आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 रात्रिकाल और शास्त्रज्ञान
दिन के अंतिम भाग में मणिजड़ित भूमि पर टहलते हुए राजमहल की शोभा निहारते थे। क्रीड़ासचिवों के साथ विहार कर देवकुमारों जैसे शोभित होते थे। रात्रि में चक्रवर्ती के योग्य कार्य करते। कृतकृत्य होने पर भी मंत्रियों से सलाह लेते थे। शत्रुरहित पृथ्वी का पालन करते हुए केवल स्वराष्ट्र की चिंता थी। छह गुणों का अभ्यास अज्ञान नाश के लिए किया। राजविद्याओं—आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता, दण्डनीति—का व्याख्यान करते। निधि-रत्नों का निरीक्षण और धर्मशास्त्र के विवादों का निराकरण करते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
तासामालापसंल्लापपरिहास कयादिभिः । सुखासिकामसौ भेजे भोगाङ्गैश्च मुहूर्तकम् ॥१३२॥
उनके आभाषण, परस्परकी बातचीत और हास्यपूर्ण कथा आदि भोगोंके साधनोंसे वे वहाँ कुछ देरतक सुखसे बैठते थे ।। १३२।।
Through their delightful speeches, mutual conversations, and humorous tales—those instruments of enjoyment—they sat there for some time, immersed in comfort and joy. ॥132॥
श्लोक ( Shlok ) 133
ततस्तुर्यावशेषेऽह्नि पर्यटन्मणिकुट्टिमे । वीक्षते स्म परां शोभामभितो राजवेश्मनः ॥१३३॥
इसके बाद जब दिनका चौथाई भाग शेष रह जाता था तब मणियोंसे जड़ी हुई जमीनपर टहलते हुए वे चारों ओर राजमहलकी उत्तम शोभा देखते थे ।।१३३।।
Thereafter, when a quarter of the day remained, they would stroll upon gem-studded floors, beholding on all sides the splendid grandeur of the royal palace. ॥133॥
श्लोक ( Shlok ) 134
सनर्मसचिवं कञ्चित् समालम्ब्यांसपीठके । परिक्रामन्नितश्चेतो” रेजे सुरकुमारवत् ॥१३४।।
कभी वे क्रीड़ासचिव अर्थात् क्रीड़ामें सहायता देने वाले लोगोंके कंधोंपर हाथ रखकर इधर उधर घूमते हुए देवकुमारोंके समान सुशोभित होते थे ॥१३४।।
At times, placing their hands upon the shoulders of the play-secretaries—those who assisted in their sports—they wandered about here and there, appearing as resplendent as celestial princes. ॥134॥
श्लोक ( Shlok ) 135
रजन्यामपि यत्कृत्यमुचितं चक्रवर्तिनः । तदाचरन् सुखेनैष त्रियामा मत्यवाहयत् ।।१३५।।
रातमें भी चक्रवर्ती के योग्य जो कार्य थे उन्हें करते हुए वे सुखसे रात्रि व्यतीत करते थे ॥१३५॥
Even during the night, engaged in duties befitting a Chakravartin, they passed the hours in ease and contentment. ॥135॥
श्लोक ( Shlok ) 136
कदाचिदुचितां वेलां नियोग इति केवलम् । मन्त्रयामास मन्त्रज्ञैः कृतकार्योऽपि चक्रभृत् ।।१३६॥
यद्यपि वे चक्रवर्ती कृतकृत्य हो चुके थे अर्थात् विजय आदिका समस्त कार्य पूर्ण कर चुके थे तथापि केवल नियोग समझकर कभी कभी उचित समयपर मंत्रियोंके साथ सलाह करते थे ।।१३६।।
Though that Chakravartin had already accomplished all his aims—having fulfilled every task such as conquest and governance—yet, considering it merely a duty, he would occasionally hold counsel with his ministers at the appropriate time. ॥136॥
श्लोक ( Shlok ) 137
तन्त्रावायगता चिन्ता नास्यासीद् विजितक्षितेः । तन्त्र चिन्तैव नन्वस्य स्वतन्त्रस्येह भारते ।१३७।।
जिन्होंने समस्त पृथिवी जीत ली है और जो इस भरतक्षेत्रमें स्वतन्त्र हैं ऐसे उन भरतको अपने तथा परराष्ट्रकी कुछ भी चिन्ता नहीं थी, यदि चिन्ता थी तो केवल तन्त्र अर्थात् स्वराष्ट्र की ही चिन्ता थी ।।१३७।।
He who had conquered the entire earth and reigned sovereign in this very land of Bharata—such a one had no concern for himself nor for foreign realms; the only care he bore was for the well-being and governance of his own kingdom. ॥137॥
श्लोक ( Shlok ) 138
तेन षाड्गुण्यमभ्यस्तमपरिज्ञानहानये । शासतोऽस्याविपक्षां क्ष्मां कृतं सन्ध्यादिचर्चया ॥१३८॥
उन्होंने अपना अज्ञान नष्ट करनेके लिये ही छह गुणोंका अभ्यास किया था क्योंकि जब वे शत्रुरहित पृथिवीका पालन करते थे तब उन्हें सन्धि विग्रह आदिकी चर्चासे क्या प्रयोजन था ।।१३८ ।।
He had practiced the six strategic virtues solely to dispel his own ignorance; for when he ruled over a world free of enemies, what need had he then for discussions of alliance, conflict, and the like? ॥138॥
श्लोक ( Shlok ) 139
“राजविद्याश्चतस्रोऽभूः कदाचिच्च कृतक्षणः । व्याचख्यौ राजपुत्रेभ्यः ख्यातये स विचक्षणः ॥१३९॥
अतिशय विद्वान् महाराज भरत केवल प्रसिद्धिके लिये ही कभी कभी बड़े उत्साह के साथ राजपुत्रों के लिये आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति इन चार राजविद्याओंका व्याख्यान करते थे ।॥ १३९॥
The exceedingly learned King Bharata, moved solely by a desire for renown, would at times, with great enthusiasm, expound the four royal sciences—Ānvīkṣikī (philosophy), Trayī (the Vedas), Vārtā (commerce and agriculture), and Daṇḍanīti (politics and punishment)—for the benefit of the princes. ॥139॥
श्लोक ( Shlok ) 140
कदाचिन्निधिरत्नानामकरोत्स निरीक्षणम् । भाण्डागारपदे तानि तस्य तन्त्र पदेऽपि च ॥१४०॥
वे कभी कभी निधियों और रत्नोंका भी निरीक्षण करते थे। क्योंकि निधियों और रत्नोंमें से कुछ तो उनके भाण्डारमें थे और कुछ उनकी सेनामें थे ॥१४०।।
At times, he would also inspect the treasures and jewels, for some of these were held within his royal treasury, while others were in the possession of his army. ॥140॥
श्लोक ( Shlok ) 141
कदाचिद्धर्मशास्त्रेषु याः स्वर्विप्रतिपत्तयः। निराचकार ताः कृत्स्ना ख्यापयन् विश्वविन्मतम् । १४१।
कभी कभी वे सर्वज्ञदेवका मत प्रकट करते हुए धर्मशास्त्रमें जो कुछ विवाद थे उन सबका निराकरण करते थे ॥ १४१।।
At times, proclaiming the views of the omniscient deity, he would resolve all disputes that arose within the realms of Dharmaśāstra. ॥141॥
श्लोक 142 से 151
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
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