आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 201 योगनिर्वाण साधन और इन्द्रोपपाद-इन्द्राभिषेक-विधिदान-सुखोदय क्रिया
योगनिर्वाण साधन क्रिया में साधु समाधि द्वारा मन, वचन, काय को स्थिर कर पंचपरमेष्ठियों के चरणों में चित्त लगाता है। यह क्रिया उसे निर्वाण की ओर ले जाती है। इन्द्रोपपाद क्रिया में पुण्य के बल से साधु इंद्र के रूप में जन्म लेता है। इन्द्राभिषेक क्रिया में देवता उसका अभिषेक करते हैं, और वह देदीप्यमान मुकुट व आभूषणों से सुशोभित होकर जयजयकार प्राप्त करता है। विधिदान क्रिया में वह देवों को उनके पदों पर नियुक्त करता है, और सुखोदय क्रिया में वह स्वर्ग के सुखों का अनुभव करता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
ततोऽसौ दिव्यशय्यायां क्षणादापूर्णयौवनः । परमानन्दसाद्भूतो दीप्तो दिव्येन तेजसा ॥१९२॥
तदनन्तर वह इन्द्र उसी उपपाद शय्यापर क्षणभरमें पूर्णयौवन हो जाता है और दिव्य तेजसे देदीप्यमान होता हुआ परमानन्दमें निमग्न हो जाता है ।।१९२।।
Thereafter, that Indra, upon the very couch of his celestial birth, attains full youth in but a moment, and—radiant with divine splendour—he becomes immersed in supreme bliss.192
श्लोक ( Shlok ) 193 –194
अणिमादिभिरष्टाभिर्युतोऽसाधारणैर्गुणैः । सहजाम्बर दिव्यस्रङ्मणिभूषणभूषितः ॥१९३॥दिव्यानुभावसं भूतप्रभावं परमुद्वहन् । बोबुध्यते तदाऽत्मीयमेन्द्रं दिव्यावधित्विषा ॥१९४llइति इन्द्रोपपादक्रिया ।
वह अणिमा महिमा आदि आठ असाधारण गुणोंसे सहित होता है और साथ साथ उत्पन्न हुए वस्त्र, दिव्यमाला, तथा मणिमय आभूषणोंसे सुशोभित होता है। दिव्य माहात्म्यसे उत्पन्न हुए उत्कृष्ट प्रभावको धारण करता हुआ वह इन्द्र दिव्य अवधिज्ञानंरूपी ज्योतिके द्वारा जान लेता है कि मैं इन्द्रपदमें उत्पन्न हुआ हूं ।॥१९३-१९४।।यह इन्द्रोपपाद नामकी तैंतीसवीं क्रिया है।
Endowed with the eight extraordinary powers—such as aṇimā and mahimā—he is adorned with garments, celestial garlands, and jeweled ornaments that arise spontaneously alongside his birth.
Embracing the magnificent aura born of divine glory, that Indra perceives, through the radiant light of his divine avadhi-jñāna (clairvoyant knowledge), that he has indeed been born into the exalted station of Indra.This is the thirty-third rite, known as Indropapāda Kriyā.193 –194
श्लोक ( Shlok ) 195
पर्याप्तमात्र एवायं प्राप्तजन्मावबोधनः । पुनरिन्द्राभिषेकेण योज्यतेऽमरसत्तमैः ॥१९५।।
पर्याप्तक होते ही जिसे अपने जन्मका ज्ञान हो गया है ऐसे इन्द्रका फिर उत्तमदेव लोग इन्द्राभिषेक करते हैं ।॥ १९५॥
As soon as he attains the state of spiritual sufficiency (paryāptaka) and becomes aware of his divine birth, that Indra is then ceremonially anointed by the exalted celestial beings in the sacred rite of Indrābhiṣeka.
श्लोक ( Shlok ) 196 – 198
दिव्यसङगीतवादित्रमङ्गलोद्गीतिनिःस्वनैः । विचित्रैश्चाप्सरोनृत्तैर्निवृत्तेन्द्राभिषेचनः ॥१९६॥ति (कि) रीटमुद्वहन् दीप्रं स्वसाम्राज्यकलाञ्छनम् । सुरकोटिभिरारूढ प्रमदैर्जयकारितः ॥१९७॥स्रग्वी सदंशुको दीप्रो भूषितो दिव्यभूषणैः । ऐन्द्रविष्टरमारूढो महानेष महीपते ॥१९८॥ इति इन्द्राभिषेकः ।
दिव्य संगीत, दिव्य बाजे, दिव्य मंगल-गीतोंके शब्द और अप्सराओंके विचित्र नृत्योंसे जिसका इन्द्राभिषेक सम्पन्न हुआ है, जो अपने साम्राज्यके मुख्य चिह्नस्वरूप देदीप्यमान मुकुटको धारण कर रहा है, हर्षको प्राप्त हुए करोड़ों देव जिसका जयजयकार कर रहे हैं जो उत्तम मालाएं और वस्त्र धारण किये हुए है तथा देदी-प्यमान वस्त्राभूषणोंसे सुशोभित है ऐसा वह इन्द्र इन्द्रके पदपर आरूढ़ होकर अत्यन्त पूजाको प्राप्त होता है ।।१९६-१९८॥ यह चौंतीसवीं इन्द्राभिषेक क्रिया है।
Amidst celestial music, divine instruments, auspicious hymns, and the wondrous dances of heavenly nymphs, his Indrābhiṣeka—the coronation of Indra—is performed.Adorned with a radiant crown, the emblem of his sovereign dominion, and robed in resplendent garments and divine garlands,he is glorified by millions of delighted gods who hail his victory with joyous acclaim.Thus ascending to the exalted throne of Indra, he becomes the object of supreme veneration.
This is the thirty-fourth rite, known as the Indrābhiṣeka Kriyā.196 – 198
श्लोक ( Shlok ) 199
ततोऽयमानतानेतान् सत्कृत्य सुरसत्तमान् । पदेषु स्थापयन् स्वेषु विधिदाने प्रवर्त्तते ॥१९९॥
तदनन्तर नम्रीभूत हुए इन उत्तम उत्तम देवोंको अपने अपने पदपर नियुक्त करता हुआ वह इन्द्र विधिदान क्रियामें प्रवृत्त होता है ।। १९९।।
Thereafter, that Indra, engaging in the rite of Vidhidāna Kriyā, humbly appoints these noble and reverent celestial beings to their respective stations and duties within the divine order.199
श्लोक ( Shlok ) 200
“स्वविमाद्धिदानेन प्रोणितैर्विबुधैर्वृतः । सोऽनुभुङक्ते चिरं कालं सुकृती सुखमामरम् ॥२००॥
अपने अपने विमानोंकी ऋद्धि देनेसे संतुष्ट हुए देवोंसे घिरा हुआ वह पुण्यात्मा इन्द्र चिरकालतक देवोंके सुखोंका अनुभव करता है ।।२००।।
Surrounded by contented celestial beings, each gratified with the splendor of their own divine aerial chariots, that meritorious Indra dwells long amidst the heavens, enjoying the pleasures of the gods.200
श्लोक ( Shlok ) 201
तदेतद्विधिदानेन्द्र सुखोदयविकल्पितम् । क्रियाद्वयं समाम्नातं स्वर्लोकप्रभवोचितम् ॥२०१॥इति विधिदानसुखोदयौ ।
इस प्रकार स्वर्गलोक में उत्पन्न होनेके योग्य ये विधिदान और इन्द्र सुखोदय नामकी दो क्रियाएं मानी गई हैं ।॥२०१।। ये पैंतीसवीं और छत्तीसवीं विधिदान तथा सुखोदय क्रियाएं हैं।
Thus, these two rites—Vidhidāna (the ordaining of celestial order) and Indra Sukhodaya (the arising of Indra’s divine pleasures)—are recognized as essential for birth in the heavenly realms.
These are the thirty-fifth and thirty-sixth kriyās, known respectively as Vidhidāna Kriyā and Sukhodaya Kriyā.201
श्लोक 202 से 211
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
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