आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 तप से प्राप्तियां
मुनि अपने सौंदर्य, प्रभा, तेज, और परिग्रह (अस्त्र, वस्त्र, आसन, छत्र आदि) का त्याग कर अरहंत की आराधना करता है, जिससे वह देदीप्यमान प्रभा, धर्मचक्र, अभिषेक, और सिंहासन प्राप्त करता है। तकिया, छत्र, और चामर का त्याग करने से वह स्वर्गीय विभूतियां, तीन छत्र, और चौंसठ चामर प्राप्त करता है। तप से वह परम स्वामी और तीर्थकर बनता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
म्लापयन् स्वाङ्गसौन्दर्य मुनिरुग्रं तपश्चरेत् । वाञ्छन्दिव्यादिसौन्दर्यमनिवार्यपरस्परम् ॥१७२॥
जिनकी परम्परा अनिवार्य है ऐसे दिव्य आदि सौन्दर्यो-की इच्छा करता हुआ वह मुनि अपने शरीरके सौन्दर्यको मलिन करता हुआ कठिन तपश्चरण करे ।।१७२।।
Desiring those divine and primordial forms of beauty whose tradition is deemed imperative,let that sage perform austere penance, defiling the beauty of his own body in the process.172
श्लोक ( Shlok ) 173
मजोमसाङ्गो व्युत्सृष्टस्वकायप्रभवप्रभः । प्रभोः प्रभां मुनिर्ध्यायन् भवेत् क्षिप्रं प्रभास्वरः ॥१७३॥
जिसका शरीर मलिन हो गया है, जिसने अपने शरीरसे उत्पन्न होनेवाली प्रभा का त्याग कर दिया है और जो अर्हन्तदेवकी प्रभाका ध्यान करता है ऐसा साधु शीघ्र ही देदीप्य-मान हो जाता है अर्थात् दिव्यप्रभा आदि प्रभाओंको प्राप्त करता है ।।१७३।।
He whose body has become soiled, who has renounced the radiance born of his own form,and who meditates upon the effulgence of the Divine Arhat—such a sage soon becomes resplendent, attaining divine brilliance and other sublime glories. 173
श्लोक ( Shlok ) 174
स्त्रं मणिस्नेह दीपादितेजोऽपास्य जिनं भजन् । तेजोमयमयं योगी स्यात्तेजोवलयोज्ज्वलः ॥१७४।॥
जो मुनि अपने मणि और तेलके दीपक आदिका तेज छोड़कर तेजोमय जिनेन्द्र भगवान्की आराधना करता है वह प्रभामण्डलसे उज्ज्वल हो उठता है ।। १७४।।
The sage who abandons the lustre of gems, oil-lamps, and the like,and devoutly worships the radiant Lord Jina—he is illumined with a halo of splendor, shining with celestial brilliance.174
श्लोक ( Shlok ) 175
त्यक्त्वाऽस्त्रवस्त्र शस्त्राणि प्राक्तनानि प्रशान्तिभाक् । जिनमाराध्य योगीन्द्रो धर्मचक्राधिपो भवेत् ।।
जो पहलेके अस्त्र, वस्त्र और शस्त्र आदि को छोड़कर अत्यन्त शान्त होता हुआ जिनेन्द्रभगवान्की आराधना करता है वह योगिराज धर्मचक्रका अधिपति होता है ॥ १७५॥
He who casts aside former weapons, garments, and instruments of war,and, abiding in supreme tranquility, worships the Lord Jina—such a sovereign among yogis becomes the master of the Wheel of Dharma.175
श्लोक ( Shlok ) 176
त्यक्तस्नानादिसंस्कारः संश्रित्य स्नातकं जिनम् । मूर्ध्नि मेरोरवाप्नोति परं जन्माभिषेचनम् ॥ १७६।।
जो मुनि स्नान आदिका संस्कार छोड़कर केवली जिनेन्द्रका आश्रय लेता है अर्थात् उनका चिन्तवन करता है वह मेरुपर्वतके मस्तकपर उत्कृष्ट जन्माभिषेकको प्राप्त होता है ॥ १७६।।
The sage who renounces rites such as bathing and takes refuge in the Omniscient Lord Jina—that is, who contemplates upon Him with unwavering devotion—attains a supreme birth-consecration upon the lofty summit of Mount Meru.176
श्लोक ( Shlok ) 177
स्वं स्वाम्यमेहिकं त्यक्त्वा परमस्वामिनं जिनम् ।सेवित्वा सेवनीयत्वमेष्यत्येष जगज्जनैः ॥१७७॥
जो मुनि अपने इस लोक-सम्बन्धी स्वामीपनेको छोड़कर परमस्वामी श्रीजिनेन्द्रदेवकी सेवा करता है वह जगत्के जीवोंके द्वारा सेवनीय होता है अर्थात् जगत्के सब जीव उसकी सेवा करते हैं ।॥ १७७।।
The sage who renounces his worldly lordship and devotes himself to the service of the Supreme Lord Jina—he becomes worthy of reverence by all beings in the world;indeed, the entire creation bows in service before him.177
श्लोक ( Shlok ) 178
स्वोचितासनभेदानां त्यागात्त्यक्ताम्बरो मुनिः । सैंह विष्टरमध्यास्य तीर्थप्रख्यापको भवेत् ॥१७८॥
जो मुनि अपने योग्य अनेक आसनों के भेदोंका त्यागकर दिगम्बर हो जाता है वह सिंहासनपर आरूढ़ होकर तीर्थको प्रसिद्ध करने-वाला अर्थात् तीर्थ कर होता है ।। १७८ ।।
The sage who renounces the many distinguished seats rightfully his, and becomes a Digambara—he ascends the lion-throne and establishes the sacred ford of Dharma;verily, he becomes a Tīrthaṅkara.178
श्लोक ( Shlok ) 179 –180
“स्त्रोपवानाद्यनादृत्य योऽभून्निरुप “धिर्भुवि । शयानः स्थण्डिले बाहुमात्रार्पितशिरस्तटः ॥१७९॥स महाभ्युदयं प्राप्य जिनो भूत्वाऽऽप्तसत्क्रियः । देवैर्विरचितं दीप्रमास्कन्दत्युपधानकम् ॥१८०॥
जो मुनि अपने तकिया आदिका अनादर कर परिग्रह- रहित हो जाता है और केवल अपनी भुजापर शिरका किनारा रखकर पृथिवीके ऊंचे-नीचे प्रदेशपर शयन करता है वह महाअभ्युदय (स्वर्गादिकी विभूति) को पाकर जिन हो जाता है, उस समय सब लोग उसका आदर-सत्कार करते हैं और वह देवोंके द्वारा बने हुए देदीप्यमान तकियाको प्राप्त होता है ।। १७९-१८०।।
The sage who, showing no regard for pillows and the like, becomes entirely free of possessions,who rests his head upon the edge of his own arm and sleeps upon the uneven ground—such a one attains supreme glory, the exalted splendor of the heavens, and becomes a Jina.At that moment, all beings honor and revere him,and he is bestowed with a resplendent, celestial pillow fashioned by the gods themselves.179 –180
श्लोक ( Shlok ) 181
त्यक्तशीतातपत्राण सकलात्मपरिच्छदः । त्रिभिश्छत्रैः समुद्भासिरत्नैरुद्भासते स्वयम् ॥१८१॥
जो मुनि शीतल छत्र आदि अपने समस्त परिग्रह-का त्याग कर देता है वह स्वयं देदीप्यमान रत्नोंसे युक्त तीन छत्रोंसे सुशोभित होता है ॥१८१॥
The sage who renounces all possessions, including the cool shade of a parasol,is, in turn, adorned with three radiant parasols studded with resplendent jewels,shining in his own divine glory.181
श्लोक 182 से 191
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
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