Hindi Translation of Adi purana Parv 35
श्लोक 1 से 11 बाहुबली के प्रति भरत का चिंतन
अथानन्तर भुजाओंके गर्वसे शोभायमान युवा बाहुबलीको वश करनेके लिये चक्रवर्ती-का मन कुछ चिन्तासे आकुल हुआ ।।१।। वह विचारने लगा कि यह हमारे भाइयोंका समूह एक ही कुलमें उत्पन्न होनेसे अपने आपको अवध्य मानता हुआ हमारे आनन्दका अभिनन्दन नहीं करता है अर्थात् हमारे आनन्द-वैभवसे ईर्ष्या रखता है ॥२॥ हमारे भाइयोंके समूहका यह विश्वास है कि हम सौ भाई अवध्य हैं इसीलिये ये प्रणाम करनेसे विमुख होकर मेरे शत्रु हो रहे हैं ।।३।। किसी शत्रुके प्रणाम न करनेपर मुझे वैसा खेद नहीं होता जैसा कि घरके भीतर रहनेवाले मिथ्याभिमानी भाइयोंके प्रणाम नहीं करनेसे हो रहा है ।।४।। अनिष्ट वचन-रूपी अग्निसे उद्दीपित हुए मुखोंसे जो अत्यन्त धूम सहित हो रहे हैं और जो प्रतिकूलतारूपी वायुसे प्रेरित हो रहे हैं ऐसे ये मेरे निजी भाई अलातचक्रकी तरह मुझे जला रहे हैं ।।५।। जिन्हें हमने बालकपनसे ही स्वतन्त्रतापूर्वक खिला-पिलाकर बड़ा किया है ऐसे अन्य कुमार यदि मेरे विरुद्ध आचरण करनेवाले हों तो खुशीसे हों परन्तु बाहुबली तरुण, बुद्धिमान्, परिपाटी-को जाननेवाला, विनयी, चतुर और सज्जन होकर भी मेरे विषयमें विकारको कैसे प्राप्त हो गया ? ॥६-७।। जो अतिशय बलवान् है, मानरूपी धनसे युक्त है, और विजयका अङ्ग स्वरूप जिसकी भुजाओंका बल युद्धके अग्रभागमें बड़ा प्रशंसनीय गिना जाता है ऐसे इस बाहु-बलीको इस समय किस प्रकार अपने अनुकूल बनाना चाहिये ।।८।। जो भुजाओंके बलसे शोभाय-मान है और अभिमानरूपी मदसे उद्धत हो रहा है ऐसा यह बाहुबली किसी मदोन्मत्त बड़े हाथी-के समान अनुनय अर्थात् शान्तिसूचक कोमल वचनोंके बिना वश नहीं हो सकता ।।९।। यह अहंकारी बाहुबली सामान्य संदेशोंसे वश नहीं हो सकता क्योंकि शरीरमें घुसा हुआ दुष्ट पिशाचमन्त्रविद्यामें चतुर पुरुषोंके बिना वश नहीं हो सकता ।।१०।। शेष क्षत्रिय युवाओंमें और बाहुबलीमें बड़ा भारी अन्तर है, साधारण हरिण यदि पाशसे पकड़ लिया जाता है तो क्या उससे सिह भी पकड़ा जा सकता है ? अर्थात् नहीं। भावार्थ-हरिण और सिहमें जितना अन्तर है उतना ही अन्तर अन्य कुमारों तथा बाहुबली में है ।।११।।
श्लोक 12 से 21 बाहुबली के अहंकार का विश्लेषण और दूत प्रेषण
वह नीतिमें चतुर होने-से अभेद्य है, अर्थात् फोड़ा नहीं जा सकता, पराक्रमी है इसलिये युद्धमें भी वश नहीं किया जा सकता और उसका आशय अत्यन्त विकारयुक्त हो रहा है इसलिये उसके साथ शान्तिका भी प्रयोग नहीं किया जा सकता। भावार्थ उसके साथ भेद, दण्ड और साम तीनों ही उपायों-से काम लेना व्यर्थ है ।।१२।। जिस प्रकार यज्ञकी अग्नि घीकी आहुति पड़नेसे और भी अधिक प्रज्वलित हो उठती है उसी प्रकार वह तेजस्वी बाहुबली स्नेह अर्थात् प्रेमसे उपकृत होकर और भी अधिक प्रज्वलित हो रहा है क्रोधित हो रहा है ।।१३।। जिस प्रकार हाथीके शरीरपर लगाई हुई चमड़ाको कोमल करनेवाली औपधि कुछ काम नहीं करती उसी प्रकार स्वभावसे ही कठोर रहनेवाले इस बाहुबली के विषयमें साम उपायका प्रयोग करना भी कुछ काम नहीं देगा ।।१४।। जो मेरी आज्ञासे विमुख हैं, जिन्होंने राज्यभोग छोड़ दिये हैं और जो वनमें जाने के लिये उन्मुख हैं ऐसे बाकी समस्त राजकुमारोंने इसका अभिप्राय प्रायः प्रकट ही कर दिया है ।।१५।। यद्यपि यह सब है तथापि फिर भी कोमल वचनोंके द्वारा उसकी परीक्षा करेंगे। यदि ऐसा करनेपर भी नम्रीभूत नहीं हुआ तो फिर आगे क्या करना चाहिये इसका विचार करना चाहिये ।।१६।। भाईपनेके कपटसे जिसके अन्तरङ्गमें विकार छिपा हुआ है और जिसका कोई प्रतिकार नहीं है ऐसा यह बाहुबली घरके भीतर उठी हुई अग्नि के समान समस्त कुलको भस्म कर देगा ।।१७।। जिस प्रकार वृक्षोंकी शाखाओंके अग्रभाग की रगड़से उत्पन्न हुई अग्नि पर्वतका विघात करनेवाली होती है उसी प्रकार भाई आदि अन्त रङ्ग प्रकृतिसे उत्पन्न हुआ प्रकोप राजाका विघात करनेवाला होता है ।।१८।। यह बलवान् बाहुबली इस समय प्रतिकूलताको प्राप्त हो रहा है इसलिये इसका शीघ्र ही प्रतिकार करना चाहिये क्योंकि क्रूर ग्रहके समान इसके शान्त हो जानेपर ही मुझे शान्ति हो सकती है ॥ १९।। ऐसा निश्चय कर चक्रवर्तीने कार्यको जाननेवाले मन्त्र करनेमें चतुर तथा निःसृष्टार्थतासे सहितदूतको बाहुबली के समीप भेजा। भावार्थ-जिस दूतके ऊपर कार्य सिद्ध करनेका सब भार सौंप दिया जाता है वह निःसृष्टार्थ दूत कहलाता है। यह दूत स्वामीके उद्देश्यकी रक्षा करता हुआ प्रसङ्गानुसार कार्य करता है। चक्रवर्ती भरतने ऐसा ही दूत बाहुबलीके पास भेजा था ॥२०॥ जो उमरमें न तो बहुत छोटा था और न बहुत बड़ा ही था ऐसा वह दूत अपने योग्य रथ पर सवार होकर नम्रताके वेषसे बाहुबली के समीप चला ॥२१॥
श्लोक 22 से 31 दूत का प्रस्थान और मार्ग
जिसने मार्ग में काम आने-वाली भोजन आदिकी समस्त सामग्री अपने साथ ले रखी है और जो प्रेम करनेवाला है ऐसे अपने ही समान एक सेवकसे अनुगत होकर वह दूत वहाँसे शीघ्र ही चला ॥ २२॥ वह दूत मार्गमें विचार करता जाता था कि यदि वह अनुकूल बोलेगा तो मैं भी अपनी प्रशंसा किये बिना ही अनुकूल बोलूंगा और यदि वह विरुद्ध होकर युद्धकी बात करेगा तो मैं युद्ध नहीं होनेके लिये उद्योग करूँगा ।।२३।। यदि वह सन्धि अथवा पणबन्ध (कुछ भेंट देना आदि) करना चाहेगा तो मेरा यह अन्तरङ्ग ही है अर्थात् में भी यही चाहता हूँ, इसके सिवाय यदि वह चक्रवर्तीको जीतनेकी इच्छा करेगा तो मैं भी कुछ पराक्रम दिखाकर शीघ्र वापिस लौट आऊँगा ।। २४।। इस प्रकार जो अपने पक्षकी सम्पत्ति और दूसरेके पक्षको विपत्तिका विचार करता जाता था, जो अपने मन्त्रको छिपाकर रखनेसे दूसरे मन्त्रियों के द्वारा कभी फोड़ा नहीं जा सकता था और जो मन्त्रभेदके डरसे पड़ावपर किसी एकान्त स्थानमें गुप्त रीतिसे शयन करता था ऐसा वह दूत युद्ध करने तथा उससे निकलनेकी भूमियोंको देखता हुआ वहुत दूर निकल गया ।। २५-२६॥ क्रम क्रमसे अनेक देश, नदी और देशोंकी सीमाओंका उल्लंघन करता हुआ वह दूत बाहुबली के पोदनपुर नामक नगर में जा पहुँचा ॥ २७।। नगरके बाहर धानोंसे युक्त मनोहर पृथिवी को पाकर और पके हुए चावलोंके खेतोंको देखता हुआ वह दूत बहुत ही आनन्दको प्राप्त हुआ था ॥२८॥ जो बहुतसे फलोंसे शोभायमान हैं और किसानोंके द्वारा बड़े यत्नसे जिनकी रक्षा की जा रही है ऐसे धानके गुच्छोंको देखते हुए दूतने मनुष्योंको बड़ा स्वार्थी समझा था ।।२९।। जो खेतोंको देखकर आनन्दसे नाच रहे हैं और खेत काटने के लिये जिन्होंने हँसिया ऊँचे उठा रखेहैं ऐसे कुटुम्व सहित किसानोंके द्वारा प्रशंसनीय, खेत काटने के संघर्षके लिये बजती हुई तुरई-के शब्दोंको भी वह दूत सुन रहा था ।। ३० ।। कहीं धानके खेतोंमें वह दूत जिनके कुछ दाने तोताओं ने अपने मुखसे खींच लिये हैं ऐसी बालोंके समूह इस प्रकार देखता था मानो विट पुरुषोंके द्वारा भोगी हुई स्त्रियां ही हों ।॥३१॥
श्लोक 32 से 44 पोदनपुर का सौंदर्य और दूत का प्रवेश
जो सुगन्धित धानकी सुगन्धिके समान सुवासित अपनी श्वासकी वायुसे दशों दिशाओंको सुगन्धित कर रही थीं, जिन्होंने धानकी वालोंसे अपने कानों के आभूषण बनाये थे, जो अपने वक्षःस्थलपर स्थूल स्तनतटके समीपमें गिरती हुई पसीनेकी बूंदोंसे मोतियोंके अलंकारसे उत्पन्न होनेवाली शोभाको धारण कर रही थीं, जो परागसहित कमलोंकी रजसे भरे हुए माँगसे सुन्दर तथा अच्छी तरह गंथी हुई नीलकमलोंकी मालाओंसे सुशोभित केशोंसे चोटियाँ बाँधे हुई थीं, जो बामसे दुःखी हुए मुखपर लगी हुई सौन्दर्य के छोटे छोटे टुकड़ोंके समान पसीनेकी बूंदोंको धारण कर रही थीं, जिनके शरीर तोते के पंखोंके समान कान्ति बाली-हरी हरी चोलियोंसे सुशोभित हो रहे थे, और जो मनोहर शब्द करती हुई छो छो करके तोतोंको उड़ा रही थी ऐसी धानकी रक्षा करनेवाली स्त्रियाँ उस दूतने देखीं ।।३२-३६।। जो चलते हुए कोल्हुओंके चीत्कार शब्दों के बहाने अत्यन्त पीड़ासे मानो रो ही रहे थे ऐसे ईखके खेत उस दूतने देखे ॥३७॥ खेतोंके समीप ही, बड़े भारी स्तनके भारसे जो धीरे धीरे चल रही हैं, जो बछड़ों के समूहसे उत्कण्ठित हो रही हैं और जो दूध झरा रही हैं ऐसी नवीन प्रसूता गायें भी उसने देखी ॥ ३८।। इस प्रकार इस नगरके मनोहर सीमाप्रदेशों को देखता हुआ और उन्हें देखकर आनन्द प्राप्त करता हुआ वह दूत अपने आपको कृतार्थ मानने लगा ॥३९॥ जिनके चारों ओर नहरकी नालियोंसे पानी फैला हुआ है और जो धान ईख और जीरेके खेतोंसे घिरी हुई हैं ऐसी उस नगरके बाहरकी पृथिवियां उस दूतका मन हरण कर रही थीं ॥८०॥ बावड़ी, कुएं, तालाब, वगीचे और कमलों के समूहोंसे उस नगरके बाहरके प्रदेश उस दूतको वहुत ही मनोहर दिखाई दे रहे थे ॥४१॥ नगरके गोपुरद्वारकोउल्लंघन कर बाजार के मार्गों को देखता हुआ वह दूत वहाँ इकट्ठी की हुई रत्नोंकी राशियोंको निधियोंके समान मानने लगा ॥४२॥ जो राजाकी भेंटमें आये हुए घोड़े और हाथियोंकी लार तथा मदजलसे कीचड़सहित हो रहा था और उससे ऐसा मालूम होता था मानो उसपर जल ही छींटा गया हो ऐसे राजाके आँगनको देखकर वह दूत बहुत ही प्रसन्न हो रहा था ।॥४३।। जिसने मुख्य मुख्य द्वारपालोंके द्वारा अपना वृत्तान्त कहला भेजा है ऐसा वह दूत राजसिंहासन पर बैठे हुए महाराज बाहुबली के समीप जा पहुँचा ।।४४।।
श्लोक 45 से 61 बाहुबली का दर्शन और स्वागत
वहाँ जाकर उसने महाराज बाहु-वलीको देखा, उनका वक्ष स्थल किनारे के समान चौड़ा था, वे स्वयं ऊंचे थे और उनका मुकुट शिखरके समान उन्नत था इसलिये वे विजयलक्ष्मीरूपी स्त्रीके कीड़ा करनेके लिये एक अद्वितीय पर्वतके समान जान पड़ते थे-जिसपर यह बंधा हुआ है ऐसे लम्बे-चौड़े ललाटपट्टको धारण करते हुए वे ऐसे जान पड़ते थे मानो विजयलक्ष्मीका उत्कृष्ट विवाहपट्ट ही धारण कर रहे हों। वे बाहुबली स्वामी, जिसने समस्त राजाओंका यशरूपी धन तोल लिया है और जिसने समस्त पृथिवीका भार उठा रक्खा है ऐसे तराजूके दण्डके समान भुजदण्डको धारण कर रहे थे-यद्यपि वे मुखसे कमलकी और नेत्रोंसे उत्पलकी शोभा धारण कर रहे थे तथापि उनके समीप न तो विजाति अर्थात् पक्षियोंकी जातियाँ थीं और न वे स्वयं जलाशय अर्थात् सरोवर ही थे। भावार्थ इस श्लोक में विरोधाभास अलंकार है इसलिये विरोधका परिहार इस प्रकार करना चाहिये कि वे यद्यपि मुख और नेत्रोंसे कमल तथा उत्पलकी शोभा धारण करते थे तथापि उनके पास विजाति अर्थात् वर्णसंकर लोगोंका निवास नहीं था और न वे स्वयं जलाशय अर्थात् जड़ आशयवाले मूर्ख ही थे। वे बाहुबली जिनपर क्रमसे सरस्वती देवी और लक्ष्मीदेवीका निरन्तर निवास रहता था ऐसे अत्यन्त विस्तृत (उदार और लम्बे चौड़े) मन और वक्षःस्थलको धारण कर रहे थे-वे, प्रजाकी रक्षाके कारण तथा बड़े बड़े फल देनेवाले गुणोंके समूहको अपने शरीरमें धारण कर रहे थे और अन्य महापुरुषोंके मनमें धारण कराते थे-वे अपने देदीप्यमान आभूषणोंकी कान्तिके छलसे ऐसे जान पड़ते थे मानो अपने विशाल प्रतापरूपी अग्निसे समस्त दिशाओंको लिप्त ही कर रहे हों। वे चन्द्रकान्त मणिके समान मुखसे, पद्मराग मणिके समान सुन्दर चरणोंसे और वजूके समान सुदृढ़ अपने शरीरसे बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहे थे। उनकी कान्ति हरे रङ्गकी थी इसलिये वे ऐसे जान पड़ते थे मानो आदि ब्रह्मा भगवान् वृषभदेवके द्वारा लोकको सहारा देने के लिये बनाया हुआ हरित मणियोंका एक खम्भा ही हो। समस्त शरीरमें फैले हुए अतिशय श्रेष्ठ क्षात्रतेज को धारण करते हुए महाराज बाहुबली ऐसे जान पड़ते थे मानो तेजरूप परमाणुओंसे ही उनकी रचना हुई हो। जिसकी ज्वाला ऊपरकी ओर उठ रही है ऐसे तेजके पुंजके समान महाराज बाहुबलीको दूरसे देखता हुआ वह चक्रवर्तीका दूत अपने ध्यानसे कुछ विचलित-सा हो गया अर्थात् घबड़ा-सा गया ॥ ४५-५५।। दूरसे ही झुके हुए शिरको धारण करनेवाले उस दूतने जाकर कुमारके चरणोंमें प्रणाम किया और कुमारने भी उसे सत्कारके साथ अपने समीप ही बैठाया ॥५६॥ कुमार बाहुबली अपने मन्द हास्यकी किरणोंको चारों ओर फैलाते हुए योग्य आसनपर बैठे हुए उस भरतके दूतसे इस प्रकार कहने लगे ॥ ५७।। कि आज चक्रवर्ती ने बहुत दिनमें हम लोगोंका स्मरण किया, हे भद्र, जो समस्त पृथिवीके स्वामी हैं और जिन्हें बहुत लोगोंकी चिन्ता रहती है ऐसे चक्रवर्तीकी कुशल तो है न ? ॥५८॥ जिसने समस्त क्षत्रियोंको जीतनेका उद्योग आज तक भी समाप्त नहीं किया है ऐसे राजाधिराज भरतेश्वर की वह प्रसिद्ध दाहिनी भुजा कुशल है न ? ॥५९॥ सुना है कि भरतने समस्त दिशाएँ वश कर ली हैं और समस्त राजाओंको जीत लिया है। हे दूत, कहो अब भी उनको कुछ कार्य बाकी रहा है या नहीं ? ॥६०॥ इस प्रकार जो अत्यन्त शान्त हैं, तेजस्वी हैं, साररूप हैं, और जिनमें थोड़े अक्षर हैं ऐसे वचन कहकर कुमारने दूतको कहने के लिये अवसर दिया ।।६१।।
श्लोक 62 से 71 दूत का संदेश
तदनन्तर दाँतोंकी किरणोंसे शब्द और अर्थ दोनोंको मिलाकर दिखलाता हुआ दूत मनोहर वचन कहने के लिये तैयार हुआ ।। ६२ ।। वह कहने लगा कि हे प्रभो, आपके इस बचन-रूपी दर्पणमें आगेका कार्य स्पष्ट रूपसे दिखाई देता है क्योंकि उसका अर्थ मुझ जैसा मूर्ख भी प्रत्यक्ष जान लेता है ।॥६३॥ हे नाथ, हम लोग तो दूत हैं केवल स्वामीका समाचार ले जाने-वाले हैं हम लोग सदा स्वामीके अभिप्रायके अनुसार चलते हैं तथा गुण और दोषोंका विचार करने में भी असमर्थ हैं ।॥ ६४।। इसलिये हे आर्य, चक्रवर्तीने जो प्रिय और उचित आज्ञा दी है वह अच्छी हो या बुरी, केवल कहनेवालेके गौरवसे ही स्वीकार करने योग्य है ।॥६५॥ गुरुके वचन बिना किसी तर्क-वितर्कके मान लेना चाहिये यह जो शास्त्रका वचन है उसे प्रमाण मानकर इस समय आपको चक्रवर्तीकी आज्ञा स्वीकार कर लेनी चाहिये ।। ६६ ।। वह भरत इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न हुआ है अथवा इक्ष्वाकु अर्थात् भगवान् वृषभदेवका पुत्र है, राजाओंमें प्रथम है, आपका बड़ा भाई है और इसके सिवाय देवोंसे भी नमस्कार कराते हुए उसने समस्त पृथिवी अपने वश कर ली है ॥ ६७॥ उसने गंगाद्वारको उल्लंघन कर अकेले ही रथपर बैठकर समुद्रको जिसकी चञ्चल लहरें एक दूसरेसे टकरा रही हैं ऐसा कर दिया ॥६८॥ बाणके बहाने से इसकी प्रतापरूपी अग्नि समुद्रके जलमें भी प्रज्वलित रहती है, उस अग्निने केवल समुद्र को ही नहीं पिया है किन्तु देवोंका मान भी पी डाला है ॥६९॥ भला, देव लोग उसे कैसे न नमस्कार करेंगे ? क्योंकि उसने बाणरूपी जालसे गलेमें बांधकर उन्हें जबर्दरती अपनी ओर खोंच लिया था ।।७०।। बारह योजन दूरतक जानेवाले उसके बाणने महासागरमें रहनेवाले मागधदेवके निवासस्थानको भी जबर्दस्ती अपना निशाना बनाया था ।।७१।।
श्लोक 72 से 81 भरत की महिमा और आह्वान
व्यर्थ न जाने-वाले बाणके द्वारा विजयार्ध पर्वतके स्वामी विजयार्धदेवको जीतनेवाले उस भरतकी विजय घोषणा देवोंने भी की थी ।॥ ७२॥ कृतमाल आदि देव उसकी आधीनता प्राप्त कर चुके हैं और उत्तर दक्षिण दोनों श्रेणियोंके विद्याधरोंने भी उसकी जयघोषणा की है ॥७३॥ जिसका अन्ध-कार दूर कर दिया गया है ऐसे गुफाके दरवाजेको अपनी विजयी सेनाके साथ उल्लंघन कर उसने विजयार्ध पर्वतकी उत्तर दिशाकी भूमिपर भी अपना अधिकार कर लिया है ।॥७४।। म्लेच्छ लोग यद्यपि उसकी आज्ञा नहीं मानना चाहते थे तथापि उसने सेनापतिके द्वारा अपनी सेनासे हराकर और जबरदस्ती उनका धन छीनकर उनपर विजय प्राप्त की है ।। ७५।। अच्छे अच्छे देवोंने आकर उसका अभिषेक किया है और उसका निर्मल यश बड़े बड़े पर्वतोंकी शिखरों पर स्थलकमलोंके समान सुशोभित हो रहा है ॥७६॥ गङ्गा-सिन्धु दोनों नदियोंके देवताओं ने रत्नोंके अर्थोंके द्वारा उसकी पूजा की है तथा वृषभाचलके तटपर उसने अपना यश टांकीसे उघेर कर लिखा है ॥७७॥ उसने लक्ष्मीको घटदासी अर्थात् पानी भरनेवाली दासीके समान किया है, देव उसके सेवक हो रहे हैं, समस्त रत्न उसके स्वाधीन हैं और निधियाँ उसे धन प्रदान करती रहती हैं ।॥७८॥ और उसकी विजयी सेनाओंने समस्त दिशाओंको जीतकर सब समुद्रों के किनारेके बनोंकी भूमिमें भूमण किया है ।॥७९॥ हे आयुष्मन्, जगत्में माननीय वही महाराज भरत अपने चक्रवर्तीपनेको प्रसिद्ध करते हुए कल्याण करनेवाले आशीर्वादसे आपका सन्मान कर आज्ञा कर रहे हैं ।॥८०॥ कि समस्त द्वीप और समुद्रों तक फैला हुआ, यह हमारा राज्य हमारे प्रिय भाई बाहुबलीके बिना शोभा नहीं देता है ॥८१॥
श्लोक 82 से 91 बाहुबली से प्रणाम की अपील
सम्पत्तियाँ वही हैं, ऐश्वर्य वही है, भोग वही है और सामग्री वही है जिसे भाई लोग सुखके उदयको बाँटते हुए साथ साथ उपभोग करें ॥८२॥ दूसरी एक बात यह है कि आपके प्रणाम करनेसे विमुख रहनेपर जिसमें समस्त मनुष्य, देव, धरणेन्द्र और विद्याधर नमस्कार करते हैं ऐसा उनका चक्रवर्तीपना भी सुशोभित नहीं होता है ॥८३॥ प्रणाम नहीं करनेवाला शत्रु स्वामीके मन को उतना अधिक दुखी नहीं करता है जितना कि अपनेको झूठमूठ चतुर माननेवाला और अभिमानसे प्रणाम नहीं करनेवाला भाई करता है ॥८४॥ इसलिये आप किसी अपराधकी क्षमा नहीं करनेवाले महाराज भरतके समीप जाकर प्रणामके द्वारा उनका सत्कार कीजिये क्योंकि स्वामीको प्रणाम करना अनेक सम्पदाओंको उत्पन्न करनेवाला है और यही सबको इष्ट है ॥८५॥ जिसकी आज्ञा कभी व्यर्थ नहीं जाती ऐसे उस भरतकी आज्ञाका जो कोई भी उल्लंघन करते हैं उन शत्रुओंका शासन करनेवाला उसका वह चक्ररत्न है जिसपर स्वयं किसीका शासन नहीं चल सकता ।।८६।। आप भरतकी आज्ञाका खण्डन करनेसे व्याकुल हुए इन मण्डलाधिपति राजाओंको देखिये जो भयंकर दण्डरूपी वजूके गिरनेसे खण्ड खण्डहो रहे हैं ।।८७।। इसलिये हे दीर्घायु कुमार, आप शीघ्र ही चलकर इसके मनोरथ पूर्ण कीजिये आप दोनों भाइयोंके मिलापसे यह समस्त संसार मिलकर रहेगा ।।८८।। इस प्रकार उस दूतके कह चुकनेके बाद चतुर और जवान बाहुबली कुमार कुछ मन्दमन्द हँसकर गंभीर अर्थसे भरे हुए धीर वीर वचन कहने लगे ॥८९।। वे बोले कि हे दूत, अपने स्वामी की साधु वृत्तिको प्रकट करते हुए तूने सब सच कहा है क्योंकि जो अपने मतकी पुष्टि करने-वाला हो वही कहना ठीक होता है ।।१०।। साम अर्थात् शान्ति दिखलाते हुए तूने विशेषकर भेद और दण्ड भी दिखला दिये हैं तथा उनका प्रयोग करते हुए तूने यह भी बतला दिया कि तूं अपना अर्थ सिद्ध करनेमें कितना स्वतन्त्र है ? ।।९१।।
श्लोक 92 से 101 बाहुबली का दूत को उत्तर और दुष्टता का खंडन
इस प्रकार कहनेवाला तूं सचमुच ही अपने स्वतन्त्र स्वामीका अन्तरङ्ग दूत है, यदि ऐसा न होता तो तूं उसके हृदयगत अभि-प्रायको कैसे प्रकट कर सकता था ।॥९२॥ चक्रवर्तीने तुझपर समस्त कार्यभार सौंपकर मेरे पास भेजा है, यद्यपि तू चतुर है तथापि इस प्रकार दूसरेका मर्मछेदन करना चतुराई नहीं है ।॥९३।। अपनी जबर्दस्ती दिखलाना वास्तवमें दुष्टोंका काम है तथा अपने गुणोंका वर्णन करना और दूसरोंमें दोष प्रकट करना भी दुष्टोंका ही काम है ॥९४॥ दुष्ट पुरुष, दूसरेके दोष और अपने गुणोंका स्वयं वर्णन किया करते हैं तथा अपने दोष और दूसरेके गुणोंको छिपाते रहते हैं ।॥९५॥ खलता अर्थात् दुष्टता खलता अर्थात् आकाशकी बेलके समान है क्योंकि जिस प्रकार आकाशकी बेलसे किसीका संताप दूर नहीं होता उसी प्रकार दुष्टतासे किसी का संताप दूर नहीं होता, जिस प्रकार आकाशकी बेल सुमन अर्थात् फूलोंसे शून्य होती है उसी प्रकार दुष्टता भी सुमन अर्थात् विद्वान् पुरुषोंसे शून्य होती है और जिस प्रकार आकाशकी बेल फलरहित होती है उसी प्रकार दुष्टता भी फलरहित होती है अर्थात् उससे किसीको कुछ लाभ नहीं होता, ऐसी इस दुष्टताका केवल मूर्ख लोग ही आश्रय लेते हैं ।॥९६॥ जो सज्जन पुरुषोंको इष्ट नहीं है, जो सब ओरसे विरस अर्थात् नीरस अथवा विद्वेषरूपी फलोंसे व्याप्त है तथा लोगोंको संताप देनेवाली है ऐसी इस खलता-दुष्टताको मैं दुःखलता अर्थात् दुःखकी बेल ही समझता हूँ ॥९७॥ यदि न्यायपूर्ण विरोध करनेवाले पुरुषके विषय-में पहले कुछ देनेके विधानके साथ सामका प्रयोग किया जावे और बादमें भेद तथा दण्ड उपाय काममें लाये जावें तो उनके द्वारा पहले प्रयोगमें लाया हुआ साम उपाय बाधित हो जाता है । भावार्थ-यदि न्यायवान् विरोधी के लिये पहले कुछ देनेका प्रलोभन देकर साम अर्थात् शान्ति का प्रयोग किया जावे और बादमें उसी के लिये भेद तथा दण्डकी धमकी दी जावे तो ऐसा करने से उसका पहले प्रयोग किया हुआ साम उपाय व्यर्थ हो जाता है क्योंकि न्याय-वान् विरोधी उसकी कूटनीतिको सहज ही समझ जाता है ।। ९८।। साम, दाम, दण्ड, भेद इन चारों उपायोंका यथायोग्य स्थानमें नियोग करना कार्यसिद्धिका कारण है और विपरीत नियोग करना पराभवका कारण है। भावार्थ जो जिसके योग्य है उसके साथ वही उपाय काममें लानेसे सफलता प्राप्त होती है और विरुद्ध उपाय काममें लानेसे तिरस्कार प्राप्त होता हे ॥९९॥ प्रतापशाली पुरुषके साथ साम अर्थात् शान्तिका प्रयोग करना एकान्तरूपसे शान्ति करनेवाला नहीं माना जा सकता क्योंकि प्रतापशाली मनुष्य स्निग्ध अर्थात् स्नेही होनेपर भी यदि क्रोधसे उत्तप्त हो जावे तो उसके साथ शान्तिका प्रयोग करना स्निग्ध अर्थात् चिकने किन्तु गर्म घीमें पानी सींचने के समान है। भावार्थ-जिस प्रकार गर्म घीमें पानी डालनेसे वह शान्त नहीं होता बल्कि और भी अधिक चटपटाने लगता है उसी प्रकार क्रोधी मनुष्य शान्तिके व्यवहारसे शान्त नहीं होता बल्कि और भी अधिक बड़बड़ाने लगता है ।।१००।। इसी प्रकार अतिशय प्रतापशाली पुरुषको कुछ देनेका विधान करना भी मैं निःसार समझता हूँ क्योंकि हजारों समिधाएँ (लकड़ियां) देनेपर भी प्रज्वलित अग्नि कैसे शान्त हो सकती है । ॥१०१।।
श्लोक 102 से 111 बाहुबली का अभिमान और स्वतंत्रता
जिस प्रकार लोहा तपानेसे नर्म नहीं होता उसी प्रकार तेजस्वी मनुष्य कष्ट देनेसे नर्म नहीं होता इसलिये उसके साथ दण्डका प्रयोग करना निरर्थक है क्योंकि अनुनय विनय कर पकड़ने योग्य हाथीपर ही दण्ड चल सकता है सिंहपर नहीं। विशेष लोहा गर्म अवस्था में नर्म हो जाता है इसलिये यहाँ लोहाका उदाहरण व्यतिरेकरूपसे मानकर ऐसा भी अर्थ किया जा सकता है कि जिस प्रकार तपा हुआ लोहा नर्म हो जाता है उस प्रकार तेजस्वी मनुष्य कष्ट में पड़कर नर्म नहीं होता इसलिये उसपर दण्डका प्रयोग करना व्यर्थ है। अरे, दण्ड भी प्रेम पुचकार कर पकड़ने योग्य हाथीपर ही चल सकता है न कि सिंहपर भी ॥१०२॥ इसलिये इन साम दान आदि उपायोंका विपरीत प्रयोग करनेवाले और इसलिये ही उपाय न जाननेवाले आप जैसे लोग इन चारों उपायोंके प्रयोगका ज्ञान. न होनेसे स्वयं दुःखी होते हैं ।॥ १०३॥हे दूत, हम लोग शान्तिसे भी वश नहीं किये जा सकते यह निश्चय होनेपर भी आप हमारे साथ अहंकारका प्रयोग कर रहे हैं, इससे स्पष्ट मालूम होता है कि आप मूर्ख हैं ।॥१०८।। भरतेश्वर उमरमें बड़े हैं इतने ही से वे प्रशंसनीय नहीं कहे जा सकते क्योंकि हाथी बूढ़ा होनेपर भी क्या सिंहके बच्चेकी बराबरी कर सकता है ? ॥ १०५॥ हे दूत, प्रेम और विनय ये दोनों परस्पर मिले हुए कुटुम्बी लोगोंमें ही संभव हो सकते हैं, यदि उन्हीं कुटुम्बियोंमें विरोध हो जावे तो उन दोनों हीकी गति नष्ट हो जाती है। भावार्थ-जब तक कुटुम्बियोंमें परस्पर मेल रहता है तब तक प्रेम और विनय दोनों ही रहते हैं और ज्योंही उनमें परस्पर विरोध हुआ त्यों ही दोनों नष्ट हो जाते हैं ।॥ १०६।। बड़ा भाई नमस्कार करने योग्य है यह वात अन्य समयमें अच्छी तरह हमेशा हो सकती है परन्तु जिसने मस्तकपर तलवार रख छोड़ी है उसको प्रणाम करना यह कौन-सी रीति है ? ।।१०७॥ हे दूत, दूसरे के अहंकारके अनुसार प्रवृत्ति करनेसे हमारा चित्त दुःखी होता है, क्योंकि संसारमें एक सूर्य ही तेजस्वी है। क्या उससे अधिक और भी कोई तेजस्वी है ।॥ १०८॥ आदि ब्रह्मा भगवान् वृषभदेवने ‘राजा’ यह शब्द मेरे लिये और भरतके लिये दोनोंके लिये दिया है, परन्तु आज भरत ‘राजराज’ हो गया है सो यह कपोल के ऊपर उठे हुए गूमड़े के समान व्यर्थ है ।॥१०९।। अथवा रत्नोंके द्वारा अत्यन्त लोभको प्राप्त हुआ वह भरत अपने इच्छानुसार भले ही ‘राजराज’ रहा आवे, हम अपने धर्मराज्यमें रिथर रहकर राजा ही बने रहेंगे ॥११०।। वह भरत बालकोंके समान छलसे हम लोगोंको बुला-कर और प्रणाम कराकर कुछ पृथिवी देना चाहता है तो उसका दिया हुआ पृथिवीका टुकड़ा खलीके टुकड़ेके समान तुच्छ मालूम होता है ।।१११।।
श्लोक 122 से 131 भरत की निंदा और यश की महत्ता
तेजस्वी मनुष्योंके लिये जो कुछ थोड़ा-बहुत अपनी भुजारूपी वृक्षका फल प्राप्त होता है वही प्रशंसनीय है, उनके लिये दूसरेकी भौंह-रूपी लताका फल अर्थात् भौंहके इशारेसे प्राप्त हुआ चार समुद्रपर्यन्त पृथिवीका ऐश्वर्य भी प्रशंसनीय नहीं है ।।११२।। जिस प्रकार पनया साँप ‘सर्प’ इस शब्दको व्यर्थ ही धारण करता है उसी प्रकार जो मनुष्य राजा होकर भी दूसरेकी आज्ञासे उपहृत हुई लक्ष्मीको धारण करता है वह ‘राजा’ इस शब्दको व्यर्थ ही धारण करता है ।। ११३।। जो पुरुष राजा होकर भी दूसरे के अपमानसे मलिन हुई विभूतिको धारण करता है निश्चयसे उस मनुष्यरूपी पशुके लिये यह राज्यकी समस्त सामग्री भारके समान है ॥११४॥ जिसके दाँत टूट गये हैं ऐसे हाथीके समान जो पुरुष मानभंग होनेपर प्राप्त हुए भोगोपभोगोंसे प्राण धारण करना चाहता है उस पुरुषमें और पशुमें भेद कैसे हो सकता है ? ॥११५॥ जो राजा मानभंगके भारसे झुके हुए शिरको धारण करता है उसकी छायाका नाश छत्रभंग होनेके बिना ही हो जाता है। भावार्थ-यहाँ छाया शब्दके दो अर्थ हैं अनातप और कान्ति । जब छत्रभंग होता है तभी छाया अर्थात् अनातप का नाश होता है परन्तु यहांपर छत्रभंगके बिना ही छायाके नाशका वर्णन किया गया है इसलिये विरोध मालूम होता है परन्तु छत्र भंगके बिना ही उनकी छाया अर्थात् कान्तिका नाश हो जाता है, ऐसा अर्थ करनेसे उसका परिहार हो जाता है ।। ११६ ।। जिन्होंने भोगोपभोग की सब सामग्री छोड़ दी है ऐसे मुनि भी जब अभिमान (आत्मगौरव) से सहित होते हैं तब फिर राज्य भोगनेकी इच्छा करनेवाला ऐसा कौन पुरुष होगा जो अभिमानको छोड़ देगा ? ॥११७॥ वनमें निवास करना अच्छा है और प्राणोंको छोड़ देना भी अच्छा है किन्तु अपने कुलका अभि-मान रखनेवाले पुरुषको दूसरेकी आज्ञाके आधीन रहना अच्छा नहीं है ।॥ ११८ ॥ धीर वीर पुरुषोंको चाहिये कि वे इन नश्वर प्राणोंके द्वारा अभिमानकी ही रक्षा करें क्योंकि अभिमान के साथ कमाया हुआ यश इस संसारको सदा सुशोभित करता रहता है ॥ ११९॥ तूने जो बहुत कुछ बढ़ाकर चक्रवर्ती के पराक्रमका वर्णन किया है सो ठीक है क्योंकि तेरा यह सब कहना स्तुति निन्दा में तत्पर है अर्थात् स्तुतिरूप होकर भी निन्दाको सूचित करनेवाला है ।।१२०।। पण्डित लोग निःसार वस्तुको भी अपने वचनोंसे पुष्ट किया ही करते हैं सो ठीक ही है क्योंकि स्तुति प्रारम्भ करनेपर कुत्तेको भी सिंह कहना पड़ता है ॥ १२१ ॥ हे दूत, तेरे द्वारा कहा हुआ यह समस्त कार्य हम लोगोंको केवल वचनाडम्बर ही जान पड़ता है क्योंकि कहां तो इसका दिग्विजयका प्रारम्भ करना और कहां धन इकट्ठा करनेमें तत्पर होना ? ॥ १२२।। जिस प्रकार भिक्षुक चक्र धारण कर भिक्षा मांगता हुआ अतिशय दीनताको प्राप्त होता है उसी प्रकार चक्रवर्तीकी वृत्ति धारण कर भिक्षाके समान कर वसूल करता हुआ तेरा स्वामी भरत तेरे द्वारा दीनताकी परम सीमाको प्राप्त करा दिया गया है ॥ १२३॥ यह ठीक है कि चक्र-वर्तीने दिग्विजयके समय देवोंको भी जीत लिया है परन्तु यह बात केवल विश्वास करने योग्य है अन्यथा तू यहां इतना तो विचार कर कि जलस्तम्भन करने में प्रवृत्त हुए तेरे स्वामी भरतने जब बाण छोड़ा था तब वह क्या दर्भकी शय्यापर नहीं सोया था अथवा उसने उपवास नहीं किया था ।।१२४-१२५।। जिस प्रकार कुम्हार आयति अर्थात् लम्बाईसे शोभायमान डंडे के द्वारा चक्रको घुमाता हुआ पार्थिव अर्थात् मिट्टीके घट बनाता है उसी प्रकार भरत भी आयति अर्थात् सुन्दर भविष्यसे शोभायमान डंड़े (दण्डरत्न) से चक्र (चक्ररत्न) को घुमाता हुआ पार्थिव अर्थात् पृथिवीके स्वामी राजाओंको वश करता फिरता है, इसलिये कहना पड़ता है कि तुम्हारा यह राजा कुम्हारके समान आचरण करता है ।। १२६।। वह भरत पापकी धूलिको उड़ाता हुआ स्वयं कलंकित हुआ है और कुलीन मनुष्योंके कुलको भी सदाके लिये कलंकित कर रहा है ॥ १२७॥ हे दूत, प्रयोगमें लाये हुए मंत्र-तंत्रोंके द्वारा दूरसे ही अनेक राजाओंको बुलानेवाले इस भरतका पराक्रम तू लज्जाके बिना कितना वर्णन कर रहा है ? ॥१२८॥ हे दूत, जिस समय तु इसके युद्धकी प्रशंसा करता है उस समय हम लोगोंको बहुत दुःख होता है क्योंकि उस समय म्लेच्छोंकी सेनाके द्वारा भरतकी सेना पानीमें हिंडोले झूल रही थी अर्थात् हिंडोलेके समान कँप रही थी ॥ १२९॥ क्षत्रियपुत्रको तो जिसे कोई हरण न कर सके ऐसे यशरूपी धनकी ही रक्षा करनी चाहिये क्योंकि इस पृथिवीमें निधियों को गाड़ कर रखनेवाले अनेक लोग मर चुके हैं। भावार्थ अमरता यशसे ही प्राप्त होती है ।।१३०।। अथवा जो रत्न एक हाथ पृथिवी तक भी साथ नहीं जाते और जिनके लिये राजा लोग केवल मृत्युको ही प्राप्त होते हैं ऐसे रत्नोंसे क्या कार्य निकल सकता है ? ॥१३१॥
श्लोक 132 से 141 युद्ध की चुनौती
जो समस्त राजाओंके द्वारा रत्नोंकी राशिसे तोला गया है ऐसा यह भरत एक प्रकारका तुलापुरुष है खेद है कि ऐसा ऐश्वर्य नहीं होता ।। १३२।। अवश्य ही वह भरत अपने पूज्य पिता श्री भगवान् वृषभदेवके द्वारा दी हुई हमारी पृथिवीको छीनना चाहता है सो इस लोभीका प्रत्याख्यान अर्थात् तिरस्कार करनेके सिवाय और कुछ उपाय नहीं है ।।१३३॥ हे दूत, पिताजी के द्वारा दी हुई यह हमारे ही कुलकी पृथिवी भरतके लिये भाईकी स्त्रीके समान है अब वह उसे ही लेना चाहता है सो तेरे ऐसे स्वामीको क्या लज्जा नहीं आती ? ॥१३४।। जो मनुष्य स्वतन्त्र हैं और इच्छानुसार शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा रखते हैं वे अपने कुलकी स्त्रियों और भुजाओंसे कमाई हुई पृथिवीको छोड़कर वाकी सब कुछ दे सकते हैं ।।१३५।। इसलिये बार-बार कहना व्यर्थ है, एक छत्रसे चिह्नित इस पृथिवीको वह भरत ही चिरकालतक उपभोग करे अथवा भुजाओंमें पराक्रम रखनेवाला में ही उपभोग करूं । भावार्थ-मुझे पराजित किये बिना वह इस पृथिवीका उपभोग नहीं कर सकता ।।१३६।। जो प्रयोजनकी सिद्धिसे रहित हैं ऐसे शूरवीरताके इन व्यर्थ वचनोंसे क्या लाभ है? अब तो युद्धरूपी कसौटी पर ही मेरा और भरतका पराक्रम प्रकट होना चाहिये ॥ १३७॥ इसलिये हे दूत, तू यह हमारा संदेहरहित एक वचन ले जा अर्थात् जाकर भरतसे कह दे कि अब तो हम दोनोंका जो कुछ होना होगा वह युद्धकी भीड़में ही होगा ।।१३८ ।। इस प्रकार अभिमान प्रकट करनेवाले कुमार बाहुबलीने उस दूतको यह कहकर शीघ्र ही बिदा कर दिया कि जा और अपने स्वामी को युद्धके लिये जल्दी तैयार कर ॥ १३९॥ उस समय जिनके मुकुटोंके संघर्षणसे करोड़ों मणि उछल-उछलकर इधर-उधर पड़ रहे हैं और उन मणियोंसे जो ऐसे जान पड़ते हैं मानो अग्नि के सैकड़ों फुलिङ्गोंको ही इधर उधर फैला रहे हों ऐसे राजा लोग उठ खड़े हुए ॥ १४०॥ उसी क्षण अनेक योद्धाओंसे भरी हुई महाराज बाहुबलीकी सेनामें युद्धकी भीड़को सूचित करने-वाला योद्धा लोगोंका परस्परका आलाप सुनाई देने लगा था ।। १४१।।
श्लोक 142 से 151 युद्ध की तैयारी
इस समय स्वामीके यह युद्धकी तैयारी बहुत दिनमें हुई है, क्या अब हम लोग स्वामीके सत्कारसे ऊऋण (ऋण-मुक्त) हो सकेंगे ? भावार्थ स्वामीने आजतक पालन-पोषण कर जो हम लोगोंका महान् सत्कार किया है क्या उसका बदला हम कुछ दे सकेंगे ? ।।१४२॥ राजा लोग समयके लिये ही सेवक लोगोंका पालनपोषण करते हैं, यदि समय नहीं साधा गया अर्थात् अवसर पड़नेपर स्वामीका कार्य सिद्ध नहीं किया गया तो फिर तृणसे बने हुए इन पुरुपोंसे क्या लाभ है ? भावार्थ-जो पुरुप अवसर पड़नेपर स्वामीका साथ नहीं देते वे घास-फसके बने हुए पुरुषों के समान सर्वथा सारहीन हैं ।॥ १४३।। अब यह शरीर छोड़ना चाहिये, यशरूपी धन कमाना चाहिये और विजय लाभकर जयलक्ष्मी प्राप्त करनी चाहिये, यह युद्धका उत्सव कुछ थोड़ा फल देनेवाला नहीं है ।। १४४।। हम लोग, घावोंसे जर्जर हुए शरीरके प्रत्येक अंगोंसे, जिसमें घामको मन्द करनेवाली बाणोंकी छाया पड़ रही है ऐसे युद्धके मण्डपमें कब विश्राम करेंगे ? ।।१४५।। कोई कहता था कि मैं कब अपने बाणोंसे शत्रुओंकी सेनाके द्वारा किये हुए अनेक व्यहोंको छेदकर विना किसी उपद्रवके बाणोंकी शय्यापर शयन करूँगा ॥१४६॥ कोई कहता था कि मैं कव युद्धमें क्षण भरके लिये मूछित होकर हाथी के कानरूपी ताड़पत्रकी वायुके चलने से जिसके युद्धका सब परिश्रम दूर हो गया है ऐसा होता हुआ हाथी के कंधेपर बैठंगा ? ॥१४७।। हाथीके दांतरूपी अर्गलोंमें पिरोये जानेसे जिसकी अंतड़ियां निकल रही हैं तथा जिसके मुग्खसे टूटे-फूटे शब्द निकल रहे हैं ऐसा होता हुआ में कब जयलक्ष्मीके कटाक्षोंका निशाना वन सकूंगा ? भावार्थ-वह दिन कब होगा जब कि मैं मरता हुआ भी विजय प्राप्त करूँगा ? ॥१४८।। कोई कहता था कि हाथियोंके दांतों के बीचमें लटकती हुई अपनी अंतड़ियोंके समूहरूपी मजबूत रस्सीपर भूलाके समान विजयलक्ष्मीको बैठाकर मैं कब उसे तोलूंगा ? ॥१४९।। इस प्रकार कहते हुए युद्धके प्रेमी वड़े बड़े योद्धाओंने प्रत्येक सेनामें अपने अपने शस्त्र तथा शिरकी रक्षा करनेवाली टोपियां सँभाल लीं ।। १५०।।
तदनन्तर दिन समाप्त हो गया सो ऐसा मालूम होता था मानो योद्धाओंकी भौंहोंके तिरस्कारसे भयभीत होकर कहीं भाग ही गया हो ॥ १५१।।
श्लोक 152 से 161 सूर्यास्त का प्रतीकात्मक वर्णन
अथानन्तर सूर्यका मंडल लाल हो गया मानो उसने क्रोधित हुए योद्धाओंकी सेनाके नेत्रोंकी छायाके द्वारा दो हुई लाल कान्ति ही धारण की हो ॥१५२।। उस समय क्षण भरके लिये सूर्यको किरणोंका समूह अस्ताचल की शिखरपर लगे हुए वनके वृक्षोंकी कोपलोंके समान कुछ कुछ लाल रंगका दिखाई दे रहा था ॥१५३॥ उस समय वह सूर्य अस्ताचलकी शिखरपर लगे हुए किरणोंसे क्षणभरके लिये ऐसा जान पड़ता था मानो नीचे गिरनेके भयसे अपने किरणरूपी हाथोंसे किसीके हाथका सहारा ही ले रहा हो ॥ १५४॥ जो सूर्य वारुणी अर्थात् पश्चिम दिशा (पक्षमें मदिरा) के समागमसे पतित हो रहा है और जिसका कान्तिरूपी धन नष्ट हो गया है ऐसे सूर्यको मानो पापसे डरते हुए ही अस्ताचलने आलम्बन नहीं दिया था । भावार्थ वारुणी शब्दके दो अर्थ होते हैं मदिरा और पश्चिम दिशा । पश्चिम दिशामें पहुँचकर सूर्य प्राकृतिक रूपसे नीचे की ओर ढलने लगता है। यहां कविने इसी प्राकृतिक दृश्यमें श्लेषमूलक उत्प्रेक्षा अलंकार-की पुट देकर उसे और भी सुन्दर बना दिया है। वारुणी अर्थात् मदिराके समागमसे मनुष्य अपवित्र हो जाता है उसका स्पर्श करना भी पाप समझा जाने लगता है, सूर्य भी वारुणी अर्थात् पश्चिम दिशा (पक्षमें मदिरा) के समागमसे मानो अपवित्र हो गया था। उसका स्पर्श करने-से कहीं मैं भी पापी न हो जाऊँ इस भयसे अस्ताचलने उसे सहारा नहीं दिया-गिरते हुए को हस्तालम्बन देकर गिरनेसे नहीं बचाया। सूर्य डूब गया ।। १५५।। उस समय सूर्य दिखाई नहीं देता था सो ऐसा जान पड़ता था मानो बीते हुए दिनको खोजने के लिये गया हो, अथवा पाताललोकमें घुस गया हो अथवा अस्ताचलकी शिखरोंके अग्रभागसे छिप गया हो ।। १५६।। जिस प्रकार कोई वीर पुरुष दारिद्रयरूपी अन्धकारको नष्ट कर और अपने कर अर्थात् टैक्स द्वारा भूभृत् अर्थात् राजाओंपर आक्रमण कर दिन अर्थात् भाग्यके अन्तमें अनंशुक अर्थात् बिना वस्त्रके यों ही चला जाता है उसी प्रकार सूर्य रात्रिसम्बन्धी अन्धकारको नष्ट कर तथा कर अर्थात् किरणोंसे भूभृत् अर्थात् पर्वतोंपर आक्रमण कर दिनके अन्तमें अनंशुक अर्थात् किरणोंके बिना यों ही चला गया-अस्त हो गया, यह कितने दुःखकी बात है । ॥ १५७।। यह सूर्य तो मेरु पर्वतके चारों ओर गोलाकार तिरछी गतिसे निरन्तर घूमता रहता है तथापि दूर होनेसे दिखाई नहीं देता इसलिये मूर्ख पुरुषोंको नीचे गिरता हुआ सा जान पड़ता है ।। १५८॥ सूर्यको इस विपत्तिके समय मानो शोकसे पीड़ित हुई दिशारूपी स्त्रियां अन्धकारसे भर जाने के कारण कान्तिरहित मुख धारण कर रही थीं। भावार्थ-पतिकी विपत्तिके समय जिस प्रकार कुलवती स्त्रियों के मुख शोकसे कान्तिहीन हो जाते हैं उसी प्रकार सूर्यकी विपत्तिके समय दिशारूपो स्त्रियोंके मुख शोकसे कान्तिहीन हो गये थे। अन्धकार छा जानेसे दिशाओंकी शोभा जाती रही थी ॥१५९॥ कमलिनियोंके कमलरूपी मुख मुरझा गये थे जिससे वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो सूर्यका वियोग होनेसे भूमरोंके करुणाजनक शब्दोंके बहाने रुदन करती हुई शोक ही कर रही हों ।॥ १६०॥ सायंकालके लाल लाल प्रकाशसे व्याप्त हुए अस्ताचल के वन ऐसे जान पड़ते थे मानो अत्यन्त भयंकर दावानलकी शिखासे ही घिर गये हों ।। १६१।।
श्लोक 162 से 171 संध्या का सौंदर्य और रात्रि का आगमन
यद्यपि यह संध्या अनुरक्त अर्थात् प्रेम करनेवाली (पक्षमें लाल) थी तथापि सूर्यने उसे छोड़ दिया था इसलिये ही वह लाल रंगकी संध्या आकाशमें ऐसी जान पड़ती थी मानो उसने अग्निमें ही प्रवेश किया हो। भावार्थ-पतिव्रता स्त्रियां पतियोंके द्वारा अपमानित होनेपर अपनी विशुद्धताका परिचय देनेके लिये सीताके समान अग्निमें प्रवेश करती हैं यहांपर कविने भी समासोक्ति अलंकारका आश्रय लेकर संध्यारूपी स्त्रीको सूर्यरूपी पतिके द्वारा अपमा नित होनेपर अपनी विशुद्धता-सच्चरित्रताका परिचय देनेके लिये संध्या कालकी लालिमा रूपी अग्निमें प्रवेश कराया है ॥ १६२॥ सिन्दूरके समान श्रेष्ठ कान्तिको धारण करनेवाली वह संध्या धीरे धीरे पश्चिम दिशामें ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो आकाशम्मी समुद्रमें मूंगोंके बगीचोंकी पंक्ति ही हो ॥ १६३॥ जवाके फूलके समान लाल लाल वह संध्याकाल की लाली पश्चिम दिशाके अन्तमें ऐसी फैल रही थी मानो चकवियोंके मनके संतापको बढ़ाने वाली अग्नि ही हो ।।१६४।। समस्त दिशाओंमें फैलती हुई संध्याकालकी लाली क्षण भरके लिये ऐसी दिखाई देती थी मानो पतियोंके आनेपर मान करनेवाली स्त्रियोंके मनका समस्त अनुराग ही एक जगह इकट्ठा हुआ हो ।॥ १६५॥ लाल किरणेंरूपी वस्त्र धारणकर सूर्यरूपी पतिके पीछे पीछे जाती हुई संध्याको लोग पतिके साथ मरनेवाली सतीके समान वहुत कुछ मानते थे ।।१६६।। चकवाने बड़ी उत्कंठासे अपने पीछे पीछे आती हुई और शब्द करती हुई चकवीको आखिर छोड़ ही दिया था सो ठीक ही है क्योंकि नियति अर्थात् दैविक नियमका उल्लं-घन कौन कर सकता है ? ॥१६७।। उस समय चकवा चकवियोंके जोड़े परस्परमें बिछुड़ गये थे-अलग अलग हो गये थे, सो यह क्या सूर्यका अपराध है? अथवा कालका अपराध है ? अथवा भाग्यका ही अपराध है ? ॥१६८।। सूर्यके बिना सब दिशाओंमें गाढ़ अन्धकार फैल गया था सो ठीक ही है क्योंकि तेजस्वीके बिना प्रायः सब ओर अन्धकार ही भर जाता है ॥१६९।। अन्धकारसे घिरी हुई और ताराओंसे व्याप्त हुई वह रात्रि ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो नील वस्त्र पहिने हुई और चमकीले मोतियोंके आभूषण धारण किये हुई कोई अभि-सारिणी स्त्री ही हो ॥ १७०।। जिस प्रकार मिथ्या दर्शनसे दूषित पुरुषोंको कुछ भी दिखाई नहीं देता-पदार्थके स्वरूपका ठीक ठीक ज्ञान नहीं होता उसी प्रकार गाढ़ अन्धकारसे भरे हुए लोकमें पुरुषोंको आंख खोलनेपर भी सामनेकी कुछ भी वस्तु दिखाई नहीं देती थी ।।१७१।।
श्लोक 172 से 181 चंद्रोदय और उसका प्रभाव
जबर्दस्ती अन्धकारसे घिरे हुए लोग भीतर ही भीतर व्याकुल हो रहे थे और उनकी दृष्टि भी कुछ काम नहीं देती थी इसलिये उन्होंने सोना ही अच्छा समझा था ॥ १७२।। घर घर में लगाये हुए प्रकाशमान दीपक ऐसे अच्छे सुशोभित हो रहे थे मानो अत्यन्त गाढ़ अन्धकार-को भेदन करनेके लिये बहुत सी सुइयां ही तैयार की गई हों ।॥ १७३।। इतने ही में जगत्को आनन्दित करनेवाली किरणोंसे अन्धकारको दूरसे ही नष्ट कर चन्द्रमा इस प्रकार उदय हुआ मानो लोकको दूधसे नहला ही रहा हो ।॥ १७४।। वह चन्द्रमा किसी उत्तम राजाके समान संसारको आनन्दित करता हुआ उदय हुआ था, क्योंकि जिस प्रकार उत्तम राजा अनुराग अर्थात् प्रेमसे अपने अखण्ड (संपूर्ण) मण्डल अर्थात् देशको धारण करता है उसी प्रकार वह चन्द्रमा भी अनुराग अर्थात् लालिमासे अपने अखण्डमण्डल अर्थात् प्रतिबिम्बको धारण कर रहा था और उत्तम राजा जिस प्रकार चारों ओर अपना कर अर्थात् टैक्स फैलाता है उसी प्रकार वह चन्द्रमा भी चारों ओर अपने कर अर्थात् किरणें फैला रहा था ।।१७५।। हरिणके चिह्न वाले चन्द्रमाको देखकर अन्धकारका समूह बड़ा होनेपर भी इस प्रकार भाग गया था जिस प्रकार कि हरिणको पकड़े हुए सिंहको देखकर हाथियोंका बड़ा भारी झुण्ड भाग जाता है।
॥१७६।। जिसमें ताराओंकी पङक्ति फैली हुई है ऐसा चन्द्रमाकी चांदनीका समूह उस समय ऐसा अच्छा जान पड़ता था मानो बुद्बुदों सहित ऊपरसे पड़ता हुआ आकाशरूपी समुद्रका प्रवाह ही हो ।।१७७।। हंसके बच्चे के समान वह चन्द्रमा अन्धकाररूपी शैवालको खोजता हुआ तारे रूपी हंसियोंसे भरे हुए आकाशरूपी सरोवरमें अवगाहन कर रहा था-इधर-उधर घूम रहा था ।।१७८।। समस्त अन्धकारको नष्ट कर जगत्को किरणोंसे भरते हुए चन्द्रमा-ने उस समय यह समस्त संसार अमृतमय बना दिया था ॥ १७९।। अन्धकारको दूर करके भी वह चन्द्रमा कलंकी बन रहा था सो ठीक ही है क्योंकि स्वाभाविक अन्धकार बड़े पुरुषोंसे छूटना भी कठिन है ।।१८०।। जिस प्रकार वैद्यके द्वारा तिभिर रोगको नष्ट करनेवाले हाथोंसे स्पर्श की हुई आंखें धीरे धीरे अपना प्रकाश फैलाने लगती है उसी प्रकार चन्द्रमाके द्वारा अन्धकार-को नष्ट करनेवाली किरणोंसे स्पर्श की हुई दिशाएँ धीरे धीरे अपना प्रकाश फैलाने लगी थीं ॥१८१॥
श्लोक 182 से 191 रात्रि में कामदेव का प्रभुत्व
इस प्रकार जिसमें तारागण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं ऐसा सायंकालका समय होने-पर सब स्त्रियां अपने अपने पतियोंके साथ महलोंकी छतोंपर जा पहुँचीं ।॥१८२॥ जिनके समस्त शरीरपर घिसे हुए चन्दनका लेप लगा हुआ है, जो मालाएँ धारण किये हुई हैं, कानोंमें आभूषण पहने हैं और जिनके समस्त आभरण देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसी वे स्त्रियां कल्पलताओं के समान सुशोभित हो रही थीं ॥१८३॥ उस समय चन्द्रमाकी किरणोंसे जिस प्रकार समुद्र लहराता हुआ वृद्धिको प्राप्त होने लगता है उसी प्रकार कामी मनुष्योंके मनमें काम उद्वेलित होता हुआ बढ़ रहा था ।। १८४।। सुन्दर पति, चन्द्रमाकी किरणें और चन्दन सहित मद ये सब मिलकर स्त्रियोंमें कामकी उत्पत्ति कर रहे थे ।। १८५।। चन्द्रमाकी किरणेंरूपी विजयी शस्त्रों-के द्वारा समस्त जगत्को तिरस्कृत करता हुआ कामदेव राजाकी स्त्रियोंके निवासस्थानमें भी सेना सहित जा पहुँचा था ।॥ १८६॥ तरुण स्त्रियोंने न तो मदिराका स्वाद लिया, न इच्छा नुसार उसे सूंघा और न हाथमें ही लिया, केवल कामदेवके आवेशसे ही उत्कण्ठाको प्राप्त हो गई, अर्थात् कामसे विह्वल हो उठीं ।॥ १८७॥ पतिकी गोदमें बैठी हुई और मदसे झुमटी हुई कोई स्त्री कामदेवके द्वारा मोहन अस्त्रसे ताड़ित की गई थी ।। १८८।। कामदेवसे प्रेरित हुई कोई स्त्री सखीके वचन उल्लंघन कर तथा मान छोड़कर स्वतंत्र हो अपने पतिके निवासस्थान को जा रही थी ॥१८९।। कोई स्त्री पतिके न आनेपर वापिस लौटी हुई दूतीके वचनोंसे दुखी होकर आंखोंसे आंसू छोड़ रही थी और चकवीके समान अत्यन्त विह्वल हो रही थी-तड़प रही थी ।।१९०।। शून्य हृदयसे गाये हुए स्त्रियोंके सुन्दर गीतोंसे तथा भूमरपंक्तिके मनोहर भंकारोंसे कामदेव कामी पुरुषों के लिये पूर्वरङ्ग अर्थात् नाटकके प्रारम्भमें होनेवाला एक अंग विशेष ही मानो बना रहा था । भावार्थ-उस समय स्त्रियां पतियोंकी प्राप्तिके लिये बेसुध होकर गा रही थीं और उड़ते हुए भूमरोंकी गुंजार फैल रही थी जिससे ऐसा मालूम होता था मानो कामदेवरूपी नट कामक्रीड़ारूप नाटकके पहले होनेवाले संगीत विशेष ही दिखला रहा हो । नाटकके पहले जो मंगल-संगीत होता है उसे पूर्वरङ्ग कहते हैं ॥१९१॥
श्लोक 192 से 201 प्रेम और विरह का चित्रण
गोत्रस्खलन अर्थात् भूलसे किसी दूसरी स्त्रीका नाम ले देनेसे जिसका क्रोध बढ़ रहा है ऐसी किसी अन्य नवीन ब्याही हुई स्त्रीकी भी कामदेवने उपेक्षा नहीं की थी किन्तु उसे भी पतिके समीप पहुँचा दिया था । भावार्थ-प्रौढ़ा स्त्रियोंकी अपेक्षा नवोढ़ा स्त्रियोंमें अधिक मान और लज्जा रहा करती है परन्तु उस चन्द्रोदयके समय वे भी कामसे उन्मत्त हो सब मान और लज्जा भूलकर पतियोंके पास जा पहुंची थीं ॥ १९२॥ जिस किसी स्त्रीका पति वचन देकर भी अन्य स्त्रीके पास चला गया था ऐसी अभिमानिनी खण्डिता स्त्रीके मनका संताप इतना अधिक बढ़ गया था कि उसे न तो चन्द्रमाकी किरणोंसे संतोष मिलता था, न उशीर (खस) से और न पंखेसे ही ॥ १९३॥ धीरज धारण करनेवाली कोई स्त्री कामदेवके द्वारा अत्यन्त पीड़ा देनेवाले बाणोंसे दुखी होकर भी उसका प्रतीकार नहीं करना चाहती थी। भावार्थ-अपने धैर्यगुणसे कामपीड़ाको चुपचाप सहन कर रही थी ॥ १९४॥ कोई तरुण पुरुष प्रेमसे भरी हुई अपनी अन्य स्त्रीको प्रेम करने योग्य किसी दूर स्थानमें ले गया था, वहां वह उसके कठोर अक्षरोंसे भरे हुए संदेशको चुपचाप सहन कर रही थी ॥ १९५॥ कोई स्त्री अपनी सखीसे कह रही थी कि हे सखि, सच कह कि क्या वह भूमसे मेरे विषयमें कहे हुए और अत्यन्त क्षीण अपनी प्रियाके नामके अक्षरोंसे कुछ चकित हुआ था ? ॥ १९६॥ कोई स्त्री अपने अपराधी पतिसे कह रही थी कि हे निर्लज्ज, जिसने तेरा चित्त हरण किया है क्या उसने तेरी लज्जा भी छीन ली है? क्योंकि तू फिर भी मुझपर प्रेम करना चाहता है ।।१९७।। कोई स्त्री पतिको ताना दे रही थी कि आप अपने आपको बड़ा सौभाग्यशाली समझते हैं इसलिये जाइये उसी मान करनेवाली स्त्रीकी सेवा कीजिये क्योंकि अयोग्य स्थानमें की गई प्रीति आपके संतापके लिये ही होगी। भावार्थ-मुझसे प्रेम करनेपर आपको संताप होगा इसलिये अपनी उसी प्रेयसीके पास जाइये ।।१९८।। इस प्रकार सखियोंके लिये संदेश देती हुई किसी अहंकार करनेवाली प्यारी स्त्रीको उसका तरुण पति आकर बड़े आदरके साथ नहीं मना रहा था क्या ? अर्थात् अवश्य ही मना रहा था ।। १९९।। कोई स्त्री अपनी सखीसे कह रही थी कि ये चन्द्रमा की किरणें मुझे संताप दे रही हैं, यह चन्दन जला सा रहा है और यह पंखोंकी हवा मेरी कामाग्नि को बढ़ा सी रही है ।॥ २००॥ इसलिये मनाकर या तो उन्हें यहां ले आ या मुझे ही उनके पास ले चल, यह ठीक है कि प्राणपतिके अनेक स्त्रियां हैं इसलिये उन्हें मेरी परवाह नहीं है किन्तु मेरे प्राण तो उन्हीं के अधीन हैं ।॥ २०१।।
श्लोक 202 से 211 प्रेम और युद्ध की समानता
इस प्रकार कामदेवसे पीड़ित होकर कोई स्त्री अपनी सखीसे संदेश कह ही रही थी कि इतनेमें उस नवीन विरहिणी स्त्रीको पास ही छिपे हुए उसके पतिते दोनों भुजाओंसे पकड़कर परस्पर आलिंगन किया ॥ २०२॥ उस समय मनोहर शब्द करती हुई स्त्रियोंकी करधनियां मानो यही घोषणा कर रही थीं कि आप लोग कामदेव-के इस राज्यमें इच्छानुसार क्रीड़ा करो ॥ २०३॥ उन स्त्रियोंके कर्णफूलके कमलोंमें छिपे हुए भूमरोंके समूह कोलाहल कर रहे थे और उससे ऐसा जान पड़ता था कि कामदेव स्त्रियोंके कानों के समीप लगकर कुछ गुप्त बातें ही कर रहा हो ॥२०४।। उस समय कामी लोगोंके समूहमें स्त्रियोंके स्तनोंपर लगे हुए लेपको मर्दन करनेवाला और अत्यन्त निर्दय आलिंगन वढ़ रहा था तथा वेगपूर्वक केशोंकी पकड़ा-पकड़ी भी बढ़ रही थी । २०५।। संभोगके बाद कामी लोगोंके नेत्र कुछ कुछ लाल और कलुषित हो गये थे, मुख कुछ कुछ गुलाबी अधरोंसे युक्त हो गया था तथा उससे सी सी शब्द भी बार बार हो रहा था ॥ २०६॥ संभोग-क्रियाके समाप्त होनेपर स्त्री और पुरुष दोनों ही उस शय्यापर सो गये जो कि फूलोंके संमर्दसे सुगन्धित हो रही थी और जिसपर खुलकर अधोवस्त्र पड़े हुए थे ॥२०७॥ जिन्हें होनेवाले युद्धके प्रारम्भमें बड़ा आनन्द आ रहा था ऐसे कितने ही शूरवीर योद्धाओंने इच्छा न रहते हुए भी अपनी प्यारी स्त्रियोंके आग्रहसे संभोग सुखका अनुभव किया था ॥२०८॥ कीतिरूपी स्त्री के समागमसे उत्पन्न होनेवाले सुखमें जिनकी इच्छा लग रही है ऐसे कितने ही मानी योद्धाओं ने अपनी प्यारी स्त्रियोंका आलिंगन स्वीकार नहीं किया था ॥ २०९।। ‘जब हम लोग शत्रुके योद्धाओंको जीत लेंगे तभी प्रियाका उपभोग करेंगे अन्यथा नहीं’ ऐसी प्रतिज्ञा कर कितने ही स्वाभाविक शूरवीर शय्याओंपर ही नहीं गये थे ॥ २१०।। बड़ी बड़ी इच्छाओंको धारण करने-वाले कितने ही उत्तम शूरवीरोंने बाणोंकी शय्यापर सोनेसे प्राप्त हुए भारी सुखका संकल्प किया था इसलिये ही उन्होंने प्यारी स्त्रियोंकी शय्यापर सोना अच्छा नहीं समझा था ।।२११॥
श्लोक 212 से 221 रात्रि का अंत और प्रभात
जिन्होंने अपनी स्त्रियोंके साथ अनेक शूरवीरोंकी कथाएँ कहना प्रारम्भ किया है ऐसे युद्धके सन्मुख हुए अन्य योद्धा लोगोंको सबेरा होते हुए भी बह रात जान नहीं पड़ी थी। भावार्थ -कथाएं कहते कहते रात्रि समाप्त हो गई, सवेरा हो गया फिर भी उन्हें मालूम नहीं हुआ ॥२१२।। युद्ध और संभोगमें एकसा आनन्द माननेवाले कितने ही योद्धाओंका चित्त यद्यपि युद्धके रसमें आसक्त हो रहा था तथापि उन्होंने सामने प्राप्त हुए स्त्रीसंभोगके रसका भी इच्छा-नुसार उपभोग किया था ॥ २१३॥ उन योद्धाओंने रणके प्रारम्भके समान ही संभोगका प्रारंभकिया था, क्योंकि जिस प्रकार रणका प्रारम्भ परस्परके प्रहारों (चोटों) से कठोर होता है उसी प्रकार संभोगका प्रारम्भ भी परस्परके प्रहारों अर्थात् कचग्रह, नखक्षत आदिसे कठोर था, और जिस प्रकार रणका प्रारम्भ ओठ चबाये जानेसे निर्दय होता है उसी प्रकार संभोगका प्रारम्भ भी ओठोंके चुम्बन आदिसे निर्दय था ।। २१४।। कामसे पीड़ित हुई कितनी ही स्त्रियां पतियोंका गाढ़ आलिंगन कर, चुम्वनके लिये उन्हें अपना मुख देकर और उनके साथ संभोग कर उनका मन हरण कर रही थीं ।। २१५।। आधी नजरसे देखना, भीतर ही भीतर हंसते हुए अव्यक्त शब्द कहना, असमयमें रूस जाना, बड़ी तेजी के साथ करवट बदलना भौंहोंको आड़ी तिरछी चलाना और स्वाभाविक स्नेहसे भरा हुआ झूठा छल-कपट दिखाना आदि स्त्रियों के अनेक व्यापारोंसे संभोगका एक दौर समाप्त हो जानेपर भी कामी पुरुषोंका पुनः संभोग प्रारम्भ हो रहा था और वह बड़ा ही रसीला था ।। २१६-२१७॥ २१६-२ उस समय वह रात्रि पोदनपुरके स्त्री-पुरुषोंके उस बढ़े हुए संभोगको देख नहीं सकी थी इसलिये ही मानो उलट पड़ी थी अर्थात् समाप्त हो चुकी थी-प्रातःकालके रूपमें बदल गई थी ॥ २१८।। जिसका चन्द्रमारूपी मूत्र नीचेकी ओर लटक रहा है ऐसी पश्चिम दिशारूपी स्त्री मानो यही कहती हुई खड़ी थी कि हे स्त्री पुरुषो, रहने दो, बहुत देरतक क्रीड़ा कर चुके, नहीं तो तुम दोनों ही दुःख पाओगे ॥२१९॥ सूर्यने सायंकालके समय चकवा-चकवियोंको परस्पर अलग-अलग किया था इसी संतापसे व्याप्त हुआ मानो वह फिरसे उदय होने लगा ।। २२० ।। इतनेमें ही दिनका प्रारम्भ हुआ, रात्रिका अन्धकार विलीन हो गया और सूर्यने अपनी किरणों के समूहसे पूर्वदिशाका आलिंगन किया ।। २२१॥
श्लोक 222 से 231 सूर्योदय और प्रकृति का जागरण
रात्रिका अन्धकार तो सूर्यकी लाल किरणोंसे ही नष्ट हो गया था अब तो सूर्यको केवल दिनरूपी लक्ष्मीका आलिंगन करना बाकी रह गया था ।।२२२।। सूर्य चकवियों के अनुरागके साथ ही साथ कमलोंकी शोभा बढ़ा रहा था और उदय होते ही चांदनीकी शोभाको भी चुराता जाता था-नष्ट करता जाता था ॥२२३।। सूर्यने अपने किरणरूपी हाथोंसे अन्धकाररूपी किवाड़ खोलकर दिशाओंके मुंह प्रकाशित कर दिये थे और समस्त जगत्के नेत्र खोल दिये थे ।। २२४।। वह सूर्य विजयकी इच्छा करनेवाले किसी राजाकी वृत्तिका अनुकरण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार विजयकी इच्छा करनेवाला राजा बड़े सबेरे उठकर अपने प्रतापसे पद्माकर अर्थात् लक्ष्मीका हाथ स्वीकार करता है उसी प्रकार सूर्य भी बड़े सबेरे उदय होकर अपने प्रतापसे पद्माकर अर्थात् कमलों के समूहको स्वीकार कर रहा था-अपने तेजसे उन्हें विकसित कर रहा था ॥ २२५॥ यद्यपि उस समय महाराज बाहुबली स्वयं जाग गये थे तथापि उन्हें जगानेका उद्योग करते हुए सुन्दर कण्ठवाले बंदीजन जोर जोरसे नीचे लिखे हुए मंगलपाठ पढ़ रहे थे ।। २२६।। हे पुरुषोत्तम, जो लोगोंको आनन्द देनेवाला है और लोग जिसकी प्रशंसा कर रहे हैं ऐसा यह सूर्य सब लोगोंको अच्छा लगनेवाले तेजको फैलाता हुआ इधर पूर्व दिशासे उदय हो रहा है इसलिये आप भी जगत्को प्रकाशित और लक्ष्मीको आनन्दित करनेके लिये सुर्योदयके समय होनेवाली योग्य क्रियाओंको करते हुए शय्याका मध्यभाग छोड़िये ॥ २२७॥ हे राजाओंमें श्रेष्ठ, आपकी सेनाओंने कितने कितने बलशाली राजाओंपर आक्रमण नहीं किया है, ये छोटे छोटे लोग प्रायः आपकी भुजाओंके बलको जानते भी नहीं हैं। हे नरवीर, आपने भरतेश्वरके साथ युद्धमें विजय प्राप्त करने-के लिये उद्यम किया है इसलिये विजयलक्ष्मीके स्वामी आप ही हों ।॥ २२८॥ हे देव, बगीचे-के वृक्षोंपर पड़ी हुई ओसकी बूंदोंको निरन्तर पड़ते हुए आंसुओंके समान अपनी किरणोंके समूहसे शीघ्र ही पोंछता हुआ यह सूर्य उदय हो रहा है और उदय होते समय ऐसा जान पड़ता है मानो कमलिनियोंके वन जिन्हें आनन्द प्राप्त हो रहा है ऐसे कमलोंके द्वारा अर्घ्य लेकर उसकी अगवानी ही कर रहे हों ॥ २२९।। इधर देखिये, जो दूसरे किनारेपर सो रही है और निरन्तर बहते हुए आँसुओं के बहानेसे जो मानो शोक ही छोड़ रही है ऐसी अपनी स्त्री चकवीके पीछे पीछे जाता हुआ यह चकवा कमलोंके परागसे भरे हुए अपने दोनों पंखोंको झटकाकर कमलि-नियोंके पत्तोंसे ढके हुए कमलसरोवरके तटपर धीरे धीरे प्रवेश कर रहा है ।। २३०।। यह चन्द्रमा पके हुए मृणालकी कान्तिको चुरानेवाली अपनी कान्तिको सब दिशाओंके अन्तसे खींच रहा है तथा अमृत बरसानेवाली अपनी किरणोंको प्रत्येक कुमुदिनियोंके समूहपर फैलाता हुआ वियोगके डरसे ही मानो उनके साथ आलिङ्गनके सम्बन्धको दृढ़ कर रहा है ॥२३१॥
श्लोक 232 से 241 चंद्रमा का अस्त और जिनेन्द्र की स्तुति
जो अन्धकाररूपी हाथियोंके समूहको भेदन कर उनके रक्तसे ही तर हुएके समान लाल लाल दिखनेवाले शरीर (मण्डल) को धारण कर रहा है तथा नींद आ जानेसे जिसकी नक्षत्ररूपी आंखोंकी पुतलियां तिरोहित अथवा कुटिल हो रही हैं ऐसा यह चन्द्रमारूपी सिंह वनके समान आकाशको उल्लंघन कर अब अस्ताचलकी गुहारूप एकान्त स्थानका निश्चित रूपसे आश्रय ले रहा है ।॥ २३२।। सूर्य उदय होते ही हंस, सारस पक्षियोंकी बोलीसे सहित सरोवरके किनारे पर जा रहे हैं, चकवा चकवियों के जोड़े परस्परमें इस प्रकार मिल रहे हैं मानो अब उनका शाप ही दूर हो गया हो, पक्षियोंके समूह चारों ओर शब्द करते हुए वृक्षोंपर पड़ रहे हैं और यह जगत् फिरसे अपने पहले रूपको प्राप्त हुआ सा जान पड़ता है ॥ २३३॥ उदयाचलकी चट्टानोंपर पैदा होनेवाले कमलोंके समान लाल तथा आकाशरूपी समुद्रमें मूंगाके वनकी
शोभा फैलाती हुई, दिशारूपी हाथियों के मुखपर सिन्दूरके समान दिन्वनेवाली, महावरके समान गुलाबी और दिशाओंके मुखोंको अलंकृत करनेवाली यह प्रभात-संध्याकी कान्ति चारों ओर बड़ी तेजीसे फैल रही है ॥ २३४।। हे नाथ, यह खिला हुआ कमल काल सूर्यकी फैलने-वाली किरणोंसे लाल लाल हो रहा है और ऐसा मालूम होता है मानो अग्निके फैलते हाए, फुलिगों-से व्याप्त ही हो रहा हो तथा इसी भयसे यह भूमरी उसमें प्रवेश करनेके लिये समर्थ नहीं हो रही है। आचार्य कहते हैं कि जिसमें आपत्ति सदा निश्चित रहती है और जो विवेकसे पराङ्मुख है ऐसी मूर्खताको धिक्कार है ॥ २३५॥ हे राजन्, जो उपवनके वृक्षोंको हिला रहा है, भूमरोंको चंचल कर रहा है, जिसने कमलों के तालाबमें लहरोंके साथ परिचय प्राप्त किया है, जो स्त्री-पुरुषोंके संभोगकी सुगन्धिको खींच रहां है और जो कमलों के परागसे भारी हो रहा है ऐसा यह प्रातःकालका वायु सब दिशाओंमें धीरे धीरे बह रहा है ॥ २३६॥ हे राजाओंमें श्रेष्ठ, जिनमें जय जयकी घोषणा प्रकट रूपसे की गई है ऐसे जिनेन्द्र भगवान्के इन इष्ट मंगलोंसे आप फिरसे जग जाइये क्योंकि इन्हीं मंगलोंके द्वारा रणके अग्रभागमें विजयलक्ष्मी रूपी स्त्रीको चाहनेवाले आपके समस्त विघ्नोंकी अच्छी तरह शान्ति होगी ।।२३७।।
अनेक इन्द्रोंके द्वारा जिन्हें पूजाकी ऋद्धि प्राप्त हुई है, जिन्होंने पापरूपी धूल नष्ट कर डाली है, जो वीतराग हैं-जिन्होंने रागद्वेष नष्ट कर दिये हैं और नमस्कार करते हुए इन्द्रों के देदीप्य-मान मुकुटके रत्नोंसे मिली हुई सुन्दर किरणोंकी मंजरीसे जिनके चरण कुछ कुछ पीले हो रहे हैं ऐसे श्री अर्हन्तदेव सदा जयवन्त रहें ।॥ २३८ ॥ जिनके भीतर भूमरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं और उनसे जो ऐसे मालूम होते हैं मानो अपनी पराजयके शोकसे रोते हुए कामदेव-के करुण कन्दनको ही प्रकट कर रहे हों तथा उसी हारे हुए कामदेवने अपने पुष्परूपी शस्त्र भगवान्के चरण-युगलके सामने डाल रक्खे हों ऐसे पुष्पोंके समूहसे जिनके विजयकी लीला सूचित होती है वे प्रथम जिनेन्द्र श्री वृषभदेव जयवन्त हों ।॥ २३९॥ जिन्होंने कामदेवको जीत लिया है, जिनका तेज अपार है, जो स्वयंभू हैं, जिनपति हैं, वीतराग हैं, जिन्होंने पाप रूपी धूलि धो डाली है, जिनके चरणकमलोंकी शोभा देव लोगोंने अपने मुकुटके अग्रभागपर धारण कर रक्खी है और जिनका ज्ञान लोक अलोक रूपी घरके अन्त तक फैला हुआ है ऐसे श्री प्रथम जिनेन्द्र सदा जयवन्त रहें ।॥ २४०॥ जिनकी आत्मा कामदेवके बाणोंसे घायल नहीं हुई है तथापि जिन्होंने तीनों लोकोंकी जयलक्ष्मीरूपी स्त्रीको अपने वक्षःस्थलपर धारण किया है और मुक्तिरूपी स्त्रीने जिन्हें स्वयं वर बनाया इसके सिवाय वह मुक्तिरूपी स्त्री विरूपा अर्थात् कुरूपा (पक्षमें आकाररहित) होकर भी जिनके लिये उत्कृष्ट सुख-समूहको बढ़ा रही है वे अर्हन्तदेव सदा जयवन्त हों ।। २४१।।
श्लोक 242 से 249 बाहुबली का युद्ध के लिए प्रस्थान
जिन्होंने जगद्विजयी कामदेवरूपी शत्रुको नष्ट करनेके लिये न तो युद्धके नगाड़ोंके भयंकर शब्दोंसे भीषण तथा शब्द करते हुए धनुषोंसे युक्त सेना ही रची और न अपना मुंह ही भौंहोंसे टेढ़ा किया वे प्रथम जिनेन्द्र भगवान् वृषभ-देव सदा जयवन्त रहें ।॥ २४२।। जो सब जगत्के स्वामी हैं, कामदेवरूपी योद्धा भी जिन्हें जीतने- के लिये समर्थ नहीं हो सका तथा जिनके सामने, देवोंको जीतनेसे जिसका अहंकार बढ़ गया है ऐसा कामदेव भी शस्त्र और सामर्थ्यके कुण्ठित हो जानेसे हृदयमें अहंकार धारण नहीं कर सका ऐसे अचिन्त्य प्रभावके धारक वे प्रसिद्ध जिनेन्द्रदेव सदा जयवन्त रहें ।। २४३।। अशोक वृक्ष, दुन्दुभि, पुष्पवृष्टि, चमर, उत्तम सिंहासन, अनुपम वचन, ऊंचा छत्र और भामण्डल ये आठ प्रातिहार्य जिनके तीनों लोकोंको जीतने के चिह्न हैं वे सबका हित करनेवाले श्री वृषभ-जिनेन्द्र सदा जयवन्त रहें ।॥२४४।। जिनके चरणकमल जन्मरूप संतापको नष्ट करनेवाले हैं, स्वर्ग मोक्ष आदि बड़े बड़े फल देनेवाले हैं, दूरसे नमस्कार करते हुए इन्द्र ही जिनके भूमर हैं और जो शरणमें आये हुए लोगोंको कल्पवृक्षके समान संतुष्ट करनेवाले हैं ऐसे वे तीर्थ कर भगवान् सदा विजयी हों और अपने विशाल माहात्म्यसे तुम सबकी रक्षा करें ।॥ २४५॥ हे पुरुषोत्तम, महाराज भरत भी आपके दोनों भुजारूपी अर्गलदण्डोंकी तुलना नहीं प्राप्त कर सकते हैं, अथवा भुजाओंका बल तो दूर रहे, जब आप युद्धके निकट जा पहुँचते हैं तब आपके देखने मात्रसे ही ऐसा कौन राजा है जो आपके सामने खड़ा रहनेके लिये समर्थ हो सके ।।२४६।। इसलिये हे अधीश्वर, समय व्यतीत करना व्यर्थ है, निद्रा छोड़िये, इस महान् कार्यमें सदा जाग-रूक रहिये और शीघ्र ही विजयलक्ष्मीको पाकर अन्य सब जगह विजय प्राप्त करनेके लिये सबपर शासन करनेवाले देवाधिदेव जिनेन्द्रदेवको भक्तिपूर्वक फिरसे नमस्कार कीजिये ।।२४७।। इस प्रकार जिनमें अच्छे अच्छे पदोंकी योजना की गई है ऐसे अनेक प्रकारके उत्कृष्ट तथा राजाओंके योग्य, विजय करानेवाले मंगल-गीतोंके द्वारा बाहुबली महाराज विजय प्राप्त करनेके लिये जगे और जिस प्रकार ऐरावत हाथी निद्रा छूट जानेसे गंगाके किनारे-की भूमिका साथ धीरे धीरे छोड़ता है उसी प्रकार उन्होंने भी निद्रा छूट जानेसे धीरे धीरे शय्या-का साथ छोड़ दिया ॥ २४८॥ सेनाके मुख्य मुख्य लोगों के द्वारा जिसकी शोभा बढ़ रही है, जो स्वयं विशाल पराक्रम धारण किये हुए हैं और कितने ही राजा लोग दूर दूरसे आकर प्रणाम करते हुए जिसे देखना चाहते हैं ऐसा वह तरुण बाहुबली मदोन्मत्त विजयी हाथियोंकी घटाओंसे दिशाओंको रोकता हुआ सेनाके साथ साथ युद्धके योग्य भूमिमें जा पहुँचा ॥२४९।।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत तिरसठशलाकापुरुषोंका वर्णन करनेवाले महापुराणसंग्रहमें कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन करनेवाला पैतीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ।
पर्व 35 सारांश
पर्व 36
हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 | पर्व 34
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 | पर्व 34 |
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena