आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 इंद्रों की नमस्कार और भगवान का रूप
बत्तीस इंद्रों ने स्तुतियाँ कीं और नमस्कार किया। वे समवसरण में बैठे। भगवान का शरीर सुवर्ण-सा, भुजाएँ हाथी-सी, मुख चंद्र-सा और नेत्र कमल-से थे। चमरों से घिरा यह शरीर कामदेव को जीतता था। देवांगनाएँ उनके मुख को असंतुष्ट होकर देखती थीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
त्यामीड्महे जिन भवन्तमनुस्मरामस्त्वां कुड्मलीकृतकरा वयमानमामः । स्वत्संस्तुतायुपचितं यदिहाद्य पुण्यंतेनास्तु भक्तिरमला त्वयि मः प्रसन्ना ॥१६२॥
हे जिनेंद्र, आपकी स्तुति कर हम लोग आपका बार-बार स्मरण करते हैं, और हाथ जोड़कर आपको नमस्कार करते हैं । हे भगवन, आपकी स्तुति करने से आज यहाँ हम लोगों को जो कुछ पुण्य का संचय हुआ है उससे हम लोगों की आपमें निर्मल और प्रसन्नरूप भक्ति हो ।।162।।
O Jinendra, by praising you, we constantly remember you and bow before you with folded hands. O Bhagavān, may the merit accumulated today through this hymn of praise bring us pure and joyful devotion towards you. ( 162)
श्लोक ( Shlok ) 163
इत्थं सुरासुरनरोरगयक्षसिद्धगन्धर्वचारण गणेस्सममिद्धबोधाः द्वात्रिंशदिन्द्रवृषभा वृषभाय तस्मै चक्रुर्नंमः स्तुतिशतैर्नतमौलयस्ते ॥ १६३॥
इस प्रकार जिनका ज्ञान अतिशय प्रकाशमान हो रहा है ऐसे मुख्य-मुख्य बत्तीस इंद्रों ने, (भवनवासी 10, व्यंतर 8, ज्योतिषी 2 और कल्पवासी 12) सुर, असुर, मनुष्य, नागेंद्र, यक्ष, सिद्ध, गंधर्व और चारणों के समूह के साथ-साथ सैकड़ों स्तुतियों-द्वारा मस्तक झुकाते हुए उन भगवान् वृषभदेव के लिए नमस्कार किया ।।163।।
Thus, the thirty-two chief Indras, whose wisdom shines brilliantly, along with the hosts of Suras, Asuras, Humans, Nagendras, Yakshas, Siddhas, Gandharvas, and Charanas, bowed their heads and offered countless hymns of praise in reverence to Lord Vrishabhadeva. ( 163)
श्लोक ( Shlok ) 164
स्तुत्वेति तं जिनमजं जगदेकबन्धु भक्त्या नतोरुमुकुटैरमरै सहेन्द्राः । धर्मप्रिया जिनपतिं परितो यथास्वमास्थान भूमिमभजन् जिनसम्मुखास्याः ॥ १६४॥
इस प्रकार धर्म से प्रेम रखने वाले इंद्र लोग, अपने बड़े-बड़े मुकुटों को नम्रीभूत करने वाले देवों के साथ-साथ फिर कभी उत्पन्न नहीं होने वाले और जगत् के एकमात्र बंधु जिनेंद्रदेव की स्तुति कर समवसरण भूमि में जिनेंद्र भगवान की ओर मुखकर उन्हीं के चारों ओर यथायोग्यरूप से बैठ गये ।।164।।
Thus, the Indras, who are devoted to Dharma, along with the gods who humbly bowed their grand crowns, praised the Jinendra Deva, the one and only true benefactor of the world, who shall never be born again. After offering their reverence, they turned toward Lord Jinendra in the Samavasarana and sat around Him in a manner befitting their positions. ( 164)
श्लोक ( Shlok ) 165
देहे जिनस्य जयिनः कनकावदाते रेजुस्तदा भृशममी सुरदृष्टिपाताः । कल्पाङ्घ्रिपाङ्ग इव मत्तमधुव्रतानामोघाः प्रसूनमधुपानपिपासितानाम् ॥१६५।।
उस समय घातियाकर्मरूपी शत्रुओं को जीतने वाले जिनेंद्रभगवान के सुवर्ण के समान उज्ज्वल शरीर पर जो देवों के नेत्रों के प्रतिबिंब पड़ रहे थे वे ऐसे अच्छे सुशोभित हो रहे थे मानो कल्पवृक्ष के अवयवों पर पुष्पों का रस पीने की इच्छा करने वाले मदोन्मत्त भ्रमरों के समूह ही हों ।।165।।
At that moment, the divine reflections of the gods’ eyes falling upon the radiant, gold-like body of Lord Jinendra, who had conquered the enemy of Ghatiya Karmas, appeared exceptionally splendid—just like swarms of intoxicated bumblebees drawn to the nectar of flowers on the celestial Kalpavriksha. ( 165)
श्लोक ( Shlok ) 166
कुञ्जरकराभभुज मिन्दुसमवक्त्रं कुञ्चितमितस्थित शिरोरुहकलापम् । मन्द्ररतटा भपृथुवक्षसमधीशं तं जिनमवेक्ष्य दिविजाः प्रमदमीयुः ॥ १६६॥
जिनकी भुजाएँ हाथी की सूँड़ के समान है, जिनका मुख चंद्रमा के समान है, जिनके केशों का समूह टेढ़ा, परिमित (वृद्धि से रहित) और स्थित (नहीं फड़ने वाला) है और जिनका वक्षःस्थल मेरुपर्वत के तट के समान है ऐसे देवाधिदेव जिनेंद्रभगवां को देखकर वे देव बहुत ही हर्षित हुए थे ।।166।।
The gods were filled with immense joy upon beholding Lord Jinendra, the Supreme Lord of the Devas, whose arms resembled the trunk of an elephant, whose face was as radiant as the moon, whose hair was neatly arranged—neither growing nor fluttering—and whose broad chest was as grand as the slopes of Mount Meru. ( 166)
श्लोक ( Shlok ) 167
विकसित सरसिजदलनिभनयनं करिकरसुरुचिरभुजयुगममलम् । जिनवपुरतिशयरुचियुतममरा निददृशुरतिधृति विमुकुलनयनाः ॥ १६७॥
जिसके नेत्र फूले हुए कमल के दल के समान हैं, जिनकी दोनों भुजाएं हाथी की सूंड के समान है, जो निर्मल है, और जो अत्यंत कांति से युक्त है ऐसे जिनेंद्रभगवां के शरीर को वे देव लोग बड़े भारी संतोष से नेत्रों को उघाड़-उघाड़कर देख रहे थे ।।167।।
The gods, filled with immense satisfaction, gazed upon Lord Jinendra’s radiant and pure form with wide, unblinking eyes. His eyes resembled fully bloomed lotus petals, his arms were like the trunks of mighty elephants, and his entire being shone with extraordinary brilliance. ( 167)
श्लोक ( Shlok ) 168
विधुरुचिहरचमररुहपरिगतं मनसिजशरशतनिपतनविजयि । जिनवरवपुरवधुतसकलमलं निपपुरमृतमिव शुचि सुरमधुपाः ॥१६८॥
जो चंद्रमा की कांति को हरण करने वाले चमरों से घिरा हुआ है, जो कामदेव के सैकड़ों बाणों के निपात को जीतने वाला है, जिसने समस्त मल नष्ट कर दिये हैं और जो अतिशय पवित्र हैं ऐसे जिनेंद्रदेव के शरीर को देवरूपी भ्रमर अमृत के समान पान करते थे ।।168।।
The divine beings, like bees drawn to nectar, drank in the sight of Lord Jinendra’s supremely pure form. Surrounded by chāmaras that outshone the moon’s radiance, he had conquered the countless arrows of Kāma (desire), destroyed all impurities, and embodied ultimate sanctity. ( 168)
श्लोक ( Shlok ) 169
कमलदल विलसदनि मिषनयनं प्रहसित निभमुखमतिशयसुरभि । सुरनरपरिवृढन यनसुखकरं व्यरुचदधिकरुचि जिनवृषभवपुः ॥१६९॥
जिसके टिमकाररहित नेत्र कमलदल के समान सुशोभित हो रहे थे जिसका मुख हँसते हुए के समान जान पड़ता था, जो अतिशय सुगंधि से युक्त था, देव और मनुष्यों के स्वामियों के नेत्रों को सुख करने वाला था, और अधिक कांति से सहित था ऐसा भगवान् वृषभदेव का वह शरीर बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा था ।।169।।
The radiant body of Lord Rishabhadeva shone with extraordinary brilliance. His tranquil, unblinking eyes resembled lotus petals, his face bore a gentle, ever-present smile, and his form exuded a divine fragrance. Bringing delight to the eyes of gods and humans alike, his resplendence was unmatched. ( 169)
श्लोक ( Shlok ) 170
जिनमुखशत दल भनिमिषनयन भ्रमरमतिसुरभि विधुतविधुरुचि । मनसिजहिमहतिविरहितमतिरुक् पपुरविदितधृर्ति सुरयुवतिदृशः ॥१७०॥
जिस पर टिमकाररहित नेत्र ही भ्रमर बैठे हुए हैं, जो अत्यंत सुगंधित है जिसने चंद्रमा की कांति को तिरस्कृत कर दिया है, जो कामदेवरूपी हिम के आघात से रहित हैं और जो अतिशय कांतिमान हैं ऐसे भगवान् के मुखरूपी कमल को देवांगनाओं के नेत्र असंतुष्टरूप से पान कर रहे थे । भावार्थ―भगवान् का मुखकमल इतना अधिक सुंदर था कि देवांगनाएँ उसे देखते हुए संतुष्ट ही न हो पाती थीं ।।170।।
The divine face of Lord Rishabhadeva was like a fully bloomed lotus, untouched by even the slightest tremor. His fragrance filled the air, and his radiance surpassed the brilliance of the moon. Unaffected by the icy touch of worldly desires, his resplendent form captivated the celestial maidens, whose eyes remained unsatisfied despite gazing upon him endlessly. ( 170)
श्लोक ( Shlok ) 171
विजितकमल दल विलसदसदृशदृशं सुरयुवतिनयनमधुकरततवपुषम् । वृषभमजरमजममरपतिसुमहितं नमत परम मतममितरुचिमृषिपतिम् ॥१७१॥
जिनके अनुपम नेत्र कमलदल को जीतते हुए सुशोभित हो रहे हैं, जिनका शरीर देवांगनाओं के नेत्ररूपी भ्रमर से व्याप्त हो रहा है, जो जरारहित हैं, जन्मरहित हैं, इंद्रों के द्वारा पूजित हैं, अतिशय इष्ट हैं अथवा जिनका मत अतिशय उत्कृष्ट है, जिनकी कांति अपार है और जो ऋषियों के स्वामी हैं ऐसे भगवान् वृषभदेव को हे भव्य जीवो, तुम सब नमस्कार करो ।।171।।
O noble beings! Bow down to Lord Rishabhadeva, whose matchless eyes surpass the beauty of lotus petals, whose divine body is surrounded by the bee-like gaze of celestial maidens. He is free from old age and birth, worshipped by Indras, supremely desirable, possessing an incomparable doctrine, radiating boundless brilliance, and revered as the Lord of Sages. ( 171)
श्लोक 172 से 181
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