आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 भगवान के शरीर का वैभव
भगवान का शरीर सुंदर, सुगंधित, लक्षणयुक्त और दैदीप्यमान है। यह विकार-मल से मुक्त, वज्रमय संधियों वाला और अपार शक्ति का धारक है। यह सूर्य-सा तेजस्वी और स्वर्ग से रत्न-धारा लाता है। जन्म पर फूलों की वृष्टि और अभिषेक ने उनका माहात्म्य फैलाया। तपकल्याणक में देव उनकी सेवा करते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
तब वपुरामिलत्सकलशोभासमुदयमस्तवस्त्रमपि रम्यम् । अतिरुचिरस्य रत्नमणिराशेरपवरणं किमिष्टमुरुदीप्तेः ॥१३२॥
हे नाथ, जिसमें समस्त शोभाओं का समुदाय मिल रहा है ऐसा यह आपका शरीर वस्त्ररहित होने पर भी अत्यंत सुंदर है सो ठीक ही है क्योंकि विशाल कांति को धारण करने वाले अतिशय दैदीप्यमान रत्न मणियों की राशि को वस्त्र आदि से ढक देना क्या किसी को अच्छा लगता है ? अर्थात् नहीं लगता ।।132।।
O Lord! Your body, which embodies the essence of all beauty, remains supremely radiant and enchanting even without clothing. And rightly so—for who would wish to cover a collection of brilliantly shining, resplendent jewels with garments? ( 132)
श्लोक ( Shlok ) 133 – 134
“स्विदिरहितं विहीनमलदोषं सुरभितरं सुलक्ष्मघटितं ते । क्षतजवियुक्तमस्ततिमिरौधं व्यपगतधातु वज्रघन संधि ॥१३३॥
समचतुरामप्रमितवीर्य प्रियहितवाग्निमेषपरिहीनम् । बपुरिदमच्छदिव्यमणिदीप्रं त्वमसि ततोऽधि देवपदभागी ॥ १३४॥
हे भगवन् आपका यह शरीर पसीना से रहित है, मलरूपी दोषों से रहित है, अत्यंत सुगंधित है, उत्तम लक्षणों से सहित है, रक्तरहित है, अंधकार के समूह को नष्ट करने वाला है, धातुरहित है, वज्रमयी मजबूत संधियों से युक्त है, समचतुरस्र संस्थान वाला है, अपरिमित शक्ति का धारक है, प्रिय और हितकारी वचनों से सहित है, निमेषरहित है, और स्वच्छ दिव्य मणियों के समान दैदीप्यमान है इसलिए आप देवाधिदेव पद को प्राप्त हुए हैं ।।133-134।।
O Bhagavan! Your body is free from sweat, devoid of impurities, highly fragrant, adorned with auspicious marks, without blood, capable of dispelling all darkness, free from earthly elements, strengthened by diamond-like joints, perfectly symmetrical, endowed with infinite power, filled with words that are pleasing and beneficial, free from blinking, and shines like pure divine jewels. Therefore, You have attained the supreme position as the Lord of all gods. ( 133-134)
श्लोक ( Shlok ) 135
इदमतिमानुषं तव शरीरं सकलविकारमोहमदहीनम् । प्रकटयतीश ते भुवनलङ्घि प्रभुतम वैभवं कनककान्ति ॥१३५॥
हे स्वामिन् समस्त विकार, मोह और मद से रहित तथा सुवर्ण के समान कांतिवाला आपका यह लोकोत्तर शरीर संसार को उल्लंघन करने वाली आपकी अद्वितीय प्रभुता के वैभव को प्रकट कर रहा है ।।135।।
O Lord! Your transcendental body, radiant like pure gold and free from all impurities, delusion, and pride, clearly reveals the unparalleled majesty of Your divine supremacy, which enables one to transcend the worldly existence. ( 135)
श्लोक ( Shlok ) 136
स्पृशति नहि भत्रन्तमागश्च यः किमु दिनपमभिद्रवेत्तामसम् । वितिमिर” सभवान् अगत्साधने ज्वळदुरुमहसा प्रदीपायते ॥१३६॥
हे अंधकार से रहित जिनेंद्र, पापों का समूह कभी आपको छूता भी नहीं है सो ठीक ही है क्योंकि क्या अंधकार का समूह भी कभी सूर्य के सम्मुख जा सकता है ? अर्थात् नहीं जा सकता । हे नाथ आप इस जगत्रूपी घर में अपने दैदीप्यमान विशाल तेज से प्रदीप के समान आचरण करते हैं ।।136।।
O Jinedra, free from all darkness! Sin can never touch You, and rightly so—for can a mass of darkness ever stand before the sun? Certainly not. O Lord! In this worldly existence, You shine like a radiant lamp, illuminating the path for all beings. ( 136)
श्लोक ( Shlok ) 137
रैधारा ते द्युसम बतारेऽपप्त न्नाकेशानां पदविमशेषां रुध्वा : स्वर्गादारात् कनकमयी वा सृष्टिं तन्वानासौ भुवनकुटीरस्यान्तः ॥१३७॥
हे भगवन् आपके स्वर्ग से अवतार लेने के समय (गर्भकल्याणक के समय) रत्नों की धारा समस्त आकाश को रोकती हुई स्वर्गलोक से शीघ्र ही इस जगत्रूपी कुटी के भीतर पड़ रही थी और वह ऐसी जान पड़ती थी मानो समस्त सृष्टि को सुवर्णमय ही कर रही हो ।।137।।
O Bhagavan! At the time of Your descent from heaven (during the Garbha Kalyanak), streams of precious jewels poured down from the celestial realms, filling the entire sky and swiftly entering this worldly abode. They appeared as if they were transforming the entire creation into pure gold. ( 137)
श्लोक ( Shlok ) 138
रैधारैरावतकरदीर्घा रेजे रे जेतारं भजत जना इत्येवम् । मूर्तीभूता तव जिनलक्ष्मी र्लोके संबोधं वा सपदि समातन्वाना ॥१३८ ॥
हे जिनेंद्र, ऐरावत हाथी की सूंड़ के समान लंबायमान वह रत्नों की धारा ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो आपकी लक्ष्मी ही मूर्ति धारण कर लोक में शीघ्र ही ऐसा संबोध फैला रही हो कि अरे मनुष्यो, कर्मरूप शत्रुओं को जीतने वाले इन जिनेंद्र भगवान् की सेवा करो ।।138।।
O Jinedra! That flowing stream of jewels, gracefully extending like the trunk of the divine Airavata elephant, shone brilliantly. It seemed as if Your divine prosperity had taken a visible form, swiftly spreading a message across the world—”O humans! Serve Lord Jinedra, the conqueror of the enemies called karma.” ( 138)
श्लोक ( Shlok ) 139
त्वत्संभूतौ सुरकरमुक्ता व्योम्नि पौष्पी वृष्टिः सुरभितरा संरेजे+ मत्तालीनां कलरुतमातन्वाना नाकस्त्रीणां नयनततिर्वा यान्ती ॥१३९॥
हे भगवन् आपके जन्म के समय आकाश से देवों के हाथों से छोड़ी गयी अत्यंत सुगंधित और मदोन्मत्त भ्रमरों की मधुर गुंजार को चारों ओर फैलाती हुई जो फूलों की वृष्टि हुई थी वह ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो देवांगनाओं के नेत्रों की पंक्ति ही आ रही हो ।।139।।
O Bhagavan! At the time of Your birth, a shower of exquisitely fragrant flowers was released from the hands of celestial beings. Spreading the sweet humming of intoxicated bees in all directions, this divine floral rain appeared as if it were the very gaze of celestial maidens descending from the heavens. ( 139)
श्लोक ( Shlok ) 140
मेरोः शृङ्गे समजनि दुग्धाम्मोधेः स्वच्छाम्भोभिः कनकघटैगम्भीरैः । माहात्म्यं ते जगवि वितन्वम्भावि स्वधौरे यैर्गुरुरभिषेकः पूतः ॥१४०॥
हे स्वामिन् इंद्रों ने मेरुपर्वत के शिखर पर क्षीरसागर के स्वच्छ जल से भरे हुए सुवर्णमय गंभीर (गहरे) घड़ों से जगत् में आपका माहात्म्य फैलाने वाला आपका बड़ा भारी पवित्र अभिषेक किया था ।।140।।
O Lord! The Indras performed Your grand and sacred consecration atop the peak of Mount Meru. Using deep golden vessels filled with the pure waters of the Ocean of Milk, they carried out this divine anointment, spreading Your glory throughout the world. ( 140)
श्लोक ( Shlok ) 141
त्वां निष्क्रान्तौ मणिमययामारूढं वोढुं सज्जा वयमिति नैतच्चित्रम् । आनिर्वाणान्नि यतममी गीर्वाणाः किंकुर्वाणा ननु जिन कल्याणे ते ॥१४१॥
हे जिन तपकल्याणक के समय मणिमयी पालकी पर आरूढ़ हुए आपको ले जाने के लिए हम लोग तत्पर हुए थे इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है क्योंकि निर्वाण पर्यंत आपके सभी कल्याणकों में ये देव लोग किंकरों के समान उपस्थित रहते हैं ।।141।।
O Jina! During Your Tapa Kalyanak, we were eager to carry You, seated in a jewel-adorned palanquin. There is no wonder in this, for these celestial beings always remain present like humble servants during all of Your auspicious events, up until Nirvana. ( 141)
श्लोक 142 से 151
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131