आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111 लिपिसंख्यान और उपनीति क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 13 से 14)
पांचवें वर्ष में लिपिसंख्यान क्रिया में बालक को अक्षरों का दर्शन कराया जाता है और व्रती गृहस्थ को अध्यापक नियुक्त किया जाता है। आठवें वर्ष में उपनीति (यज्ञोपवीत) क्रिया में केश मुंडन, व्रतबंधन, और मौंजीबंधन होता है। जिनालय में अर्हंत पूजा के बाद बालक को मूंज की रस्सी बांधी जाती है। सफेद धोती, दुपट्टा, और यज्ञोपवीत धारण करने वाला बालक ब्रह्मचारी कहलाता है। उसे भिक्षावृत्ति से निर्वाह करना चाहिए, और प्राप्त भिक्षा का अग्रभाग अर्हंत को समर्पित कर शेष भोजन करना चाहिए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
ततोऽस्य पञ्चमे वर्षे प्रथमाक्षरदर्शने । ज्ञेयः क्रियाविधिर्नाम्ना लिपिसंख्यानसंग्रहः ॥१०२॥
तदनन्तर पांचवें वर्ष में बालकको सर्वप्रथम अक्षरोंका दर्शन कराने के लिये लिपिसंख्यान नामकी क्रियाकी विधि की जाती है ।॥१०२॥
Thereafter, in the fifth year, the child is first introduced to the letters through the solemn rite called Lipisaṅkhyāna, performed according to prescribed procedure. ॥102॥
श्लोक ( Shlok ) 103
यथाविभवमत्रापि ज्ञेयः पूजापरिच्छदः । उपाध्यायपदे चास्य मतोऽधीती गृहवती ॥१०३॥ इति लिपिसंख्यान संग्रहः ।
इस क्रियामें भी अपने वैभव के अनुसार पूजा आदिकी सामग्री जुटानी चाहिये और अध्ययन करानेमें कुशल व्रती गृहस्थको ही उस बालकके अध्यापक के पदपर नियुक्त करना चाहिये ।।१०३।। यह तेरहवीं लिपिसंख्यान क्रिया है।
In this rite also, according to one’s means, all necessary materials for worship and ceremony should be gathered. The child’s teacher appointed to instruct him must be a learned and devoted householder, skilled in the art of teaching.This is the thirteenth rite, known as Lipisaṅkhyāna. ॥103॥
श्लोक ( Shlok ) 104
क्रियोपनीतिर्नामास्य वर्षे गर्भाष्टमे मता । यत्रापनीतकेशस्य मौञ्जी सव्रतबन्धना ॥१०४।।
इस गर्भसे आठवें वर्ष में बालककी उपनीति (यज्ञोपवीत धारण) क्रिया होती है। क्रियामें केशोंका मुण्डन, व्रतबन्धन तथा मौञ्जीबन्धनकी क्रियाएं की जाती हैं ।।१०४।।
In the eighth year from conception, the child undergoes the sacred Upanīti ceremony (the investiture of the Yajñopavīta). This rite includes the shaving of the hair, the binding of the sacred thread (vratabandha), and the tying of the mauñjī (sacred grass) thread. ॥104॥
श्लोक ( Shlok ) 105
कृतार्हत्पूजनस्यास्य मौञ्जीबन्धो जिनालये। गुरुसाक्षिविधातव्यो व्रतार्पणपुरस्सरम् ॥१०५।।
प्रथम ही जिनालयम जाकर जिसने अर्हन्तदेवकी पूजा की है ऐसे उस बालकको व्रत देकर उसका मौञ्जीबन्धन करना चाहिये अर्थात् उसकी कमरमें मूंजकी रस्सी बांधनी चाहिये ।। १०५।।
First, having visited the Jina temple and performed worship of the Arhantadeva, the child should be bestowed with the sacred vow (vrata) and have the mauñjī tied—that is, the sacred grass cord should be bound around his waist. ॥105॥
श्लोक ( Shlok ) 106
शिखी सितांशुकः सान्तर्वासा निर्वेषविक्रियः । व्रतचिह्न दधत्सूत्रं तदोक्तो ब्रह्मचार्यसौ ॥ १०६।
जो चोटी रखाये हुए है, जिसकी सफेद धोती और सफेद दुपट्टा है, जो वेष और विकारोंसे रहित है, तथा जो व्रतके चिह्नस्वरूप यज्ञोपवीत सूत्रको धारण कर रहा है ऐसा वह बालक उस समय ब्रह्मचारी कहलाता है ।।१०६।।
The child who wears the tuft, is clad in a white dhoti and white scarf, who is free from blemishes and faults, and who bears the sacred thread (Yajñopavīta) as the mark of his vow—such a child is called a Brahmachārī at that time. ॥106॥
श्लोक ( Shlok ) 107 – 108
चरणोचितमन्यच्च नामधेयं तदस्य वै। वृत्तिश्च भिक्षयाऽन्यत्र राजन्यादुद्धवैभवात् ॥ १०७॥’सोऽन्तःपुरे चरेत् पात्र्यां नियोग इति केवलम् । ‘तदग्रं देवसात्कृत्य ततोऽन्नं योग्यमाहरेत् ॥१०८llइत्युपनीतिः ।
उस समय उसके आचरणके योग्य और भी नाम रक्खे जा सकते हैं। उस समय बड़े वैभवशाली राजपुत्रको छोड़कर सबको भिक्षावृत्तिसे ही निर्वाह करना चाहिये और राजपुत्रको भी अन्तः-पुरमें जाकर माता आदिसे किसी पात्रमें भिक्षा मांगनी चाहिये, क्योंकि उस समय भिक्षा लेने-का यह नियोग ही है। भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो उसका अग्रभाग श्री अरहन्तदेवको समर्पण कर बाकी बचे हुए योग्य अन्नका स्वयं भोजन करना चाहिये ॥१०७-१०८॥ यह चौदहवीं उपनीति क्रिया है।
At that time, additional titles befitting his conduct may also be bestowed upon him. Except for princes of great grandeur, all should sustain themselves by the practice of bhikṣāvṛtti—the vow of mendicancy. Even the princes must enter the inner chamber and, from their mother or elders, seek alms in a vessel, for this is the prescribed duty in that season. Whatever alms are received, the foremost portion must be offered to the venerable Śrī Arhantadeva, and the remainder of the suitable food should be consumed by the child himself.This is the fourteenth rite, known as Upanīti. ॥107–108॥
श्लोक ( Shlok ) 109
व्रतचर्यामतो वक्ष्ये क्रियामस्योपबिभ्रतः । कट्यूरूरःशिरोलिङ्गमनूचानव्रतोचितम् ॥१०९॥
अथानन्तर ब्रह्मचर्य व्रतके योग्य कमर, जांघ, वक्षःस्थल और शिरके चिह्नको धारण करनेवाले इस ब्रह्मचारी बालककी व्रतचर्या नामकी क्रियाका वर्णन करते हैं ।॥१०९।।
Thereafter, the Brahmachārī boy, who wears the sacred marks upon his waist, thigh, chest, and head in accordance with the vows of Brahmacharya, is taught the rites known as Vratacaryā—the observance and discipline of his sacred vow. ॥109॥
श्लोक ( Shlok ) 110
कटीलिङ्गं भवेदस्य मौञ्जीबन्धात्त्रिभिर्गुणैः । रत्नत्रितयशुद्ध्यङ्ग तद्धि चिह्न द्विजात्मनाम् ॥११०॥
तीन लरकी मूंजकी रस्सी बांधनेसे कमरका चिह्न होता है, यह मौंजीबन्धन रत्न-त्रयकी विशुद्धिका अंग है और द्विज लोगोंका एक चिह्न है ।।११०।।
The sacred mark upon the waist is made by binding three strands of the mauñjī cord. This Mauñjībandhana is an essential purificatory emblem of the Ratna-traya (the three jewels) and serves as a distinguishing mark of the twice-born (Dvija) class. ॥110॥
श्लोक ( Shlok ) 111
तस्थेष्टमूरुलिङ्गं च सुधौतसितशाटकम् । आर्हतानां कुलं पूतं विशालं चेति सूचने ॥१११॥
अन्त्यन्त धुली हुई सफेद धोती उसकी जांघ का चिह्न है, वह धोती यह सूचित करती है कि अरहन्त भगवान्का कुल पवित्र और विशाल है ॥ १११ ॥
The pure, spotless white dhoti, worn with utmost care, marks the thigh and signifies that the lineage of the Arhant Bhagavān is both sacred and exalted. ॥111॥
श्लोक 112 से 121
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
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