आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11
श्लोक 1 से 11 गंधकुटी का निर्माण और उसकी शोभा
कुबेर ने सुमेरु के तीसरे पीठ पर रत्नजटित, पवित्र गंधकुटी बनाई। यह इंद्रधनुष रचती, फूलों और चमरों से शोभती थी। सूर्य से स्पर्धा करती यह स्वर्ग के विमानों को लज्जित करती थी। ऊँचे शिखरों और पताकाओं से यह देवों को बुलाती-सी लगती थी।
श्लोक 12 से 21 गंधकुटी की अलौकिक सुंदरता
गंधकुटी तीन पीठों सहित लक्ष्मी की प्रतिमा-सी थी। मोतियों, सुवर्ण जालियों और रत्नमालाओं से अलंकृत यह भ्रमरों और स्तोत्रों से स्तुति करती-सी लगती थी। सुगंध, फूल और धूप से यह स्त्री-सी शोभती थी।
श्लोक 22 से 31 सिंहासन और भगवान की उपस्थिति
गंधकुटी ने सुगंध से दिशाएँ भर दीं। यह छह सौ धनुष विस्तृत थी। इसके मध्य रत्नमय सिंहासन पर भगवान वृषभदेव अधर विराजमान थे। इंद्र ने फूल बरसाए, जो भ्रमरों से गूंजते थे।
श्लोक 32 से 41 पुष्पवर्षा और अशोक वृक्ष
पुष्पवर्षा ने बारह योजन तक पराग फैलाया। भगवान के समीप अशोक वृक्ष रत्नमय पत्तों और फूलों से नृत्य करता और स्तुति करता था। इंद्र ने इसे मुख्य वृक्ष बनाया।
श्लोक 42 से 51 छत्र और चमरों की शोभा
तीन सफेद छत्र चंद्रमा को जीतते थे, रत्नों से जड़े थे। यक्षों के चमर क्षीरसागर-से लगते थे, जो आकाशगंगा-सी शोभती थीं। ये भगवान के यश को प्रकट करते थे।
श्लोक 52 से 61 चमर और दुंदुभि का वैभव
चमरों की संख्या चौंसठ थी, जो चक्रवर्ती से राजा तक घटती थी। ये चंद्रमा-सी कांति से स्पर्धा करते थे। दुंदुभि मधुर शब्द करते थे, जिन्हें मयूर प्रेम से देखते थे।
श्लोक 62 से 71 दिव्यध्वनि और प्रभामंडल
नगाड़े गंभीर शब्द करते थे। समवसरण भूमि भगवान की प्रभा से शोभती थी, जिसमें सात भव दिखते थे। उनकी दिव्यध्वनि सर्वभाषारूप थी, जो मोह नष्ट करती थी।
श्लोक 72 से 81 समवसरण का वर्णन
दिव्यध्वनि भगवान का गुण थी। समवसरण में भगवान सिंहासन पर थे। सभा पताकाओं, सरोवरों और परिखा से शोभती थी, जो इंद्रों को बुलाती-सी लगती थी।
श्लोक 82 से 91 समवसरण की संरचना
समवसरण नृत्यशालाओं, धूपघटों, वनों, ध्वजाओं और कल्पवृक्षों से युक्त थी। स्फटिक कोट और श्रीमंडप इसे अलंकृत करते थे। सौधर्मेंद्र ने इसमें प्रवेश किया।
श्लोक 92 से 101 भगवान के दर्शन और पूजा
भगवान चार मुखों से शोभित, अनंतचतुष्टय के स्वामी थे। उनकी प्रभा सूर्य से स्पर्धा करती थी। इंद्र और इंद्राणी ने प्रणाम कर उनकी पूजा की।
श्लोक 102 से 111 भगवान के चरणों की पूजा
भगवान वृषभदेव के चरणकमलों की नख-किरणें देवों के मस्तकों को स्पर्श करती थीं, मानो शेषाक्षत अर्पित कर रही हों। इंद्रों ने भक्ति से प्रणाम किया, उनके मस्तक चरण-प्रभा से पवित्र हुए। इंद्राणी ने अप्सराओं संग नमस्कार किया, नख-किरणें उसके स्तनों पर पड़ीं। इंद्र कल्पवृक्ष-से पूजा करते दिखे। इंद्रों और इंद्राणी ने गंध, पुष्प, धूप, अक्षत आदि से चरणों की पूजा की। इंद्राणी ने रत्न-चूर्ण से मंडल बनाया और जलधारा छोड़ी।
श्लोक 112 से 121 इंद्राणी की भक्ति और स्तुति का प्रारंभ
इंद्राणी ने रत्नमय दीपकों से भगवान की पूजा की, जो भक्ति में योग्यता का विचार नहीं करती। उसने धूप, दीप और अमृत-पिंड अर्पित किए, जो चंद्रमा-से लगते थे। फलों से भी उसने हर्षपूर्वक पूजा की। देवों ने भी भक्ति की, पर वीतराग भगवान को इससे प्रयोजन नहीं था, फिर भी वे भक्तों को फल देते थे। इंद्र प्रसन्नचित्त होकर भगवान की स्तुति करने लगे, अपनी भक्ति को गुण-रत्नों के खजाने की पूजा बताया।
श्लोक 122 से 131 भगवान के गुणों की स्तुति
इंद्रों ने कहा कि भगवान सर्वज्ञ, अविनाशी और जगत् के हितकारी हैं। उनकी गुण-किरणें कर्म-कलंक हटाकर चमकती हैं। वे संसार-लता को शांत परिणाम से उखाड़ते हैं। चार कषायों और कामदेव को उन्होंने तप और चारित्र से जीता। उनका शरीर विकाररहित और शांतिसुख का प्रतीक है, जो तीनों लोकों के गुरु होने को दर्शाता है।
श्लोक 132 से 141 भगवान के शरीर का वैभव
भगवान का शरीर सुंदर, सुगंधित, लक्षणयुक्त और दैदीप्यमान है। यह विकार-मल से मुक्त, वज्रमय संधियों वाला और अपार शक्ति का धारक है। यह सूर्य-सा तेजस्वी और स्वर्ग से रत्न-धारा लाता है। जन्म पर फूलों की वृष्टि और अभिषेक ने उनका माहात्म्य फैलाया। तपकल्याणक में देव उनकी सेवा करते थे।
श्लोक 142 से 151 भगवान की महिमा और उपासना
भगवान मोक्षमार्ग के धाता, तीनों लोकों के स्वामी और गुणों के खजाने हैं। वे मित्र, गुरु और पितामह हैं, जिनका ध्यान मोक्ष देता है। योगी उनके अगम का चिंतन करते हैं। उनकी चमरें, सिंहासन, छत्र और अशोकवृक्ष उनकी महिमा दर्शाते हैं। ये संसार से मुक्ति दिलाते हैं।
श्लोक 152 से 161 समवसरण का वैभव और स्तुति
दुंदुभि और पुष्पवर्षा से समवसरण गूंजता था, मयूर शब्द करते थे। चमरें कांति बढ़ाती थीं। भगवान की दिव्यध्वनि सर्वभाषारूपी और तत्त्वज्ञान देने वाली थी। उनकी वाणी तीर्थ और मोक्षमार्ग है। वे सर्वज्ञ, सर्वजित् और तीर्थंकर हैं। इंद्रों ने उन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश रूप में पूजा।
श्लोक 162 से 171 इंद्रों की नमस्कार और भगवान का रूप
बत्तीस इंद्रों ने स्तुतियाँ कीं और नमस्कार किया। वे समवसरण में बैठे। भगवान का शरीर सुवर्ण-सा, भुजाएँ हाथी-सी, मुख चंद्र-सा और नेत्र कमल-से थे। चमरों से घिरा यह शरीर कामदेव को जीतता था। देवांगनाएँ उनके मुख को असंतुष्ट होकर देखती थीं।
श्लोक 172 से 181 भगवान के शरीर की प्रशंसा
भगवान का मुख कमल-सा, नेत्र विशाल और शरीर सुगंधित था। यह क्रोध-राग से मुक्त और शांत था। चरण लाल कमल-से, सिंहासन रत्नमय और छत्र चंद्र-सा था। उनका चरित्र जीवों का हित करता था। अशोकवृक्ष उनकी सेवा में शोभता था।
श्लोक 182 से 191 समवसरण के अवयवों की स्तुति
समवसरण में पुष्पवर्षा, ध्वजाएँ, मानस्तंभ, सरोवर, लतावन और चार वन शोभते थे। धूपघट, नाट्यशालाएँ, कल्पवृक्ष और स्तूप उनकी महिमा बढ़ाते थे। ये कल्याणकारी थे।
श्लोक 192 से 196 समवसरण की संरचना और प्रभाव
समवसरण में मानस्तंभ, सरोवर, कोट, सभाएँ और पीठिका थी। बारह गण क्रम से बैठते थे। भगवान स्याद्वाद-रथ पर सवार थे। उनकी स्तुति करने वाला अर्हंत अवस्था पाता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1 – 7
अथ त्रिमेखलस्यास्य मूर्ध्नि पीठस्य विस्तृते । स्फुरन्मणिविभाजालर चितामरकार्मुके ॥१॥
सुरेन्द्रकरविक्षिप्तपुष्पप्रकरशोभिनि । हसतीव घनापायस्फुटतारकमम्बरम् ॥२॥
चलच्चामरसंघातप्रतिबिम्बिनिभागतैः। हंसैरिव सरोबुद्ध्या सेव्यमानतटें पृथौ ॥३॥
मार्तण्डमण्डलच्छायाप्रस्पर्धिनि महर्द्धिके। स्वर्धुनीफेननीकाशैः स्फटिकैर्घटिते क्वचित् ॥४॥
पद्मरागसमुत्सर्पंन्मयूखैः क्वचिदास्तृते। जिनपादतलच्छायाशोणिम्ने वानुरञ्जिते ॥५॥
शुचौ स्निग्धे मृदुस्पर्शे जिनाङ् घ्रिस्पर्शपावने । पर्यन्तरचितानेकमङ्गलङ्गव्यसंपदि ॥६॥
तन्त्र गन्धकुटी पृथ्वीं तुङ्गशालोपशोभिनीम् । रराड् निवेशयामास स्वर्विमानातिशायिनीम् ॥७॥
अथानंतर―जो दैदीप्यमान मणियों की कांति के समूह से अनेक इंद्रधनुषों की रचना कर रहा है, जो स्वयं इंद्र के हाथों से फैलाये हुए पुष्पों के समूह से सुशोभित हो रहा था और उससे जो ऐसा जान पड़ता है मानो मेघों के नष्ट हो जाने से जिसमें तारागण चमक रहे हैं ऐसे शरद्ऋतु के आकाश की ओर हँस ही रहा हो; जिस पर ढूरते हुए चमरों के समूह से प्रतिबिंब पड़ रहे थे और उनसे जो ऐसा जान पड़ता था मानो उसे सरोवर समझकर हंस ही उसके बड़े भारी तलभाग की सेवा कर रहे हों; जो अपनी कांति से सूर्यमंडल के साथ स्पर्द्धा कर रहा था; बड़ी-बड़ी ऋद्धियों से युक्त था, और कहीं-कहीं पर आकाश-गंगा के फेन के समान स्फटिकमणियों से जड़ा हुआ था; जो कहीं-कहीं पर पद्मराग की फैलती हुई किरणों से व्याप्त हो रहा था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो जिनेंद्र भगवान् के चरणतल की लाल-लाल कांति से ही अनुरक्त हो रहा हो, जो अतिशय पवित्र था, चिकना था, कोमल स्पर्श से सहित था, जिनेंद्र भगवान् के चरणों के स्पर्श से पवित्र था और जिसके समीप में अनेक मंगलद्रव्यरूपी संपदा रखी हुई थीं ऐसे उस तीन कटनीदार तीसरे पीठ के विस्तृत मस्तक अर्थात् अग्रभाग पर कुबेर ने गंधकुटी बनायी । वह गंधकुटी बहुत ही विस्तृत थी, ऊँचे कोट से शोभायमान थी और अपनी शोभा से स्वर्ग के विमानों का भी उल्लंघन कर रही थी ।।1-7।।
Thereafter—radiating a brilliance that, with its cluster of dazzling gems, was forming multiple rainbows; adorned with a collection of flowers scattered by the hands of Indra himself, and appearing as if it were laughing towards the autumn sky, where, with the clouds dispersed, the stars shone brightly.
Its surface reflected the swaying fly-whisks, giving the impression that swans were worshiping its vast lower expanse, mistaking it for a great lake. Competing in radiance with the sun, it was enriched with immense prosperity. In certain places, it was studded with crystal-like gems, resembling the foam of the celestial Ganges. In other areas, it was suffused with the spreading rays of Padmaraga (ruby), making it seem as though it had been imbued with the deep red glow of Lord Jina’s revered feet.
It was supremely pure, smooth, and soft to the touch—sanctified by the touch of Lord Jina’s feet. Around it, an abundance of auspicious treasures was placed. Upon the expansive forehead, or frontal portion, of this three-tiered grand structure, Kubera built a Gandhakuti (fragrant chamber).
This Gandhakuti was vast, adorned with lofty walls, and so magnificent in its grandeur that it even surpassed the celestial chariots of heaven. (1–7)
श्लोक ( Shlok ) 8
त्रिमेखलाङ्किते पीठे सैषा गन्धकुटी बभौ । नन्दनादि वनश्रेणीत्रयाद् वोपरि चूलिका ॥८॥
तीन कटनियों से चिह्नित पीठ पर वह गंधकुटी ऐसी सुशोभित हो रही था मानो नंदन वन, सौमनस वन और पांडुक वन इन तीन वनों के ऊपर सुमेरु पर्वत की चूलिका ही सुशोभित हो रही हो ।।8।।
On the back, marked by three divisions, the Gandhakuti shone resplendently, as if the crest of Mount Sumeru itself was radiantly adorning the three divine forests—Nandanvana, Saumanasa Vana, and Panduka Vana. ( 8)
श्लोक ( Shlok ) 9
यथा सर्वार्थसिद्धिर्वा स्थिता त्रिदिवमूर्धनि । तथा गन्धकुटी दीप्रा पोठस्याधितलं बभौ ॥९॥
अथवा जिस प्रकार स्वर्गलोक के ऊपर स्थित हुई सर्वार्थसिद्धि सुशोभित होती है उसी प्रकार उस पीठ के ऊपर स्थित हुई वह अतिशय दैदीप्यमान गंधकुटी सुशोभित हो रही थी ।।9।।
Or, just as Sarvarthasiddhi, the celestial abode, shines brilliantly above the heavenly realms, in the same way, that exceedingly radiant Gandhakuti was resplendently adorning the top of the Peetha (platform). ( 9)
श्लोक ( Shlok ) 10
नानारत्न प्रभोत्सर्पैर्यत्कूटैैस्ततमम्बरम् । सचित्रमिव भाति स्म सेन्द्रचापमिवाथवा ॥१०॥
अनेक प्रकार के रत्नों की कांति को फैलाने वाले उस गंधकुटी के शिखरों से व्याप्त हुआ आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो अनेक चित्रों से सहित ही हो रहा हो अथवा इंद्रधनुषों से युक्त ही हो रहा हो ।।10।।
The sky, illuminated by the brilliance of various gems radiating from the peaks of that Gandhakuti, appeared as if it were adorned with numerous paintings or filled with multiple rainbows. ( 10)
श्लोक ( Shlok ) 11
योतुङ्गै शिखरैर्वद्धजयकेतनकोटिभि । भुजशाखा प्रसार्येव नभोगानाजुहूषत ॥११॥
जिन पर करोड़ों विजयपताकाएँ बँधी हुई हैं ऐसे ऊँचे शिखरों से वह गंधकुटी ऐसी जान पड़ती थी मानो अपने हाथों को फैलाकर देव और विद्याधरों को ही बुला रही हो ।।11।।।
The Gandhakuti, with its lofty peaks adorned with millions of victory banners, appeared as if it were extending its hands to invite the Devas (celestial beings) and Vidyadharas (mystical beings). ( 11)
श्लोक 12 से 21
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कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316