आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71
श्लोक 72 से 81 मुक्त जीव की स्वतंत्रता
जो जीव जन्म, जरा, और मरण से मुक्त है, वह तप या अन्य आवास की इच्छा नहीं करता। वह समस्त दोषों से रहित, गुणों से युक्त, परमात्मा और उत्कृष्ट ज्योतिस्वरूप है, वही परमेष्ठी कहलाता है। कामरूपी होना (इच्छानुसार अवतार लेना) आप्त का लक्षण नहीं, क्योंकि कामरूपी रागयुक्त और अकृतकृत्य होता है। जैसे बेड़ी में बंधा जीव इष्ट स्थान तक नहीं पहुंच सकता, वैसे ही कर्मबद्ध जीव स्वतंत्र नहीं। कर्ममुक्त जीव स्वतंत्रता प्राप्त करता है। संसारी जीव की परतंत्रता के वर्णन से मुक्त जीव की स्वतंत्रता स्पष्ट होती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
भवेच्च न तपःकामो वीतजातिजरामृतिः । नावासान्तरमन्विच्छेदात्मवासे च सुस्थितः ॥७२॥
जिसके जन्म, जरा और मरण नष्ट हो चुके हैं वह कभी तपकी इच्छा नहीं करता तथा जो आत्मारूपी घरमें सुखसे स्थित रहता है वह कभी दूसरे आवासकी इच्छा नहीं करता ।। ७२।।
He in whom birth, decay, and death have been utterly extinguished harbours no desire for austerities; and he who abides blissfully in the dwelling of the soul seeks no other abode.72
श्लोक ( Shlok ) 73
स एवमखिलैर्दोषैर्मुक्तो युक्तोऽखिलैर्गुणैः । परमात्मा परं ज्योतिः परमेष्ठीति गीयते ॥७३॥
इस प्रकार जो समस्त दोषोंसे रहित है, समस्त गुणोंसे सहित है, परमात्मा है और उत्कृष्ट ज्योति स्वरूप है वही परमेष्ठी कहलाता है ।। ७३।।
He who is utterly free from all blemishes, endowed with every noble virtue, who is the Supreme Soul and the embodiment of supreme radiance—that exalted one alone is called the Parameṣṭhī. ॥73॥
श्लोक ( Shlok ) 74
कामरूपित्वमाप्तस्य लक्षणं चेन्न साम्प्रतम्। सरागः कामरूपी स्याद् कृतार्थश्च सोऽञ्जसा ॥७४।।
कदाचित् आप यह कहें कि कामरूपित्व अर्थात् इच्छानुसार अनेक अवतार धारण करना आप्तका लक्षण है तो आपका यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि जो कामरूपी होता है वह अवश्य ही रागसहित तथा अकृतकृत्य होता है ।। ७४।।
Should you assert that the ability to assume manifold forms at will—Kāmarūpitva—is a characteristic of the Enlightened One, such a claim would be incorrect. For one who manifests at will is necessarily bound by attachment and remains unfulfilled in his spiritual purpose. ॥74॥
श्लोक ( Shlok ) 75
प्रकृतिस्थेन रूपेण प्राप्तुं यो नालमीप्सितम्। स वैकृतेन रूपेण कामरूपी कथं सुखी ॥७५।। इति पुरुषनिदर्शनम् ।
जो स्वाभाविक रूपसे अपना इष्ट प्राप्त करनेके लिये समर्थ नहीं है वह कामरूपी विकृत रूपसे कैसे सुखी हो सकता है ? ॥७५॥ यह पुरुषका उदाहरण कहा, अब निगलका उदाहरण कहते हैं।
He who is, by his very nature, incapable of attaining his true good—how can such a one, assuming distorted forms at will, ever know true happiness? ॥75॥
Thus ends the illustration of the man; now follows the illustration of the shackle.
श्लोक ( Shlok ) 76
निगलस्थो यथानेष्टं गन्तु देशमलन्तराम् । कर्मबन्धनबद्धोऽपि नेष्टं धाम तथे यृयात् ॥७६॥
जिस प्रकार निगल अर्थात् बेड़ीमें बंधा हुआ जीव अपने इष्ट स्थानपर जानेके लिये समर्थ नहीं होता है उसी प्रकार कर्मरूप बन्धनसे बंधा हुआ जीव भी अपने इष्ट स्थानपर नहीं पहुंच सकता ।।७६।।
Just as a being bound in shackles is unable to reach the place he desires, even so, a soul ensnared in the bondage of karma is incapable of attaining its true abode. ॥76॥
श्लोक ( Shlok ) 77
यथेह बन्धनान्मुक्तः परं स्वातन्त्र्यमृच्छति । कर्म बन्धनमुक्तोऽपि तथोपाच्छे ‘त् स्वतन्त्रताम् ॥७७॥
जिस प्रकार इस लोकमें बन्धनसे छूटा हुआ पुरुष परम स्वतन्त्रताको प्राप्त होता है उसी प्रकार कर्मबन्धनसे छूटा हुआ पुरुष भी स्वतन्त्रताको प्राप्त होता है ॥७७॥
Just as a man freed from worldly bondage attains supreme freedom in this world, even so does the one released from the fetters of karma attain true liberation. ॥77॥
श्लोक ( Shlok ) 78
निगलस्थो विपाशश्च स एवैकः पुमान्यथा । कर्मबद्धो विमुक्तश्च स एवात्मा मतस्तथा ॥७८॥इति निगलनिदर्शनम् ।
और जिस प्रकार बेड़ीसे बंधा हुआ तथा बेड़ीसे छूटा हुआ पुरुष एक ही माना जाता है उसी प्रकार कर्मोंसे बंधा हुआ तथा कर्मोंसे छूटा हुआ पुरुष भी एक ही माना जाता है ॥७८॥यह निगलका उदाहरण है,
And just as the man bound by shackles and the man freed from them are regarded as one and the same person, even so is the soul, whether bound by karma or freed from it, considered to be the same. ॥78॥This is the illustration of the shackle (nigala).
श्लोक ( Shlok ) 79
मुक्तेतरात्मनोर्व्यक्त्यै द्वयमेतन्निदर्शितम् । तद् दृढीकरणायेष्टं सत्संसारिनिदर्शनम् ॥७९॥
इस प्रकार मुक्त और संसारी आत्माओंको प्रकट करनेके लिये ये दो उदाहरण कहे, अब उक्त कथनको दृढ़ करनेके लिये संसारी जीवोंका उदाहरण कहना चाहिये ।।७९।।
Thus, to reveal the nature of both the liberated and the worldly souls, these two illustrations have been given. Now, to firmly establish the aforesaid doctrine, an example from the life of embodied souls shall be presented. ॥79॥
श्लोक ( Shlok ) 80
यत्संसारिणमात्मानमूरीकृत्यान्यतन्त्रताम् । तस्योपदेशे मुक्तस्य स्वातन्त्र्योपनिदर्शनम् ॥८०॥
संसारी जीवोंको लेकर जो उनकी परतन्त्रताका कथन करना है उनकी उसी परतन्त्रता के उपदेशमें मुक्त जीवोंकी स्वतन्त्रताका उदाहरण हो जाता है। भावार्थ संसारी जीवोंकी परतन्त्रताका वर्णन करनेसे मुक्त जीवोंकी स्वतन्त्रताका वर्णन अपने आप हो जाता है क्योंकि संसारी जीवोंकी परतन्त्रताका अभाव होना ही मुक्त जीवोंकी स्वतन्त्रता है ॥८०॥
In illustrating the bondage of worldly beings, the very lesson of the liberated soul’s freedom is inherently conveyed. In essence, the portrayal of the dependence and subjugation of the worldly soul naturally reveals the independence of the liberated one—for the absence of the worldly soul’s bondage is itself the hallmark of the liberated soul’s freedom. ॥80॥
श्लोक ( Shlok ) 81
मतः संसारिदृष्टान्तः सोऽयमाप्तीयदर्शने। मुक्तात्मनां भवेदेवं स्वातन्त्र्यं प्रकटीकृतम् ॥८१॥
अरहंत देवके मतमें संसारीका उदाहरण वही माना गया है कि जिसमें मुक्त जीवोंकी स्वतन्त्रता प्रकट हो सके ॥८१॥
According to the doctrine of the Divine Arhat, that alone is deemed a true illustration of the worldly soul wherein the freedom of the liberated soul may be clearly revealed. ॥81॥
श्लोक 82 से 91
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