आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 भरत का प्रश्न और स्वप्नों का वर्णन
भरत ने वृषभदेव से पूछा कि उनकी ब्राह्मण सृष्टि में गुण-दोष क्या हैं और क्या यह योग्य है। साथ ही, उन्होंने रात में देखे सोलह स्वप्नों का वर्णन किया, जो अनिष्टसूचक प्रतीत हुए। स्वप्न थे: (1) सिंह, (2) सिंह का बच्चा, (3) हाथी का भार उठाने वाला घोड़ा, (4) सूखे पत्ते खाने वाले बकरे, (5) हाथी पर वानर, (6) कौवों से त्रस्त उलूक, (7) आनंदित भूत, (8) मध्य में सूखा तालाब, (9) धूल से मलिन रत्न, (10) नैवेद्य खाता कुत्ता, (11) तरुण बैल, (12) मंडल युक्त चंद्रमा, (13) मिलते हुए दो बैल, (14) मेघों से आच्छादित सूर्य, (15) छायारहित सूखा वृक्ष, (16) जीर्ण पत्तों का समूह। उन्होंने इनके फल का निश्चय करने को कहा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
विश्वस्य धर्मसर्गस्य त्वयि साक्षात्प्रणेतरि । स्थिते मयातिवालिश्यादि दमाचरितं विभो ॥३२॥
हे प्रभो, समस्त धर्मरूपी सृष्टिको साक्षात् उत्पन्न करनेवाले आपके विद्यमान रहते हुए भी मैंने अपनी बड़ी मूर्खतासे यह काम किया है ।। ३२ ।।
“O Lord, though You Yourself are the manifest source of the entire creation of Dharma, yet, in my great folly, I have presumptuously undertaken this task on my own.”32
श्लोक ( Shlok ) 33
दोषः कोऽत्र गुणः कोऽत्र किमेतत् साम्प्रतं न वा । दोलायमानमिति मे मनः स्थापय निश्चितौ ।॥३३॥
हे देव, इन ब्राह्मणों की रचनामें दोष क्या है? गुण क्या है ? और इनकी यह रचना योग्य हुई अथवा नहीं ? इस प्रकार भूलाके समान भूलते हुए मेरे चित्तको किसी निश्चयमें स्थिर कीजिये अर्थात् गुण, दोष, योग्य अथवा अयोग्यका निश्चयकर मेरा मन स्थिर कीजिये ॥३३॥
“O Divine One, what flaws lie in the creation of these Brāhmaṇas? What virtues? Was this act befitting or not? In my confusion, I have erred like one who errs blindly—therefore, I beseech You: bring clarity to my wavering mind by discerning rightly the merit, fault, worthiness, or unworthiness of this deed, and grant it repose in certainty.”33
श्लोक ( Shlok ) 34
अपि चाद्य मया स्वप्ना निशान्ते षोडशेक्षिताः । प्रायोऽनिष्टफलाश्चैते मया देवाभिलक्षिताः ॥३४॥
इसके सिवाय हे देव, आज मैंने रात्रिके अन्तिमभागमें सोलह स्वप्न देखे हैं और मुझे ऐसा जान पड़ता है कि ये स्वप्न प्रायः अनिष्ट फल देनेवाले हैं ।॥ ३४॥
“Moreover, O Lord, in the final watch of the night, I beheld sixteen dreams—and it seems to me that these visions are largely ominous in nature, portending misfortune.”34
श्लोक ( Shlok ) 35
यथादृष्टमुपन्यस्ये तानिमान् परमेश्वरः । यथास्वं तत्फलान्यस्मत्प्रतीतिविषयं” नय ॥३५॥
हे परमेश्वर, वे स्वप्न मैंने जिस प्रकार देखे हैं उसी प्रकार उपस्थित करता हूं। उनका जैसा कुछ फल हो उसे मेरी प्रतीतिका विषय करा दीजिए ॥३५॥
“O Supreme Lord, I shall now recount those dreams just as I beheld them. May You graciously reveal to me the true import of their fruits, and make them the object of my understanding.”35
श्लोक ( Shlok ) 36 – 41
सिंहो मुगेन्द्रपोतश्च तुरगः करिभारभृत् । छागा वृक्षलतागुल्मशुष्कपत्रोपभोगिनः ॥३६॥शाखामृगा द्विपस्कन्धमरूढ़ाः कौशिकाः खगैः। विहितोपद्रवा ध्वाङ्क्षैः प्रमथाश्च प्रमोदिनः ॥३७॥शुष्कमध्यं तडागं च पर्यन्तप्रचुरोदकम्। पांशुधूसरितो रत्नराशिः श्वार्थ भुगर्हितः ॥३८॥ तारुण्यशाली वृषभः शीतांशुः परिवेषयुक् । मिथोऽङ्गीकृतसाङ्गत्त्यौ पुङ्गवौ सङ्गलच्छियौ ॥३९॥रविराशावधूरत्नवतंसोऽब्दै स्तिरोहितः । संशुष्कस्तरुरच्छायो जीर्णपर्णसमुच्चयः ॥४०॥ षोडशैतेऽद्य यामिन्यां दृष्टाः स्वप्ना विदां वर । फलविप्रतिपत्तिं मे तद् गतां त्वमपाकुरु ॥४१॥
(१) सिंह, (२) सिंहका बच्चा, (३) हाथीके भारको धारण करनेवाला घोड़ा, (४) वृक्ष, लता और झाड़ियोंके सूखे पत्ते खानेवाले बकरे, (५) हाथी के स्कन्धपर बैठे हुए वानर, (६) कौआ आदि पक्षियोंके द्वारा उपद्रव किये हुए उलूक, (७) आनन्द करते हुए – भूत, (८) जिसका मध्यभाग सूखा हुआ है और किनारोंपर खूब पानी भरा हुआ है ऐसा तालाब, (९) धूलिसे धूसरित रत्नोंकी राशि, (१०) जिसकी पूजा की जा रही है ऐसा नैवेद्यको खाने-वाला कुत्ता, (११) जवान बैल, (१२) मण्डलसे युक्त चन्द्रमा, (१३) जो परस्परमें मिल रहे हैं और जिनकी शोभा नष्ट हो रही है ऐसे दो बैल, (१४) जो दिशारूपी स्त्रीरत्नों के से बने हुए आभूषणके समान है तथा जो मेघोंसे आच्छादित हो रहा है ऐसा सूर्य, (१५) छाया-रहित सूखा वृक्ष और (१६) पुराने पत्तोंका समूह। हे ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, आज मैने रात्रिके समय ये सोलह स्वप्न देखे हैं। हे नाथ, इनके फलके विषयमें जो मुझे संदेह है, उसे दूर कर दीजिये ॥३६-४१।।
“O Lord—foremost among the Wise—this night I beheld sixteen dreams, which I now place before You just as they appeared:
- A lion,
- A lion’s cub,
- A horse bearing the burden of an elephant,
- Goats feeding upon the dry leaves of trees, vines, and shrubs,
- Monkeys seated upon the shoulders of an elephant,
- An owl harassed by crows and other birds,
- Ghosts rejoicing and celebrating,
- A pond, parched and dry at its center, yet full of water at the edges,
- A heap of jewels covered in dust,
- A dog eating sacred offerings while being worshipped,
- A young bull,
- The moon marked with a halo,
- Two bulls clashing and losing their beauty,
- The sun, veiled by clouds, appearing like an ornament fashioned from the jeweled women of the directions,
- A dry tree bereft of shadow,
- A mass of withered, fallen leaves.
O Protector, I am troubled by doubt as to the meaning of these portents. I beseech You—dispel this uncertainty, and reveal the fruit they signify.”36 – 41
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
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