आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 कुलचर्या से कर्त्रन्वय क्रियाओं का प्रारंभ
चौदहवीं ‘कुलचर्या’ क्रिया में भव्य पुरुष आर्योचित छह कर्मों (देवपूजा आदि) में पूर्ण प्रवृत्ति रखता है। पंद्रहवीं ‘गृहीशिता’ क्रिया में सम्यक् चारित्र और अध्ययन से युक्त श्रावक, प्रायश्चित्त, श्रुति, स्मृति, और पुराण जानकर गृहस्थाचार्य पद प्राप्त करता है। सोलहवीं ‘प्रशान्तता’ क्रिया में वह उपवास आदि भावनाओं से शांति प्राप्त करता है। सत्रहवीं ‘गृहत्याग’ क्रिया में वह पुत्र को शिक्षा देकर घर छोड़ता है। अठारहवीं ‘दीक्षाद्य’ क्रिया में वह तपोवन में एक वस्त्र धारण करता है। उन्नीसवीं ‘जिनरूपता’ क्रिया में वह मुनि से दिगंबर रूप ग्रहण करता है। शेष क्रियाएं गर्भान्वय जैसी हैं। इनका पालन करने वाला भव्य शीघ्र निर्वाण प्राप्त करता है। इसके बाद कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन शुरू होता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
वर्णलाभोऽयमुद्दिष्टः कुलचर्याऽधुनोच्यते । आर्यषट्कर्मवृत्तिः स्यात् कुलचर्याऽस्य पुष्कला ॥७२॥ इति कुलचर्या ।
यह वर्णलाभ क्रिया कह चुके । अब कुलचर्या क्रिया कही जाती है। आर्य पुरुषोंके करने योग्य देवपूजा आदि छह कार्यों में पूर्ण प्रवृत्ति रखना कुलचर्या कहलाती है ।॥७२॥ यह कुलचर्या नामकी चौदहवीं क्रिया है।
Having completed the rite of Varṇalābha, there follows the rite known as Kulacaryā.This is the steadfast adherence to the six sacred duties—such as the worship of the noble deities—that the noble Aryas are bound to perform with full devotion.72
This is the fourteenth sacred act—Kulacaryā.
श्लोक ( Shlok ) 73 – 74
विशुद्धस्तेन वृत्तेन ततोऽभ्येति गृहोशिताम् । वृत्ताध्ययनसम्पत्त्या परानुग्रहणक्षमः ॥७३॥ प्रायश्चित्तविधानज्ञः ‘श्रुतिस्मृति पुराणवित् । गृहस्थाचार्यतां प्राप्तः तदा धत्ते गृहीशिताम् ॥७४॥ इति गृहीशिताक्रिया ।
ऊपर कहे हुए चारित्रसे विशुद्ध हुआ श्रावक गृहीशिता क्रियाको प्राप्त होता है। जो सम्यक्चारित्र और अध्ययनरूपी सम्पत्तिसे परपुरुषोंका उपकार करनेमें समर्थ है, जो प्रायश्चित्तकी विधिका जानकार है, श्रुति, स्मृति और पुराणका जानने वाला है ऐसा भव्य गृहस्थाचार्य पदको प्राप्त होकर गृहीशिता नामकी क्रियाको धारण करता है ॥७३-७४।। यह गृही-शिता नामकी पन्द्रहवीं क्रिया है ।
Purified by the noble conduct previously described, the Śrāvaka attains the honored station of Gṛhīśita.
Endowed with right conduct and profound learning, capable of aiding others through virtue, well-versed in the rites of penance, and knowledgeable in Śruti, Smṛti, and the Purāṇas, such a noble one assumes the role of Gṛhīśita—the master of household discipline—and thus embraces the sacred rite called Gṛhī-śita.73 – 74
This is the fifteenth sacred act—Gṛhī-śita.
श्लोक ( Shlok ) 75
ततः पूर्ववदेवास्य भवेदिष्टा प्रशान्तता । नानाविधोपवासादिभावनाः समुपेयुषः ॥७५॥ इति प्रशान्तताक्रिया ।
तदनन्तर नाना प्रकार के उपवास आदिकी भावनाओंको प्राप्त होनेवाले उस भव्य के पहले के समान ही प्रशान्तता नामकी क्रिया मानी जाती है ।। ७५ ।। यह सोलहवीं प्रशान्तता क्रिया है।
Thereafter, having attained the sentiments of various forms of fasting and austerity, that noble soul experiences a state akin to his former one, known as Praśāntatā.75
This is the sixteenth sacred act—Praśāntatā.
श्लोक ( Shlok ) 76
गृहत्यागस्ततोऽस्य स्याद् गृहवासाद् विरज्यतः । योग्यं सूनुं यथान्यायमनुशिष्य गृहोज्झनम् ॥७६॥इति गृहत्यागक्रिया ।
तत्पश्चात् जब वह घरके निवाससे विरक्त होकर योग्य पुत्रको नीतिके अनुसार शिक्षा देकर घर छोड़ देता है तब उसके गृहत्याग नामकी क्रिया होती है ।।७६।। यह सत्रहवीं गृहत्याग क्रिया है ।
Thereafter, when he renounces the dwelling of the household, having detached himself from worldly ties and duly educating his worthy son in the ways of righteousness, he departs from the home; this rite is known as Gṛhatyāga—the abandonment of the household life.76
This is the seventeenth sacred act—Gṛhatyāga.
श्लोक ( Shlok ) 77
त्यक्तागारस्य तस्यातस्तपोवनमुपेयुषः । एकशाटकधारित्वं प्राग्वद्दीक्षाद्यमिष्यते ॥७७॥ इति दीक्षाद्यक्रिया ।
तदनन्तर जो घर छोड़कर तपोवनमें चला गया है ऐसे भव्य पुरुषका पहले के समान एक वस्त्र धारण करना यह दीक्षाद्य नामकी क्रिया मानी जाती है ॥७७॥ यह दीक्षाद्य नामकी अठारहवीं क्रिया है।
Thereafter, when the noble soul has forsaken the household and entered the forest of austerity, the donning of a single garment, as before, is regarded as the rite called Dīkṣādyā.77
This is the eighteenth sacred act—Dīkṣādyā.
श्लोक ( Shlok ) 78
ततोऽस्य जिनरूपत्वमिष्यते त्यक्तवाससः । धारणं जातरूपस्य युक्ताचाराद् गणेशिनः ॥७८॥इति जिनरूपता ।
इसके बाद जब वह गृहस्थ वस्त्र छोड़कर किन्हीं योग्य आचरणवाले मुनिराजसे दिगम्बर रूप धारण करता है तब उसके जिनरूपता नामकी क्रिया कही जाती है ।॥७८॥ यह उन्नीसवीं जिनरूपता क्रिया है।
Thereafter, when he casts aside the garments of a householder and, under the guidance of a worthy ascetic, assumes the Digambara form, he performs the rite known as Jinarūpatā.78
This is the nineteenth sacred act—Jinarūpatā.
श्लोक ( Shlok ) 79
क्रियाशेषास्तु निःशेषाः प्रोक्ता गर्भान्वये यथा । तथैव प्रतिपाद्याः स्युर्न भेवोऽस्त्यत्र कश्चन ॥७९॥
इनके सिवाय जो कुछ क्रियाएं बाकी रह गई हैं वे सब जिस प्रकार गर्भान्वय क्रियाओंमें कहीं गई हैं उसी प्रकार प्रतिपादन करने योग्य हैं। इनमें और उनमें कोई भेद नहीं है ।॥७९॥
Apart from these, whatever rites remain are to be expounded in the same manner as they have been described within the Garbha-anvaya (sequential exposition) of the previous rites.There exists no distinction between those rites and these; their essence and form are one and the same.79
श्लोक ( Shlok ) 80
यस्त्वेतास्तत्त्वतो ज्ञात्वा भव्यः समनुतिष्ठति । सोऽधिगच्छति निर्वाणमचिरात्सुखसाद्भवन् ॥८०॥इति दीक्षान्वयक्रिया ।
जो भव्य इन क्रियाओंको यथार्थरूपसे जानकर उनका पालन करता है वह सुखके आधीन होता हुआ बहुत शीघ्र निर्वाणको प्राप्त होता है ।॥८०॥ इस प्रकार यह दीक्षान्वय क्रियाओंका वर्णन पूर्ण हुआ ।
He who, being noble, truly comprehends these sacred rites and faithfully observes them, becomes a master of bliss and swiftly attains the supreme liberation—Nirvāṇa.80
Thus, the detailed exposition of the Dīkṣānvaaya—the rites of initiation—comes to its completion.
श्लोक ( Shlok ) 81
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि द्विजाः कर्त्रन्वयक्रियाः । याः प्रत्यासन्नमिष्ठस्य भवेयुर्भव्यदेहिनः ॥८१॥
अथानन्तर-हे द्विजो, मैं आगे उन कर्त्रन्वय क्रियाओंको कहता हूं जो कि अल्पसंसारी भव्य प्राणी हीके हो सकती हैं ।॥ ८१ ॥
Now then, O twice-born ones, I shall proceed to expound the Kartṛnvaya rites—those sacred acts which can be undertaken only by noble beings of limited worldly bondage.81
श्लोक 82 से 91
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
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