आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293
श्लोक 294 से 303 योगसंमह और आर्हन्त्य क्रिया
योगसंमह क्रिया में भगवान बाह्य-अभ्यंतर परिग्रह त्यागकर जिनकल्प तप धारण करते हैं। क्षपक श्रेणी पर चढ़कर शुक्लध्यान से घातिया कर्म जलाते हैं, और केवलज्ञान की ज्योति प्रकट होती है। यह क्रिया ज्ञान-ध्यान के संयोग से तेज उत्पन्न करती है। आर्हन्त्य क्रिया में इंद्र उनकी पूजा करते हैं, और आठ प्रातिहार्य, बारह सभाएं, स्तूप आदि अद्भुत विभूतियां प्रकट होती हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 294 to 303
श्लोक ( Shlok ) 294
योऽत्र शेषो विधिर्युक्तः केशपूजादिलक्षणः । प्रागेव स तु निर्णीतो निष्क्रान्तौ वृषभेशिनः ॥२९४॥ इति निष्क्रान्तिः ।
इस क्रिया में केश लोंच करना, भगवान्की पूजा करना आदि जो भी कार्य अवशिष्ट रह गया है उस सबका भगवान् वृषभदेवकी दीक्षाके समय वर्णन किया जा चुका है।। २९४।।
All remaining rites pertaining to this ceremony—such as the plucking of the hair and the worship of the Lord—have already been described in full at the time of Lord Ṛṣabhadeva’s initiation.294,Thus, this is the forty-eighth rite of renunciation (niṣkrānti-kriyā).
श्लोक ( Shlok ) 295
परिनिष्क्रान्तिरेषा स्यात् क्रिया निर्वाणदायिनी । अतः परं भवेदस्य मुमुक्षोर्योगसम्महः ॥२९५॥
यह निर्वाणको देनेवाली परिनिष्क्रान्ति नाम की क्रिया है। अब इसके आगे मोक्षकी इच्छा करनेवाले उन भगवान्के योगसंमह नामकी क्रिया होती है ॥ २९५।।
This is the sacred rite known as Pariniṣkrānti, the noble act that leads to liberation. Now follows the next exalted rite—Yoga-saṃgraha—performed by the Blessed Lord who aspires for Mokṣa.295
श्लोक ( Shlok ) 296 – 298
यदायं त्यक्तबाह्यान्तस्सङ्गो ‘निःसङ्गमाचरेत् । ‘सदुश्चरं तपोयोगं जिनकल्पमनुत्तरम् ॥२९६॥तदाऽस्य क्षपकश्रेणीम् आरूढस्योचिते पदे । शुक्लध्यानाग्निनिर्दग्धघातिकर्मघनाटवेः ॥२९७॥ प्रादुर्भवति निःशेषबहिरन्तर्मलक्षयात् । केवलाख्यं परं ज्योतिर्लोकालोकप्रकाशकम् ॥ २९८।।
जब वे भगवान् बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रहको छोड़कर निष्परिग्रह अवस्थाको प्राप्त होते हैं और अत्यन्त कठिन तथा सर्वश्रेष्ठ जिनकल्प नामके तपोयोगको धारण करते हैं तब क्षपक श्रेणीपर आरूढ हुए और योग्य पद अर्थात् गुणस्थानमें जाकर शुक्लध्यानरूपी अग्निसे घातियाकर्मरूपी सघन वनको जला देनेवाले उन भगवान्के समस्त बाहय और अन्तरङ्ग मलके नष्ट हो जानेसे लोक तथा अलोकको प्रकाशित करनेवाली केवलज्ञान नामकी उत्कृष्ट ज्योति प्रकट होती है ।॥ २९६-२९८।।
When the Blessed Lord renounces all external and internal possessions and attains the state of absolute non-attachment,When He embraces the supremely arduous and exalted Jinakalp—the austere path of the victors—Then, ascending the ladder of annihilation (kṣapaka-śreṇi) and reaching the noble stage of spiritual purity,He kindles the radiant flame of śukla-dhyāna, the purest meditation, and with it sets ablaze the dense forest of destructive karmas.Thus, as all outer and inner defilements are utterly destroyed, there arises the supreme light of Kevalajñāna—omniscience—A brilliance that illumines both the realms of the worldly and the transcendental. 296 – 298
श्लोक ( Shlok ) 299
तदेतत्सिद्धसाध्यस्य प्रापुषः परमं महः। योगसम्मह इत्याख्यामनुधत्ते क्रियान्तरम् ॥२९९।
इस प्रकार जिनके समस्त कार्य सिद्ध हो चुके हैं और जिन्हें उत्कृष्ट तेज प्राप्त हुआ है ऐसे. भगवान्के यह एक भिन्न क्रिया होती है जो कि ‘योगसम्मह’ इस नामको धारण करती है ।।२९९।।
Thus, this distinct rite—known as Yoga-saṃgraha—belongs to the Blessed Lord, who has accomplished all his endeavors and attained supreme radiance. 299
श्लोक ( Shlok ) 300
ज्ञानध्यानसमायोगो योगो यस्तत्कृतो महः । महिमातिशयः सोऽयम् आम्नातो योगसम्महः ॥३००॥ इति योगसम्महः ।
ज्ञान और ध्यानके संयोगको योग कहते हैं और उस योगसे जो अतिशय तेज उत्पन्न होता है वह योगसम्मह कहलाता है ।। ३००।। यह योगसम्मह नामकी उनंचासवीं क्रिया है।
The union of knowledge and meditation is called yoga, and the extraordinary radiance that arises from this union is known as Yoga-saṃgraha.300
This sacred rite of Yoga-saṃgraha is the forty-ninth in the divine sequence of acts.
श्लोक ( Shlok ) 301
ततोऽस्य केवलोत्पत्तौ पूजितस्यामरेश्वरैः । बहिर्विभूतिरुद्धता प्रातिहार्यादिलक्षणा ॥३०१॥
यह योगसम्मह नामकी उनंचासवीं क्रिया है। तदनन्तर केवलज्ञान उत्पन्न होनेपर इन्द्रोंने जिनकी पूजा की है ऐसे उन भगवान्के प्रातिहार्य आदि बाहय विभूति प्रकट होती है ॥ ३०१॥
This is the forty-ninth rite, known as Yoga-saṃgraha. Thereafter, upon the manifestation of Kevalajñāna (omniscience), the divine external glories—such as the Prātihāryas—begin to manifest around the Blessed Lord, who is now worshipped by the celestial Indras themselves.301
श्लोक ( Shlok ) 302 – 303
प्रातिहार्याष्टकं दिव्यं गणो द्वादशधोदितः । स्तूपहर्म्यावली सालवलयः केतुमालिका ॥३०२॥इत्यादिकामिमां भूतिमद्भुतामुपविभ्रतः । स्यादार्हन्त्यमिति ख्यातं क्रियान्तरमनन्तरम् ॥३०३॥
इस प्रकार आठ प्रातिहार्य, बारह दिव्य सभा, स्तूप, मकानोंकी पंक्तियां, कोटका घेरा और पताकाओंकी पंक्ति इत्यादि अद्भुत विभूतिको धारण करनेवाले उन भगवान्के आर्हन्त्य नामकी एक भिन्न क्रिया कही गई है ।।३०२-३०३।।यह आर्हन्त्य नामकी पचासवीं क्रिया है।
Thus, the Blessed Lord who bears wondrous divine manifestations—Eight Prātihāryas, twelve celestial assemblies, rows of stupas and magnificent mansions, fortified enclosures (koṭakas), and banners in procession—Is said to perform the distinct rite known as Ārahatya.
This sacred Ārahatya rite is the fiftieth in the revered sequence of sacred acts.302 – 303
श्लोक 304 से 313
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293
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