श्लोक 1 से 11 श्रीवृषभदेव की जय और भरत का पूजा निश्चय
भगवान् श्रीवृषभदेव ने अपने ज्ञान से मोहरूपी विष को दूर कर समस्त जगत् को जगा दिया। राजर्षि भरत को एक साथ तीन समाचार मिले: उनके पिता को केवलज्ञान प्राप्त हुआ, अंतःपुर में पुत्र जन्मा, और आयुधशाला में चक्ररत्न प्रकट हुआ। भरत ने इन समाचारों को सुनकर यह विचार किया कि इनमें से पहले किसका उत्सव करना चाहिए। उन्हें लगा कि केवलज्ञान धर्म का फल, पुत्र काम का फल, और चक्ररत्न अर्थ का फल है। अंततः उन्होंने निश्चय किया कि सबसे पहले धर्मकार्य अर्थात् भगवान् की पूजा करनी चाहिए। इसके लिए वे अपने भाई, अंतःपुर की स्त्रियों और नगर के प्रमुख लोगों के साथ पूजा सामग्री लेकर भगवान् की वंदना के लिए तैयार हुए।
श्लोक 12 से 21 भरत का समवसरण की ओर प्रस्थान और पूजा
महाराज भरत नगाड़ों की गंभीर ध्वनि के साथ सेना सहित समवसरण की ओर प्रस्थान करते हैं। उनकी सेना समुद्र की लहरों और ध्वजाओं से सुशोभित दिखती है। समवसरण पहुँचकर वे प्रदक्षिणा देते हैं, मानस्तंभों और धर्मचक्रों की पूजा करते हैं, और गंधकुटी में भगवान् वृषभदेव को श्रेष्ठ सिंहासन पर विराजमान देखते हैं। वे भगवान् की भक्ति में लीन होकर पूजा के लिए आगे बढ़ते हैं।
श्लोक 22 से 31 भगवान् वृषभदेव का दिव्य स्वरूप और भरत की पूजा
भगवान् वृषभदेव चमरों, छत्रों, और पुष्पवृष्टि से सुशोभित दिखते हैं, मानो सुमेरु पर्वत हों। उनकी प्रभा और दिव्य ध्वनि से आनंद फैलता है। भरत उनकी प्रदक्षिणा करते हैं और उत्कृष्ट सामग्री से पूजा करते हैं। पूजा के बाद वे घुटनों पर बैठकर भगवान् को नमस्कार करते हैं और स्तुति शुरू करते हैं।
श्लोक 32 से 41 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 1)
भरत भगवान् को ब्रह्मा, परमज्योति, सृष्टिकर्ता, सर्वदर्शी, और आत्मभू कहकर स्तुति करते हैं। वे उन्हें हिरण्यगर्भ, परमात्मा, शंकर, और सर्वज्ञ बताते हैं। भगवान् को योगी, सिद्ध, और धर्म के अधिपति कहते हुए उनकी महिमा का वर्णन करते हैं।
श्लोक 42 से 51 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 2)
भरत भगवान् को उत्तम, स्थिर, अचल, और संसार का अंत करने वाला कहते हैं। वे उनके आठ प्रातिहार्यों और छत्रत्रितय की शोभा की प्रशंसा करते हैं। भगवान् का सिंहासन लोकभार धारण करने वाला प्रतीत होता है। भरत उनकी भक्ति में तल्लीन होकर स्तुति करते हैं।
श्लोक 52 से 61 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 3)
भरत भगवान् की प्रभा को पुण्यरूप जल मानते हैं। उनकी दिव्यध्वनि मोह को नष्ट करती है। वे भगवान् को सर्वव्यापी, स्वयंभू, और क्षायिक गुणों से युक्त कहते हैं। उनका ज्ञान और दर्शन एक साथ कार्य करते हैं, जो आश्चर्यजनक है।
श्लोक 62 से 71 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 4)
भरत भगवान् के अनंत बल और सम्यक्चारित्र की प्रशंसा करते हैं। उनका सुख विषय-कषाय से मुक्त है। वे उनके जन्म के चमत्कारों का वर्णन करते हैं और उन्हें सर्वगत, सनातन कहते हैं। उनकी भक्ति से प्रेरित होकर भरत स्तुति करते हैं।
श्लोक 72 से 81 भरत की स्तुति समापन और तत्त्व प्रश्न
भरत भगवान् की भक्ति में अपनी अक्षमता स्वीकार करते हैं और उनकी कृपा माँगते हैं। स्तुति के बाद वे सभा में बैठते हैं और तत्त्वों के स्वरूप, मार्ग, और फल के बारे में प्रश्न करते हैं। भगवान् गंभीर वाणी से जवाब शुरू करते हैं।
श्लोक 82 से 91 भगवान् की दिव्यध्वनि और तत्त्व वर्णन
भगवान् की दिव्यध्वनि बिना प्रयत्न के प्रकट होती है। वे जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, और काल द्रव्यों का वर्णन करते हैं। तत्त्व को सम्यग्ज्ञान और मुक्ति का आधार बताते हुए इसके भेदों (दो, तीन, चार, पाँच, छह) का विवेचन करते हैं।
श्लोक 92 से 101 जीवतत्त्व का विस्तृत वर्णन
भगवान् जीव को चेतन, अनादि, ज्ञाता, और कर्ता बताते हैं। उसका स्वभाव ऊर्ध्वगमन और संकोच-विस्तार करना है। वे गति, इंद्रिय आदि मार्गणाओं और गुणस्थानों से जीव के अन्वेषण की व्याख्या करते हैं। ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग के भेद भी स्पष्ट करते हैं।
श्लोक 102 से 111 जीवतत्त्व का उपयोग और पर्याय
भगवान् वृषभदेव बताते हैं कि ज्ञानोपयोग वस्तुओं को भेदपूर्वक ग्रहण करता है, इसलिए इसे साकार कहते हैं, जबकि दर्शनोपयोग सामान्य रूप से ग्रहण करता है, इसलिए यह अनाकार है। जीव को जीव, प्राणी, जंतु, क्षेत्रज्ञ, पुरुष, पुमान्, आत्मा, अंतरात्मा और ज्ञानी जैसे पर्यायवाची शब्दों से जाना जाता है। जीव का स्वरूप नित्य है, पर उसकी पर्यायें अनित्य हैं। यह उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से युक्त है। मिथ्यादृष्टि लोग इसके स्वरूप को गलत समझते हैं और विवाद करते हैं।
श्लोक 112 से 121 मिथ्यानय और मोक्ष के साधन
मिथ्यादृष्टि लोग आत्मा के अस्तित्व, नित्यता, कर्तृत्व, भोक्तृत्व और मोक्ष को लेकर भिन्न-भिन्न मत रखते हैं। भगवान् भरत को इन मिथ्या नयों को छोड़कर सही जीवतत्त्व समझने को कहते हैं। जीव की दो अवस्थाएँ हैं: संसार और मोक्ष। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये तीनों मिलकर मोक्ष के साधन हैं। इनमें से किसी एक की कमी से मोक्ष संभव नहीं है।
श्लोक 122 से 131 मोक्षमार्ग और तत्त्वों की शुद्धता
कुछ मूर्ख लोग केवल एक या दो साधनों से मोक्ष मानते हैं, पर यह गलत है। आप्त, आगम और पदार्थों में श्रद्धा से सम्यग्दर्शन शुद्ध होता है। आप्त वह है जो कर्मों से मुक्त और कृतकृत्य हो। आगम आप्त का वचन है। जीव के भव्य, अभव्य और मुक्त तीन भेद हैं। भव्य जीव सिद्धि प्राप्त कर सकता है, अभव्य नहीं। मुक्त जीव कर्मबंधन से मुक्त हैं।
श्लोक 132 से 141 अजीवतत्त्व का वर्णन
अजीवतत्त्व के पाँच भेद हैं: धर्म, अधर्म, आकाश, काल और पुद्गल। धर्म गति में और अधर्म स्थिति में सहायक है, पर ये स्वयं प्रेरक नहीं हैं। आकाश स्थान देता है और काल परिवर्तन का सहकारी कारण है। काल दो प्रकार का है: व्यवहारकाल और निश्चयकाल। व्यवहारकाल से निश्चयकाल का बोध होता है।
श्लोक 142 से 151 अजीव के गुण और पुद्गल के भेद
निश्चयकाल लोकाकाश में असंख्यात अणुओं से जाना जाता है और एकप्रदेशी होने से अनस्तिकाय है। धर्म, अधर्म, आकाश और काल अमूर्तिक हैं, जबकि पुद्गल मूर्तिक है। पुद्गल में वर्ण, गंध, रस और स्पर्श होते हैं। इसके स्कंध और परमाणु दो भेद हैं। परमाणु सूक्ष्म और नित्य हैं। पुद्गल के छह भेद हैं: सूक्ष्मसूक्ष्म, सूक्ष्म, सूक्ष्मस्थूल, स्थूलसूक्ष्म, स्थूल और स्थूलस्थूल।
श्लोक 152 से 161 पुद्गल भेद और तत्त्व निरूपण
पानी आदि स्थूल और पृथिवी आदि स्थूलस्थूल हैं। जो इन तत्त्वों का सही श्रद्धान करता है, वह परब्रह्म अवस्था पाता है। भगवान् वृषभदेव भरत को चार पुरुषार्थ, मार्ग, फल, बंध, मोक्ष, लोकों का स्वरूप, स्वर्ग, और तीर्थंकरों के कल्याणकों का वर्णन करते हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान के द्रव्यों का स्वरूप बताते हैं।
श्लोक 162 से 172 भरत और अन्य की प्रबुद्धता
तत्त्व सुनकर भरत आनंदित होते हैं और सम्यग्दर्शन व अणुव्रत ग्रहण करते हैं। वे गुरुदेव से प्रबुद्ध होकर शोभित होते हैं। सभा धर्मामृत से संतुष्ट होती है। वृषभसेन दीक्षा लेकर प्रथम गणधर बनते हैं। अन्य राजा और राजकन्याएँ भी दीक्षा लेते हैं।
श्लोक 173 से 181 गणधर और श्रावकों का उत्थान
वृषभसेन, सोमप्रभ, ब्राह्मी, सुंदरी आदि दीक्षा लेते हैं। श्रुतकीर्ति और प्रियव्रता श्रावक व्रत ग्रहण करते हैं। अनंतवीर्य मोक्ष के अग्रगामी बनते हैं। मरीचि को छोड़ अन्य तपस्वी पुनः दीक्षित होते हैं।
श्लोक 182 से 186 भरत का अयोध्यापुरी में प्रवेश
भगवान् की पूजा कर भरत बाहुबली आदि के साथ अयोध्या लौटते हैं। वे सूर्य के समान प्रभावशाली और विजयी प्रतीत होते हैं। अयोध्या जिनवाणी की तरह शोभित होती है, जिसमें पदार्थों का विस्तार, पवित्रता और आनंद भरा है।
English translation of Ādi purāṇa parv 24 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
स जीयाद् वृषभो मोहविषसुप्त मिदं जगत् । पटविद्येव यद्विद्या सद्यः समुदतिष्ठिपत् ॥१॥
जिनके ज्ञान ने पटविद्या अर्थात् विष दूर करने वाली विद्या के समान मोहरूपी विष से सोते हुए इस समस्त जगत् को शीघ्र ही उठा दिया था―जगा दिया था वे श्रीवृषभदेव भगवान् सदा जयवंत रहें ।।1।
May Lord Shri Rishabhadeva, whose wisdom, like the science of antidotes that neutralizes poison, swiftly awakened this entire world from the deep slumber of delusion (ignorance), always be victorious. ||1||
श्लोक ( Shlok ) 2
श्रीमान् भरतराजर्षिर्बुबुधे युगपत्त्रयम् । गुरोः कैवल्यसंभूर्ति सूर्तिं च सुतचक्रयोः ॥२॥
अथानंतर राज्यलक्ष्मी से युक्त राजर्षि भरत को एक ही साथ नीचे लिखे हुए तीन समाचार मालूम हुए कि पूज्य पिता को केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है, अंतःपुर में पुत्र का जन्म हुआ है और आयुधशाला में चक्ररत्न प्रकट हुआ है ।।2।।
Thereafter, the royal sage Bharata, endowed with the glory of sovereignty, received three pieces of news simultaneously: that his revered father had attained Kevaljnana (absolute knowledge), that a son was born in the inner chambers, and that the Chakraratna (divine discus) had manifested in the armory. ||2||
श्लोक ( Shlok ) 3
धर्मस्थाद् गुरुकैवल्यं चक्रमायुधपालतः । काञ्चुकीयात् सुतोत्पत्ति विदामास तदा विभुः ॥३॥
उस समय भरत महाराज ने धर्माधिकारी पुरुष से पिता के केवलज्ञान होने का समाचार, आयुधशाला की रक्षा करने वाले पुरुष से चक्ररत्न प्रकट होने का वृत्तांत, और कंचुकी से पुत्र उत्पन्न होने का समाचार मालूम किया था ।।3।।
At that time, King Bharata learned about his father’s attainment of Kevaljnana (absolute knowledge) from a righteous official, the manifestation of the Chakraratna (divine discus) from the guardian of the armory, and the birth of his son from the chamberlain. ||3||
श्लोक ( Shlok ) 4
पर्याकुल इवासीच्च क्षणं तद्योग पद्यतः । किमत्र प्रागनुष्ठेषं संविधानमिति प्रभुः ॥४॥
ये तीनों ही कार्य एक साथ हुए हैं । इनमें से पहले किसका उत्सव करना चाहिए यह सोचते हुए राजा भरत क्षण-भर के लिए व्याकुल से हो गये ।।4।।
All three events had occurred simultaneously. While contemplating which celebration should be held first, King Bharata became momentarily anxious. ||4||
श्लोक ( Shlok ) 5
त्रिवर्गफलसंभूतिरक्रमोपनता मम । पुण्यतीर्थ सुतोत्पत्तिश्चक्ररत्नमिति त्रयी ॥५॥
पुण्यतीर्थ अर्थात् भगवान को केवलज्ञान उत्पन्न होना, पुत्र की उत्पत्ति होना और चक्ररत्न का प्रकट होना ये तीनों ही धर्म, अर्थ, काम तीन वर्ग के फल मुझे एक साथ प्राप्त हुए हैं ।।5।।
The attainment of Kevaljnana by the revered Lord (a sacred event), the birth of a son, and the manifestation of the Chakraratna—these three have bestowed upon me the fruits of Dharma (righteousness), Artha (prosperity), and Kama (desires) all at once. ||5||
श्लोक ( Shlok ) 6
तत्र धर्मफलं तीर्थ पुत्रः स्यात् कामजं फलम् । अर्थानुबन्धिनोऽर्थस्य फलं चक्रं प्रभास्वरम् ॥६॥
इनमें से भगवान् के केवलज्ञान उत्पन्न होना धर्म का फल है, पुत्र का होना काम का फल है और दैदीप्यमान चक्र का प्रकट होना अर्थ प्राप्त कराने वाले अर्थ पुरुषार्थ का फल है ।।6।।
Among these, the attainment of Kevaljnana by the Lord is the fruit of Dharma (righteousness), the birth of a son is the fruit of Kama (fulfillment of desires), and the manifestation of the radiant Chakraratna is the fruit of Artha (prosperity and material wealth). ||6||
श्लोक ( Shlok ) 7
अथवा सर्वमप्येतत्फलं धर्मस्य पुष्कलम्। यतो धर्मतरोरर्थः फलं कामस्तु तद्रसः ॥७॥
अथवा यह सभी धर्मपुरुषार्थ का पूर्ण फल है क्योंकि अर्थ धर्मरूपी वृक्ष का फल है और काम उसका रस है ।।7।।
Or rather, all these are the complete fruits of Dharma Purushartha (righteous effort), because Artha (prosperity) is the fruit of the tree of Dharma, and Kama (desires) is its essence. ||7||
श्लोक ( Shlok ) 8
कार्येषु प्राग्विधेयं तद्धर्म्यं श्रेयोऽनुबन्धि यत् । महाफलं च तद्देवसेवा प्राथमकल्पिकी ॥८॥
सब कार्यों में सबसे पहले धर्मकार्य ही करना चाहिए क्योंकि वह कल्याणों को प्राप्त कराने वाला है और बड़े-बडे फल देने वाला है इसलिए सर्वप्रथम जिनेंद्र भगवान् की पूजा ही करनी चाहिए ।।8।।
Among all duties, Dharma should be performed first, as it leads to ultimate well-being and grants the greatest rewards. Therefore, the worship of Jinendra Bhagwan should be conducted first. ||8||
श्लोक ( Shlok ) 9
निश्चिचायेति राजेन्द्रो गुरुपूजनमादितः । अहो धर्मात्मनां चेष्टा प्रायः श्रेयोऽनुबन्धिनी ॥९॥
इस प्रकार राजाओं के इंद्र भरत महाराज ने सबसे पहले भगवान् की पूजा करने का निश्चय किया सो ठीक ही है क्योंकि धर्मात्मा पुरुषों की चेष्टाएँ प्राय: पुण्य उत्पन्न करने वाली ही होती हैं ।।9।।
Thus, it was only appropriate that King Bharata, the Indra of kings, decided to worship the Lord first, as the actions of righteous individuals generally lead to the accumulation of merit (punya). ||9||
श्लोक ( Shlok ) 10
सानुजन्मा समेतोऽन्तः पुरपौरपुरोगमैः। प्राज्यामिज्यां पुरोधाय सज्जोऽभूद् गमनं प्रति ॥१०॥
तदनंतर महाराज भरत अपने छोटे भाई, अंतःपुर की स्त्रियाँ और नगर के मुख्य-मुख्य लोगों के साथ पूजा की बड़ी भारी सामग्री लेकर जाने के लिए तैयार हुए ।।10।।
Thereafter, King Bharata, along with his younger brothers, the women of the royal palace, and the prominent citizens of the kingdom, prepared to set out with grand and elaborate offerings for the worship. ||10||
श्लोक ( Shlok ) 11
गुरौ भक्ति परां तन्वन् कुर्वन् धर्मप्रभावनाम्। स भूत्या परयोत्तस्थे भगवद्वन्दनाविधौ ॥११॥
गुरुदेव भगवान् वृषभदेव में उत्कृष्ट भक्ति को बढ़ाते हुए और धर्म की प्रभावना करते हुए महाराज भरत भगवान् की वंदना के लिए उठे ।।11।।
Enhancing his supreme devotion toward the revered Guru, Lord Rishabhadeva, and promoting the glory of Dharma, King Bharata rose to offer his reverence to the Lord. ||11||
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196