आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62
श्लोक 63 से 71 अतींद्रिय गुणों की श्रेष्ठता
अतींद्रिय ज्ञान वाला पुरुष शास्त्राश्रित नहीं, बल्कि स्वयं सबको उपदेश देता है। अतींद्रिय दर्शन वाला अपूर्व पदार्थ देखने की इच्छा नहीं करता, क्योंकि वह सब कुछ देखता है। अनंतवीर्य वाला स्वयं कृतकृत्य हो सिद्धालय पहुंचता है। अतींद्रिय सुख वाला भोगों से उत्कंठित नहीं, अतींद्रिय सुंदरता वाला स्नानादि की इच्छा नहीं करता, और अतींद्रिय आत्मरूप शरीर वाला आहारादि की अपेक्षा नहीं करता। ऐसे गुणों वाला आप्त है, अन्य अनाप्त।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 63 to 71
श्लोक ( Shlok ) 63 – 64
यस्त्वतीन्द्रियविज्ञान दृग्वीर्यसुखसन्ततिः । शरीरावाससौन्दयैः स्वात्भभूतैरधिष्ठितः ॥६३॥तस्योक्तदोषसंस्पर्शो भवेन्नैव कदाचन । तद्वानाप्तस्ततो ज्ञेयः स्यादनाप्तस्त्वतद्गुणः ।॥६४।।
परन्तु जिसके अतीन्द्रिय ज्ञान, अतीन्द्रिय दर्शन, अतीन्द्रिय बल और अतीन्द्रिय सुखकी संतान है और जो अपने आत्मस्वरूप शरीर, आवास तथा सुन्दरता आदिसे सहित है उसके ऊपर कहे हुए दोषोंका स्पर्श कभी नहीं होता है, इसलिये जिसके अतीन्द्रिय ज्ञान, वीर्य और सुखकी संतान है उसे ही आप्त जानना चाहिये और जिसके उक्त गुण नहीं हैं उसे अनाप्त समझना चाहिये ।। ६३-६४।।
But he whose progeny is of supersensual knowledge, supersensual perception, supersensual strength, and supersensual bliss—who abides in the true form of the Self, possessed of its own body, dwelling, and beauty—such a one is never touched by the aforesaid defects.
Therefore, he alone should be regarded as Āpta—the trustworthy, the enlightened—who possesses these supersensual qualities; and he who is bereft of them must be known as Anāpta—untrustworthy, unenlightened. 63 – 64
श्लोक ( Shlok ) 65
स्फुटीकरणमस्यैव वाक्यार्थस्याधुनोच्यते । यतोऽनाविष्कृतं तत्त्वं तत्त्वतो” नावबुध्यते ॥६५॥
अब आगे इसी वाक्यार्थका स्पष्टी-करण करते हैं क्योंकि जबतक किसी पदार्थका स्पष्टीकरण नहीं हो जाता है तब तक उसका ठीक ठीक ज्ञान नहीं होता है ।। ६५।।
Now, let the purport of the foregoing be further clarified; for until a thing is thoroughly explained, true understanding of it cannot arise.65
श्लोक ( Shlok ) 66
तद्यथाऽतीन्द्रियज्ञानः शास्त्रार्थ न परं श्रयेत् । शास्ता स्वयं त्रिकालज्ञः केवलामललोचनः ॥६६॥
जिसके अतीन्द्रिय ज्ञान है ऐसा पुरुष किसी दूसरे शास्त्र के अर्थका आश्रय नहीं लेता, किन्तु केवलज्ञानरूपी निर्मल नेत्रोंको धारण करनेवाला और तीनों कालों के सब पदार्थोंको जाननेवाला वह स्वयं सबको उपदेश देता है ।। ६६।।
He who possesses supersensual knowledge does not rely upon the interpretations of any other scripture; rather, endowed with the pure vision of Kevalajñāna—omniscience—he perceives all substances of the three times, and himself becomes the teacher of all.66
श्लोक ( Shlok ) 67
तथाऽतीन्द्रियदृग्नार्थी स्यादपूर्वार्थ दर्शने । तेनादृष्टं न वै किञ्चिद्युगपद्विश्वदृश्वना ॥६७।।
इसी प्रकार जिसके अतीन्द्रिय दर्शन हैं ऐसा जीव कभी अपूर्व पदार्थके देखनेकी इच्छा नहीं करता क्योंकि जो एक साथ समस्त पदार्थोंको देखता है उसका न देखा हुआ कोई पदार्थ भी तो नहीं है ॥६७॥
Likewise, the soul endowed with supersensual perception never harbours the desire to behold anything unseen; for one who beholds all substances simultaneously, what remains that is yet unseen by him?67
श्लोक ( Shlok ) 68
क्षायिकानन्तवीर्यश्च नान्यसाचि “व्यमीक्षते । कृतकृत्यः स्वयं प्राप्तलोकाग्रशिखरालयः ॥६८॥
जिसके क्षायिक अनन्तवीर्य है वह पुरुष भी किसी अन्य जीवकी सहायता नहीं चाहता किन्तु वह स्वयं कृतकृत्य होकर लोकके अग्र शिखरपर सिद्धालयमें जा पहुँचता है ।। ६८ ।।
He whose destructive karmas have ceased, and who is endowed with infinite energy, seeks the aid of none; rather, having fulfilled all that is to be done, he ascends to the summit of the universe and attains the abode of the Siddhas.68
श्लोक ( Shlok ) 69
अतीन्द्रियसुखोऽप्यात्मा स्याद्भोगैरुत्सुको न वै। भोग्यवस्तुगता चिन्ता जायते नास्य जात्वतः ।॥६९॥
इसी प्रकार अतीन्द्रिय सुखको धारण करनेवाला पुरुष भी भोगोंसे उत्कंठित नहीं होता, क्योंकि उसे भोग करने योग्य वस्तुओंकी चिन्ता ही कभी नहीं होती है ।॥ ६९॥
In like manner, the one who partakes of supersensual bliss feels no yearning for sensual enjoyments, for no thought of objects to be enjoyed ever arises in him.69
श्लोक ( Shlok ) 70
प्राप्तातीन्द्रियसौन्दर्यो नेच्छेत्स्नानादिसत्क्रियाम् । स्नातको नित्यशुद्धात्मा बहिरन्तर्मलक्षयात् ॥७०॥
जिसे अतीन्द्रिय सौन्दर्य प्राप्त हुआ है वह भी कभी स्नान आदि क्रियाओंकी इच्छा नहीं करता, क्योंकि बहिरङ्ग और अन्तरङ्ग मलका क्षय हो जानेसे वह स्वयं स्नातक कहलाता है और उसका आत्मा निरन्तर शुद्ध रहता है ।।७०।।
He who has attained supersensual beauty harbours no desire for acts such as bathing and adornment, for with the destruction of both external and internal impurities, he is verily called snātaka—the one ever bathed—and his soul remains perpetually pure.70
श्लोक ( Shlok ) 71
अतीन्द्रियात्मदेहश्च नाहारादीनपेक्षते । क्षुद् व्याधिविषशस्त्रादिबाधातीततनुः स वै ॥७१॥
इसी प्रकार जिसके अतीन्द्रिय आत्मा ही शरीर है वह आहार आदिकी अपेक्षा नहीं करता क्योंकि उसका आत्मारूप शरीर क्षुधा, व्याधि, विष और शस्त्र आदिकी बाधासे रहित होता है ।। ७१।।
Likewise, he whose very soul—supersensual in nature—is his body, has no dependence on food or the like; for his soul-formed body is beyond the afflictions of hunger, disease, poison, and weaponry.71
श्लोक 72 से 81
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62
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