आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71 दिव्यध्वनि और प्रभामंडल
नगाड़े गंभीर शब्द करते थे। समवसरण भूमि भगवान की प्रभा से शोभती थी, जिसमें सात भव दिखते थे। उनकी दिव्यध्वनि सर्वभाषारूप थी, जो मोह नष्ट करती थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
पणवस्तुणवैः कलमन्द्ररुतैः सइकाहलशङ्खमहापटहैः । ध्वनिरुत्ससृजे ककुभां विवरं मुखरं विदधत् पिदधच्च नभः ॥६२॥
जिनका शब्द अत्यंत मधुर और गंभीर था ऐसे पणव, तुणव, काहल, शंख और नगाड़े आदि बाजे समस्त दिशाओं के मध्यभाग को शब्दायमान करते हुए तथा आकाश को आच्छादित करते हुए शब्द कर रहे थे ।।62।।
Musical instruments such as Paṇava, Tuṇava, Kāhala, conches, and drums, producing exceedingly sweet and deep sounds, reverberated throughout the skies, filling the entire space and resounding in all directions.
श्लोक ( Shlok ) 63
घनकोणहताः सुरपाणविकैः कुपिता इव ते द्युसदां पटहाः । ध्वनिमुत्ससृजुः किमहो वठराः परिताडयथेति विसृष्टगिरः ॥६३॥
देवरूप शिल्पियों के द्वारा मजबूत दंडों से ताड़ित हुए वे देवों के नगाड़े जो शब्द कर रहे थे उनसे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो कुपित होकर स्पष्ट शब्दों में यही कह रहे हों कि अरे दुष्टों, तुम लोग जोर-जोर से क्यों मार रहे हो ।।63।।
Struck firmly with sturdy drumsticks by the divine artisans, the celestial drums resounded in such a manner that they seemed to be angrily exclaiming in clear tones, “Oh wicked ones, why are you striking us so forcefully?”
श्लोक ( Shlok ) 64
ध्वनिरम्बुमुचां किमयं स्फुरति क्षुभितोऽब्धिरुतस्फुरदूर्मिरवः । कृततर्कमिति प्रसरन् जयतात् सुरतूर्यरवो जिनभर्तु रसौ ॥६४॥
क्या यह मेघों की गर्जना है? अथवा जिसमें उठती हुई लहरें शब्द कर रही हैं ऐसा समुद्र ही क्षोभ को प्राप्त हुआ है? इस प्रकार तर्क-वितर्क कर चारों ओर फैलता हुआ भगवान् के देव दुंदुभियों का शब्द सदा जयवंत रहे ।।64।।
Is this the roar of thunderclouds? Or has the ocean itself been stirred, causing its rising waves to echo? As people speculated in this way, the resounding celestial drums of the Lord spread in all directions—may their victorious sound prevail forever!
श्लोक ( Shlok ) 65
प्रभया परितो जिनदेहभुवा जगती सकला समवादिसृतेः । रुरुचे ससुरासुरमर्त्यजनाः किमिवाद्भुतमीदृशि धाम्नि विभोः ॥६५॥
सुर, असुर और मनुष्यों से भरी हुई वह समवसरण की समस्त भूमि जिनेंद्रभगवां के शरीर से उत्पन्न हुई तथा चारों ओर फैली हुई प्रभा अर्थात् भामंडल से बहुत ही सुशोभित हो रही थी सो ठीक ही है क्योंकि भगवान् के ऐसे तेज में आश्चर्य ही क्या है ।।65।।
The entire land of the Samavasarana, filled with gods, demons, and humans, was magnificently illuminated by the radiant aura emanating from Lord Jinendra’s divine body. And rightly so, for what wonder is there in such brilliance belonging to the Lord?
श्लोक ( Shlok ) 66
तरुणार्करुचि नु तिरोदधति सुरकोटिमहांसि तु निर्धुनती ।जगदेकमहोद यमासृजति प्रथते स्म तदा जिनदेहरुचिः ॥६६॥
उस समय वह जिनेंद्रभगवान के शरीर की प्रभा मध्याह्न के सूर्य की प्रभा को तिरोहित करती हुई―अपने प्रकाश में उसका प्रकाश छिपाती हुई, करोड़ों देवों के तेज को दूर हटाती हुई, और लोक में भगवान् का बड़ा भारी ऐश्वर्य प्रकट करती हुई चारों ओर फैल रही थी ।।66।।
At that time, the divine radiance of Lord Jinendra’s body spread in all directions, outshining the brilliance of the midday sun, eclipsing the radiance of millions of gods, and magnificently revealing the supreme majesty of the Lord in the universe.
श्लोक ( Shlok ) 67
जिनदेह रुचाव मृताब्धिशुची सुरदानवमर्त्यजना ददृशुः । स्वभवान्तरसप्तक्रमात्तमुदो जगतो ‘बहु मङ्गलदर्पणके ॥६७॥
अमृत के समुद्र के समान निर्मल और जगत् को अनेक मंगल करने वाले दर्पण के समान, भगवान् के शरीर की उस प्रभा (प्रभामंडल) में सुर, असुर और मनुष्य लोग प्रसन्न होकर अपने सात-सात भव देखते थे ।।67।।
As pure as the ocean of nectar and like a mirror bringing countless blessings to the world, the divine radiance (halo) of the Lord’s body delighted gods, demons, and humans alike, allowing them to behold the reflections of their past seven lives.
श्लोक ( Shlok ) 68
विधुमाशु विलोक्य नु विश्वसृजो गतमातपवारणतां त्रि तयीम् । रविरिद्ध वपुः स पुराणकविं समशिश्रियदङ्गविभानिभतः ॥६८॥
चंद्रमा शीघ्र ही भगवान् के छत्रत्रय की अवस्था को प्राप्त हो गया है यह देखकर ही मानो अतिशय दैदीप्यमान सूर्य भगवान् के शरीर की प्रभा के छल से पुराण कवि भगवान् वृषभदेव की सेवा करने लगा था । भावार्थ―भगवान का छत्रत्रय चंद्रमा के समान था और प्रभामंडल सूर्य के समान था ।।68।।
Seeing that the moon had swiftly taken the form of the Lord’s triple-canopy (chhatra-traya), the brilliantly radiant sun, seemingly deceived by the divine aura of Lord Rishabhadeva, began serving Him with devotion.
Explanation: The Lord’s triple-canopy resembled the moon, while His halo shone with the brilliance of the sun.
श्लोक ( Shlok ) 69
दिग्यमहाध्वनिरस्य मुखाब्जान्मेघरवानु कृतिर्निरगच्छत् । भव्यमनोगतमोहतमोघ्न न्नद्युतदेष यथैव तमोऽरिः ॥६९॥
भगवान् के मुखरूपी कमल से बादलों की गर्जना का अनुकरण करने वाली अतिशययुक्त महादिव्यध्वनि निकल रही थी और वह भव्य जीवों के मन में स्थित मोहरूपी अंधकार को नष्ट करती हुई सूर्य के समान सुशोभित हो रही थी ।।69।।
From the lotus-like mouth of the Lord emerged a supremely divine voice, resembling the deep roar of clouds. Radiant like the sun, it dispelled the darkness of delusion residing in the minds of noble souls.
श्लोक ( Shlok ) 70
एकतयोऽपि च सर्वनृभाषाः सोऽन्तरनेष्ट बहूश्च कुभाषाः । अप्रतिपत्तिमपास्य च तत्त्वं बोधयति स्म जिनस्य महिम्ना ॥७०॥
यद्यपि वह दिव्यध्वनि एक प्रकार की थी तथापि भगवान् के माहात्म्य से समस्त मनुष्यों की भाषाओं और अनेक कुभाषाओं को अपने अंतर्भूत कर रही थी अर्थात् सर्वभाषारूप परिणमन कर रही थी और लोगों का अज्ञान दूर कर उन्हें तत्त्वों का बोध करा रही थी ।।70।।
Although that divine voice was singular in nature, by the greatness of the Lord, it encompassed all human languages and even various dialects. It transformed itself into every tongue, dispelling ignorance and imparting true knowledge to all beings.
श्लोक ( Shlok ) 71
एकतयोऽपि तथैव जलौघश्चित्ररसौ भवति द्रुमभेदात् । पात्रविशेषवशाच्च तथायं सर्वविदो ध्वनिराप बहुत्वम् ॥७१॥
जिस प्रकार एक ही प्रकार का जल का प्रवाह वृक्षों के भेद से अनेक रस वाला हो जाता है उसी प्रकार सर्वज्ञदेव की वह दिव्यध्वनि भी पात्रों के भेद से अनेक प्रकार की हो जाती थी ।।71।।
Just as a single stream of water acquires different tastes depending on the trees it flows through, so too did the omniscient Lord’s divine voice transform into various forms according to the nature of its listeners.
श्लोक 72 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61