विहार, योगत्याग, और अग्रनिवृति क्रिया ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 51 से 53)
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303
श्लोक 304 से 313 विहार, योगत्याग, और अग्रनिवृति क्रिया ( तिरेपन क्रियाएं 51 से 53)
विहार क्रिया में भगवान धर्मचक्र के साथ तीर्थ विहार करते हैं। योगत्याग क्रिया में विहार समाप्त कर वे समवसरण विघटित करते हैं और योगनिरोध करते हैं। केबलि-समुद्घात इस क्रिया में शामिल है। अग्रनिवृति क्रिया में समस्त योगों का निरोध कर भगवान अघातिया कर्म नष्ट करते हैं और मोक्षस्थान पर पहुंचते हैं। ये तिरेपन क्रियाएं भव्य पुरुषों को पालनी चाहिए। भरत महाराज ने द्विजों को इन गर्भान्वय और दीक्षान्वय क्रियाओं में स्थापित किया। इनका पालन करने वाला भव्य पुरुष मोक्ष प्राप्त करता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 304 to 313
श्लोक ( Shlok ) 304
विहारस्तु प्रतीतार्थों धर्मचक्रपुरस्सरः । प्रपञ्चितश्च प्रागेव ततो न पुनरुच्यते ॥३०४।॥ इति विहारक्रिया ।
धर्मचक्रको आगे कर जो भगवान्का विहार होता है वह विहार नामकी क्रिया है। यह क्रिया अत्यन्त प्रसिद्ध है और पहले ही इसका विस्तारके साथ निरूपण किया जा चुका है इसलिये फिरसे यहां नहीं कहते हैं ॥ ३०४।। यह इक्यावनवीं विहारक्रिया है।
The Lord’s sacred wanderings, with the Wheel of Dharma set forth before Him, constitute the rite known as Vihāra.
This revered rite is renowned throughout, and its detailed description has already been given earlier; therefore, it is not elaborated again here.304
This Vihāra-kriyā is the fifty-first act in the divine sequence.
श्लोक ( Shlok ) 305
ततः परार्थसम्पत्त्यै ‘धर्ममार्गोपदेशने। कृततीर्थविहारस्य योगत्यागः परा क्रिया ॥३०५॥
तदनन्तर धर्ममार्ग के उपदेशके द्वारा परोपकार करनेके लिये जिन्होंने तीर्थ विहार किया है ऐसे भगवान्के योगत्याग नामकी उत्कृष्ट क्रिया होती है ॥ ३०५।।
जिसमें विहार करना समाप्त हो जावे, सभाभूमि (समवसरण) विघट जावे, और योगनिरोध करनेके लिये अपनी वृत्ति करनी पड़े उसे योगत्याग कहते हैं ।॥ ३०६।॥
That moment in which the Lord’s wanderings come to an end, the divine preaching hall (samavasaraṇa) dissolves, and the Supreme One turns inward to cease all activity—this is known as Yoga-tyāga, the renunciation of all spiritual exertion.305
श्लोक ( Shlok ) 306
विहारस्योपसंहारः संहृतिश्च सभावनेः । वृत्तिश्च योगरोधार्था योगत्यागः स उच्यते ॥३०६॥
जिसमें विहार करना समाप्त हो जावे, सभाभूमि (समवसरण) विघट जावे, और योगनिरोध करनेके लिये अपनी वृत्ति करनी पड़े उसे योगत्याग कहते हैं ।॥ ३०६।॥
That moment wherein the Lord’s sacred wanderings come to a close, the divine preaching hall (Samavasaraṇa) dissolves, and He turns His intent toward the cessation of all activities—this is called Yoga-tyāga, the renunciation of all yogic exertion.306
श्लोक ( Shlok ) 307
यच्च दण्डकपाटादिप्रतीतार्थं क्रियान्तरम् । तदन्तर्भूतमेवादस्ततो न पृथगुच्यते ॥३०७॥इति योगत्यागक्रिया ।
दण्ड, कपाट आदि रूपसे प्रसिद्ध जो केबलि-समुद्घात नामकी क्रिया है वह इसी योगत्याग क्रिया में अन्तर्भूत हो जाती है इसलिये अलगसे उसका वर्णन नहीं किया है ।।३०७।। यह बावनवीं योगत्याग नामकी क्रिया है।
The rite known as Kevalī-Samudghāta, famed for its signs such as the staff and the closing of doors, is included within this very act of Yoga-tyāga; hence, it is not described separately.307
This Yoga-tyāga is the fifty-second sacred rite.
श्लोक ( Shlok ) 308 – 309
ततो निरुद्धनिःशेषयोगस्यास्य जिनेशिनः । प्राप्तशैलेश्यवस्थस्य प्रक्षीणा घातिकर्मणः ॥३०८।। क्रियाग्रनिवृ तिर्नाम परनिर्वाणमापुषः । स्वभावजनितामूर्ध्वं व्रज्यामास्कन्दतो मता ॥३०९॥इति अग्रनिवृतिः ।
तदनन्तर जिनके समस्त योगोंका निरोध हो चुका है, जो जिनोंके स्वामी हैं, जिन्हें शीलके ईश्वरपनेकी अवस्था प्राप्त हुई है, जिनके अघातिया कर्म नष्ट हो चुके हैं जो स्वभावसे उत्पन्न हुई ऊर्ध्वगतिको प्राप्त हुए हैं और जो उत्कृष्ट मोक्षस्थानपर पहुंच गये हैं ऐसे भगवान्के अग्रनिवृति नामकी क्रिया मानी गई है ॥३०८-३०९।। यह तिरेपनवीं अग्रनिवृति नामकी क्रिया है।
Thereafter, the Blessed Lord—Who has brought all activities to complete cessation,Who is the Supreme among the Jinas,
Who has attained the divine state of mastery through perfect conduct,Whose non-destructive karmas have been fully annihilated,
Who, by their very nature, ascend toward the highest realm—
Reaches the supreme abode of liberation (Mokṣa-sthāna).This final transition is known as the rite of Agra-nivṛtti, the noble cessation of all worldly association.308 – 309
This Agra-nivṛtti is counted as the fifty-third sacred act.
श्लोक ( Shlok ) 310
इति निर्वाणपर्यन्ताः क्रिया गर्भादिकाः सदा । भव्यात्मभिरनुष्ठेयास्त्रि पञ्चाशत्समुच्चयात् ॥३१०।।
इस प्रकार गर्भसे लेकर निर्वाण पर्यन्त जो सब मिलाकर तिरेपन क्रियाएं हैं भव्य पुरुषोंको सदा उनका पालन करना चाहिये ॥३१०॥
Thus, from conception to liberation, there are in all fifty-three sacred rites. Exalted beings should ever revere and uphold them with steadfast devotion.310
श्लोक ( Shlok ) 311
यथोक्तविधिनैताः स्युरनुष्ठेया द्विजन्मभिः । योऽप्यत्रान्तर्गतो’ भेदस्तं वच्म्युत्तरपर्वणि ॥३११॥
द्विज लोगोंको ऊपर कही हुई विधिके अनुसार इन क्रियाओंका पालन करना चाहिये। इन क्रियाओंके जो भी अन्तर्गत भेद हैं उनका आगेके पर्वमें निरूपण करेंगे ॥ ३११।।
The twice-born should observe these sacred rites in accordance with the prescribed procedure spoken above.The twice-born should observe these sacred rites in accordance with the prescribed procedure spoken above.
As for the various distinctions and classifications within these rites, they shall be expounded in the forthcoming section.311
श्लोक ( Shlok ) 312
इत्युच्चैर्भरताधिपः स्वसमये संस्थापयन् तान् द्विजान् सम्प्रोवाच कृती सतां बहुमता गर्भान्वयोत्थाः क्रियाः ।गर्भाद्याः परिनिर्वृ तिप्रगमनप्रान्तास्त्रिपञ्चाशतं प्रारेभेऽथ पुनः प्रवक्तुमुचिता दीक्षान्वयाख्याः क्रियाः ॥३१२॥
इस प्रकार पुण्यवान् भरत महाराजने उन द्विजोंको अपने धर्ममें स्थापित करते हुए गर्भसे लेकर निर्वाणगमन पर्यन्तकी तिरेपन गर्भा-न्वय क्रियाएं कहीं और उनके बाद कहने योग्य जो दीक्षान्वय क्रियाएं थीं उनका कहना प्रारम्भकिया ॥३१२॥
Thus did the virtuous Emperor Bharata, establishing the twice-born in the path of righteousness, expound the fifty-three sacred rites—from conception to liberation—known as Garbha-anvaya-kriyās.
Thereafter, he began to declare the subsequent Dīkṣā-anvaya rites, which are to be spoken of henceforth.312
श्लोक ( Shlok ) 313
यस्त्वेताः द्विजसत्तमैरभिमता गर्भादिकाः सत्क्रियाः श्रुत्वा सम्यगधीत्यभावितमतिर्जैनेश्वरे दर्शने ।सामग्रीमुचितां स्वतश्च परतः सम्पादयन्नाचरेद् भव्यात्मा स समग्रधीस्त्रिजगति चूडामणित्वं भजेत् ॥३१३॥
उत्तम उत्तम द्विजोंको माननीय इन गर्भाधानादि समीचीन क्रियाओंको सुनकर तथा अच्छी तरह पढ़कर जो जिनेन्द्र भगवान्के दर्शनमें अपनी बुद्धि लगाता है और योग्य सामग्री प्राप्त कर दूसरोंसे आचरण कराता हुआ स्वयं भी इनका आचरण करता है वह भव्य पुरुष पूर्ण ज्ञानी होकर तीनों लोकोंक चूड़ामणिपनेको प्राप्त होता है अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर तीनों लोकोंके अग्रभागपर विराजमान होता है ।। ३१३।।
He who, having listened to and studied well these noble and venerable rites—beginning from Garbha-dhāna and extending through all that is proper and pure—Fixes his intellect upon the vision of the Blessed Jina,And, having obtained the requisite means, causes others to follow this path while practicing it himself—
That exalted soul, adorned with right faith and conduct, becomes a Sarvajña (omniscient one),And, attaining liberation, ascends to the summit of the three worlds, shining as their supreme crest-jewel.313
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसङ्ग्रहे द्विजोत्पत्तौ गर्भान्वयक्रियावर्णनं नाम अष्टत्रिंशत्तमं पर्व ।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके भाषा-नुवादमें द्विजोंकी उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओंका वर्णन करनेवाला अड़तीसवां पर्व समाप्त हुआ
Thus ends the thirty-eighth canto of the Bhāṣā-nuvāda (prose rendering) of the Triṣaṣṭi-Lakṣaṇa Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the venerable Ācārya Bhagavat Jinasena,
containing the account of the origin of the twice-born and the sacred Garbha-anvaya rites.
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन
पर्व 39 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303
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