पुण्य की महिमा और भरत का वैभव
भरत की समृद्धि—रूप, शरीर, निधियां, रत्न, अन्तःपुर, और भोग—पुण्य के उदय से प्राप्त है। पुण्य बिना विजयलक्ष्मी, प्रताप, और कीर्ति असंभव है। पण्डितों को पुण्य-संचय का उपदेश दिया जाता है। भरत का समय भोगों में क्षण-भर-सा बीतता है। वे साम्राज्यलक्ष्मी का एकछत्र पालन करते हैं, बिना व्याकुल हुए।
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 191 to 201
श्लोक ( Shlok ) 191 – 200
पुण्याद् विना कुतस्तादृग्रूपसंपदनीदृशी । पुण्याद् विना कुतस्तादृग् अभेद्यं गात्रबन्धनम् ॥१९१॥पुण्याद् विना कुतस्ता दृङनिधिरत्नद्धिर्जिता । पुण्याद् विना कुतस्तावृग् इभाश्वादिपरिच्छदः ॥१९२॥पुण्याद् विना कुतस्तादृग् अन्तःपुरमहोदयः । पुण्याद् विना कुतस्तादृग् दशाङ्गो भोगसम्भवः ॥१९३॥पुण्याद् विना कुतस्तादृग् आज्ञाद्वीपाब्धिलङ्घिनी । पुण्याविना कुतस्तादृग् जयश्रीजित्वरी दिशाम् ॥१९४।।पुण्याद् विना कुतस्तादृक्प्रतापः प्रणतामरः । पुण्याद् विना कृतस्तादृग् उद्योगो लङ्गितार्णवः ॥१९५llपुण्याद् विना कृतस्ताद्ग् प्राभवं त्रिजगज्जयि । पुण्याव् विना कुतस्तादृक् ‘नगराजजयोत्सवः ॥१९६॥पुण्याद् विना कुतस्तादृक् सत्कार स्तत्कृतोऽधिकः । पुण्याद् विना कुतस्तादृक् सरिद्देव्यभिषेचनम् ॥१९७।पुण्याद् विना कुतस्तादृक् खचराचलनिर्जयः । पुण्याद् विना कुतस्तादृग्रत्नलाभोऽन्यदुर्लभः ॥१९८॥पुण्याद् विना कुतस्ताद्ग् ‘आयतिर्भरतेऽखिले । पुण्याद् विना कुतस्तादृक् कीर्तािदक्तट लङघिनी ॥१९९।। ततः पुण्योदयोद्भूतां मत्वा चक्रभूतः श्रियम् । चिनुध्वं भो बुधाः पुण्यं यत्पुण्यं सुखसम्पदाम् ॥ २००॥
पुण्यके बिना चक्रवर्तीके समान अनुपम रूपसम्पदा कैसे मिल सकती है ? पुण्यके बिना वैसा अभेद्य शरीरका बंधन कैसे मिल सकता है ? पुण्यके बिना अतिशय उत्कृष्ठ निधि और रत्नोंकी ऋद्धि कैसे प्राप्त हो सकती है ? पुण्यके बिना वैसे हाथी घोड़े आदिका परिवार कैसे मिल सकता है ? पुण्यके बिना वैसे अन्तःपुरका वैभव कैसे मिल सकता है ? पुण्यके बिना दस प्रकारके भोगोपभोग कहां मिल सकते हैं ? पुण्यके बिना द्वीप और समुद्रोंको उल्लंघन. करनेवाली वैसी आज्ञा कैसे प्राप्त हो सकती है ? पुण्यके बिना दिशाओंको जीतनेवाली वैसी विजयलक्ष्मी कहां मिल सकती है ? पुण्यके बिना देवताओंको भी नमू करनेवाला वैसा प्रताप कहां प्राप्त हो सकता है ? पुण्यके बिना समुद्रको उल्लंघन करनेवाला वैसा उद्योग कैसे मिल सकता है ? पुण्यके बिना तीनों लोकोंको जीतनेवाला वैसा प्रभाव कहां हो सकता है ? पुण्य-के बिना वैसा हिमवान् पर्वतको विजय करनेका उत्सव कैसे मिल सकता है? पुण्यके बिना हिमवान् देवके द्वारा किया हुआ वैसा अधिक सत्कार कहां मिल सकता है? बिना पुण्यके नदियोंकी अधिष्ठात्री देवियोंके द्वारा किया हुआ वैसा अभिषेक कहां हो सकता है ? पुण्यके बिना विजयार्थ पर्वतको जीतना कैसे हो सकता है ? पुण्यके बिना अन्य मनुष्योंको दुर्लभवैसे रत्नोंका लाभ कहां हो सकता है ? पुण्यके बिना समस्त भरतक्षेत्रमें वैसा सुन्दर विस्तार कैसे हो सकता है ? और पुण्यके बिना दिशाओंके किनारेको उल्लंघन करनेवाली वैसी कीति कैसे हो सकती है ? इसलिये हे पण्डित जन, चक्रवर्तीकी विभूतिको पुण्यके उदयसे उत्पन्न हुई मानकर उस पुण्यका संचय करो जो कि समस्त सुख और सम्पदाओंकी दुकानके समान है ।।१९१-२००।।
How can one, devoid of merit, ever attain the unparalleled glory and wealth of a Chakravartin?Without virtue, how can the binding of an invincible, flawless body be secured?Without merit, whence comes the abundance of the finest treasures and jewels?Without merit, how can one possess a retinue of majestic elephants and swift horses?Without virtue, whence the splendor of such magnificent palaces and inner courts?Without merit, where is found the enjoyment of the tenfold pleasures and indulgences?Without merit, how can one command islands and oceans with sovereign authority?Without virtue, whence comes victory that conquers all directions like auspicious fortune?
Without merit, how can one wield the power that even the gods revere?Without virtue, how does one attain such grand enterprises that traverse the seas?Without merit, how can one command influence that rules the three worlds?Without virtue, whence the festival that celebrates the conquest of the snow-capped mountains?
Without merit, how does one receive the exalted hospitality of the heavenly beings?Without virtue, how is the anointment by river goddesses bestowed?Without merit, how can one conquer the victorious mountains?Without virtue, where is found the rare benefit of precious jewels for men?Without merit, how can the entire realm of Bharata exhibit such magnificent expanse?And without virtue, whence the fame that reaches the farthest bounds of the directions?Therefore, O learned ones, regard the glory of the Chakravartin as born from the rise of merit,and diligently cultivate that very merit—for it is the very storehouse of all happiness and wealth.191 – 200
श्लोक ( Shlok ) 201
इत्याविष्कृतसम्पदो विजयिनस्तस्याखिलक्ष्माभृताम् स्फीतामप्रतिशासनां प्रथयतः षट्खण्डराज्यश्रियम् ।कालोऽनल्पत रोऽप्यगात् क्षण इव प्राक्नुण्यकर्मोदयाद् उद्भूतैः प्रमदावहः षड्ॠतुजैर्भोगैरतिस्वादुभिः ॥२०१॥
इस प्रकार जिसने सम्पदाएं प्रकट की हैं, जिसने समस्त राजाओंको जीत लिया है, और जो दूसरेके शासनसे रहित अपने छह खण्डकी विस्तृत राज्यलक्ष्मीको निरन्तर फैलाता रहता है ऐसे उस चक्रवर्ती भरतका बड़ा भारी समय पूर्व पुण्यकर्म के उदयसे उत्पन्न हुए, सब तरहका आनन्द देनेवाले और अत्यन्त स्वादिष्ट छहों ऋतुओंके भोगोंके द्वारा क्षण-भरके समान व्यतीत हो गया था ॥२०१॥
Thus, the mighty Chakravartin Bharat—who revealed vast riches, conquered all kings,and, free from the rule of others, perpetually extended the wealth of his sixfold dominions—passed away like a fleeting moment,borne of the long-past rise of virtuous deeds,
after enjoying the delights and exquisite pleasures of all six seasons,
each imparting boundless joy and sweetness.201
श्लोक 202 से 205
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190
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