतोंके अग्रभागपर रखे हुए मृणालोंसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो निरन्तर पानीके सींचनेसे उनके दांत ही अंकुरित हो उठे हों ।॥१३५॥ मदसे अत्यन्त उन्मत्त हुआ कोई हाथी अपनी सूड़से ऊपर उठाये हुए मृणालको बाँधनेकी साँकल समझकर उसे दुहरी कर महावतको दे रहा था ।। १३६।। अपने पैरमें लगे हुए मृणालको खींचता हुआ कोई डरपोक हाथी उसे बाँधनेकी साँकल समझकर तालाबके बाहरी तटपर ही खड़ा रह गया था ।।१३७।। अपनी सूंड़ोंसे कमलोंको उठाकर खड़े हुए हाथी ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो हाथोंमें अर्ध लेकर किसी देवताका कुछ स्मरण ही कर रहे हों ।॥ १३८ ॥ जिनके शरीर तालाबकी लहरोंसे धुल गये हैं ऐसे ऊँचे ऊँचे हाथी सघन रूपसे लगे हुए कमलोंकी परागसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो स्नान कराकर उनका शृङ्गार ही किया गया हो ।। १३९॥ हाथियोंसे घिरे हुए तालाब के जलको छोड़कर सब पक्षी तालाबके किनारेपर चले गये थे सो ठीक ही है क्योंकि निर्बल प्राणियोंको ऐसा ही करना योग्य है ।। १४०।। तालाबोंमें प्रवेश करनेसे जिनके शरीर निर्मल हो गये हैं ऐसे कितने ही हाथी धूल उड़ाकर फिरसे अपने आपको मैला कर रहे थे ॥१४१।।
श्लोक 142 से 151 : हाथियों का विश्राम और बंधन
प्रथम तो हम लोग जातिसे ही मातंग अर्थात् चाण्डाल हैं (पक्षमें-हाथी हैं) और फिर मद अर्थात् मदिरासे (पक्षमें – गण्डस्थलसे बहते हुए तरल पदार्थसे) उत्तेजित हो रहे हैं इसलिये हम लोगोंकी शुद्धि अर्थात् पवित्रता (पक्षमें-निर्मलता) कहांसे रह सकती है ऐसा समझकर ही मानो हाथियोंने अपने ऊपर धूल डाल ली थी ॥ १४२॥ इस प्रकार वे हाथी बहुत देर तक सरोवरोंमें क्रीड़ा कर और अन्तरङ्गमें उत्पन्न हुए संतापको जलसे शान्त कर किनारेके वृक्षों के समीप आ गये थे, यद्यपि वहां उनके बाँधनेका स्थान नियत था तथापि क्रीड़ासे उत्पन्न हुए अतिशय संतोषसे उन्हें उसका कुछ भी ज्ञान नहीं था ॥ १४३।। हाथियोंने तालाबोंका जो पानी पिया था उसे मानों अपना बदला चुकाने के लिये ही अपने मदरूपी जल से बढ़ा दिया था, इस प्रकार प्यास रहित हो सुखकी साँस लेते हुए वे हाथी, ‘ये तालाब अपनी लहरेंरूपी हाथोंसे’ कहीं हमें रोक न लें’ ऐसी आशंका कर तालाबोंसे शीघ्र ही बाहर निकल आये थे ।।१४४।। मदरूपी स्याहीसे मलिन हुए हाथियोंको निर्मल करनेके लिये तालाबोंके जलमें प्रवेश कराते हुए महावत जब उन्हें जलके भीतर प्रविष्ट नहीं करा सके तब उन्होंने केवल जल ही पिलाना चाहा परन्तु बहुत कुछ अनुनय विनय करनेपर भी वे किनारे पर खड़े हुए उन हाथियोंको केवल जल भी पिलानेके लिये समर्थ नहीं हो सके थे। भावार्थ मदोन्मत्त हाथी न तो पानी में ही घुसे थे और न उन्होंने पानी ही पिया था ।। १४५॥ मदोन्मत्त हाथियोंने न तो अपने इच्छा-नुसार बिना यत्नके प्राप्त हुआ पानी ही पिया था, न किनारेके वृक्षोंसे कुछ तोड़कर खाया ही था, और न वृक्षोंकी छायामें कुछ विश्राम ही प्राप्त किया था, खेद है कि यह मद कभी भी आत्मा का भला करनेवाला नहीं है ।। १४६ ।। इन हाथियोंने शरीर भारी होनेसे शीघ्र ही मार्ग तय नहीं किया यह बात नहीं है अर्थात् इन्होंने भारी होनेपर भी शीघ्र ही मार्ग तय किया है, इन्होंने युद्धमें भी कभी अपराध नहीं किया है और ये भार ढोनेके लिये भी सबसे अधिक समर्थ हैं फिर भी केवल चंचल होनेसे इन्हें बद्ध होना पड़ा है इसलिये इस चंचलताको ही धिक्कार हो ।।१४७।। तुम लोग इस प्रकार बिना अपराधके हम लोगोंको क्यों बांध रहे हो ? तुम्हारा यह कार्य तुम्हें शीघ्र ही इसका बदला देगा यह तुम खूब समझ लो इस प्रकार बांधने के कारण महावतोंमें जो वैर था उसे वे हाथी अंकुशको ऊपर उछालकर मस्तक हिलाते हुए स्पष्ट रूपसे जतला रहे थे ।।१४८।। जो हाथी जीवोंका घात करनेवाले थे वे शरीरके आगे पीछे तथा सूंड़ और पूंछ आदि सब जगह बन्धनोंसे युक्त किये गये थे और जो हाथी किसीका घात नहीं करते थे वे बन्धनसे युक्त नहीं किये गये थे इससे यह सिद्ध होता है कि जो अविरत अर्थात् हिंसा आदि पापोंके त्यागसे रहित हैं उन्हीं के कर्मबन्धन सुदृढ़ रूपसे होता है और जो विरत अर्थात् हिंसा आदि नापों के त्यागसे सहित हैं उनके कर्मका बन्ध नहीं होता ॥ १४९॥ जिनके स्कन्ध बहुत ऊंचे गये हैं ऐसे वनके वृक्षोंमें ही सेनाके ऊँचे ऊँचे हाथी बांधे गये थे सो ठीक ही है क्योंकि महा-पुरुषोंको धारण करने के लिये जिसकी स्वशक्ति नष्ट नहीं हुई है ऐसा बहुत बड़ा ही आश्रय चाहिये ।।१५०।। इस प्रकार महावतोंके द्वारा ऊँचे वृक्षोंमें बाँधा हुआ वह हाथियोंका समूह अपनी आधी आंखें बन्द किये हुए सुखसे खड़ा था, उस समय वह अपना सब शरीर हिला रहा था, लीलापूर्वक ग्रास ले रहा था और कान फड़फड़ा रहा था ।। १५१।।
श्लोक 152 से 161 : हथिनियों और बच्चों की क्रीड़ा
पलान आदि सब सामान उतार लेनेसे हलकी होकर जिन्होंने जल्दी जल्दी चलकर अपनी शीघ्र गति प्रकट की है, तथा चंचल बच्चे जिनके पीछे पीछे आ रहे हैं ऐसी हथिनियाँ तालाबोंका पानी पीने के लिये चारों ओर से जा रही थीं ।। १५२॥ तालाबोंके जिस पानीको पहले ऊँटोंके समूह पी चुके थे, जो ऊंटोंके उगालसे दूषित हो गया था और जिसमें ऊँटोंके शरीरकी गंध आने लगी थी ऐसे पानीको हाथी का बच्चा प्यासा होनेपर भी नहीं पीना चाहता था, सो ठीक ही है क्योंकि सभी कोई अपने मनके विषयभूत पदार्थके अच्छे होनेकी चाह रखते हैं ।। १५३।। जिसे पहले हाथियोंके समूह पी चुके थे और जिसमें उनके मद जलकी गंध आ रही है ऐसे पानीको हथिनियाँ तथा उनके बच्चे बहुत शीघ्र तालाबपर जाकर बड़े प्रेमसे पी रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि समानता ही साथ साथ खाने पीने आदि संभोग का कारण होता है ॥ १५४॥ जिन्होंने जल पीकर अन्तरङ्गका संताप दूर किया है और तालाबमें घुसकर बाहिरी संताप नष्ट किया है ऐसी हथिनियां अपने बच्चों के साथ खाने के लिये शीघ्र ही वनके वृक्षोंकी ओर चली गई ।। १५५।। वह हथिनियोंका समूह लताओंके पुष्पसहित नवीन पत्तोंके अग्रभागोंको, छोटे छोटे पौधोंको, रसीले कड़ंगरि वृक्षोंको और वनके वृक्षोंकी स्वादिष्ट तथा कोमल शाखाओंको खा रहा था ।। १५६।। लता-गृहोंमें पतली घासके अंकुरोंको खूंदता हुआ खेतोंकी मेड़को अपने दाँतोंसे धीरे धीरे तोड़ता हुआ, लताओंके अग्रभागके खाने में चतुर तथा फलोंको तोड़ता हुआ वह चंचल हाथियोंके बच्चों का समूह चिरकाल तक क्रीड़ा करता रहा था ।। १५७।। पत्तेवाली नवीन लताओंको ग्रहण कर, ऊँची ऊँची शाखाओंसे युक्त सघन वनमें जा, लतागृहमें बैठ और खानेके योग्य सल्लकी वनोंके समीप जा इस प्रकार महावतोंकी आज्ञासे वह हथिनियोंका समूह वनमें इधर-उधर विहार कर रहा था ।।१५८।। इस प्रकार जो अनेक प्रकारकी क्रीड़ाओंके द्वारा वनका अपने इच्छा-नुसार उपभोग कर रहा है, स्वतन्त्रतापूर्वक आगे चलनेसे महावत लोग जिसे रोक रहे हैं और जो बाँधनेके योग्य हैं ऐसा वह हथिनियोंका समूह बच्चोंके साथ अपने ठहरने योग्य स्थानपर जा पहुंचा ।।१५९।। इधर हाथियोंसे डरे हुए इन घोड़ोंने यह रथ कुमार्गमें ले जाकर पटक दिया है, इसका धुरा और भौंरा टूट गया है तथा वेश्याओंको ले जाने में तत्पर ये खच्चरियाँ अपना मार्ग छोड़कर बहुत शीघ्र भागी जा रही हैं ।॥ १६०॥ इधर यह ऊंट देखनेसे डरा हुआ हाथी दौड़ा जा रहा है और उससे अपना डरपोकपना प्रकट कर रहा है तथा इधर जिसके स्तन और जधन परका वस्त्र खिसक गया है ऐसी यह स्त्री डरे हुए खच्चरसे गिर रही है ।। १६१।।
श्लोक 162 से 169 : चक्रवर्ती का वैभव और समुद्र विजय
इस प्रकार जोर जोरसे बोलते हुए साधारण पुरुषोंकी बातचीतके शब्दोंसे, क्षोभको प्राप्त हुए गधे, ऊंट तथा बैलोंके शब्दोंसे और परस्पर बुलानेसे उत्पन्न हुए सैनिकों के कठोर शब्दोंसे राजाओंकी सेनाओंमें क्षण भरके लिये बड़ा भारी क्षोभ उत्पन्न हो गया था ।।१६२।। घोड़ोंपर बैठे हुए अनेक राजाओंका समूह जिसके पीछे पीछे चल रहा है ऐसा वह चक्रवर्ती अपने बड़े भारी वैभव से लोकपालोंको जीतता हुआ तथा प्रत्येक दिशामें बन्दीजनोंके मंगल गानोंके साथ साथ आशी-र्वाद सुनता हुआ अपने उच्च शिविर में प्रविष्ट हुआ ।। १६३।।
अथानन्तर जो किनारे के बनकी पंक्तियोंको हिला रहा है ऐसा वायु कमलिनियों की उत्कट गंध लेकर धीरे धीरे चारों ओर बह रहा था और समुद्र के द्वारा भेजे हुए किसी खास सम्बन्धी के समान चक्रवर्तीके समस्त परिश्रमको दूर कर रहा था ।। १६४।। उस समय वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान (पड़ाव) ठीक समुद्रका अनुकरण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार समुद्र प्रमाणरहित शंख और रत्नोंसे सहित होता है उसी प्रकार वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान भी प्रमाणरहित शंख आदि निधियों तथा रत्नोंसे सहित था, जिस प्रकार समुद्र, जिनके मस्तकपर अनेक रत्न देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसे भोगी अर्थात् सर्पोंसे सेवनीय होता है उसी प्रकार वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान भी, जिनके मस्तकपर अनेक मणि देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसे भोगी अर्थात् राजाओंके द्वारा सेवनीय था, जिस प्रकार समुद्र निरन्तर बढ़ता रहता है उसी प्रकार वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान भी निरन्तर बढ़ता जाता था, और जिस प्रकार समुद्र सब दिशाओंको घेरे रहता है उसी प्रकार वह चक्रवर्तीकी सेनाका स्थान भी सब दिशाओंको घेरे हुए था ।।१६५॥ जिसने अपनी सेना समुद्र के किनारे ठहरा दी है और जिसने अपने विजय-शील शस्त्रोंसे मागध देवकी सभाको जीत लिया है ऐसे निधियोंके स्वामी चक्रवर्तीने रथके द्वारा समुद्र में जाकर मागधदेव के समान व्यन्तरोंके स्वामी वरतनु देवको भी जीता और समुद्रके भीतर रहनेवाले उसके वरतनु नामक द्वीपको कल्पान्त कालतक स्थिर रहनेवाले अपने यश से सदाके लिये अलंकृत कर दिया ।। १६६।। भरतेने वरतनु देवसे कभी न टूटनेवाला कवच, देदीप्यमान हार, चमकता हुआ चूड़ारत्न, दिव्य कड़े और रत्नोंसे प्रकाशमान यज्ञोपवीत इतनी वस्तुएं प्राप्त कीं । तदनन्तर उत्तम रत्नोंसे जिसकी पूजा की गई है ऐसे ऐश्वर्यशाली भरतने वैजयन्त नामक समुद्र के द्वारसे वापिस लौटकर अनेक प्रकारके तोरणोंसे सुशोभित किये गये अपने शिबिरमें प्रवेश किया ।।१६७।। उस समय वह दक्षिण दिशाका लवणसमुद्र ठीक मंत्रीकी तरह छलरहित हो भरतकी सेवा कर रहा था, क्योंकि जिस प्रकार मंत्री अपने स्वच्छ हृदयको प्रकट करता है उसी प्रकार वह समुद्र भी मोतियोंके छलसे अपने स्वच्छ हृदय (मध्यभाग) को प्रकट कर रहा था, जिस प्रकार मंत्री अपने अन्तरङ्गका अनुराग (प्रेम) प्रकट करता है उसी प्रकार वह समुद्र भी उत्पन्न होते हुए मूंगाओंके अंकुरोंसे अपने अन्तरङ्गका अनु-राग (लाल वर्ण) प्रकट कर रहा था, जिस प्रकार मंत्री अपना सर्वस्व समर्पण कर देता है उसी प्रकार समुद्र भी अपना सर्वस्व (जल) समर्पण कर रहा था, जिस प्रकार मंत्री अपना गुप्त धन उनके समीप रखता था उसी प्रकार वह समुद्र भी अपना गुप्त धन (मणि आदि) उनके समीप रख रहा था, और जिस प्रकार मंत्री दक्षिण (उदार सरल) होता है उसी प्रकार वह समुद्र भी दक्षिण (दक्षिणदिशावर्ती) था ।।१६८।। अथवा जिस प्रकार इन्द्र दास होकर अनन्त चतुष्ट्यरूप लक्ष्मीके स्वामी प्रथम जिनेन्द्र भगवान् वृषभदेवकी सेवा करता था उसी प्रकार वह समुद्र भी दास होकर राज्यलक्ष्मीके अधिपति भरत चक्रधरकी सेवा कर रहा था, क्योंकि जिस प्रकार इन्द्र आस्थान अर्थात् समवसरण सभामें जाकर विजय-दुन्दुभि बजाता था उसी प्रकार वह समुद्र भी भरतके आस्थान अर्थात् सभामण्डपके समीप अपनी गर्जनासे विजय-दुन्दुभि बजा रहा था, जिस प्रकार इन्द्र प्रातःकालके समय पढ़े जानेवाले मंगल-पाठके लिये जय जय शब्दका उच्चारण करता था उसी प्रकार वह समुद्र भी प्रातःकालके समय पढ़े जानेवाले भरतके मंगल-पाठके लिये अपने गंभीर शब्दोंसे जय जय शब्दका स्पष्ट उच्चारण कर रहा था, जिस प्रकार इन्द्र जलाशय (जडाशय) अर्थात् केवल ज्ञानकी अपेक्षा अल्प ज्ञानी होकर भी अपने ज्ञानकी अपेक्षा अजलधी (अजड़धी) अर्थात् विद्वान् (अजड़ा धीर्यस्य सः) अथवा अजड (ज्ञानपूर्ण प्रमात्मा) का ध्यान करनेवाला (अजड़ ध्यायतीत्यजडधीः) था उसी प्रकार वह समुद्र भी जलाशय अर्थात् जलयुक्त होकर भी अजलधी अर्थात् जल प्राप्त करनेकी इच्छासे (नास्ति जले धीर्यस्य सः) रहित था, इस प्रकार वह समुद्र चिरकाल तक भरतेश्वरकी सेवा करता रहा ।। १६९।।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके भावानुवादमें दक्षिण समुद्रके द्वारके विजयका वर्णन करनेवाला उनतीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ।
पर्व 30
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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