Hindi Translation of Adi purana Parv 38
आदिपुराण सारांश पर्व 38
श्लोक 1 से 11 अरहंत भगवान की महिमा और भरत की दिग्विजय
जो समस्त भाषाओंमें परिणत होनेवाली है, जिसने अज्ञानरूपी गाढ अन्धकारको नष्ट कर दिया है और जो सूर्यकी किरणोंके समान देदीप्यमान है वह अरहन्त भगवान्की सुन्दर वाणी सदा जयवन्त हो ।।१।। गारुड़ी विद्याके समान जिनकी विद्याने मोहरूपी विषसे सोये हुए इस समस्त संसारको बहुत शीघ्र जगा दिया वे भगवान् वृषभदेव सदा जयवन्त रहें ।॥२॥ गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक, में उन परमज्योति-स्वरूप भगवान् वृषभदेव तथा भगवान् महावीर स्वामीको नमस्कारकर अब यहांसे द्विजोंकी उत्पत्ति कहता हूं सो सुनो ॥ ३॥ भरत चक्रवर्ती अनेक राजाओंके साथ भारतवर्षको जीतकर साठ हजार वर्षमें दिग्विजयसे वापिस लौटे ॥४।। जब वे सब कार्य कर चुके तब उनके चित्तमें यह चिन्ता उत्पन्न हुई कि दूसरेके उपकारमें मेरी इस संपदाका उपयोग किस प्रकार हो सकता है ? ।।५।। मैं श्री जिनेन्द्रदेवका बड़े ऐश्वर्यके साथ महामह नामका यज्ञ कर धन वितरण करता हुआ समस्त संसारको संतुष्ट करूं ? ।।६।। सदा निःस्पृह रहनेवाले मुनि तो हम लोगोंसे धन लेते नहीं हैं परन्तु ऐसा गृहस्थ भी कौन है जो धन-धान्य आदि सम्पत्तिके द्वारा पूजा करनेके योग्य है ।।७।। जो अणु व्रतको धारण करनेवाले हैं, धीर वीर हैं और गृहस्थोंमें मुख्य हैं ऐसे पुरुष ही हम लोगोंके द्वारा इच्छित धन तथा सवारी आदिक वाहनोंके द्वारा तर्पण करने के योग्य हैं ।।८।। इस प्रकार निश्चय कर सत्कार करनेके योग्य व्यक्तियोंकी परीक्षा करनेकी इच्छासे राजराजेश्वर भरतने उस समय समस्त राजाओंको बुलाया ।।९।। और सबके पास खबर भेज दी कि आप लोग अपने अपने सदाचारी इष्ट मित्र तथा नौकर चाकर आदिके साथ आज हमारे उत्सवमें अलग अलग आवें ।।१०।। इधर चक्रवर्तीने उन सबकी परीक्षा करनेके लिये अपने घरके आंगनमें हरे हरे अंकुर, पुष्प और फल खूब भरवा दिये ।।११।।
श्लोक 12 से 21 व्रतियों की परीक्षा और सत्कार
उन लोगोंमें जो अव्रती थे वे बिना किसी सोच-विचारके राजमन्दिरमें घुस आये । राजा भरतने उन्हें एक ओर हटाकर बाकी बचे हुए लोगोंको बुलाया ।।१२।। परन्तु बड़े बड़े कुलमें उत्पन्न हुए और अपने व्रतकी सिद्धिके लिये चेष्टा करनेवाले उन लोगोंने जब तक मार्गमें हरे अंकूरे हैं तब तक उसमें प्रवेश करनेकी इच्छा नहीं की ॥१३॥ पापसे डरनेवाले कितने ही लोग दयालु होने के कारण हरे धान्योंसे भरे हुए राजाके आंगनको उल्लंघन किये बिना ही वापिस लौटने लगे ।।१४।। परन्तु जब चक्रवर्तीने उनसे बहुत ही आग्रह किया तब वे दूसरे प्रासुक मार्गसे राजाके आंगनको लांघ-कर उनके पास पहुंचे ।।१५।। आप लोग पहले किस कारणसे नहीं आये थे, और अब किस कारणसे आये हैं, ऐसा जब चक्रवर्तीने उनसे पूछा तब उन्होंने नीचे लिखे अनुसार उत्तर दिया ।।१६।। आज पर्वके दिन कोंपल, पत्ते तथा पुष्प आदिका विधात नहीं किया जाता और न जो अपना कुछ बिगाड़ करते हैं ऐसे उन कोंपल आदिमें उत्पन्न होनेवाले जीवोंका भी विनाश किया जाता है ॥१७॥ हे देव, हरे अंकुर आदिमें अनन्त निगोदिया जीव रहते हैं, ऐसे सर्वज्ञ-देवके वचन हमलोगोंने सुने हैं ।॥१८॥ इसलिये जिसमें गीले गीले फल, पुष्प और अंकुर आदिसे शोभा की गई है ऐसा आपके घरका आंगन आज हम लोगोंने नहीं बूंदा है ।।१९।। इस प्रकार उनके वचनोंसे प्रभावित हुए सम्पत्तिशाली भरतने व्रतोंमें दृढ़ रहनेवाले उन सबकी प्रशंसा कर उन्हें दान मान आदि सत्कारसे सन्मानित किया ॥२०॥ पद्म नामकी निधि से प्राप्त हुए एकसे लेकर ग्यारह तककी संख्यावाले ब्रह्मसूत्र नामके सूत्रसे (व्रतसूत्रसे) उन सबके चिह्न किये ॥२१॥ प्रतिमाओंके द्वारा किये हुए भेदके अनुसार जिन्होंने यज्ञोपवीत धारण किये हैं ऐसे इन सबका भरतने सत्कार किया तथा जो व्रती नहीं थे उन्हें वैसे ही जाने दिया ।।२२।।
श्लोक 22 से 31 व्रतियों का सम्मान और पूजा के प्रकार
अथानन्तर चक्रवर्तीने जिनका सन्मान किया है ऐसे व्रत धारण करनेवाले वे लोग अपने अपने व्रतोंमें और भी दृढ़ताको प्राप्त हो गये तथा अन्य लोग भी उनकी पूजा आदि करने लगे ॥२३॥ भरतने उन्हें उपासकाध्ययनांगसे इज्या, वार्ता, दत्ति, स्वाध्याय, संयम और तपका उपदेश दिया ।। २४।। यह इनका कुलधर्म है ऐसा विचार कर राजर्षि भरतने उस समय अनुक्रमसे अर्हपूजा आदिका वर्णन किया ॥२५॥ वे कहने लगे कि अर्हन्त भगवान्की पूजा नित्य करनी चाहिये, वह पूजा चार प्रकारकी है सदार्चन, चतुर्मुख, कल्पद्रुम और आष्टाह्निक ॥२६॥ इन चारों पूजाओंमेंसे प्रतिदिन अपने घरसे गन्ध, पुष्प, अक्षत इत्यादि ले जाकर जिनालयमें श्री जिनेन्द्रदेवकी पूजा करना सदार्चन अर्थात् नित्यमह कहलाता है ॥२७॥ अथवा भक्तिपूर्वक अर्हन्तदेवकी प्रतिमा और मन्दिरका निर्माण कराना तथा दानपत्र लिख-कर ग्राम खेत आदिका दान देना भी सदार्चन (नित्यमह) कहलाता है ।। २८॥ इसके सिवाय अपनी शक्तिके अनुसार नित्य दान देते हुए महामुनियोंकी जो पूजा की जाती है उसे भी नित्य-मह समझना चाहिये ।। २९ ।। महामुकुटबद्ध राजाओंके द्वारा जो महायज्ञ किया जाता है उसे चतुर्मुख यज्ञ जानना चाहिये। इसका दूसरा नाम सर्वतोभद्र भी है ॥ ३०॥ जो चक्रतियों-के द्वारा किमिच्छक (मुंहमांगा) दान देकर किया जाता है और जिसमें जगत्के समस्त जीवों-की आशाएं पूर्ण की जाती हैं वह कल्पद्रुम नामका यज्ञ कहलाता है। भावार्थ – जिस यज्ञमें कल्पवृक्षके समान सबकी इच्छाएं पूर्ण की जावें उसे कल्पद्रुम यज्ञ कहते हैं, यह यज्ञ चक्रवर्ती ही कर सकते हैं ।। ३१।। चौथा आष्टाह्निक यज्ञ है जिसे सब लोग करते हैं और जो जगत्में अत्यन्त प्रसिद्ध है। इनके सिवाय एक ऐन्द्रध्वज महायज्ञ भी है जिसे इन्द्र किया करता है ।।३२।।
श्लोक 32 से 41 पूजा और दत्ति के प्रकार
बलि अर्थात् नैवेद्य चढ़ाना, अभिषेक करना, तीनों संध्याओंमें उपासना करना तथा इनके समान और भी जो पूजाके प्रकार हैं वे सब उन्हीं भेदों में अन्तर्भूत हैं ।॥ ३३।। इस प्रकारकी विधिसे जो जिनेन्द्रदेवकी महापूजा की जाती है उसे विधिके जाननेवाले आचार्य इज्या नामकी प्रथम वृत्ति कहते हैं ॥ ३४।। विशुद्ध आचरणपूर्वक खेती आदिका करना वार्ता कहलाती है तथा दयादत्ति, पात्रदत्ति, समदत्ति और अन्वयदत्ति ये चार प्रकारकी दत्ति कही गई हैं ।। ३५।।
अनुग्रह करने योग्य प्राणियोंके समूहपर दयापूर्वक मन वचन कायकी शुद्धिक साथ उनके भय दूर करनेको पण्डित लोग दयादत्ति मानते हैं ।। ३६।। महातपस्वी मुनियोंके लिये सत्कारपूर्वक पड़गाह कर जो आहार आदि दिया जाता है उसे पात्रदान कहते हैं ।। ३७।। क्रिया, मंत्र और व्रत आदिसे जो अपने समान है तथा जो संसारसमुद्रसे पार कर देनेवाला कोई अन्य उत्तम गृहस्थ है उसके लिये पृथिवी सुवर्ण आदि देना अथवा मध्यम पात्रके लिये समान बुद्धि-से श्रद्धाके साथ जो दान दिया जाता है वह समानदत्ति कहलाता है ॥ ३८-३९॥ अपने वंशकी प्रतिष्ठाके लिये पुत्रको समस्त कुलपद्धति तथा धनके साथ अपना कुटुम्ब समर्पण करनेको सकल-दत्ति कहते हैं। शास्त्रोंकी भावना (चिन्तवन) करना स्वाध्याय है, उपवास आदि करना तप है और व्रत धारण करना संयम है ॥४०-४१॥
श्लोक 42 से 51 द्विजों की परिभाषा और संस्कार
यह ऊपर कही हुई छह प्रकारकी विशुद्ध वृत्ति इन द्विजोंके करने योग्य है। जो इनका उल्लंघन करता है वह मूर्ख नाममात्रसे ही द्विज है, गुणसे द्विज नहीं है ।।४२।। तप, शास्त्रज्ञान और जातिये तीन ब्राह्मण होनेके कारण हैं, जो मनुष्य तप और शास्त्रज्ञानसे रहित है वह केवल जातिसे ही ब्राह्मण है ॥४३॥ इन लोगों-की आजीविका पापरहित है इसलिये इनकी जाति उत्तम कहलाती है तथा दान, पूजा, अध्ययन आदि कार्य मुख्य होनेके कारण व्रतोंकी शुद्धि होनेसे वह उत्तम जाति और भी सुसंस्कृत हो गई है ।॥४४।। यद्यपि जाति नामकर्म के उदयसे उत्पन्न हुई मनुष्य जाति एक ही है तथापि आजी-विकाके भेदसे होनेवाले भेदके कारण वह चार प्रकारकी हो गई है ॥४५॥ व्रतोंके संस्कारसे ब्राह्मण, शस्त्र धारण करनेसे क्षत्रिय, न्यायपूर्वक धन कमानेसे वैश्य और नीच वृत्तिका आश्रय लेनेसे मनुष्य शूद्र कहलाते हैं ।॥४६।। इसलिये द्विज जातिका संस्कार तपश्चरण और शास्त्रा-भ्याससे ही माना जाता है परन्तु तपश्चरण और शास्त्राभ्याससे जिसका संस्कार नहीं हुआ है वह जातिमात्रसे द्विज कहलाता है ।॥४७॥ जो एक बार गर्भसे और दूसरी बार क्रियासे इस प्रकार दो बार उत्पन्न हुआ हो उसे द्विजन्मा अथवा द्विज कहते हैं परन्तु जो क्रिया और मंत्र दोनोंसे ही रहित है वह केवल नामको धारण करनेवाला द्विज है ॥४८॥ इसलिये इन द्विजोंकी जातिके संस्कारको दृढ करते हुए सम्राट् भरतेश्वरने द्विजों के लिये नीचे लिखे अनुसार क्रियाओं-के समस्त भेद कहे ।।४९।। उन्होंने कहा कि श्रावकाध्याय संग्रहमें वे क्रियाएं तीन प्रकारकी कही गई हैं, सम्यग्दृष्टि पुरुषोंको उन क्रियाओंका पालन अवश्य करना चाहिये क्योंकि वे सभी उत्तम फल देनेवाली और शुभ करनेवाली हैं ।। ५० ।। गर्भान्वय क्रिया, दीक्षान्वय क्रिया और कर्त्रत्वय क्रिया इस प्रकार विद्वान् लोगोंने तीन प्रकारकी क्रियाएं मानी हैं ।॥ ५१।।
श्लोक 52 से 63 गर्भान्वय और दीक्षान्वय क्रियाएं
गर्भान्वय क्रियाएं, आधान आदि तिरेपन जानना चाहिये और दीक्षान्वय क्रियाएं अड़तालीस समझना चाहिये ।। ५२ ।। इनके सिवाय उस विषयके जानकार विद्वानोंने कर्त्रन्वय क्रियाएं सात संग्रह की हैं। अब आगे यथाक्रमसे उन क्रियाओंका नाम निर्देश किया जाता है ।॥५३॥ जो समुद्रसे भी दुस्तर है ऐसे बारह अंगोंमें सातवें अंग (उपासकाध्ययनांग) से जो कुछ मुझे ज्ञानका अंश प्राप्त हुआ है उसे मैं नीचे लिखे हुए आठ श्लोकोंसे प्रकट करता हूँ ॥५४॥ १ आधान, २ प्रीति, ३ सुप्रीति, ४ धृति, ५ मोद, ६ प्रियोद्भव, ७ नामकर्म, ८ बहिर्यान, ९ निषद्या, १० प्राशन, ११ व्युष्टि, १२. केशवाप, १३लिपि संख्यानसंग्रह, १४ उपनीति, १५ व्रतचर्या, १६ व्रतावतरण, १७ विवाह, १८ वर्णलाभ, १९ कुल-चर्या, २० गृहीशिता, २१ प्रशान्ति, २२ गृहत्याग, २३ दीक्षाद्य, २४ जिनरूपता, ३५ मौना-ध्ययनवृत्तत्व, २६ तीर्थकृत्भावना, २७ गुरुस्थानाभ्युपगम, २८ गणोपग्रहण, २९ स्वगुरु-स्थानसंक्रान्ति, ३० निःसंगत्वात्मभावना, ३१ योगनिर्वाणसंप्राप्ति, ३२ योगनिर्वाण साधन, ३३ इन्द्रोपपाद, ३४ अभिषेक, ३५ विधिदान, ३६ सुखोदय, ३७ इन्द्रत्याग, ३८ अवतार, ३९ हिरण्योत्कृष्टजन्मता, ४० मन्दरेन्द्राभिषेक, ४१ गुरुपूजोपलम्भन, ४२ यौवराज्य, ४३ स्वराज्य, ४४ चक्रलाभ, ४५ दिग्विजय, ४६ चक्राभिषेक, ४७ साम्राज्य, ४८ निष्क्रान्ति, ४९ योगसन्मह, ५० आर्हन्त्य, ५१ तद्विहार, ५२ योगत्याग और ५३ अग्रनिवृति । परमागम में ये गर्भसे लेकर निर्वाणपर्यन्त तिरपन क्रियाएं मानी गई हैं ।॥५५-६३।।
श्लोक 64 से 71 कर्त्रन्वय क्रियाएं और आधान
१ अवतार, २ वृत्तलाभ, ३ स्थानलाभ, ४ गणग्रह, ५ पूजाराध्य, ६ पुण्ययज्ञ, ७ दृढचर्या और ८ उपयोगिता इन कही हुई आठ क्रियाओंके साथ उपनीति नामकी चौदहवीं क्रियासे तिरपनवीं निर्वाण (अग्र-निवृति) क्रिया तककी चालीस क्रियाएं मिलाकर कुल अड़तालीस दीक्षान्वय क्रियाएं कहलाती हैं ।॥६४-६५।। कर्त्रन्वय क्रियाएं वे हैं जो कि पुण्य करनेवाले लोगोंको प्राप्त हो सकती हैं और जो समीचीन मार्गकी आराधना करनेके फल स्वरूप प्रवृत्त होती हैं ।। ६६ ।। १ सज्जाति, २ सद्गृहित्व, ३ पारिव्राज्य, ४ सुरेन्द्रता, ५ साम्राज्य, ६ परमार्हन्त्य और ७ परमनिर्वाण ये सात स्थान तीनों लोकोंमें उत्कृष्ट माने गये हैं और ये सातों ही अर्हन्त भगवान्के वचनरूपी अमृत के आस्वादनसे जीवोंको प्राप्त हो सकते हैं ।॥६७-६८॥ महर्षियोंने इन क्रियाओंका समूह अनेक प्रकारका माना-अनेक प्रकारसे क्रियाओंका वर्णन किया है परन्तु मैं यहां विस्तार छोड़-कर संक्षेपसे ही उनके लक्षण कहता हूँ ।॥ ६९॥ चतुर्थ स्नानके द्वारा शुद्ध हुई रजस्वला पत्नी को आगे कर गर्भाधानके पहले अर्हन्तदेवकी पूजाके द्वारा मंत्रपूर्वक जो संस्कार किया जाता है उसे आधान क्रिया कहते हैं ।॥७०॥ इस आधान क्रियाकी पूजामें जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमाके दाहिनी ओर तीन चक्र, बांई ओर तीन छत्र और सामने तीन पवित्र अग्नि स्थापित करे ।।७१।।
श्लोक 72 से 81 गर्भाधान और प्रीति-सुप्रीति क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 1 से 3)
अर्हन्त भगवान् (तीर्थ कर) के निर्वाणके समय, गणधरदेवोंके निर्वाणके समय और सामान्य केवलियोंके निर्वाणके समय जिन अग्नियोंमें होम किया गया था ऐसी तीन प्रकारकी पवित्र अग्नियां सिद्ध प्रतिमाकी वेदीके समीप ही तैयार करनी चाहिये ।। ७२ ।। प्रथम ही अर्हन्त देवकी पूजा कर चुकनेके बाद शेष बचे हुए पवित्र द्रव्यसे पुत्र उत्पन्न होनेकी इच्छा कर मंत्रपूर्वक उन तीन अग्नियोंमें आहुति करनी चाहिये ॥७३॥ उन आहुतियोंके मंत्र आगेके पर्वमें शास्त्रा-नुसार कहे जावेंगे। वे पीठिका मंत्र, जातिमंत्र आदिके भेदसे सात प्रकारक हैं ।॥७४।। श्रीजिनेन्द्रदेवने इन्हीं मंत्रोंका प्रयोग समस्त क्रियाओंमें बतलाया है इसलिये उस विषयके जान-कार श्रावकोंको व्यामोह (प्रमाद) छोड़कर उन मंत्रोंका प्रयोग करना चाहिये ॥७५।। इस प्रकार कही हुई इस गर्भाधानकी क्रियाको पहले विधिपूर्वक करके फिर स्त्री-पुरुष दोनों को विष-यानुरागके बिना केवल सन्तानके लिये समागम करना चाहिये ॥७६॥ इस प्रकार यह गर्भा-धान क्रियाकी विधि समाप्त हुई । गर्भाधानक बाद तीसरे माहमें प्रीति नामकी क्रिया होती है जिसे संतुष्ट हुए द्विज लोग करते हैं ।॥ ७७।। इस क्रियामें भी पहलेकी क्रियाके समान मन्त्रपूर्व क जिनेन्द्रदेवकी पूजा करनी चाहिये, दरवाजेपर तोरण बांधना चाहिये तथा दो पूर्ण कलश स्थापन करना चाहिये ॥७८॥ उस दिनसे लेकर गृहस्थोंको प्रतिदिन अपने वैभवके अनुसार घंटा और नगाड़े बजवाने चाहिये ।। ७९।। यह दूसरी प्रीति क्रिया है।
गर्भाधानसे पांचवें माहमें सुप्रीति क्रिया की जाती है जो कि प्रसन्न हुए उत्तम श्रावकों के द्वारा की जाती है ।।८०।। इस क्रियामें भी मंत्र और क्रियाओंको जाननेवाले श्रावकोंको अग्नि तथा देवताकी साक्षी कर अर्हन्त भगवान्की प्रतिमाके समीप पहले कही हुई समस्त विधि करनी चाहिये ।।८१।। यह तीसरी सुप्रीति नामकी क्रिया है।
श्लोक 82 से 91 धृति, मोद, प्रियोद्भव, और नामकर्म क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 4 से 8)
जिनका आदर किया गया है और जिनका चित्त व्याकुल नहीं है ऐसे गृहस्थोंको गर्भकी वृद्धिके लिये गर्भसे सातवें महीने में पिछली क्रियाओंके समान ही धृति नामकी क्रिया करनी चाहिये ॥८२॥ यह चौथी धृति नामकी क्रिया है ।
तदनन्तर नौवें महीनेके निकट रहनेपर मोद नामकी क्रिया की जाती है यह क्रिया भी पिछली क्रियाओंके समान आदरयुक्त उत्तम द्विजोंके द्वारा गर्भकी पुष्टिके लिये की जाती है ।॥८३॥ इस क्रिया में उत्तम द्विजोंको गर्भिणीके शरीरपर गात्रिकाबन्ध करना चाहिये अर्थात् मंत्रपूर्वक बीजाक्षर लिखना चाहिये, मङ्गलमय आभूषणादि पहिनाना चाहिये और रक्षाके लिये कंकणसूत्र आदि बांधनेकी विधि करनी चाहिये ।।८४।। यह पांचवीं मोदक्रिया है।
तदनन्तर प्रसूति होनेपर प्रियोद्भव नामकी क्रिया की जाती है, इसका दूसरा नाम जातकर्म विधि भी है। यह क्रिया जिनेन्द्र भगवान्का स्मरण कर विधिपूर्वक करनी चाहिये ।।८५।। इस क्रिया में क्रिया मंत्र आदि अवान्तर विशेष कार्य बहुत भारी हैं इसलिये इसका पूर्ण ज्ञान मूलभूत उपासकाध्ययनाङ्गसे प्राप्त करना चाहिये ॥८६॥ यह छठवीं प्रियोद्भव क्रिया है।
जन्मदिनसे बारह दिन के बाद, जो दिन माता पिता और देनेवाला हो उस दिन नामकर्मकी क्रिया की जाती अपने वैभवके अनुसार अर्हन्तदेव और ऋषियोंकी पूजा पुत्र के अनुकूल हो, सुख है ।।८७।। इस क्रियामें करनी चाहिये, द्विजोंका भी यथायोग्य सत्कार करना चाहिये तथा जो वंशकी वृद्धि करनेवाला हो ऐसा कोई उत्तम नाम बालकका रखना चाहिये ।।८८॥ अथवा जिनेन्द्रदेवके एक हजार आठ नामोंके समूहसे घटपत्रकी विधिसे कोई एक शुभ नाम ग्रहण कर लेना चाहिये । भावार्थ भगवान् के एक हजार आठ नामोंको एक हजार आठ कागजके टुकड़ोंपर अष्टगंधसे सुवर्ण अथवा अनार की कलमसे लिखकर उनकी गोली बना लेवे और पीले वस्त्र तथा नारियल आदिसे ढके हुए एक घड़ेमें भर देवे, कागजके एक टुकड़ेपर ‘नाम’ ऐसा शब्द लिखकर उसकी गोली बना लेवे इसी प्रकार एक हजार सात कोरे टुकड़ोंकी गोलियां बनाकर इन सबको एक दूसरे घड़ेमें भर देवे, अनन्तर किसी अबोध कन्या या बालकसे दोनों घड़ोंमेसें एक एक गोली निकलवाता जावे । जिस नामकी गोलीके साथ नाम ऐसा लिखी हुई गोली निकले वही नाम बालकका रखना चाहिये । यह घटपत्र विधि कहलाती है ।॥८९॥ यह सातवीं नामकर्म क्रिया है।
तदनन्तर दो-तीन अथवा तीन-चार माहके बाद किसी शुभ दिन तुरही आदि मांगलिक बाजोंके साथ साथ अपनी अनुकूलताके अनुसार बहिर्यान क्रिया करनी चाहिये ॥९०॥ जिस दिन यह क्रिया की जावे उसी दिनसे माता अथवा धायकी गोदमें बैठे हुए बालकका प्रसूतिगृहसे बाहर ले जाना शास्त्रसम्मत है ।।९१॥
श्लोक 92 से 101 निषद्या, अन्नप्राशन, व्युष्टि, और केशवाप क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 9 से 12)
उस क्रियाके करते समय बालकको भाई बान्धव आदिसे पारितोषिक भेंटरूपसे जो कुछ धनकी प्राप्ति हो उसे इकट्ठा कर, जब वह पुत्र पिताके धनका अधिकारी हो तब उसके लिये सौंप देवे ॥९२।। यह आठवीं बहिर्यान क्रिया है।
तदनन्तर, जिसके समीप मङ्गलद्रव्य रक्खे हुए हैं और जो बालकके योग्य हैं ऐसे बिछाये हुए आसनपर उस बालककी निषद्या क्रिया की जाती है अर्थात् उसे उत्तम आसनपर बैठालते हैं ।॥९३॥ इस क्रिया में सिद्ध भगवान्की पूजा करना आदि सब विधि पहले के समान ही करनी चाहिये जिससे इस बालककी उत्तरोत्तर दिव्य आसनपर बैठनेकी योग्यता होती रहे ॥९४।। यह नौंवी निषद्या क्रिया है।
जब क्रम क्रमसे सात आठ माह व्यतीत हो जायें तब अर्हन्त भगवान्की पूजा आदि कर वालकको अन्न खिलाना चाहिये ।।९५॥ यह दसवीं अन्नप्राशन क्रिया है।
तदनन्तर एक वर्ष पूर्ण होनेपर व्युष्टि नामकी क्रिया की जाती है इस क्रियाका दूसरा नाम शास्त्रानुसार वर्षवर्धन है ।।९६।। इस क्रियानें भी पहले ही के समान दान देना चाहिये, जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करनी चाहिये, इष्टवन्धुओंको बुलाना चाहिये और सबको भोजन कराना चाहिये ॥ ९७।। यह ग्यारहवीं व्युष्टि क्रिया है।
तदनन्तर, किसी शुभ दिन देव और गुरुकी पूजाके साथ साथ क्षौरकर्म अर्थात् उस्तरासे बालकके बाल बनवाना केशवाप क्रिया कहलाती है ।॥९८।। प्रथम ही वालोंको गन्धोदकले गीला कर उनपर पूजाके बचे हुए शेष अक्षत रखखे और फिर चोटी सहित अथवा अपनी कुलपद्धति के अनुसार उसका मुंडन करना चाहिये ।। ९९।। फिर स्नान कराने के लिये लाये हुए जलसे जिसका समस्त शरीर साफ कर दिया गया है, जिस पर लेप लगाया गया है और जिसे उत्तम आभूवण पहिनाये गये हैं ऐसे उस बालकसे मुनियोंको नमस्कार करावे, पश्चात् सब भाई, बन्धु उसे आशीर्वादस युक्त करें ।॥१००॥ इस क्रियाम पुण्याह-मंगल किया जाता है और यह चौल क्रिया नामसे प्रसिद्ध है इस किया में आदरको प्राप्त हुए लोग बड़े हर्षसे प्रवृत्त होते हैं ।॥ १०१।। यह केशवाप नामकी वारहवीं क्रिया है।
श्लोक 102 से 111 लिपिसंख्यान और उपनीति क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 13 से 14)
तदनन्तर पांचवें वर्ष में बालकको सर्वप्रथम अक्षरोंका दर्शन कराने के लिये लिपिसंख्यान नामकी क्रियाकी विधि की जाती है ।॥१०२॥ इस क्रियामें भी अपने वैसबके अनुसार पूजा आदिकी सामग्री जुटानी चाहिये और अध्ययन करानेमें कुशल व्रती गृहस्थको ही उस बालकके अध्यापकको पदपर नियुक्त करना चाहिये ।।१०३।। यह तेरहवीं लिपिसंख्यान क्रिया है।
इस गर्भसे आठवें वर्ष में बालककी उपनीति (यज्ञोपवीत धारण) क्रिया होती है। क्रियामें केशोंका मुण्डन, व्रतबन्धन तथा मौञ्जीबन्धनकी क्रियाएं की जाती हैं ।।१०४।। प्रथम ही जिनालयम जाकर जिसने अर्हन्तदेवकी पूजा की है ऐसे उस बालकको व्रत देकर उसका मौञ्जीबन्धन करना चाहिये अर्थात् उसकी कमरमें मूंजकी रस्सी बांधनी चाहिये ।। १०५।। जो चोटी रखाये हुए है, जिसकी सफेद धोती और सफेद दुपट्टा है, जो वेष और विकारोंसे रहित है, तथा जो व्रतके चिह्नस्वरूप यज्ञोपवीत सूत्रको धारण कर रहा है ऐसा वह बालक उस समय ब्रह्मचारी कहलाता है ।।१०६।। उस समय उसके आचरणके योग्य और भी नाम रक्खे जा सकते हैं। उस समय बड़े वैभवशाली राजपुत्रको छोड़कर सबको भिक्षावृत्तिसे ही निर्वाह करना चाहिये और राजपुत्रको भी अन्तः-पुरमें जाकर माता आदिसे किसी पात्रमें भिक्षा मांगनी चाहिये, क्योंकि उस समय भिक्षा लेने-का यह नियोग ही है। भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो उसका अग्रभाग श्री अरहन्तदेवको समर्पण कर बाकी बचे हुए योग्य अन्नका स्वयं भोजन करना चाहिये ॥१०७-१०८॥ यह चौदहवीं उपनीति क्रिया है।
अथानन्तर ब्रह्मचर्य व्रतके योग्य कमर, जांघ, वक्षःस्थल और शिरके चिह्नको धारण करनेवाले इस ब्रह्मचारी बालककी व्रतचर्या नामकी क्रियाका वर्णन करते हैं ।॥१०९।। तीन लरकी मूंजकी रस्सी बांधनेसे कमरका चिह्न होता है, यह मौंजीबन्धन रत्न-त्रयकी विशुद्धिका अंग है और द्विज लोगोंका एक चिह्न है ।।११०।। अन्त्यन्त धुली हुई सफेद धोती उसकी जांघ का चिह्न है, वह धोती यह सूचित करती है कि अरहन्त भगवान्का कुल पवित्र और विशाल है ॥ १११ ॥
श्लोक 112 से 121 व्रतचर्या और व्रतावतरण क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 15 से 16)
उसके वक्षःस्थलका चिह्न सात लरका गुंथा हुआ यज्ञोपवीत है, यह यज्ञोपवीत सात परमस्थानोंका सूचक है ।॥ ११२ ॥ उसके शिरका चिह्न स्वच्छ और उत्कृष्ट मुण्डन है जो कि उसके मन, वचन, कायके मुण्डनको बढ़ानेवाला है। भावार्थ-शिर मुण्डनसे मन, वचन, काय पवित्र रहते हैं ।॥११३॥ प्रायः इस प्रकारके चिह्नोंसे विशुद्ध और ब्रह्मचर्य से बढ़े हुए स्थूल हिंसाका त्याग (अहिंसाणु व्रत) आदि व्रत उसे धारण करना चाहिये ॥११४।। इस ब्रह्मचारीको वृक्षकी दातौन नहीं करनी चाहिये, न पान खाना चाहिये, न अंजन लगाना चाहिये और न हल्दी आदि लगाकर स्नान करना चाहिये, उसे प्रतिदिन केवल
जलसे शुद्ध स्नान करना चाहिये ।।११५॥ उसे खाट अथवा पलंगपर नहीं सोना चाहिये, दूसरे के शरीरसे अपना शरीर नहीं रगड़ना चाहिये, और व्रतोंको विशुद्ध रखनेके लिये अकेला पृथिवीपर सोना चाहिये ।। ११६।। जब तक विद्या समाप्त न हो तब तक उसे यह व्रत धारण करना चाहिये और विद्या समाप्त होनेपर वे व्रत धारण करना चाहिये जो कि गृहस्थोंके मूलगुण कहलाते हैं ।।११७।। सबसे पहले इस ब्रह्मचारीको गुरुके मुखसे श्रावकाचार पढ़ना चाहिये और फिर विनयपूर्वक अध्यात्मशास्त्र पढ़ना चाहिये ॥११८।। उत्तम संस्कारोंको जागृत करने के लिये और विद्वत्ता प्राप्त करने के लिये इस व्याकरण आदि शब्दशास्त्र और न्याय आदि अर्थशास्त्रका भी अभ्यास करना चाहिये क्योंकि आचार-विषयक ज्ञान होनेपर इनके अध्ययन करनेमें कोई दोष नहीं है ।॥ ११९ ॥ इसके बाद ज्योतिष शास्त्र, छन्दशास्त्र, शकुनशास्त्र और गणितशास्त्र आदिका भी उसे विशेषरूपसे अध्ययन करना चाहिये ।। १२० ।। यह पन्द्रहवीं व्रतचर्या क्रिया है ।
तदनन्तर जिसने समस्त विद्याओंका अध्ययन कर लिया है ऐसे उस ब्रह्मचारीकी व्रतावतरण क्रिया होती है। इस क्रिया में वह साधारण व्रतोंका तो पालन करता ही है परन्तु अध्ययनके समय जो विशेष व्रत ले रक्खेथे उनका परित्याग कर देता है। ॥१२१॥
श्लोक 122 से 131 व्रतावतरण और विवाह क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 16 से 17)
इस क्रियाके बाद उसके मधुत्याग, मांसत्याग, पांच उदुम्बर फलोंका त्याग और हिंसा आदि पांच स्थूल पापोंका त्याग, ये सदा काल अर्थात् जीवन पर्यन्त रहनेवाले व्रत रह जाते हैं ।। १२२।। यह व्रतावतरण क्रिया गुरुकी साक्षीपूर्वक जिनेन्द्र भगवान्की पूजा कर बारह अथवा सोलह वर्ष बाद करनी चाहिये ।। १२३ ।। पहले द्विजोंका सत्कार कर फिर व्रतावतरण करना उचित है और व्रतावतरण के बाद गुरुकी आज्ञासे वस्त्र, आभूषण और माला आदिका ग्रहण करना उचित है ।। १२४।। इसके बाद यदि वह शस्त्रोपजीवी अर्थात् क्षत्रिय वर्गका है तो वह अपनी आजीविकाकी रक्षा के लिये शस्त्र भी धारण कर सकता है अथवा केवल शोभा-के लिये भी शस्त्र ग्रहण किया जा सकता है ।। १२५।। इस प्रकार इस क्रियामें यद्यपि वह भोगोप-भोगोंके ब्रह्मव्रतका अर्थात् ताम्बूल आदिके त्यागका अवतरण (परित्याग) कर देता है तथापिजब तक उसके आगेकी क्रिया नहीं होती तब तक वह काम परित्यागरूप ब्रह्मव्रतका पालन करता रहता है ।। १२६।। यह सोलहवीं व्रतावतरण क्रिया है।
तदनन्तर विवाहके योग्य कुलमें उत्पन्न हुई कन्याके साथ जो विवाह करना चाहता है ऐसे उस पुरुषकी गुरुकी आज्ञासे वैवाहिकी क्रिया की जाती है ॥ १२७॥ उत्तम द्विजोंको चाहिये कि वे सबसे पहले अच्छी तरह सिद्ध भगवान्की पूजा करें और फिर तीनों अग्नियोंकी पूजा कर उनकी साक्षीपूर्वक उस वैवाहिकी (विवाह सम्बन्धी) क्रियाको करें ॥ १२८॥ किसी पवित्र स्थानमें बड़ी विभूतिके साथ सिद्ध भगवान्की प्रतिमाके सामने वधू-वरका विवाहोत्सव करना चाहिये ॥ १२९॥ वेदीमें जो तीन, दो अथवा एक अग्नि उत्पन्न की थी उसकी प्रदक्षिणाएं देकर वधू-वरको समीप ही बैठना चाहिये ॥१३०॥ विवाहकी दीक्षामें नियुक्त हुए वधू और वरको देव और अग्निकी साक्षीपूर्वक सात दिन तक ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना चाहिये ।। १३१।।
श्लोक 132 से 141 विवाह और वर्णलाभ क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 17 से 18)
फिर अपने योग्य किसी देशमें भूमण कर अथवा तीर्थभूमिमें विहारकर वर और वधू बड़ी विभूतिके साथ अपने घरमें प्रवेश करें ।।१३२।। तदनन्तर जिनका कंकण छोड़ दिया है, ऐसे वर और वधू अपने घरमें समया-नुसार भोगोपभोगके साधनोंसे सुशोभित शय्यापर शयन कर केवल संतान उत्पन्न करनेकी इच्छासे ऋतुकालमें ही परस्पर काम-सेवन करें। काम-सेवनका यह क्रम काल तथा शक्ति की अपेक्षा रखता है इसलिये शक्तिहीन पुरुषोंके लिये इससे विपरीत क्रम समझना चाहिये अर्थात् उन्हें ब्रह्मचर्यसे रहना चाहिये ।।१३३-१३४।। यह सत्रहवीं विवाह-क्रिया है।
इस प्रकार जिसका विवाह किया जा चुका है और जो गार्हस्थ्यधर्मका पालन कर रहा है ऐसा पुरुष अपने धर्मका उल्लंघन न करे इसलिये उसके अर्थ वर्णलाभ क्रियाको कहते हैं ॥१३५॥ यद्यपि उसका विवाह हो चुका है तथापि वह जबतक पिताके घर रहता है तबतक अस्वतन्त्र ही है इसलिये उसको स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके लिये यह वर्णलाभकी क्रिया कही गई है ।।१३६॥ पिताकी आज्ञासे जिसे धनधान्य आदि सम्पदाएं प्राप्त हो चुकी हैं और मकान भी जिसे अलग मिल चुका है ऐसे पुरुषकी स्वतन्त्र आजीविका करने लगनेको वर्णलाभ कहते हैं ।॥ १३७।। इस क्रियाके समय भी पहले के समान सिद्ध प्रतिमाओंका पूजन कर पिता अन्य मुख्य श्रावकोंको साक्षी कर उनके सामने पुत्रको धन अर्पण करे तथा यह कहे कि यह धन लेकर तुम इस अपने घरमें पृथरूपसे रहो। तुम्हें दान पूजा आदि समस्त गृहस्थधर्म पालन करते रहना चाहिये। जिस प्रकार हमारे पिताके द्वारा दिये हुए धनसे मैंने यश और धर्मका अर्जन किया है उसी प्रकार तुम भी यश और धर्मका अर्जन करो । इस प्रकार पुत्रको समझाकर पिता उसे वर्णलाभमें नियुक्त करे और सदाचारका पालन करता हुआ वह पुत्र भी पिताके धर्मका पालन करनेके लिये समर्थ होता है ।।१३८-१४१।। यह अठारहवीं वर्णलाभ क्रिया है।
श्लोक 142 से 151 कुलचर्या, गृहीशिता, और प्रशान्ति-गृहत्याग क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 19 से 21)
जिसे वर्णलाभ प्राप्त हो चुका है ऐसे पुत्रके लिये कुलचर्या क्रिया कही जाती है और पूजा, दत्ति तथा आजीविका करना आदि सब जिसके लक्षण हैं ऐसी कुलचर्या क्रियाका पहले विस्तारके साथ वर्णन कर चुके हैं ।॥ १४२॥ निर्दोषरूपसे आजीविका करना तथा आर्य पुरुषोंके करने योग्य देवपूजा आदि छह कार्य करना यही गृहस्थोंकी कुलचर्या कहलाती है और यही उनका कुलधर्म माना जाता है ॥ १४३॥ यह उन्नीसवीं कुलचर्या क्रिया है।
तदनन्तर कुलचर्याको प्राप्त हुआ वह पुरुष धर्ममें दृढताको धारण करता हुआ गृहस्थाचार्यरूपसे गृहीशिताको स्वीकार करे अर्थात् गृहस्थोंका स्वामी बने ।॥ १४४।। फिर उसे आपको उत्तमवर्ण मानकर आपमें गृहीशिता स्थापित करनी चाहिये । जो दूसरे गृहस्थोंमें न पाई जावे ऐसी शुभ वृत्ति, क्रिया, मन्त्र, विवाह तथा आगे कही जानेवाली क्रियाएं, शास्त्रज्ञान और चारित्र आदिकी क्रियाओंसे अपने आपको उन्नत करता हुआ वह गृहीश अर्थात् गृहस्थोंके स्वामी होनेके योग्य होता है ।।१४५-१४६।। उस समय वर्णोत्तम, महीदेव, सुश्रुत, द्विजसत्तम, निस्तारक, ग्रामपति और मानार्ह इत्यादि कहकर लोगोंको उसका सत्कार करना चाहिये ।।१४७।। यह बीसवीं गृहीशिता क्रिया है।
तदनन्तर वह गृहस्थाचार्य अपना भार संभालनेमें समर्थ योग्य पुत्रको पाकर उसे अपनी गृहस्थीका भार सौंप दे और आप स्वयं उत्तम शान्तिका आश्रय ले ।। १४८।। विषयोंमें आसक्त नहीं होना, नित्य स्वाध्याय करनेमें तत्पर रहना तथा नाना प्रकारके उपवास आदि करते रहना प्रशान्त वृत्ति कहलाती है ॥ १४९।। यह इक्कीसवीं प्रशान्ति क्रिया है।
तदनन्तर गृहस्थाश्रममें अपने आपको कृतार्थ मानता हुआ जब वह गृहत्याग करनेके लिये उद्यत होता है तब उसके यह गृहत्याग नामकी क्रियाकी विधि की जाती है ।।१५०।। इस क्रियामें सबसे पहले सिद्ध भगवान्का पूजन कर समस्त इष्टजनोंको बुलाना चाहिये और फिर उनकी साक्षीपूर्वक पुत्रके लिये सब कुछ सौंपकर गृहत्याग कर देना चाहिये ।।१५१।।
श्लोक 152 से 161 गृहत्याग और दीक्षाद्य-जिनरूपता क्रिया
गृहत्याग करते समय ज्येष्ठ पुत्रको बुलाकर उससे इस प्रकार कहना चाहिये कि पुत्र, हमारे पीछे यह कुलक्रम तुम्हारे द्वारा पालन करने योग्य है। मैंने जो अपने धनके तीन भाग किये हैं उनका तुम्हें इस प्रकार विनियोग करना चाहिये कि उनमेंसे एक भाग तो धर्मकार्यमें खर्च करना चाहिये, दूसरा भाग अपने घर खर्चके लिये रखना चाहिये और तीसरा भाग अपने भाइयोंमें बांट देनेके लिये है। पुत्रोंके समान पुत्रियोंके लिये भी बराबर भाग देना चाहिये । हे पुत्र, तू कुलका बड़ा होकर मेरी सब संतानका पालन कर । तू शास्त्र, सदाचार, क्रिया, मन्त्र और विधिको जाननेवाला है इसलिये आलस्यरहित होकर देव और गुरुओंकी पूजा करता हुआ अपने कुलधर्मका पालन कर । इस प्रकार ज्येष्ठ पुत्रको उपदेश देकर वह द्विज निराकुल होवे और फिर दीक्षा ग्रहण करनेके लिये अपना घर छोड़ दे ।।१५२-१५६॥ यह बाईसवीं गृहत्याग नामकी क्रिया है।
जिसने घर छोड़ दिया है, जो सम्यग्दृष्टि है, प्रशान्त है, गृहस्थोंका स्वामी है और दीक्षाधारण करनेके समयके कुछ पहले जिसने एक वस्त्र धारण किया है उसके दीक्षाग्रहण करनेके पहले जो कुछ आचरण किये जाते हैं उन आचरणों अथवा क्रियाओंके समूहको द्विजकी दीक्षाद्य क्रिया कहते हैं ।॥ १५७-१५८।। यह तेईसवीं दीक्षाद्य क्रिया है।
जिसने वस्त्र आदि सब परिग्रह छोड़ दिये हैं और जो जिनदीक्षाको प्राप्त करना चाहता है ऐसे पुरुषका दिगम्बररूप धारण करना जिनरूपता नामकी क्रिया कहलाती है ॥ १५९॥ जिनका आत्मा कातर है ऐसे पुरुषोंको जिनरूप (दिगम्बररूप) का धारण करना कठिन है इसलिये जिसमें परिग्रह त्यागकी मुख्यता है ऐसा यह जिनेन्द्रदेवका रूप धीरवीर मनुष्योंके द्वारा ही धारण किया जाता है ।।१६०।। यह चौबीसवीं जिनरूपता क्रिया है।
जिसने दीक्षा लेकर उपवास किया है और जो पारणकी विधिमें अर्थात् विधि-पूर्वक आहार लेने में प्रवृत्त होता है ऐसे साधुका शास्त्रकी समाप्ति पर्यन्त जो मौन रहकर अध्ययन करनेमें प्रवृत्ति होती है उसे मौनाध्ययनवृत्तत्व कहते हैं ॥१६१॥
श्लोक 162 से 171 मौनाध्ययनवृत्तत्व और तीर्थकृद्भावना क्रिया
जिसने मौन धारण किया है, जिसका आत्मा विनय युक्त है, और मन वचन काय शुद्ध हैं ऐसे साधुको गुरुके समीपमें प्रारम्भसे लेकर समस्त शास्त्रोंका अध्ययन करना चाहिये ।।१६२।। क्योंकि इस विधिसे भव्यजीवोंके द्वारा उपासना किया हुआ शास्त्र इस लोकमें उनकी योग्यता बढ़ाता है और परलोकमें प्रसन्न रखता है ।॥ १६३॥ यह पच्चीसवीं मौनाध्ययनवृत्तित्व क्रिया है ।
तदनन्तर जिसने समस्त आचार शास्त्रका अध्ययन किया है, तथा अन्य शास्त्रोंके अध्ययनसे जिसने समस्त श्रुतज्ञानका विस्तार प्राप्त किया है और जिसका आचरण विशुद्ध है ऐसा साधु तीर्थङ्कर पदकी भावनाओंका अभ्यास करे ॥ १६४।। सम्यग्दर्शनकी विशुद्धि रखना आदि जिसके लक्षण हैं जो महान् ऐश्वर्यको देनेवाली हैं तथा पहले जिनका विस्तारके साथ वर्णन किया जा चुका है ऐसी वे भावनाएँ सोलह मानी गई हैं ।।१६५।। यह छब्बीसवीं तीर्थकृद्भावना नामकी क्रिया है।
तदनन्तर जिसने समस्त विद्याएं जान ली हैं और जिसने अपने अन्तःकरणको वश कर लिया है ऐसे साधुका गुरुके अनुग्रहसे गुरुका स्थान स्वीकार करना शास्त्रसंमत है ।।१६६।। जो ज्ञान विज्ञान करके सम्पन्न है, अपने गुरुको इष्ट है अर्थात् जिसे गुरु अपना पद प्रदान करना योग्य समझते हैं, जो विनयवान् और धर्मात्मा है वह साधु गुरुका पद प्राप्त करनेके योग्य है ।।१६७।। यह सत्ताईसवीं गुरुस्थानाभ्युपगम क्रिया है।
तदनन्तर जो सदाचारका पालन करता है गण अर्थात् समस्त मुनिसंघके पोषण करनेमें जो तत्पर रहता है उसके महषियोंने गणोपग्रहण नामकी क्रिया मानी है ।॥ १६८॥ इस आचार्यको चाहिये कि वह मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविकाओंको समीचीन मार्गमे लगाता हुआ अच्छी तरह संघका पोषण करे ।। १६९।। उसे यह भी चाहिये कि वह शास्त्र अध्ययनकी इच्छा करनेवालोंको दीक्षा देवे और धर्मात्मा जीवोंके लिये धर्मका प्रतिपादन करे ॥ १७०।। वह आचार्य सदाचार धारण करनेवालोंको प्रेरित करे, दुराचारियोंको दूर हटावे और किये हुए स्वकीय अपराधरूपी मलको शोधता हुआ अपने आश्रितगणकी रक्षा करे ।। १७१।। यह अट्ठाईसवीं गणोपग्रहण क्रिया है।
तदनन्तर इस प्रकार संघका पालन करता हुआ वह उत्तम आचार्य अपने गुरुका स्थान प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न सहित हो ॥१७२।।
श्लोक 172 से 181 गुरुस्थानाभ्युपगम और गणोपग्रहण क्रिया
जिसने समस्त विद्याएं पढ़ ली हैं और उन विद्याओंके जानकार उत्तम उत्तम मुनि जिसका आदर करते हैं ऐसे योग्य शिष्यको बुलाकर उसके लिये अपना भार सौंप दे ॥ १७३।। गुरुकी अनुमतिसे वह शिष्य भी गुरुके स्थानपर अधिष्ठित होता हुआ उनके समस्त आचरणोंका स्वयं पालन करे और समस्तसंघको पालन करावे ॥ १७४।। यह उन्तीसवीं स्वगुरु-स्थानावाप्ति क्रिया है।
इस प्रकार सुयोग्य शिष्यपर समस्त भार सौंपकर जो किसी कालमें दुःखी नहीं होता है ऐसा साधु अकेला विहार करता हुआ ‘मेरा आत्मा सब प्रकारके परिग्रहसे रहित है’ इस प्रकारकी भावना करे ।। १७५।। जिसकी वृत्ति समस्त परिग्रहसे रहित है, जो अकेला ही विहार करता है, महातपस्वी है और जो केवल अपने आत्माका ही संस्कार करना चाहता है उसे किसी अन्य पदार्थका संस्कार नहीं करना चाहिये अर्थात् अपने आत्माको छोड़कर किसी अन्य साधु या गृहस्थके सुधारकी चिन्तामें नहीं पड़ना चाहिये ।। १७६ ।। शिष्य पुस्तक आदि सब पदार्थोंमें राग छोड़कर और निर्ममत्वभावनामें एकाग्र बुद्धि लगाकर उस समय उसे चारित्रकी शुद्धि धारण करनी चाहिये ।।१७७।। यह तीसवीं निःसङ्गत्वात्मभावना क्रिया है।
तदनन्तर इस प्रकार अपने आत्माका संस्कार कर जो सल्लेखना धारण करने के लिये उद्यत हुआ है और जिसने सब प्रकारसे आत्माकी शुद्धि कर ली है ऐसा पुरुष योगनिर्वाण क्रियाको प्राप्त हो ।॥१७८॥ योग नाम ध्यानका है उसके लिये जो संवेग-पूर्वक प्रयत्न किया जाता है उस परम तपको योगनिर्वाण संप्राप्ति कहते हैं ।॥ १७९।। प्रथम ही शरीरको शुद्ध कर सल्लेखनाके योग्य आचरण करना चाहिये और फिर रागादि दोषोंके साथ शरीरको कृश करना चाहिये ।। १८० ।। जीवित रहने आशा और मरनेकी इच्छा छोड़कर ‘यह भव्य है’ इस प्रकारका सुयश प्राप्त करने के लिये संन्यास धारण करनेके पहले भावना की जाती है वह योगनिर्वाण कहलाता है ।। १८१।।
श्लोक 182 से 191 स्वगुरुस्थानसंक्रान्ति और निःसंगत्वात्मभावना-योगनिर्वाणसंप्राप्ति क्रिया
उस समय रागद्वेष छोड़कर कल्याणकी प्राप्ति में प्रयत्न करना चाहिये और जो पदार्थ आत्माके नहीं हैं उनमें ‘यह मेरे हैं’ इस संकल्पका त्याग कर देना चाहिये ।।१८२॥ न में शरीर हूं, न मन हूं, न वाणी हूं और न इन तीनोंका कारण ही हूं। इस प्रकार तीनोंके विषयमें उद्विग्न न होकर अन्यत्व भावनाका चिन्तवन करना चाहिये ॥१८३॥ इस संसारमें में अकेला हूं न मेरा कोई है और न मैं भी किसीका हूं, इस प्रकार उदार चित्त होकर एकत्वभावनाका अच्छी तरह चिन्तवन करना चाहिये ।।१८४।॥ जो नित्य और अनन्त सुखका स्थान है ऐसे लोकके अग्रभाग अर्थात् मोक्षस्थानमें बुद्धि लगाकर उस योगीको योग (ध्यान) की सिद्धिके लिये योग निर्वाण क्रियाकी भावना करनी चाहिये। भावार्थ-सल्लेखनामें बैठे हुए साधुको संसारके अन्य पदार्थोंका चिन्तवन न कर एक मोक्षका ही चिन्तवन करना चाहिये ।।१८५।। यह इकतीसवीं योगनिर्वाण संप्राप्ति क्रिया है।
तदनन्तर-समस्त आहार और शरीरको छोड़ता हुआ वह योगिराज योगनिर्वाण साधनके लिये उद्यत हो ।।१८६।। जिसने उत्तम अर्थात् मोक्षपदार्थमें आदर बुद्धि की है, शरीरसे ममत्व छोड़ दिया है और जिसकी बुद्धि उत्तम है ऐसा वह साधु अपने मन, वचन, कायको अपने आत्मासे भिन्न अनुभव करता हुआ अपने मनकी प्रवृत्ति पञ्चपरमेष्ठियोंके चरणोंमें लगावे और इस प्रकार जीवनके अन्त में योगनिर्वाण साधनको अपने आधीन करे-स्वीकार करे ।।१८७-१८८।। योग नाम समाधिका है उस समाधिके द्वारा चित्तको जो आनन्द होता है उसे निर्वाण कहते हैं, चूंकि यह योगनिर्वाण इष्ट पदार्थोंका साधन है-इसलिये इसे योगनिर्वाण साधन कहते हैं ।। १८९।। यह बत्तीसवीं योगनिर्वाण साधनक्रिया है।ऊपर लिखे अनुसार योगोंका समाधान कर अर्थात् मन, वचन, कायको स्थिरकर जिसने प्राणोंका परित्याग किया है ऐसा साधु पुण्यके आगे आगे चलनेपर इन्द्रोपपाद क्रियाको प्राप्त होता है ॥ १९०॥ देवोंके स्वामी इन्द्र कहलाते हैं, तपश्चरणके बलसे उन इन्द्रोंमें जन्म लेना इन्द्रोपपाद कहलाता है। वह इन्द्रोपपादक्रिया अर्हत्प्रणीत मोक्षमार्ग का सेवन करनेवाले जीवोंके ही होती है ।। १९१॥
श्लोक 192 से 201 योगनिर्वाण साधन और इन्द्रोपपाद-इन्द्राभिषेक-विधिदान-सुखोदय क्रिया
तदनन्तर वह इन्द्र उसी उपपाद शय्यापर क्षणभरमें पूर्णयौवन हो जाता है और दिव्य तेजसे देदीप्यमान होता हुआ परमानन्दमें निमग्न हो जाता है ।।१९२।। वह अणिमा महिमा आदि आठ असाधारण गुणोंसे सहित होता है और साथ साथ उत्पन्न हुए वस्त्र, दिव्यमाला, तथा मणिमय आभूषणोंसे सुशोभित होता है। दिव्य माहात्म्यसे उत्पन्न हुए उत्कृष्ट प्रभावको धारण करता हुआ वह इन्द्र दिव्य अवधिज्ञानंरूपी ज्योतिके द्वारा जान लेता है कि मैं इन्द्रपदमें उत्पन्न हुआ हूं ।॥१९३-१९४।। यह इन्द्रोपपाद नामकी तैंतीसवीं क्रिया है।
पर्याप्तक होते ही जिसे अपने जन्मका ज्ञान हो गया है ऐसे इन्द्रका फिर उत्तमदेव लोग इन्द्राभिषेक करते हैं ।॥ १९५॥ दिव्य संगीत, दिव्य बाजे, दिव्य मंगल-गीतोंके शब्द और अप्सराओंके विचित्र नृत्योंसे जिसका इन्द्राभिषेक सम्पन्न हुआ है, जो अपने साम्राज्यके मुख्य चिह्नस्वरूप देदीप्यमान मुकुटको धारण कर रहा है, हर्षको प्राप्त हुए करोड़ों देव जिसका जयजयकार कर रहे हैं जो उत्तम मालाएं और वस्त्र धारण किये हुए है तथा देदी-प्यमान वस्त्राभूषणोंसे सुशोभित है ऐसा वह इन्द्र इन्द्रके पदपर आरूढ़ होकर अत्यन्त पूजाको प्राप्त होता है ।।१९६-१९८॥ यह चौंतीसवीं इन्द्राभिषेक क्रिया है।
तदनन्तर नम्रीभूत हुए इन उत्तम उत्तम देवोंको अपने अपने पदपर नियुक्त करता हुआ वह इन्द्र विधिदान क्रियामें प्रवृत्त होता है ।। १९९।। अपने अपने विमानोंकी ऋद्धि देनेसे संतुष्ट हुए देवोंसे घिरा हुआ वह पुण्यात्मा इन्द्र चिरकालतक देवोंके सुखोंका अनुभव करता है ।।२००।। इस प्रकार स्वर्गलोक में उत्पन्न होनेके योग्य ये विधिदान और इन्द्र सुखोदय नामकी दो क्रियाएं मानी गई हैं ।॥२०१।। ये पैंतीसवीं और छत्तीसवीं विधिदान तथा सुखोदय क्रियाएं हैं।
इस प्रकार इन्द्रोपपाद, इन्द्राभिषेक, विधिदान और सुखोदय ये इन्द्र सम्बन्धी चार क्रियाएं कहीं ।
श्लोक 202 से 211 इन्द्रत्याग क्रिया
अब इन्द्रत्याग नामकी पृथक् क्रियाका निरूपण करता हूं ॥ २०२॥ इन्द्र जब अपनी आयुकी स्थिति थोड़ी रहनेपर अपना स्वर्गसे च्युत होना जान लेता है तब वह देवोंको इस प्रकार उपदेश देता है ॥ २०३॥ कि भो देवो, मैंने चिरकालसे आपका पालन किया है, कितने ही देवोंको मैंने पिताके समान माना है, कितने ही देवोंको पुत्रके समान बड़े प्रेमसे खिलाया है, कितने हीको पुरोहित, मन्त्री और अमात्यके स्थानपर नियुक्त किया है, कितने हीको मैंने मित्र और पीठमर्दके समान देखा है। कितने ही देवोंको अपने प्राणोंके समान मानकर उन्हें अपनी रक्षाके लिये नियुक्त किया है, कितने हीको देवोंकी रक्षाके लिये सम्मानयोग्य पदपर देखा है, कितने हीको सेनापतिके स्थानपर नियुक्त किया है, कितने हीको अपने परिवारके लोग समझा है, कितने हीको सामान्य प्रजाजन माना है, कितने हीको सेवक माना है, कितने हीको परिजनके स्थानपर और कितने हीको अन्तःपुरमें रहनेवाले प्रतीहारी आदिके स्थानपर नियुक्त किया है। कितने ही देवियोंको वल्लभिका बनाया है और कितनी ही देवियोंको महादेवी पदपर नियुक्त किया है, इस प्रकार मैंने आप लोगोंपर असाधारण प्रेम दिखलाया है और आप लोगोंने भी हमपर असाथा-रण प्रेम धारण किया है ॥२०४-२०९॥ इस समय स्वर्ग के भोगोंमें मेरी इच्छा मन्द हो गई है और निश्चय ही पृथिवी लोककी लक्ष्मी आज मेरे निकट आ रही है ॥ २१०।। इसलिये आज तुम सबकी साक्षीपूर्वक मैं स्वर्गका यह समस्त साम्राज्य छोड़ रहा हूं और मेरे पीछे मेरे समान जो दूसरा इन्द्र होनेवाला है उसके लिये यह समस्त सामग्री सर्पित करता हूं ।। २११।।
श्लोक 212 से 223 इन्द्रावतार और हिरण्योत्कृष्टजन्मता क्रिया
इस प्रकार उन सब देवोंमें अपनी अनुत्कण्ठा अर्थात् उदासीनताका अनुभव करता हुआ इन्द्र उन सबके लिये शिक्षा दे और धीरवीर बुद्धिका धारक हो, इन्द्र पदका त्याग कर दुःखी न हो ।।२१२।। इस तरह जो स्वर्ग के भोगोंका त्याग करता है वह इन्द्रत्याग क्रिया है। यह भी एक आश्चर्य की बात है कि धीरवीर पुरुष स्वर्ग के वैसे ऐश्वर्यको भी बिना किसी कष्टके छोड़ देते हैं ।॥ २१३।। इस प्रकार यह सैंतीसवीं इन्द्रत्याग क्रिया है ।
तदनन्तर-जो इन्द्र आयुके अन्तमें अरहन्तदेवका पूजन कर स्वर्गसे अवतार लेना चाहता है उसके आगेकी अवतार नामकी क्रिया होती है ॥ २१४।॥ मैं मनुष्य जन्म पाकर बहुत शीघ्र मोक्ष प्राप्त किया चाहता हूं यही विचार कर वह इन्द्र अपना चित्त सिद्ध भगवान्को नमस्कार करने में लगाता है ॥ २१५।। शुभ सोलह स्वप्नोंके द्वारा जिसने अपना बड़ा भारी अभ्युदय-माहात्म्य सूचित किया है ऐसा वह इन्द्र उस समय कल्याण करनेवाली स्वर्गावतार नामकी क्रियाको प्राप्त होता है ।। २१६।। यह अड़तीसवीं इन्द्रावतार क्रिया है।
तदनन्तर-वे माता महादेवीके श्री आदि देवियोंक द्वारा शुद्ध किये हुए रत्नमय गर्भागारके समान गर्भमें अवतार लेते हैं ।॥ २१७।। गर्भमें आनेके छह महीने पहलेसे जब कुबेर घरपर रत्नोंकी वर्षा करने लगता है और वह रत्नोंकी वर्षा ऐसी जान पड़ती है मानो आनन्दसे स्वर्गकी सम्पदा ही भगवान्के साथ साथ पृथिवीतलपर आ रही हो ।। जब अमृतके समान सुख देनेवाली वायु मन्द मन्द बहकर सब दिशाओंमें फैल रही हो तथा ऐसी जान पड़ती हो मानो पवनकुमार देवोंके द्वारा निर्माण किया हुआ पृथिवीरूपी देवीका निःश्वास ही हो । जब आकाशमें उठी हुई फैली हुई दुन्दुभि वाजोंकी गंभीर आवाज मयूरोंको असमय में होनेवाली मेघगर्जनाकी शंका उत्पन्न कर रही हो। जब गुहचक नामके देवोंके समूह कभी म्लान न होनेवाली और सुगन्धिके कारण भूमरोंको अपनी ओर खींचने वाली कल्पवृक्षके फूलों की मालाओंको वरसा रहे हों। और जब श्री, ही, बुद्धि, धृति और कीर्ति नामकी देवियां लक्ष्मी के साथ आकर स्वयं जगन्माता महादेवीकी सेवा कर रही हों उस समय पुण्यके निवासभूत किसी पवित्र राजमन्दिर में वे हिरण्यगर्भ भगवान् हिरण्योत्कृष्ट जन्म धारण करते हैं ।॥ २१८-२२३।।
श्लोक 224 से 231 हिरण्योत्कृष्ट जन्मता और मन्दराभिषेक-गुरुपूजन-यौवराज्य क्रिया
जो गर्भमें स्थित रहते हुए भी तीन ज्ञानको धारण करनेवाले हैं ऐसे भगवान्, हिरण्य अर्थात् सुवर्णकी वर्षासे जन्मकी उत्कृष्टता सूचित होनेके कारण हिरण्योत्कृष्ट जन्म इस सार्थक नामको धारण करनेवाली क्रियाको धारण करते हैं ।। २२४।। यह उनतालीसवीं हिरण्योत्कृष्ट जन्मता क्रिया है ।
उस समय वह भगवान्की माता विश्वेश्वरी, जगन्माता, महादेवी, महासती, पूज्या और सुमंगला इत्यादि नामोंको धारण करती है ॥ २२५॥ कुलाचलोंपर रहनेवाली श्री, ही, बुद्धि, धृति, कीति और लक्ष्मी ये छह देवियां जिनमातृका अर्थात् जिनमाताकी सेवा करनेवाली कहलाती हैं ।॥ २२६॥ जन्मके अनन्तर आये हुए इन्द्रोंके द्वारा मेरु पर्वतके मस्तक पर क्षीरसागरके पवित्र जलसे भगवान्का जो अभिषेक किया जाता है वह उन परमेष्ठीकी मन्दराभिषेक क्रिया है। वह क्रिया अत्यन्त प्रसिद्ध है इसलिये यहां उसका फिरसे विस्तार नहीं किया जाता है ।। २२७-२२८।। यह चालीसवीं मन्दराभिषेक क्रिया है ।
तदनन्तर स्वतंत्र और स्वयंभू रहनेवाले भगवान्के विद्याओंको उपदेश होता है वे शिष्यभावके बिना ही गुरुकी पूजाको प्राप्त होते हैं अर्थात् किसीके शिष्य हुए बिना ही सबके गुरु कहलाने लगते हैं ।॥ २२९।। उस समय इन्द्र लोग आकर हे देव, आप अशिक्षित होनेपर भी सबको मान्य हैं इस प्रकार आश्र्चर्यको प्राप्त होते हुए सबकी रक्षा करनेवाले और तीनों जगत्के गुरु भगवान् की पूजा करते हैं ॥ २३०॥ यह इकतालीसवीं गुरुपूजन क्रिया है।
तदनन्तर कुमारकाल आनेपर उन्हें युवराजपदकी प्राप्ति होती है, उस समय महा-प्रतापवान् उन भगवान्के राज्यपट्ट बांधा जाता है और अभिषेक किया जाता है ।। २३१।। यह बियालीसवीं यौवराज्य क्रिया है।
श्लोक 232 से 240 स्वराज्य, चक्रलाभ, और दिग्विजय क्रिया
तत्पश्चात् समस्त राजाओंने राजाधिराज (सम्राट्) के पदपर जिनका अभिषेक किया है और जो दूसरे के शासनसे रहित इस समुद्र पर्यन्तकी पृथिवीका शासन करते हैं ऐसे उन भगवान्के स्वराज्यकी प्राप्ति होती है ॥ २३२।। यह तैतालीसवीं स्वराज्य क्रिया है। इसके बाद निधियों और रत्नोंकी प्राप्ति होनेपर उन्हें चक्रकी प्राप्ति होती है उस समय समस्त प्रजा उन्हें राजाधिराज मानकर उनकी अभिषेक सहित पूजा करती है ।॥ २३३॥ यह चक्रलाभ नामकी चवालीसवीं क्रिया है।
तदनन्तर चक्ररत्नको आगे कर समुद्रसहित समस्त पृथिवीको जीतने वाले उन भग-वान्का जो दिशाओंको जीतने के लिये उद्योग करना है वह दिशांजय कहलाता है ॥ २३४।। यह दिशांजय नामकी पैंतालीसवीं क्रिया है।
जब भगवान् दिग्विजय पूर्णकर अपने नगरमें प्रवेश करने लगते हैं तब उनके चक्रा-भिषेक नामकी क्रिया होती है। अब इस समय उसी क्रियाका वर्णन किया जाता है ॥२३५।। वे भगवान् चक्र रत्नको आगे कर अपने उस राजभवन में प्रवेश करते, हैं जो कि बहुमूल्य वैभवसे सहित होता है और स्वर्गके विमानोंकी हँसी करता है ॥ २३६॥ वहांपर वे मनोहर आनन्दमण्डपेमें क्षणभर विराजमान होते हैं उस समय उनपर चमर ढुलाये जाते हैं जिससे वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो निर्भरनोंसहित सुमेरु पर्वत ही हो ।।२३७।। उस समय वे निधियों और रत्नोंकी पूजाकर चक्र प्राप्त होनेका बड़ा भारी उत्सव करते हैं, किमिच्छक दान देते हैं और माननीय राजाओंका सन्मान करते हैं ।॥ २३८ ॥ तदनन्तर तुरही आदि हजारों मांगलिक बाजोंके गंभीर शब्द करते रहने पर वे उत्तम उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए राजाओंके द्वारा अभिषेकको प्राप्त होते हैं ।॥ २३९॥ तदनन्तर-विधिपूर्वक जिनका अभिषेक किया गया है ऐसे उन भगवान्के मस्तकपर प्रसिद्ध प्रसिद्ध कुलमें उत्पन्न हुए मुख्य चार राजाओंके द्वारा मुकुट रक्खा जाता है ।। २४०।।
श्लोक 241 से 251 चक्राभिषेक क्रिया
इस प्रकार महाभिषेककी सामग्री से जिनका चक्राभिषेक किया गया है, जिन्होंने माङ्गलिक वेष धारण किया है, जिन्हें चारों ओर से राजा लोग नमस्कार कर रहे हैं, जो देदीप्यमान रत्नोंकी किरणोंसे समस्त दिशाओंको व्याप्त करनेवाले तथा चक्रवर्तीके साम्राज्यके चिह्नस्वरूप मुकुटको धारण कर रहे हैं, राजाओंमें श्रेष्ठ हैं, जो अपने दोनों कानोंमें रत्नोंकी किरणोंसे व्याप्त तथा सरस्वतीके क्रीड़ारथके पहियोंकी शोभा देनेवाले दो कुण्डलोंको धारण कर रहे हैं, जो वक्षःस्थलरूपी घरके सामने खड़े किये हुए मांगलिकतोरण के समान सुशोभित होनेवाले और ताराओंकी पंक्तिके समान चंचल तथा बड़े बड़े मोतियोंसे युक्त हार धारण किये हुए हैं, शोभायमान यज्ञोपवीतसे जिनके शरीरकी उच्चता प्रकट हो रही है और इसी कारण जो तटपर पड़ते हुए निर्भरनोंसे सुन्दर आकारवाले सुमेरु पर्वतके समान जान पड़ते हैं, जो रत्नोंके कटक अर्थात् कड़ों (पक्षमें रत्नमय मध्यभागों) से सहित, ऊंचे ऊंचे शिखरों अर्थात् कन्धों (पक्ष में चोटियों) से युक्त, लम्बाईसे सुशोभित और इसलिये ही दो कुलाचलोंके समान आचरण करनेवाली दो भुजाओंको धारण कर रहे हैं, जिनकी कमरपर देदीप्यमान करधनी सटी हुई है और उससे जो ऐसे जान पड़ते हैं मानो चारों ओरसे रत्नमयी वेदीके द्वारा घिरा हुआ कोई महाद्वीप ही हो, जो मन्दार वृक्षके फूलोंकी सुगन्धिके कारण आकर लगे हुए भूमरोंके समूहकी झंकारोंसे कुछ गाते हुएके समान सुशोभित होनेवाले शेखरको धारण कर रहे हैं तथा उस कालके योग्य अन्य अन्य मांगलिक आभूषण धारण किये हुए हैं ऐसे वे भगवान् उस समय ऐसे जान पड़ते हैं मानो जिसकी शिखा ऊंची उठ रही हैं ऐसा साक्षात् लक्ष्मीका पुञ्ज ही हो ।। २४१-२४९॥ उस समय अन्य उत्तम उत्तम राजा लोग संतुष्ट होकर उनकी इस प्रकार स्तुति करते हैं कि आपने समस्त संसारको जीत लिया है, आप दिशाओंको जीतनेवाले हैं और दिव्यमूर्ति हैं ।। २५०।। नगरनिवासी लोग तथा मंत्री आदि मुख्य मुख्य पुरुष उनके चरणोंके अभिषेक करते हैं और उनका चरणोदक लेकर अपने अपने मस्तकपर धारण करते हैं ।॥ २५१॥
श्लोक 252 से 261 साम्राज्य क्रिया
श्री ह्री आदि देवियां, गङ्गा सिन्धु आदि देवियां तथा विश्वेश्वरा आदि देवियां अपने अपने नियोगोंके अनुसार आकर उस समय उनकी उपासना करती हैं ।॥ २५२ ।। यह चक्राभिषेक नामकी छियालीसवीं क्रिया है।
इस प्रकार उनकी यह एक चक्राभिषेक नामकी क्रिया कही। अब इसके बाद साम्राज्य नामकी दूसरी क्रिया कहते हैं ।॥ २५३।। दूसरे दिन प्रातःकालके समय जिन्होंने पवित्र आभूषण धारण किये हैं जो बड़े बड़े राजाओंकी सभाके बीचमें राजसिहासनपर विराजमान हैं, जिनपर देदीप्यमान, गङ्गा नदीके जलके छींटोंके समान उज्ज्वल और गणिकाओंके हाथसे हिलाये हुए चमर चारों ओरसे ढुलाये जा रहे हैं, जो धृति, शान्ति, दीप्ति, ओज और निर्मलताको उत्पन्न करनेवाले पृथिवी आदि देवताओं के अंशोंसे अर्थात् उनके वैक्रियिक शरीरोंसे हैं, जो उन देवताओंको समाधान-पूर्वक निरन्तर प्रजाके उपकार करने में लगा रहे हैं और आदर सत्कार, दान तथा विश्वास आदि से जो मंत्री आदि प्रमुख कार्यकर्ताओंको आनन्दित कर रहे हैं ऐसे वे महाराज नमस्कार करते हुए राजाओंको इस प्रकार शिक्षा देते हैं कि तुम लोग न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करो, यदि अन्यायमं प्रवृत्ति रक्खोगे तो अवश्य ही तुम्हारी वृत्तिका लोप हो जावेगा ॥ २५४-२५८।। न्याय दो प्रकारका है-एक दुष्टोंका निग्रह करना और दूसरा शिष्ट पुरुषोंका पालन करना । यहक्षत्रियोंका सनातन धर्म है। राजाओंको इसकी रक्षा अच्छी तरह करनी चाहिये ॥ २५९॥ ये दिव्य अस्त्रोंके अधिष्ठाता देव भी विधिपूर्वक आराधना करने योग्य हैं क्योंकि इनके प्रसन्न होनेपर युद्धमें विजय अवश्य ही होती है ।।२६०।। इस राजवृत्तिका अच्छी तरह पालन करते हुए आप लोग आलस्य छोड़कर प्रजाके साथ न्याय-मार्गसे बर्ताव करो ॥ २६१॥
श्लोक 262 से 271 निष्क्रान्ति क्रिया
जो राजा इस धर्मका पालन करता है वह धर्मविजयी होता है क्योंकि जिसने अपना आत्मा जीत लिया है तथा न्यायपूर्वक जिसकी आजीविका है ऐसा क्षत्रिय ही पृथिवीको जीत सकता है ॥ २६२॥ इस प्रकार न्यायपूर्वक बर्ताव करनेसे इस संसारमें यशका लाभ होता है, महान् वैभवके साथ साथ पृथिवीकी प्राप्ति होती है, और परलोकमें अभ्युदय अर्थात् स्वर्गकी प्राप्ति होती है और अनुक्रमसे वह तीनों लोकोंको जीत लेता है अर्थात् मोक्ष अवस्था प्राप्त कर लेता है ।।२६३।। इस प्रकार वे महाराज प्रजापालनकी रीतियोंके विषयमें उन राजाओंको बार-बार शिक्षा देते हैं तथा योग और क्षेमका बार बार चिन्तवन करते हुए उनका स्वयं पालन करते हैं ।॥ २६४।। इस प्रकार यह उनकी धर्मसहित साम्राज्य नामकी वह क्रिया है जिसके कि पालन करनेसे यह जीव इस लोक तथा परलोक दोनों ही लोकोंमें समृद्धिको प्राप्त होता है ।। २६५।। यह सैंता-लीसवीं साम्राज्य क्रिया है।
इस प्रकार बहुत दिन तक प्रजा और राजाओंका पालन करते हुए उन महाराज के किसी समय भेदविज्ञान उत्पन्न होनेपर दीक्षा ग्रहण करने के लिये उद्यम होने लगता है ।। २६६।। जो राज्यसे विरक्त हो रहे हैं और आये हुए लौकान्तिक देव जिन्हें बार बार प्रबोधित कर रहे हैं ऐसे उन भगवान्की यह निष्क्रान्ति नामकी क्रिया कही जाती है ॥ २६७।। वे समस्त राजाओंकी साक्षीपूर्वक अपने बड़े पुत्रके लिये राज्य सौंप देते हैं और संतान-पालन करनेके लिये उसे इस प्रकार शिक्षा देते हैं ।॥ २६८ ॥ हे पुत्र, तुझे प्रजाके पालन करने में न्यायरूप धनसे मुक्त होना चाहिये अर्थात् तू न्यायको ही धन समझ, क्योंकि न्यायपूर्वक पालन की हुई प्रजा मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली कामधेनु गायके समान मानी गई है ॥ २६९।। हे पुत्र, तू इसे ही राजवृत्त अर्थात् राजाओंका कर्तव्य समझ कि न्यायपूर्वक धन कमाना, उसकी वृद्धि करना, रक्षा करना तथा तीर्थस्थान अथवा योग्य पात्रोंका देना ॥ २७०॥ प्रजाका पालन करने-के लिये सबसे अपनी बुद्धिकी रक्षा करनी चाहिये, इस लोक और परलोक दोनों लोकसम्बन्धी पदार्थोंके विषय में हित तथा अहितका ज्ञान होना ही मति कहलाती है ।। २७१।।
श्लोक 272 से 281 निष्क्रान्ति क्रिया (जारी)
इसलिये वृद्ध मनुष्योंकी संगति रूपी सम्पदासे इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर तुम धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र के ज्ञानसे अपनी बुद्धिको सुसंस्कृत बनाने के योग्य हो अर्थात् बुद्धिके अच्छे संस्कार बनाओ ।।२७२।। यदि राजा इससे विपरीत प्रवृत्ति करेगा तो वह हित तथा अहितका जानकार न होने से बुद्धिभूष्ट हो जावेगा और ऐसी दशामें वह मिथ्याज्ञानके अंश मात्रसे उद्धत हुए अन्य कुमार्गगामियोंके वश हो जावेगा ।। २७३।। राजाओंको अपने कुलकी मर्यादा पालन करने के लिये बहुत भारी प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि जिसे अपनी कुलमर्यादाका ज्ञान नहीं है वह अपने दुराचारोंसे कुलको दूषित कर सकता है ।। २७४।। इसके सिवाय राजाको अपनी रक्षा करने में भी सदा यत्न करते रहना चाहिये क्योंकि अपने आपके सुरक्षित रहनेपर ही अन्य सब कुछ सुरक्षित रह सकता है ॥ २७५॥ जिसने अपने आपकी रक्षा नहीं की है ऐसे राजाका शत्रुओंसे तथा क्रोधी, लोभी और अपमानित हुए अपने ही सेवकोंसे विनाश हो जाता है ॥२७६॥ इसलिये शत्रुओंके ‘द्वारा किये हुए प्रारम्भमें सरल किन्तु फलकालमें कठिन अपायोंका परिहार कर अपने इष्ट वर्गोंक द्वारा प्रयत्नपूर्वक अपनी रक्षा करनी चाहिये ।। २७७।। इसके सिवाय राजाको अपनी तथा प्रजाकी रक्षा करनेमें समंजसवृत्ति अर्थात् पक्षपातरहित होना चाहिये क्योंकि जो राजा असमंजसवृत्ति होता है, वह अपने ही लोगोंके द्वारा अपमानित होने लगता है ।।२७८।। समस्त प्रजाको समान रूपसे देखना अर्थात किसीके साथ पक्षपात नहीं करना ही राजाका समंजसत्व गुण कहलाता है। उस समंजसत्व गुणमें क्रूरता या घातकपना नहीं होना चाहिये और न कठोर वचन तथा दण्डकी कठिनता ही होनी चाहिये ।। २७९।। इस प्रकार जो राजा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य इन छह अन्तरङ्ग शत्रुओंको जीतकर अपनी इस वृत्तिका पालन करता हुआ स्वकीय राज्यमें स्थिर रहता है वह इस लोक तथा परलोक दोनों ही लोकोंमें समृद्धिवान् होता है ।। २८०।। पक्षपातरहित होकर सबको एक समान देखना, कुलकी मर्यादाकी रक्षा करना, बुद्धिकी रक्षा करना, अपनी रक्षा करना और प्रजाका पालन करना यह सब राजाओंकी वृत्ति कहलाती है ॥ २८१।।
श्लोक 282 से 293 निष्क्रान्ति क्रिया (पूर्ण)
इसलिये हे पुत्र, ऊपर कहे हुए इस क्षात्रधर्मकी रक्षा करता हुआ तू राज्यमें स्थिर रहकर अपना यश, धर्म और विजय प्राप्त कर ॥२८२।। जिनकी वृद्धि अत्यन्त शान्त है और जिन्हें भेदविज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे वे भगवान् ऊपर लिखे अनुसार पुत्रको शिक्षा देकर दीक्षाकल्याणके लिये इन्द्रोंके द्वारा पूजित होते हैं ॥२८३॥ अथानन्तर महादान देकर सामाज्यपदको छोड़ते हुए वे राजाधिराज राजर्षि घरसे वनके लिये निकलते हैं ।॥ २८४।॥ प्रथम ही मुख्य मुख्य राजा लोग जिसे पृथिवीतलसे उठाकर कंधेपर रखकर कुछ दूर ले जाते हैं और फिर भक्तिसे भरे हुए देव लोग जिसे अपने कंधोंपर रखते हैं, जो देदीप्यमान रत्नोंसे बनी हुई है और जो पृथिवीतलपर आये हुए सूर्यके विमानके समान जान पड़ती है ऐसी दिव्य पालकीपर वे भगवान् सवार होते हैं ।॥ २८५-२८६।। जिस समय समस्त आकाश-मार्गको रोकते हुए और अपनी कान्तिसे आकाशमें सूर्यकी प्रभाका संदेह फैलाते हुए सुर और असुर आगे चलते हैं, जिसे राज्य प्राप्त हुआ है और जिसका नवीन उदय प्रकट हुआ है ऐसे कुमारको आगे कर बड़े प्रेम और संभूमके साथ जब समस्त राजा लोग भगवान् के समीप खड़े होते हैं, जिनका भगवान्के समीप रहना छूट चुका है और भगवान्के छोड़ देनेसे ही मानो जिनकी कान्ति मन्द पड़ गई है ऐसे निधि और रत्नोंका समूह जब उनके पीछे पीछे आता है, जिसने वायुके वेगसे उड़ती हुई ध्वजाओंक समूहसे आकाशको व्याप्त कर लिया है ऐसी सेना अपनी विशेष रचना बनाकर जिस समय धीरे धीरे उनके पीछे चलने लगती है तथा जिस समय देवोंके तुरही आदि बाजे बजते हैं, अप्सराओंका समूह नृत्य करता है और किन्नरी देवियां मनोहर शब्दोंसे मंगलगीत गाती हैं, उस समय वे भगवान् किसी पवित्र आश्रममें अपने चित्तके समान विस्तृत शिलातलपर विराजमान होकर दीक्षा लेते हैं। इस प्रकार जिनका उदय आश्चर्य करनेवाला है और जो निर्वाणदीक्षाके द्वारा अपने आपको युक्त कर रहे हैं ऐसे भगवान्की इन्द्र लोग उत्कृष्ट सामग्रीके द्वारा आनन्दके साथ पूजा करते हैं ।।२८७-२९३।।
श्लोक 294 से 303 योगसंमह और आर्हन्त्य क्रिया
इस क्रिया में केश लोंच करना, भगवान्की पूजा करना आदि जो भी कार्य अवशिष्ट रह गया है उस सबका भगवान् वृषभदेवकी दीक्षाके समय वर्णन किया जा चुका है।। २९४।। इस प्रकार यह अड़तालीसवीं निष्क्रान्ति क्रिया है।
यह निर्वाणको देनेवाली परिनिष्क्रान्ति नाम की क्रिया है। अब इसके आगे मोक्षकी इच्छा करनेवाले उन भगवान्के योगसंमह नामकी क्रिया होती है ॥ २९५।। जब वे भगवान् बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रहको छोड़कर निष्परिग्रह अवस्थाको प्राप्त होते हैं और अत्यन्त कठिन तथा सर्वश्रेष्ठ जिनकल्प नामके तपोयोगको धारण करते हैं तब क्षपक श्रेणीपर आरूढ हुए और योग्य पद अर्थात् गुणस्थानमें जाकर शुक्लध्यानरूपी अग्निसे घातियाकर्मरूपी सघन वनको जला देनेवाले उन भगवान्के समस्त बाहय और अन्तरङ्ग मलके नष्ट हो जानेसे लोक तथा अलोकको प्रकाशित करनेवाली केवलज्ञान नामकी उत्कृष्ट ज्योति प्रकट होती है ।॥ २९६-२९८।। इस प्रकार जिनके समस्त कार्य सिद्ध हो चुके हैं और जिन्हें उत्कृष्ट तेज प्राप्त हुआ है ऐसे. भगवान्के यह एक भिन्न क्रिया होती है जो कि ‘योगसम्मह’ इस नामको धारण करती है ।।२९९।। ज्ञान और ध्यानके संयोगको योग कहते हैं और उस योगसे जो अतिशय तेज उत्पन्न होता है वह योगसम्मह कहलाता है ।। ३००।। यह योगसम्मह नामकी उनंचासवीं क्रिया है। तदनन्तर केवलज्ञान उत्पन्न होनेपर इन्द्रोंने जिनकी पूजा की है ऐसे उन भगवान्के प्रातिहार्य आदि बाहय विभूति प्रकट होती है ॥ ३०१॥ इस प्रकार आठ प्रातिहार्य, बारह दिव्य सभा, स्तूप, मकानोंकी पंक्तियां, कोटका घेरा और पताकाओंकी पंक्ति इत्यादि अद्भुत विभूतिको धारण करनेवाले उन भगवान्के आर्हन्त्य नामकी एक भिन्न क्रिया कही
गई है ।।३०२-३०३।।
श्लोक 304 से 313 विहार, योगत्याग, और अग्रनिवृति क्रिया ( तिरेपन क्रियाएं 51 से 53)
यह आर्हन्त्य नामकी पचासवीं क्रिया है। धर्मचक्रको आगे कर जो भगवान्का विहार होता है वह विहार नामकी क्रिया है। यह क्रिया अत्यन्त प्रसिद्ध है और पहले ही इसका विस्तारके साथ निरूपण किया जा चुका है इसलिये फिरसे यहां नहीं कहते हैं ॥ ३०४।। यह इक्यावनवीं विहारक्रिया है।
तदनन्तर धर्ममार्ग के उपदेशके द्वारा परोपकार करनेके लिये जिन्होंने तीर्थ विहार किया है ऐसे भगवान्के योगत्याग नामकी उत्कृष्ट क्रिया होती है ॥ ३०५।। जिसमें विहार करना समाप्त हो जावे, सभाभूमि (समवसरण) विघट जावे, और योगनिरोध करनेके लिये अपनी वृत्ति करनी पड़े उसे योगत्याग कहते हैं ।॥ ३०६।॥ दण्ड, कपाट आदि रूपसे प्रसिद्ध जो केबलि-समुद्घात नामकी क्रिया है वह इसी योगत्याग क्रिया में अन्तर्भूत हो जाती है इसलिये अलगसे उसका वर्णन नहीं किया है ।।३०७।। यह बावनवीं योगत्याग नामकी क्रिया है।
तदनन्तर जिनके समस्त योगोंका निरोध हो चुका है, जो जिनोंके स्वामी हैं, जिन्हें शीलके ईश्वरपनेकी अवस्था प्राप्त हुई है, जिनके अघातिया कर्म नष्ट हो चुके हैं जो स्वभावसे उत्पन्न हुई ऊर्ध्वगतिको प्राप्त हुए हैं और जो उत्कृष्ट मोक्षस्थानपर पहुंच गये हैं ऐसे भगवान्के अग्रनिवृति नामकी क्रिया मानी गई है ॥३०८-३०९।। यह तिरेपनवीं अग्रनिवृति नामकी क्रिया है।
इस प्रकार गर्भसे लेकर निर्वाण पर्यन्त जो सब मिलाकर तिरेपन क्रियाएं हैं भव्य पुरुषोंको सदा उनका पालन करना चाहिये ॥३१०॥ द्विज लोगोंको ऊपर कही हुई विधिके अनुसार इन क्रियाओंका पालन करना चाहिये। इन क्रियाओंके जो भी अन्तर्गत भेद हैं उनका आगेके पर्वमें निरूपण करेंगे ॥ ३११।। इस प्रकार पुण्यवान् भरत महाराजने उन द्विजोंको अपने धर्ममें स्थापित करते हुए गर्भसे लेकर निर्वाणगमन पर्यन्तकी तिरेपन गर्भा-न्वय क्रियाएं कहीं और उनके बाद कहने योग्य जो दीक्षान्वय क्रियाएं थीं उनका कहना प्रारम्भकिया ॥३१२॥ उत्तम उत्तम द्विजोंको माननीय इन गर्भाधानादि समीचीन क्रियाओंको सुनकर तथा अच्छी तरह पढ़कर जो जिनेन्द्र भगवान्के दर्शनमें अपनी बुद्धि लगाता है और योग्य सामग्री प्राप्त कर दूसरोंसे आचरण कराता हुआ स्वयं भी इनका आचरण करता है वह भव्य पुरुष पूर्ण ज्ञानी होकर तीनों लोकोंक चूड़ामणिपनेको प्राप्त होता है अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर तीनों लोकोंके अग्रभागपर विराजमान होता है ।। ३१३।।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके भाषा-नुवादमें द्विजोंकी उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओंका वर्णन करनेवाला अड़तीसवां पर्व समाप्त हुआ
पर्व 39
हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 |
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena