आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91 अनंत गुण और पवित्रता
वे अनंत वीर्य, सुख, प्रकाश और दान से युक्त हैं। परम ध्यानी, अयोनि, पवित्र और परमात्मा हैं। कर्म, मोह और राग से मुक्त होकर वे मोक्षगामी हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 25 – Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
नमो दर्शनमोहघ्ने क्षायिकामलदृष्टये । नमश्चारित्रमोहघ्ने विरागाय महौजसे ll८२ll
हे भगवन् आप दर्शनमोहनीय कर्म को नष्ट करने वाले तथा निर्मल क्षायिकसम्यग्दर्शन को धारण करने वाले हैं इसलिए आपको नमस्कार हो इसी प्रकार आप चारित्रमोहनीय कर्म को नष्ट करने वाले वीतराग और अतिशय तेजस्वी है इसलिए आपको नमस्कार हो ।।82।।
O Lord, you have destroyed Darshan Mohaniya Karma and attained pure, unwavering Kshayik Samyagdarshan (perfect right faith). Therefore, I bow to you. Likewise, you have eradicated Charitra Mohaniya Karma, becoming Vitarag (free from attachment) and immensely radiant. Therefore, I offer my salutations to you. ॥82॥
श्लोक ( Shlok ) 83
नमस्तेऽनन्तवीर्याय नमोऽनन्तसुखात्मने । नमस्तेऽनन्त लोकाय लोकालोकावलोकिने ।।८३॥
आप अनंतवीर्य को धारण करने वाले हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप अनंतसुखरूप हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप अनंतप्रकाश से सहित तथा लोक और अलोक को देखने वाले हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।83।।
You possess Anantavirya (infinite energy), therefore, I bow to you. You are the embodiment of Anantasukh (infinite bliss), therefore, I bow to you. You are endowed with Anantaprakash (infinite brilliance) and have the vision to see both Loka (the universe) and Aloka (the beyond). Therefore, I offer my salutations to you. ॥83॥
श्लोक ( Shlok ) 84
नमस्तेऽनन्तदानाय नमस्तेऽनन्तलब्धये । नमस्तेऽनन्तभोगाय नमोऽनन्तोपभोग ते ll८४।।
अनंतदान को धारण करने वाले आपके लिए नमस्कार हो, अनंतलाभ को धारण करने वाले आपके लिए नमस्कार हो, अनंतभोग को धारण करने वाले आपके लिए नमस्कार हो, और अनंत उपभोग को धारण करने वाले आपके लिए नमस्कार हो ।।84।।
Salutations to you, who possess Anantadaan (infinite charity), salutations to you, who possess Anantalabh (infinite gain), salutations to you, who possess Anantabhog (infinite enjoyment), and salutations to you, who possess Anantopabhog (infinite utilization). ॥84॥
श्लोक ( Shlok ) 85
नमः परमयोगाय नमस्तुभ्यमयोनये । नमः परमपूताय नमस्ते परमर्षये ॥८५॥
हे भगवन्, आप परम ध्यानी हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप अयोनि अर्थात् योनिभ्रमण से रहित हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप अत्यंत पवित्र हैं इसलिए आपको नमस्कार हो और आप परमऋषि हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।85।।
O Lord, you are the supreme meditator (Param Dhyaani), therefore, I bow to you. You are Ayoni—free from the cycle of birth and rebirth—therefore, I bow to you. You are utterly pure, therefore, I bow to you. And you are the supreme sage (Param Rishi), therefore, I offer my salutations to you. ॥85॥
श्लोक ( Shlok ) 86
नमः परमविद्याय नमः परमतच्छिदे । नमः परमतत्वाय नमस्ते परमात्मने ॥८६॥
आप परमविद्या अर्थात् केवलज्ञान को धारण करने वाले हैं, अन्य सब मतों का खंडन करने वाले हैं, परमतत्त्वस्वरूप है और परमात्मा हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।86।।
You possess Paramavidya—the supreme knowledge of Kevalgyan (absolute knowledge), you refute all false doctrines, you are the embodiment of the ultimate truth (Paramatattva), and you are the Paramatma (supreme soul). Therefore, I offer my salutations to you. ॥86॥
श्लोक ( Shlok ) 87
नमः परमरूपाय नमः परमतेजसे । नमः परममार्गाय नमस्ते परमेष्टिंने ॥८७॥
आप उत्कृष्ट रूप को धारण करने वाले हैं, परम तेजस्वी हैं, उत्कृष्ट मार्गस्वरूप हैं और परमेष्ठी हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।87।।
You possess an excellent form, you are supremely radiant, you are the embodiment of the highest path, and you are the Paramesthi (the supreme being). Therefore, I offer my salutations to you. ॥87॥
श्लोक ( Shlok ) 88
परमं भेजुषे धाम परमज्योतिषे नमः । नमः पारेतमः प्राप्तधाम्ने परतरात्मनें ॥८८॥
आप सर्वोत्कृष्ट मोक्षस्थान की सेवा करने वाले हैं, परम ज्योतिःस्वरूप हैं, आपका ज्ञानरूपी तेज अंधकार से परे है और आप सर्वोत्कृष्ट हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।88।।
You serve the supreme state of Moksha (liberation), you are the embodiment of ultimate brilliance, your light of knowledge transcends all darkness, and you are the most excellent. Therefore, I offer my salutations to you. ॥88॥
श्लोक ( Shlok ) 89
नमः क्षीणकलङ्काय क्षीणबन्ध नमोऽस्तु ते। नमस्ते क्षीणमोहाय क्षीणदोषाय ते नमः ॥८९॥
आप कर्मरूपी कलंक से रहित हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आपका कर्मबंधन क्षीण हो गया है इसलिए आपको नमस्कार हो, आपका मोहकर्म नष्ट हो गया है इसलिए आपको नमस्कार हो और आपके समस्त राग आदि दोष नष्ट हो गये हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।89।।
You are free from the stain of Karma, therefore, I bow to you. Your bondage of Karma has been diminished, therefore, I bow to you. Your Moha Karma (delusion-causing karma) has been destroyed, therefore, I bow to you. And all your attachments and other defects have been eradicated, therefore, I offer my salutations to you. ॥89॥
श्लोक ( Shlok ) 90
नमः सुगतये तुभ्यं शोभनां गतिमीयुषे । नमस्तेऽतीन्द्रियज्ञानसुखायानिन्द्रियात्मने ।।९०।।
आप मोक्षरूपी उत्तम गति को प्राप्त होनेवाले हैं इसलिए सुगति हैं अत: आपको नमस्कार हो, आप अतींद्रियज्ञान और सुख से सहित हैं तथा इंद्रियों से रहित अथवा इंद्रियों के अगोचर हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।90।।
You are destined to attain the supreme path of Moksha (liberation), therefore, you are Sugati (possessor of the highest state). Thus, I bow to you. You possess Atindriya Jnana (transcendental knowledge) and bliss beyond the senses, and you are beyond the reach of the senses or imperceptible to them. Therefore, I offer my salutations to you. ॥90॥
श्लोक ( Shlok ) 91
कायबन्धन निर्मोक्षादकायाय नमोऽस्तु ते । नमस्तुभ्यमयोगाय योगिनामधियोगिने ।।९१।।
आप शरीररूपी बंधन के नष्ट हो जाने से अकाय कहलाते हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप योगरहित हैं और योगियों अर्थात् मुनियों में सबसे उत्कृष्ट हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।91।।
You are called Akaya (bodiless) because the bondage of the body has been destroyed, therefore, I bow to you. You are free from all Yoga (attachments and activities) and are the most excellent among Yogis (sages and ascetics). Therefore, I offer my salutations to you. ॥91॥
श्लोक 92 से 101
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81