आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151
श्लोक 143 से 151 व्युष्टि और चौल मंत्र
व्युष्टि मंत्रों में ‘उपनयनजन्मवर्षवर्धनभागी भव’, ‘वैवाहनिष्ठवर्षवर्धनभागी भव’, ‘मुनीन्द्रजन्मवर्षवर्धनभागी भव’, ‘सुरेन्द्रजन्मवर्षवर्धनभागी भव’, ‘मन्दराभिषेकवर्षवर्धनभागी भव’, ‘यौवराज्यवर्षवर्धनभागी भव’, ‘महाराज्यवर्षवर्धनभागी भव’, ‘परमराज्यवर्षवर्धनभागी भव’, और ‘आर्हन्त्यराज्यवर्षवर्धनभागी भव’ मंत्र यज्ञोपवीत, विवाह, मुनि, इंद्र, अभिषेक, युवराज, महाराज, चक्रवर्ती, और अरहंत पद के वर्ष वृद्धि की प्रार्थना करते हैं। चौल मंत्रों में ‘उपनयनमुण्डभागी भव’, ‘निर्ग्रन्थमुण्डभागी भव’, ‘निष्क्रान्तिमुण्डभागी भव’, ‘परमनिस्तारककेशभागी भव’, ‘परमेन्द्रकेशभागी भव’, ‘परमराज्यकेशभागी भव’, और ‘आर्हन्त्यराज्यकेशभागी भव’ मंत्र उपनयन, निर्ग्रन्थ दीक्षा, केशलोच, आचार्य, इंद्र, चक्रवर्ती, और अरहंत के केशों की प्राप्ति के लिए हैं। इन मंत्रों से चोटी रखवानी चाहिए। इसके बाद लिपि-संख्यान मंत्रों का वर्णन किया जाएगा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 40- Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
चूणिः-उपनयनमुण्डभागी भव, निर्ग्रन्थमुण्डभागी भव, परमनिस्तारककेशभागी भव, परमेन्द्र केश-भावी भव, परमराज्यकेशभागी भव, आर्हन्त्यराज्यकेशभागी भव । (इति चौलक्रियामन्त्रः) शब्दपारभागी भव अर्थपारभागी भव । पदं शब्दार्थसम्बन्धपारभागी भवेत्यपि ॥१५२।।
संग्रह-‘उपनयनमुण्डभागी भव, निर्ग्रन्थमुण्डभागी भव, निष्क्रान्तिमुण्डभागी भव, परमनिस्तारक केशभागी भव, परमेन्द्रकेशभागी भव, परमराज्यकेशभागी भव, आर्हन्त्यराज्य-केशभागी भव’ ।
लिपिसंख्यानके मन्त्र- ‘शब्दपारभागी भव’ (शब्दोंका पारगामी हो), ‘अर्थपारगामी भागी भव’ (सम्पूर्ण अर्थका जाननेवाला हो) और ‘शब्दार्थसंबन्धपारभागी भव’ (शब्द तथा अर्थ दोनोंके सम्बन्धका पारगामी हो) ये पद लिपिसंख्यानके समय कहने चाहिए ॥ १५२॥
Cūṇiḥ (Conclusion):
“Upanayana-muṇḍa-bhāgī bhava, Nirgrantha-muṇḍa-bhāgī bhava, Paramanistāraka-keśa-bhāgī bhava, Paramendra-keśa-bhāgī bhava, Paramarājya-keśa-bhāgī bhava, Ārhantya-rājya-keśa-bhāgī bhava” —
(Thus concludes the tonsure rite mantras.)Now begins the transition to scriptural learning:“Śabdapāra-bhāgī bhava” — May you attain mastery over phonetics and sound.“Arthapāra-bhāgī bhava” — May you attain the supreme comprehension of meanings.“Padaṁ śabdārtha-sambandha-pāra-bhāgī bhava” —
May you attain the highest realization of the relation between word and meaning.152
श्लोक ( Shlok ) 153 –155
चूर्णिः-शब्दपारगामी (भागी) भव, अर्थपारगामी (भागी) भव, शब्दार्थपारगामी (भागी) भव, (लिपिसंख्यानमंन्त्रः)
उपनीतिक्रियामन्त्रं स्मरन्तीमं द्विजोत्तमाः । परमनिस्तारकादिलिङ्गभागी भवेत्यतः ॥१५३॥युक्तं परमर्षिलिङ्गेन भागीभवपदं भवेत् । परमेन्द्रादिलिङ्गादिभागी भवपदं परम् ॥१५४।॥ एवं परमराज्यादि परमार्हन्त्यादि च क्रमात् । युक्तं परमनिर्वाणपदेन च शिखापदम् ॥१५५॥
संग्रह ‘शब्दपारगामी भव, अर्थपारगामी भव, शब्दार्थपारगामी भव’ ।उत्तम द्विज नीचे लिखे हुए मन्त्रोंको उपनीति क्रियाके मन्त्ररूपसे स्मरण करते हैं-सबसे पहले ‘परमनिस्तारकलिङगभागी भव’ (तू उत्कृष्ट आचार्यके चिह्नोंको धारण करने-वाला हो), फिर ‘परमर्षिलिङगभागी भव’ (परमऋषियोंके चिह्नको धारण करनेवाला हो) और ‘परमेन्द्रलिङगभागी भव’ (परम इन्द्रपदके चिह्नोंको धारण करनेवाला हो) ये मन्त्र बोलना चाहिये । इसी प्रकार अनुक्रमसे परम राज्य, परमार्हन्त्य और परम निर्वाण पदको ‘लिङ्गभागी भव’ पदसे युक्तकर ‘परमराज्यलिङ्गभागी भव’ (परमराज्य के चिह्नोंको धारण करनेवाला हो), ‘परमार्हन्त्यलिङ्गभागी भव’ (उत्कृष्ट अरहन्तदेवके चिह्नोंको धारण करनेवाला हो) और ‘परमनिर्वाणलिङगभागी भव’ (परमनिर्वाणके चिह्नोंका धारक हो) ये मन्त्र बना लेना चाहिये । ॥१५३-१५५॥
Saṅgraha (Collected Invocation):
“Śabdapāragāmī bhava, Arthapāragāmī bhava, Śabdārthapāragāmī bhava” —
May you become one who transcends mere sound; may you attain the essence of meaning; may you fully realize the unity of word and meaning.
The noble twice-born (uttama dvija) should then recall the following mantras as part of the upanīti (initiation into scriptural discipline):
- “Parama-nistāraka-liṅga-bhāgī bhava” —
May you be one who bears the sacred symbols of the Supreme Liberator (Ācārya). - “Paramarṣi-liṅga-bhāgī bhava” —
May you be one who bears the emblems of the Supreme Ṛṣis (Seers). - “Paramendra-liṅga-bhāgī bhava” —
May you bear the distinguishing marks of the Supreme Indra (Celestial Lord).
In the same order, one should form the following mantras by conjoining each divine station with the phrase “liṅga-bhāgī bhava”:
- “Paramarājya-liṅga-bhāgī bhava” —
May you bear the insignia of the exalted Sovereign (Chakravartin). - “Paramārhantya-liṅga-bhāgī bhava” —
May you carry the sacred symbols of the Supreme Arhant. - “Parama-nirvāṇa-liṅga-bhāgī bhava” —
May you bear the signs of the ultimate liberation — Nirvāṇa. 153 –155
श्लोक ( Shlok ) 156
चूर्णिः-परमनिस्तारकलिङ्गभागी भव, परमर्षिलिङ्गभागी भव, परमेन्द्रलिङ्गभागी भव, परम-राज्यलिङ्गभागी भव, परमार्हन्त्यलिङ्गभागी भव, परमनिर्वाणलिङ्गभागी भव, (इत्युपनीतिक्रियामन्त्रः)
मन्त्रेणानेन शिष्यस्य कृत्वा संस्कारमादितः । निर्विकारेण वस्त्रेण कुर्यादेनं सवाससम् ॥१५६॥
संग्रह-‘परमनिस्तारकलिङगभागी भव, परषिलिङगभागी भव, परमेन्द्रलिङगभागी भव, परमराज्यलिङ्गभागी भव, परमार्हन्त्यलिङगभागी भव, परमनिर्वाणलिङगभागी भव’ । इन मन्त्रोंसे प्रथम ही शिष्यका संस्कार कर उसे विकाररहित वस्त्रके द्वारा वस्त्रसहित करना चाहिये अर्थात् साधारण वस्त्र पहिनाना चाहिये ।। १५६॥
Saṅgraha (Collected Invocation):
“Parama-nistāraka-liṅga-bhāgī bhava, Pararṣi-liṅga-bhāgī bhava, Paramendra-liṅga-bhāgī bhava, Paramarājya-liṅga-bhāgī bhava, Paramārhantya-liṅga-bhāgī bhava, Parama-nirvāṇa-liṅga-bhāgī bhava” —May you bear the symbols of the Supreme Liberator, the Supreme Seer, the Celestial Lord, the Sovereign Ruler, the Arhant Divine, and of Final Liberation itself.With the chanting of these mantras, the disciple should first be sanctified — consecrated through the mantras — and then clothed in pure, untainted garments, free from all defilement; in other words, he should be adorned with simple, unadorned attire befitting the sacred rite.156
श्लोक ( Shlok ) 157
कौपीनाच्छादनं चैनमन्तर्वासेन कारयेत् । मौंजीबन्धमतः कुर्याद नुबद्धत्रिमेलकम् ॥१५७।।
इसे वस्त्रके भीतर लँगोटी देनी चाहिये और उसपर तीन लड़की बनी हुई मूंजकी रस्सी बाँधनी चाहिये ।।१५७।।
Beneath the robe, he should be girded with a langoṭi (loincloth), and over it, a triple-twined sacred cord made of mūñja grass, fashioned into three strands, should be firmly bound — symbolizing restraint, purity, and the threefold discipline of body, speech, and mind. 157
श्लोक ( Shlok ) 158
सूत्रं गणधरैर्दृव्धं व्रतचिह्न नियोजवेत् । मन्त्रपूतमतो यज्ञोपवीती स्यादसौ द्विजः ।।१५८॥
तदनन्तर गणधरदेवके द्वारा कहा हुआ, व्रतोंका चिह्नस्वरूप और मन्त्रोंसे पवित्र किया हुआ सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत धारण कराना चाहिये । यज्ञोपवीत धारण करनेपर वह बालक द्विज कहलाने लगता है ॥ १५८॥
Thereafter, the sacred thread (yajñopavīta) — as ordained by the venerable Gaṇadhara-lords, sanctified by mantra, and emblematic of the vows — should be ceremonially bestowed. Upon receiving this thread, the child is thenceforth known as a dvija, a twice-born.158
श्लोक ( Shlok ) 159
जात्येव ब्राह्मणः पूव मिदानीं व्रतसंस्कृतः । द्विर्जातो द्विज इत्येवं रूढिमास्तिघ्नुते गुणैः ॥१५९ll
पहले तो वह केवल जन्मसे ही ब्राह्मण था और अब व्रतोंसे संस्कृत होकर दूसरी बार उत्पन्न हुआ है इसलिये दो बार उत्पन्न होनेरूप गुणोंसे वह द्विज ऐसी रूढ़िको प्राप्त होता है ।।१५९।।
At first, he was a brāhmaṇa only by birth; but now, having been sanctified through sacred vows, he is born anew. Thus endowed with the noble quality of a twofold birth, he rightfully acquires the revered appellation of dvija — the twice-born.159
श्लोक ( Shlok ) 160
देयान्यणुव्रतान्यस्मै गुरुसाक्षि यथाविधिः । गुणशीलानुगैश्चैनं संस्कुर्याद् व्रतजातकैः ॥१६०॥
उस समय उस पुत्रके लिये विधिके अनुसार गुरुकी साक्षीपूर्वक अणुव्रत देना चाहिये और गुणव्रत तथा शिक्षाव्रत रूपशीलसे सहित व्रतोंके समूहसे उसका संस्कार करना चाहिये । भावार्थ-उसे पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत इस प्रकार व्रत और शील देकर उसके संस्कार अच्छे बनाना चाहिये ।। १६०।।
At that time, the son should be endowed with aṇuvratas in the presence of the preceptor, as prescribed by sacred ordinance. Along with these, he must be sanctified by the noble vows known as guṇavratas and śikṣāvratas, thereby refining his character through a complete code of conduct.
(That is: five aṇuvratas, three guṇavratas, and four śikṣāvratas — these vows and disciplines together should shape and sanctify his life.)160
श्लोक ( Shlok ) 161
ततोऽतिबालविद्यादीन्नियोगादस्य निर्दिशेत् । दत्वोपासकाध्ययनं नामापि चरणोचितम् ॥१६१॥
तदनन्तर गुरु उसे उपासकाध्ययन पढ़ाकर और चारित्रके योग्य उसका नाम रखकर अतिबाल विद्या आदिका नियोगरूपसे उपदेश दे ।।१६१।।
Thereafter, the preceptor should instruct him in the Upāsakādhyayana (the sacred text for lay practitioners), and bestow upon him a name befitting the path of righteousness. He should also initiate him into disciplines such as Atibāla Vidyā and others, as ordained, thus appointing him to the noble pursuit of knowledge and conduct.161
श्लोक 162 से 171
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151
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