भरत और वृषभदेव की महिमा
भरत ने छह खण्डों की पृथ्वी को भरतभूमि बनाया, शत्रुओं का नाश कर उसका पालन किया। उनकी लक्ष्मी निधियों और रत्नों से युक्त है। वे प्रथम चक्रवर्ती हैं। वृषभदेव, तीनों लोकों के गुरु, स्तुति और ध्यान के योग्य हैं, जो भव्यों को कल्याण देते हैं। वे संसार-भय से रक्षा करते हैं।
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 202 to 205
श्लोक ( Shlok ) 202
नानारत्न ‘निधान देशविलसत्सम्पत्तिगुर्वीमिमां सामाज्यश्रियमेकभोगनियतां कृत्वाऽखिलां पालयन् ।योऽभून्नैव किलाकुलः कुलवधूमेकामिवाङ्कस्थितां सोऽयं चक्रधरोऽभु नक् भुवममूमेकातपत्रां चिरम् ॥ २०२॥
अनेकों रत्नों, निधियों और देशोंसे सुशोभित हुई सम्पत्तिके द्वारा जो भारी गौरवको प्राप्त हो रही है ऐसी इस समस्त साम्राज्यलक्ष्मीको एक अपने ही उपभोग करने के योग्य बनाकर उसका पालन करता हुआ जो चक्रवर्ती गोदमें बैठी हुई कुलवधूकी रक्षा करते हुए के समान कभी व्याकुल नहीं हुआ वह भरत एक छत्रवाली इस पृथिवीका चिरकाल तक पालन करता रहा था ।।२०२।।
Adorned with countless jewels, treasures, and realms,this vast wealth of the empire, resplendent with immense glory,was guarded and sustained by Bharat, the Chakravartin,who, as one devoted to protecting the bride seated upon his lap—his own rightful possession—never once felt restless.Thus, he upheld this umbrella-crowned earth steadfastly through the ages.202
श्लोक ( Shlok ) 203
यन्नाम्ना भरतावनित्वमगमत् षट्व ण्डभूषा” मही येना सेतुहिमाद्रि रक्षितमिदं क्षेत्रं कृतारिक्षयम् । यस्याविर्निधिरत्नसम्पदुचिता लक्ष्मीरुरःशायिनी स श्रीमान् भरतेश्वरो निधिभुजामग्रेसरोऽभूत् प्रभुः ॥२०३॥
छह खण्डोंसे विभूषित पृथिवी जिसके नामसे भरतभूमि नामको प्राप्त हुई, जिसने दक्षिण समुद्रसे लेकर हिमवान् पर्वततक के इस क्षेत्र में शत्रुओंका क्षय कर उसकी रक्षा की, तथा प्रकट हुई निधि और रत्न आदि सम्पदाओं-से योग्य लक्ष्मी जिसके वक्षःस्थलपर शयन करती थी वह प्रभु-श्रीमान् भरतेश्वर निधियों के स्वामी अर्थात् चक्रतियों में प्रथम और मुख्य चक्रवर्ती हुआ था ॥ २०३॥
Adorned by six mighty continents, the earth, known far and wide as Bharatbhumi,stretching from the southern ocean unto the lofty Himalayan peaks,where the foes were vanquished and the realm protected,and graced by wealth and gems worthy of the goddess Lakshmi,who reposed upon his noble chest—that illustrious lord, Bharateshvara, master of treasures,stood foremost among the Chakravartins, the sovereign supreme.203
श्लोक ( Shlok ) 204
यः स्तुत्यो जगतां त्रयस्य न पुनः स्तोता स्वयं कस्यचिंद् ध्येयो योगिजनस्य यश्च न तरां ध्याता स्वयं कस्यचित् ।यो नन्तृनपि नेतुमुन्नतिमलं नन्तव्यपक्षे स्थितः स श्रीमान् जयताज्जगत्त्रयगुरुर्देवः पुरुः पावनः ॥२०४॥
जो तीनों जगत् के जीवों के द्वारा स्तुति करने के योग्य हैं परन्तु जो स्वयं किसीकी स्तुति नहीं करते, बड़े बड़े योगी लोग जिनका ध्यान करते हैं परन्तु जो किसीका ध्यान नहीं करते, जो नमस्कार करनेवालों-को भी उन्नत स्थानपर ले जाने के लिये समर्थ हैं परन्तु स्वयं नमस्कार करने योग्य पक्षमें स्थित हैं अर्थात् किसीको नमस्कार नहीं करते, वे तीनों जगत्के गुरु अत्यन्त पवित्र श्रीमान् भगवान् वृषभदेव सदा जयवन्त रहें ।। २०४।।
Worthy of praise by all beings of the three worlds, yet themselves never offering praise;Revered by great yogis who meditate upon them, yet they regard none;Capable of uplifting even those who bow before them, yet they themselves stand beyond all obeisance—Such are the sacred Lords of the three worlds, the venerable Vṛṣabhadeva.May they forever endure in eternal victory and glory.204
श्लोक ( Shlok ) 205
यं नत्वा पुनरानमन्ति न परं स्तुत्वा च यं नापरं भव्याः संस्तुवते श्रयन्ति न परं यं संश्रिताः श्रेयसे । यं सत्कृत्य कृतादरं कृतधियः सत्कुर्वते नापरम् स श्रीमान् वृषभो जिनो “भवभयान्नस्त्रायतां तीर्थकृत् ॥ २०५।।
भव्य लोग जिन्हें नमस्कार कर फिर किसी अन्यको नमस्कार नहीं करते, जिनकी स्तुति कर फिर किसी अन्यकी स्तुति नहीं करते, जिनका आश्रय लेकर कल्याण के लिये फिर किसी अन्यका आश्रय नहीं लेते, और बुद्धिमान् लोग जिनका सबने आदर किया है ऐसे जिनका सत्कार कर फिर किसी अन्यका सत्कार नहीं करते वे श्रीमान् वृषभजिनेन्द्र तीर्थ कर हम सबकी संसारके भयसे रक्षा करें ।॥ २०५।।
Majestic beings, before whom all bow—and bow to none besides;Whose praise once offered, leaves no need for any other’s acclaim;In whose refuge all find welfare—and seek no other shelter thereafter;
Wise beyond measure, by all honored, yet honoring none above themselves—May those revered Lords, Vṛṣabhajinendra and the Tirthankaras,Protect us all from the fears that afflict this worldly existence.205
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षण-महापुराण सङ्ग्रहे भरतेश्वराभ्युदयवर्णनं नाम सप्तंत्रशत्तमं पर्व ॥३७॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहके भाषानुवादमें भरतेश्वरके वैभवका वर्णन करनेवाला यह सैंतीसवां पर्व समाप्त हुआ ।
Thus concludes the thirty-seventh canto,which, in translation from the Triṣaṣṭi-lakṣaṇa Mahāpurāṇa as composed by the venerable hagavajjinasena Acharya,has narrated the majestic grandeur and splendor of Emperor Bharata.
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन
पर्व 38 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201
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