श्लोक 1 से 12 भगवान वृषभदेव की महिमा और सौधर्मेंद्र की स्तुति का प्रारंभ
भगवान वृषभदेव की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि राजर्षि भरत के चले जाने और दिव्यध्वनि के बंद होने पर वे समुद्र की तरह शांत हो गए हैं। उन्होंने धर्मरूपी जल से जीवों को सींचा और कल्पवृक्ष की भाँति अभीष्ट फल प्रदान किए। उनके चरणों में तीनों लोक विश्राम करते हैं। वे अनंत बल, गुणरूपी रत्नों और नव केवलज्ञान की किरणों से सुशोभित हैं। चार श्रमण संघों से घिरे हुए वे सुमेरु पर्वत जैसे प्रतीत होते हैं। आठ प्रातिहार्य, पाँच कल्याणक और चौंतीस अतिशयों से युक्त वे तीनों लोकों के स्वामी हैं। सौधर्मेंद्र ने स्थिर चित्त से उनकी स्तुति शुरू की, यह कहते हुए कि यद्यपि वे बुद्धि में सीमित हैं, पर भक्ति से प्रेरित होकर स्तुति करते हैं। वे मानते हैं कि भगवान की स्तुति से उत्तम फल प्राप्त होते हैं और मोक्ष सुख उसका परिणाम है।
श्लोक 13 से 21 भक्ति की प्रेरणा और भगवान के गुणों का प्रभाव
सौधर्मेंद्र कहते हैं कि भगवान के गुणों से प्रेरित भक्ति उन्हें आनंदित करती है और संसार से उदासीन होने पर भी वे स्तुति में प्रवृत्त हैं। थोड़ी-सी भक्ति भी कल्पवृक्ष की तरह बड़े फल देती है। भगवान का शरीर आभूषणों से रहित होकर भी राग-द्वेष पर विजय का प्रतीक है। उनका भूषणरहित शरीर स्वयं दैदीप्यमान है और अतिशय सुंदर प्रतीत होता है। उनके मुख पर क्रोध या शस्त्र का प्रयोग नहीं है, फिर भी उन्होंने घातियाकर्मों को नष्ट किया। उनकी सौम्य दृष्टि और निर्मल दीप्ति कामदेव पर विजय और पुण्यधारा की तरह जीवों को पवित्र करती है।
श्लोक 22 से 31 भगवान के मुख की शोभा और वचनों की महिमा
भगवान का मुख शरद् चंद्रमा की तरह कांतिमय है और वीतरागता को प्रकट करता है। उनकी पवित्र कांति अंधकार को नष्ट करती है और सरस्वती की तरह सुशोभित है। देवों की नेत्र-पंक्ति उनके मुखरूपी कमल पर भ्रमरों की तरह प्रतीत होती है। उनके वचनरूपी मकरंद से भव्य जीव आनंदित होते हैं। एक दिशा में मुख होने पर भी वे सर्वदर्शी प्रतीत होते हैं। उनके वचनरूपी किरणें अंधकार नष्ट करती हैं और अमृत की तरह जीवों को अमर बनाती हैं। उनका मुख धर्म का खजाना है और वचन सभा को आनंदित करते हैं।
श्लोक 32 से 41 शरीर की दिव्यता और समवसरण का माहात्म्य
भगवान का शरीर पसीना, मलमूत्र से रहित, सुगंधित और वज्र की तरह स्थिर है। उनकी सुंदरता, सौभाग्य और मधुर वाणी अद्वितीय हैं। उनका अपरिमित वीर्य अल्प शरीर में समाया है। समवसरण के चारों ओर सौ योजन तक अन्न-पान सुलभ होता है और यह आकाश में स्थिर रहता है। उनके उपदेश से हिंसक जीव भी अहिंसक हो जाते हैं। मोहनीय कर्म के क्षय से वे कवलाहार से मुक्त हैं। मूर्ख जो उनके कवलाहार की कल्पना करते हैं, उन्हें मोह दूर करने के लिए अनुभवी स्नेह की आवश्यकता है।
श्लोक 42 से 51 कर्मों पर विजय और दिव्य गुण
भगवान कर्मों से मुक्त हैं और असातावेदनीय उनके लिए प्रभावहीन है। वे पाप को धोने वाले, ईति-उपसर्ग से रहित हैं। उनका केवलज्ञान अनंतमुखी है और वे चतुर्मुख, अविनाशी हैं। उनका शरीर छायारहित और नेत्र अनुन्मेष हैं। उनके नख-केश स्थिर रहते हैं, जो रसादि के अभाव को दर्शाते हैं। उनके उदार गुण अद्वितीय हैं और इंद्र भी उनके रूप-सौंदर्य की इच्छा करते हैं, पर वे इन्हें त्यागते हैं।
श्लोक 52 से 61 समवसरण की शोभा और भक्ति का फल
उनकी उपासना करने वाले उनकी समानता प्राप्त करते हैं। समवसरण में अशोकवृक्ष, चमर, छत्र और सिंहासन उनकी शोभा बढ़ाते हैं। देवों के दुंदुभि उनके जयोत्सव की घोषणा करते हैं। पुष्पवर्षा और प्रभामंडल समवसरण को प्रभातमय बनाते हैं। उनके नखों की किरणें चरणों को कल्पवृक्ष की तरह सुशोभित करती हैं।
श्लोक 62 से 71 चरणों की महिमा और विजय के नाम
उनके चरणों की किरणें जीवों को आह्लादित करती हैं और मोह पर विजय का प्रतीक हैं। वे स्वयंभू, तीनों लोकों के स्वामी और विद्वानों में श्रेष्ठ हैं। उन्होंने घातियाकर्म, मृत्यु और संसार को जीता, इसलिए अनंतजित, मृत्युंजय और त्रिपुरारि कहलाते हैं।
श्लोक 72 से 81 गुणों के नाम और नमस्कार
वे त्रिनेत्र, अंधकांतक, अर्धनारीश्वर, शिव, हर, शंकर, वृषभ आदि नामों से पुकारे जाते हैं। वे चार शरणों के मूर्तिस्वरूप और पंच परमेष्ठी हैं। उनके कल्याणकों और कर्म-विनाश के लिए सौधर्मेंद्र नमस्कार करते हैं।
श्लोक 82 से 91 अनंत गुण और पवित्रता
वे अनंत वीर्य, सुख, प्रकाश और दान से युक्त हैं। परम ध्यानी, अयोनि, पवित्र और परमात्मा हैं। कर्म, मोह और राग से मुक्त होकर वे मोक्षगामी हैं।
श्लोक 92 से 101 नामों से स्तुति और अनंत वैभव, जिन सहस्त्रनाम 1 से 19
वे परम संयम, केवलदर्शन और रक्षक हैं। लेश्या, संज्ञा और दोषों से मुक्त हैं। उनके अनंत गुणों का स्तवन कठिन है, अतः उनके 1008 नामों से स्तुति की जाती है। वे श्रीमान, स्वयंभू, वृषभ, शंभव, विश्वभू आदि नामों से युक्त हैं।
इस प्रकार, सौधर्मेंद्र भगवान वृषभदेव की अनंत महिमा, गुणों और नामों से उनकी स्तुति करते हैं।
श्लोक 102 से 110 जिन सहस्त्रनाम 20 से 100, भगवान वृषभदेव के नाम और गुणों की महिमा
भगवान वृषभदेव समस्त पदार्थों को देखने वाले विश्वदृश्वा हैं और केवलज्ञान से सर्वत्र व्याप्त विभु कहलाते हैं। वे जीवों को मोक्ष पहुँचाने वाले धाता, विश्व के ईश्वर विश्वेश, और सबके हित के लिए उपदेश देने वाले विश्वविलोचन हैं। उनका ज्ञान विश्वव्यापी है और वे मोक्षमार्ग के विधानकर्ता विधि हैं। धर्म से जगत् की सृष्टि करने वाले वेधा, सदा विद्यमान शाश्वत, और चारों दिशाओं में मुख वाले विश्वतोमुख हैं। उन्होंने कर्मभूमि में आजीविका के लिए कार्यों का उपदेश दिया, इसलिए विश्वकर्मा कहलाते हैं। वे सबसे श्रेष्ठ जगज्ज्येष्ठ, अनंत गुणों से युक्त विश्वमूर्ति, और कर्म पर विजय पाने वाले जिनेश्वर हैं। वे अनंतज्योति से प्रकाशित और स्वामी होने पर भी अनीश्वर हैं।
श्लोक 111 से 121 जिन सहस्त्रनाम 101 से 200, दिव्य गुणों और पवित्रता का वर्णन
भगवान दिव्यध्वनि के स्वामी दिव्यभाषापति और अत्यंत सुंदर दिव्य हैं। उनके वचन और शासन पवित्र होने से पूतवाक् और पूतशासन कहलाते हैं। उनकी आत्मा शुद्ध पूतात्मा और उत्कृष्ट ज्योति से युक्त परमज्योति है। वे धर्म के अध्यक्ष धर्माध्यक्ष और इंद्रियों को जीतने वाले दमीश्वर हैं। मोक्षरूपी लक्ष्मी के अधिपति श्रीपति, अष्ट प्रातिहार्यों से युक्त भगवान, और पूज्य अर्हत् हैं। वे कर्ममल से रहित अरजा:, ज्ञानावरण से मुक्त विरजा:, और अति पवित्र शुचि हैं। तीर्थ के निर्माता तीर्थकृत्, केवलज्ञानी केवली, और अनंत सामर्थ्य से युक्त ईशान हैं। पूजा के योग्य पूजार्ह, घातियाकर्मों से मुक्त स्नातक, और मलरहित अमल हैं।
श्लोक 122 से 132 जिन सहस्त्रनाम 201 से 300, श्रेष्ठता और विश्वजयी स्वरूप
वे अनंत दीप्ति के धारक अनंतदीप्ति और ज्ञानस्वरूप ज्ञानात्मा हैं। स्वयं मोक्षमार्ग में प्रवृत्त स्वयंबुद्ध और जनसमूह के रक्षक प्रजापति हैं। कर्मबंधन से मुक्त, अनंत बलशाली शक्त, और बाधारहित निराबाध हैं। वे शरीररहित निष्कल और तीनों लोकों के स्वामी भुवनेश्वर हैं। कर्मरूपी अंजन से मुक्त निरंजन और जगत् को प्रकाशित करने वाले जगज्ज्योति हैं। उनके वचन सार्थक निरुक्तोक्ति और वे रोगरहित अनामय हैं। उनकी स्थिति अचल अचलस्थिति और वे अक्षोभ्य, नित्य कूटस्थ, गमनरहित स्थाणु, और क्षयरहित अक्षय हैं। वे विश्व को जीतने वाले विश्वजित् और मृत्यु को परास्त करने वाले विजितांतक हैं।
श्लोक 133 से 143 जिन सहस्त्रनाम 301 से 400, धर्म और पुण्य के प्रतीक
वे तीनों लोकों में अग्रणी और भव्यजीवों को मोक्ष दिलाने वाले ग्रामणी हैं। वे मार्गदर्शक नेता और शास्त्रों के रचयिता प्रणेता हैं। न्यायशास्त्र के उपदेशक न्यायशास्त्रकृत् और हितोपदेश देने वाले शास्ता हैं। वे धर्म के स्वामी धर्मपति और धर्म से युक्त धर्म्य हैं। उनकी आत्मा धर्मस्वरूप धर्मात्मा और वे तीर्थ के निर्माता धर्मतीर्थकृत् हैं। वृषभ चिह्न से युक्त वृषध्वज, धर्म के अधीश वृषाधीश, और धर्मरूपी पताका वृषकेतु हैं। वे धर्मशस्त्रधारी वृषायुध, धर्मस्वरूप वृष, और जीवों का पोषण करने वाले भर्ता हैं। सुंदर नाभि के कारण हिरण्यनाभि और सत्यस्वरूप भूतात्मा हैं। वे जीवों की रक्षा करने वाले भूतभृत् और मोक्ष के कारण प्रभव हैं।
श्लोक 144 से 155 जिन सहस्त्रनाम 401 से 500, सिद्धि और महानता का वर्णन
वे सिद्धि देने वाले सिद्धिद और संकल्प-सिद्ध सिद्धसंकल्प हैं। उनकी आत्मा सिद्ध अवस्था में सिद्धात्मा और मोक्ष-साधन से युक्त सिद्धसाधन हैं। वे सब कुछ जानने वाले बुद्धबोध्य और रत्नत्रय से युक्त महाबोधि हैं। उनके गुण बढ़ते रहते हैं, इसलिए वर्धमान, और ऋद्धियों के धारक महर्द्धिक हैं। वे वेदों के अंग वेदांग, वेदज्ञ वेदवित्, और दिगंबर जातरूप हैं। वे जानने वालों में श्रेष्ठ विदांवर और अनुभव से जानने योग्य स्वसंवेद्य हैं। आदि-अंत से रहित अनादिनिधन और ज्ञान से स्पष्ट व्यक्त हैं। वे युग के व्यवस्थापक युगादिकृत् और जगत् के प्रारंभ में उत्पन्न जगदादिज हैं। वे इंद्रों से श्रेष्ठ अतींद्र और इंद्रियातीत अतींद्रिय हैं।
श्लोक 156 से 167 जिन सहस्त्रनाम 501 से 600, महागुणों और शक्ति का प्रदर्शन
वे मुनियों में उत्तम महामुनि और मौन धारण करने वाले महामौनी हैं। शुक्लध्यान के स्वामी महाध्यान और जितेंद्रिय महादम हैं। वे शांत महाक्षम और उत्तम शील से युक्त महाशील हैं। तपश्चरण से कर्म नष्ट करने वाले महायज्ञ और पूज्य महामरण हैं। वे महाव्रतों के स्वामी महाव्रतपति और जगत्पूज्य मह्य हैं। विशाल कांति के धारक महाकांतिधर और मैत्रीभाव से युक्त महामैत्रीमय हैं। वे दयालु महाकारुणिक और मंत्रों के स्वामी महामंत्र हैं। यतियों में श्रेष्ठ महायति और गंभीर ध्वनि के धारक महानाद हैं। वे आनंदस्वरूप आनंद और सबको सुख देने वाले नंदन हैं। वे कामदेव को नष्ट करने वाले कामहा और अभीष्ट प्रदान करने वाले कामद हैं।
श्लोक 179 से 190 जिन सहस्त्रनाम 701 से 800, बुद्धि और विश्वप्रियता का वर्णन
वे प्रशस्त वचनों के धारक वाग्मी और बुद्धि के स्वामी शेमुषीश हैं। अनेक गुणों से युक्त नैकात्मा और साधारण जनों से अविज्ञेय हैं। वे ज्ञानगर्भ और दयालु दयागर्भ हैं। रत्नत्रय से युक्त रत्नगर्भ और सुंदर दर्शन वाले सुदर्शन हैं। वे लक्ष्मीवान् और त्रिदशाध्यक्ष हैं। धर्म के स्तंभ धर्मयुप और मुनियों के स्वामी मुनीश्वर हैं। उनके वचन अमोघवाक् और शासन सफल अमोघशासन है। वे सुख में स्थित सुस्थित और राग से मुक्त वीतराग हैं। तीनों लोकों के प्रिय त्रिजगद्वल्लभ और मंगलदाता त्रिजगन्मंगलोदय हैं। वे त्रिलोक के शिखर पर चूड़ामणि त्रिलोकाग्रशिखामणि हैं।
श्लोक 204 से 217 जिन सहस्त्रनाम 901 से 1008, तेजस्विता और शांत स्वरूप
वे दिगंबर दिग्वासा और परिग्रहरहित निष्किंचन हैं। ज्ञानरूपी नेत्रों के धारक ज्ञानचक्षु और मोह से मुक्त अमोमुह हैं। तेज के समूह तेजोराशि और अनंत प्रताप के धारक अनंतौज हैं। वे ज्ञान के समुद्र ज्ञानाब्धि और अंधकार को नष्ट करने वाले तमोऽपह हैं। तीनों लोकों में श्रेष्ठ जगच्चूड़ामणि और विघ्नों के नाशक विघ्नविनायक हैं। वे निद्रारहित अनिंद्रालु और सदा जागृत जागरूक हैं। मोक्ष के इच्छुक मुमुक्षु और इंद्रियों को जीतने वाले जिताक्ष हैं। धर्म के मूलकर्ता मूलकर्ता और कल्याणकारी वाणी के धारक श्रायसोक्ति हैं। वे शुभयुक्त शुभंयु और धर्म की रक्षा करने वाले धर्मपाल हैं।
श्लोक 218 से 231 नामों की महिमा और प्रार्थना
उनके एक हजार आठ नामों का स्मरण करने से स्मरणशक्ति पवित्र होती है। वे वचनों से परे होने पर भी स्तुति से अभीष्ट फल देने वाले हैं। वे जगत् के बंधु, वैद्य, और हितकारी हैं। एक प्रकाशक, द्विविध उपयोग, त्रिविध मोक्षमार्ग, और अनंतचतुष्टय से युक्त हैं। पंचपरमेष्ठी, छह द्रव्यों के ज्ञाता, और आठ गुणों से सुशोभित हैं। भक्त उनकी नाममाला से पूजा करते हैं, और यह स्तोत्र पाठ से कल्याण प्राप्त होता है। इंद्र ने उनकी स्तुति कर तीर्थ विहार की प्रार्थना की। वे भव्य जीवों को धर्मामृत से सींचने वाले और मोह की सेना को नष्ट करने वाले हैं।
श्लोक 232 से 244 समवसरण और विहार का वैभव
तीर्थंकररूपी सूर्य भव्य जीवों का अनुग्रह करने को तैयार हुए। वे छत्रत्रय, चमर, और मधुर दिव्यध्वनि से सुशोभित हैं। करोड़ों सूर्यों से स्पर्धा करने वाला भामंडल और पुष्पवर्षा उनकी शोभा बढ़ाते हैं। मेरु शिखर जैसे सिंहासन, अशोकवृक्ष, और मानस्तंभ उनके समवसरण को अलंकृत करते हैं। स्वच्छ जल की परिखा, गोपुरद्वार, और कल्पवृक्ष उनकी महिमा दर्शाते हैं। किन्नरदेव यश गाते हैं, और गंधकुटी दिशाओं को सुगंधित करती है। वे तीनों लोकों के स्वामी और विहार के लिए उद्यत हुए।
श्लोक 245 से 261 विहार का भव्य दृश्य
उनके विहार के समय करोड़ों देव इधर-उधर चले। इंद्रों के मुकुटों से मणि झलकते थे, और जय-जय शब्द गूँजता था। चार निकाय के देव महासागर जैसे क्षुब्ध थे। वे अर्धमागधी में उपदेश देते हैं और वृक्षों को फूलों से भर देते हैं। सुगंधित वायु बहती है, और पृथ्वी दर्पण-सी चमकती है। एक योजन तक भूमि स्वच्छ रहती है, और कमलों पर उनके चरण पड़ते हैं। धर्मचक्र, अष्ट मंगल, और ध्वजाएँ आकाश को व्याप्त करती हैं। दुंदुभि और भेरियों का शब्द कर्मशत्रुओं को तर्जना देता है।
श्लोक 262 से 271 विहार की शोभा और प्रभाव
देवांगनाएँ नृत्य करती हैं, और किन्नर गायन करते हैं। इंद्र उनके चारों ओर चमकते हैं। दिशाएँ निर्मल और पृथ्वी सुभिक्ष से भरी होती है। वृक्ष असमय फूलते हैं, और प्राणी मित्रता बढ़ाते हैं। सुवर्णमय कमल उनके चरणों के नीचे सुशोभित होते हैं। भव्य जीव आनंदित होते हैं, और चार सौ कोश तक कल्याण व्याप्त होता है।
श्लोक 272 से 281 कमलों की पंक्ति और विश्वप्रकाशन
सुवर्णमय कमल उनकी राह में 225 की संख्या में बिछे हैं। आकाश सरोवर-सा सुशोभित होता है। वे वचनामृत से सबको संतुष्ट करते हैं। मिथ्यात्व का अंधकार नष्ट कर वे जगत् को प्रकाशित करते हैं। भव्य धर्मामृत से संतोष पाते हैं।
श्लोक 282 से 290 देश-विहार और कैलास प्राप्ति
जिनेंद्ररूपी मेघ धर्मामृत बरसाते हैं, और भव्य चातक संतुष्ट होते हैं। वे अनेक देशों में विहार करते हैं। कैलास पर सभामंडप में विराजमान होकर वे अनंतचतुष्टय से युक्त होते हैं। इंद्रों द्वारा पूजित और तीनों लोकों के स्वामी, वे भक्तों को नमस्कार के योग्य हैं।
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
English translation of Ādi purāṇa parv 25 – Shlok 1 to 12
श्लोक ( Shlok ) 1 – 8
गते भरतराजर्षों दिव्यभाषोपसंहृतौ । निवातस्तिमितं वार्षिमिवानाविष्कृतध्वनिम् ॥१॥
धर्माम्बुवर्ष संसिक्तजगज्जनवनद्रुमम् । प्रावृङ्घनमिवोद्वान्त वृष्टिमृत्सृष्टनिःस्वनम् ॥२॥
कल्पद्रुममिवाभीष्टफलविश्राण नोद्यतम् । स्वपादाभ्यर्णविश्रान्त त्रिजगज्जनमूर्जितम् ॥३॥
विवस्त्रन्तमिवोद्धतमोहान्ध तमसोदयम् । नवकेवललब्धीद्धकरोत्करविराजितम् ॥४॥
महाकरमिवोद्भूतगुणरत्नोच्च याचितम् । भगवन्तं जगत्कान्तमचिन्त्यानन्तवैभवम् ॥५॥
वृतं श्रमणसङ्घेन चतुर्धा भेदमीयुषा । चतुर्विध वनाभोगपरिष्कृतमिवाद्रिपम् ।।६॥
प्रातिहार्याष्ट कोपेत सिद्धकल्याणपञ्चकम् । चतुस्त्रिंशदतीशेषै रिद्धर्द्धि त्रिजगत्प्रभुम् ॥७॥
प्रपश्यन् विकन्नेत्रसहस्त्रः प्रीतमानसः । सौधर्मेन्द्रः स्तुतिं कर्तुमथारेभे समाहितः ॥८॥
अथानंतर―राजर्षि भरत के चले जाने और दिव्यध्वनि के बंद हो जाने पर वायु बंद होने से निश्चल हुए समुद्र के समान जिनका शब्द बिलकुल बंद हो गया है, जिन्होंने धर्मरूपी जल की वर्षा के द्वारा जगत् के जीवरूपी वन के वृक्ष सींच दिये हैं अतएव जो वर्षा कर चुकने के बाद शब्दरहित हुए वर्षाऋतु के बादल के समान जान पड़ते हैं, जो कल्पवृक्ष के समान अभीष्ट फल देने में तत्पर रहते हैं, जिनके चरणों के समीप में तीनों लोकों के जीव विश्राम लेते हैं, जो अनंत बल से सहित हैं, जिन्होंने सूर्य के समान मोहरूपी गाड़ अंधकार के उदय को नष्ट कर दिया है, और जो नव केवललब्धिरूपी दैदीप्यमान किरणों के समूह से सुशोभित हैं, जो किसी बड़ी भारी खान के समान उत्पन्न हुए गुणरूपी रत्नों के समूह से व्याप्त हैं, भगवान् हैं, जगत् के अधिपति हैं, और अचिंत्य तथा अनंत वैभव को धारण करने वाले हैं । जो चार प्रकार के श्रमण संघ से घिरे हुए हैं और उनसे ऐसे जान पड़ते हैं मानो भद्रशाल आदि चारों वनों के विस्तार से घिरा हुआ सुमेरु पर्वत ही हो । जो आठ प्रातिहार्यों से सहित हैं, जिनके पाँच कल्याणक सिद्ध हुए हैं, चौंतीस अतिशयों के द्वारा जिनका ऐश्वर्य बढ़ रहा है और जो तीनों लोकों के स्वामी हैं, ऐसे भगवान् वृषभदेव को देखते ही जिसके हजार नेत्र विकसित हो रहे हैं और मन प्रसन्न हो रहा है ऐसे सौधर्म स्वर्ग के इंद्र ने स्थिर-चित्त होकर भगवान् की स्तुति करना प्रारंभ की ।।1-8।।
After Rajarshi Bharat departed and the divine voice ceased, just as the ocean becomes motionless when the wind stops, their speech also became completely silent. They, who have nourished the trees of life of the world with the rainfall of dharma, now seem like clouds after the monsoon—silent after having poured down rain. They are like the wish-fulfilling tree (Kalpavriksha), always eager to grant desired fruits. At their feet, the beings of all three worlds find rest. They possess infinite strength, have destroyed the rise of deep darkness of delusion like the sun, and are adorned by the radiant rays of newly attained absolute knowledge (Kevaljnana).
They are filled with qualities like precious jewels emerging from a great mine. They are the Lords of the universe, bearing unimaginable and infinite grandeur. Surrounded by the four types of ascetic communities (Shraman Sangh), they appear like Mount Sumeru surrounded by the expanses of the four Bhadrashala forests.
They are accompanied by the eight miraculous phenomena (Pratiharyas), have achieved the five auspicious events (Kalyanakas), and their grandeur is enhanced by thirty-four extraordinary qualities (Atishayas). They are the sovereigns of the three worlds.
Seeing such a magnificent Lord Rishabhadeva, whose thousands of eyes are opening with delight and whose heart is filled with joy, the Indra of Saudharma Heaven, with a focused mind, began to praise the Lord. ( 1-8)
श्लोक ( Shlok ) 9
स्तोष्ये त्वां परमं ज्योतिर्गुणरत्नमहाकरम् । मतिप्रकर्षहीनोऽपि केवलं भक्तिचोदितः ॥९॥
हे प्रभो, यद्यपि मैं बुद्धि की प्रकर्षता से रहित हूँ तथापि केवल आपकी भक्ति से ही प्रेरित होकर परम ज्योतिस्वरूप तथा गुणरूपी रत्नों की खानस्वरूप आपकी स्तुति करता हूँ ।।9।।
O Lord, although I am devoid of supreme intelligence, still, inspired solely by devotion to You, I offer praise to You, who are the embodiment of supreme radiance and the very mine of virtues resembling precious jewels. ||9||
श्लोक ( Shlok ) 10
त्वामभिष्टुवतां भक्त्या विशिष्टाः फलसंपदः । स्वयमाविर्भवन्तीति निश्चित्य त्वां जिनस्तुवे ॥१०॥
हे जिनेंद्र, भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करने वाले पुरुषों में उत्तम-उत्तम फलरूपी संपदाएं अपने आप ही प्राप्त होती हैं यही निश्चय कर आपकी स्तुति करता हूँ ।।10।।
O Jinendra, believing with certainty that those who praise You with devotion naturally attain the most excellent and prosperous fruits, I offer my praises to You. ||10||
श्लोक ( Shlok ) 11 –12
स्तुतिः पुण्यगुणोत्कीर्तिः स्तोता भव्यः प्रसन्नधीः । निष्ठितार्थों भवान् स्तुत्यः फलं नैःश्रेयसं सुखम् ॥ ११॥
इत्याकलय्य मनसा तुष्टूपुं मां फलार्थिनम् ।विभो प्रसन्नया दृष्ट्या त्वं पुनीहि सनातन ॥१२॥
पवित्र गुणों का निरूपण करना स्तुति है, प्रसन्न बुद्धि वाला भव्य स्तोता अर्थात् स्तुति करनेवाला है, जिनके सब पुरुषार्थ सिद्ध हो चुके हैं ऐसे आप स्तुत्य अर्थात् स्तुति के विषय हैं, और मोक्ष का सुख प्राप्त होना उसका फल है । हे विभो, हे सनातन, इस प्रकार निश्चय कर ह्रदय से स्तुति करने वाले और फल की इच्छा करने वाले मुझको आप अपनी प्रसन्न दृष्टि से पवित्र कीजिए ।।11-12।।
Describing pure virtues is true praise; a noble soul with a joyful mind is the true praiser. You, whose all efforts have been accomplished, are the worthy object of praise, and the attainment of the bliss of liberation is its ultimate fruit.
O Lord, O Eternal One, understanding this and offering praise from my heart with a desire for that supreme fruit, I pray—may You purify me with Your gracious and benevolent glance. ||11-12||
श्लोक 13 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181