ऋतुओं में सुभद्रा के साथ क्रीड़ा
वसन्त का चैत्र मास सुगन्ध से भरा है, और मलय-वायु कामदेव की घोषणा-सी करता है। ग्रीष्म में सुभद्रा जल-स्नान और चन्दन-लेप से भरत को शान्त करती है। मालती-मालाएं पहनकर वह रातें प्रेममयी बनाती है। वर्षा में वह मेघ-गर्जना से भयभीत होकर भरत से आलिंगन करती है। नदियों, मयूरों, और बक-फूलों की सुगन्ध कामी लोगों को सन्तुष्ट करती है।
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
पुष्पच्चूतवनोद्ङ्गन्धि त्फुल्लकमलाकरः । पप्रथेसुरभिर्मासः सुरभीकृतदिग्मुखः ॥१२२॥
फूले हुए आमके वनोंसे जो अत्यन्त सुगन्धित हो रहा है, जिसमें कमलोंके समह फूले हुए हैं और जिसने समस्त दिशाएं सुगन्धित कर दी हैं ऐसा वह वसन्तका चैत्र मास चारों ओर फैल रहा था ।।१२२।।
The month of Chaitra, that springtime spreading forth from the blossoming mango groves, richly fragrant, where clusters of lotuses bloom in abundance and the entire realm is suffused with sweet scent.122
श्लोक ( Shlok ) 123
हृतालिकुलझङ्कारः सञ्चरन्मलयानिलः । अनङ्गनृपतेरासीद् घोषयन्निव शासनम् ॥ १२३॥
भ्रमर समूह की झंकार को हरण करनेवाला, चारों ओर फिरता हुआ मलयसमीर ऐसा जान पड़ता था मानो कामदेवरूपी राजाके शासनकी घोषणा ही कर रहा हो ।॥ १२३॥
The gentle Malaya breeze, sweeping away the buzzing chorus of the bees as it wandered everywhere, seemed as though it proclaimed the reign of the king—Kamadeva himself.123
श्लोक ( Shlok ) 124
सन्ध्या रुणां कलामिन्दोर्मेने लोको जगद्मसः। करालामिव रक्ताक्तां” दंष्ट्रां मदनरक्षसः ॥१२४।॥
उस समय सन्ध्याकालकी लालीसे कुछ कुछ लाल हुई चन्द्रमा की कलाको लोग ऐसा मानते थे मानो जगत्को निगलनेवाले कामदेवरूपी राक्षसकी रक्तसे भीगी हुई भयंकर डांढ़ ही हो ॥ १२४॥
At that time, the crescent moon, tinged faintly red by the hues of twilight, appeared to onlookers as the blood-stained fang of some fearsome demon—none other than Kamadeva, poised to devour the world.124
श्लोक ( Shlok ) 125
उन्मत्तकोकिल काले तस्मिन्नुत्मत्तषट्पदे । नानुन्मत्तो जनः कोऽपि मुक्त्वानङ्ग “द्रु हो मुनीन् ॥ १२५।।
जिसमें कोयल और भ्रमर सभी उन्मत्त हो जाते हैं ऐसे उस वसन्तके समय कामदेवके साथ द्रोह करनेवाले मुनियोंको छोड़कर और कोई ऐसा मनुष्य नहीं था जो उन्मत्त न हुआ हो ।॥ १२५॥
In that season of spring, when both cuckoos and bees are overcome with rapture, there was none—save the ascetics who defy Kamadeva—who did not fall under its intoxicating sway.125
श्लोक ( Shlok ) 126
सायमुदगाह निर्णेक्तैः रङ्गैस्तुहिनशीतलैः । ग्रीष्मे मदनतापातं सास्याङ्गं निरवापयत् ॥ १२६॥
सायंकालके समय जलमें अवगाहन करनेसे जो स्वच्छ किये गये हैं और जो बर्फके समान शीतल हैं ऐसे अपने समस्त अंगोंसे वह सुभद्रा ग्रीष्मकालमें कामके संतापसे संतप्त हुए भरतके शरीरको शान्त करती थी ।। १२६।।
In the summer season, Subhadra—her limbs purified by evening ablutions and cooled to a snowy touch—soothed the body of Bharata, scorched by the fever of desire.126
श्लोक ( Shlok ) 127
चन्दनद्रवसंसिक्तसुन्दराङ्गलतां प्रियाम् । परिरभ्य दृढं दोर्भ्यां स लेभे गात्रनिवृतिम् ॥ १२७।।
जिसकी शरीररूपी सुन्दर लतापर घिसे हुए चन्दनका लेप किया गया है ऐसी अपनी प्रिया सुभद्राको भरत महाराज दोनों हाथोंसे गाढ़ आलिंगन कर अपना शरीर शान्त करते थे ।।१२७॥
Upon the graceful vine of her body, anointed with smooth, cooling sandal paste, King Bharata would draw his beloved Subhadra into a close embrace with both arms, calming the heat of his own body.127
श्लोक ( Shlok ) 128
मदनज्वरतापार्तां तीव्रग्रीष्मोष्मनिःसहाम्। स तां निर्वापयामास स्वाङ्गस्पर्शसुखाम्बुभिः ॥१२८॥
जो कामज्वरके संतापसे पीड़ित हो रही है और जिसे ग्रीष्मकालकी तीव्र गर्मी बिलकुल ही सहननहीं हो सकती ऐसी उस सुभद्राको महाराज भरत अपने शरीरके स्पर्शसे उत्पन्न हुए सुखरूपी जलसे शान्त करते थे ।। १२८।।
Afflicted by the fever of desire and unable to endure the fierce heat of summer, Subhadra was soothed by King Bharata—who, with the cooling touch of his body, bathed her in a stream of comfort and delight.128
श्लोक ( Shlok ) 129
उत्फुल्लमल्लिका मोदवाहिभिर्गन्धवाहिभिः । स सायंप्रातिकैर्भेजे धृंति रतिसुखाहरैः ॥१२९॥
खिली हुई मालतीकी सुगंधको धारण करनेवाले तथा रतिसमय में सुख पहुंचानेवाले सायंकाल और प्रातःकालकी वायुके द्वारा चक्रवर्ती भरत बहुत ही अधिक संतोष प्राप्त करते थे ॥ १२९॥
Embracing the fragrance of blooming Mālatī blossoms, the evening and morning breezes brought profound delight to Emperor Bharata, especially in moments of love’s union.129
श्लोक ( Shlok ) 130
उत्फुल्लपाटलोद्गन्धि मल्लिकामालभारिणीम्। उपगूह्य प्रियां प्रेम्णा नैदाघीसोऽनय न्निशाम् ।।१३०॥
फूले हुए गुलाबकी सुगन्धयुक्त मालतीकी मालाओं-को धारण करनेवाली उस सुभद्राको आलिंगन कर महाराज भरत बड़े प्रेमसे ग्रीष्मकालकी रात व्यतीत करते थे ।।१३०।।
Adorned with garlands of Mālatī blossoms, fragrant with the scent of blooming roses, Subhadra was embraced by King Bharata, who spent the summer nights in her arms, immersed in deep and tender love.130
श्लोक ( Shlok ) 131
सा घनस्तनितव्याजात् तर्जितेव मनोभुवा । भुजोपपीडमाश्लिप्य शिश्ये पत्या तपात्यये ॥१३१॥
वर्षाऋतुमें मेघों की गर्जना के बहानेसे मानो कामदेवने जिसे घुड़की दिखाकर भयभीत किया है ऐसी वह सुभद्रा भुजाओंसे आलिंगनकर पतिके साथ शयन करती थी ।।१३१।।
In the season of rains, as though the thunderous roar of clouds were the stern rebuke of Kāma himself, meant to strike fear into her heart, Subhadrā, trembling, sought solace in her husband’s embrace, and lay entwined with him in loving repose.131
श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
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