आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
श्लोक 12 से 21 भरत की विनम्रता और वैभव
हिमवान, विजयार्ध, मागध, और विद्याधर भरत को नमस्कार करते हैं। अभिषेक के बावजूद भरत को अहंकार नहीं होता, क्योंकि वे भाइयों को विभूति न बांट पाने का पश्चाताप करते हैं। बाहुबली के संघर्ष से उनका तेज और बढ़ता है। निष्कंटक राज्य प्राप्त कर वे सूर्य-से देदीप्यमान होते हैं। उनकी प्रजा योग और क्षेम से सनाथ रहती है। भरत निधियों और रत्नों का यथायोग्य उपयोग करते हैं, जिससे उनका यश प्रथम चक्रवर्ती के रूप में फैलता है।
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
हिमवद्विजयार्धेशौ मागधाद्याश्च देवताः । खेचराश्चोभयश्रेण्योस्तं नेमुर्नम्रमौलयः ॥ १२ ॥
हिमवान् और विजयार्थ पर्वतके अधीश्वर हिमवान् तथा विजयार्ध-देव, मागध आदि अन्य अनेक देव, और उत्तर-दक्षिण श्रेणीके विद्याधर अपने मस्तक झुका झुकाकर उन्हें नमस्कार कर रहे थे ।।१२।।
Himavat, the sovereign of the snowy peaks, along with the deity of Vijayartha Mountain, the gods of Magadha and many others, as well as the Vidyadharas arrayed from north to south, all bowed their heads in profound homage, offering their reverent salutations to him.12
श्लोक ( Shlok ) 13
सोऽभिषिक्तोऽपि नोत्सिक्तो बभूव नृपसत्तमैः। महतां हि मनोवृत्तिर्नोत्सेक परिरम्भिणी ॥ १३ ॥
अनेक अच्छे अच्छे राजाओंके द्वारा अभिषिक्त होनेपर भी उन्हें कुछ भी अहंकार नहीं हुआ था सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषोंकी मनोवृत्ति अहंकारका स्पर्श नहीं करती ॥१३॥
Though anointed by numerous illustrious kings, Maharaja Bharata bore no trace of pride; for such noble souls remain untouched by the touch of arrogance, as is fitting for men of greatness.13
श्लोक ( Shlok ) 14
चामरैर्वीज्यमानोऽपि न निवृत्तिमगाद् विभुः । भ्रातृष्वसंविभक्ता श्रीरि तीहानुशयानुगः ॥ १४ ॥
यद्यपि उनके ऊपर चमर ढुलाये जा रहे थे तथापि वे उससे संतोषको प्राप्त नहीं हुए थे क्योंकि उन्हें निरन्तर इस बातका पछतावा हो रहा था कि मैंने अपनी विभूति भाइयों की नहीं बांट पाई ।।१४।।
Though the royal fly-whisks were waved over him in honour, he found no satisfaction therein; for a constant remorse weighed upon his heart—that he had not shared his grandeur with his brothers.14
श्लोक ( Shlok ) 15
दोर्बलिभ्रातृसङ्घर्षात् नास्य तेजो विकर्षितम् । प्रत्युतोत्कर्षिहेम्नो वा घुष्टस्य निकषोपले ॥ १५॥
भाई बाहुबलीके संघर्षसे उनका तेज कुछ कम नहीं हुआ था किन्तु कसौटीपर घिसे हुए सोनेके समान अधिक ही हो गया था ॥१५।।
Though his strength had been tested by the struggles of his mighty brothers, his brilliance was in no way diminished; rather, like gold refined upon the touchstone, it shone forth all the more brilliantly. 15
श्लोक ( Shlok ) 16
निष्कण्टकमिति प्राप्य साम्ग्राज्यं भरताधिपः । बभौ भास्वानिवोद्रिक्तप्रतापः शुद्धमण्डलः ॥ १६ ॥
इस प्रकार निष्कण्टक राज्यको पाकर महाराज भरत उस सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहे थे जिसका कि प्रताप बढ़ रहा है और मण्डल अत्यन्त शुद्ध है ॥१६॥
Thus, having attained a realm free from thorns, Maharaja Bharata began to shine forth like the radiant sun—whose splendour grows ever greater and whose orb is immaculately pure.16
श्लोक ( Shlok ) 17
क्षेमैकतानतां भेजुः प्रजास्तस्मिन् सुराजनि । योगक्षेमौ वितन्वाने मन्वानाः स्वां सनाथताम् ॥ १७ ॥
योग (अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति करना) और क्षेम (प्राप्त हुई वस्तुकी रक्षा करना) को फैलानेवाले उन उत्तम राजा भरतके विद्यमान रहते हुए प्रजा अपने आपको सनाथ समझती हुई कुशल मंगलको प्राप्त होती रहती थी ।।१७।।
While that noble King Bharata, the promulgator of both Yoga—the attainment of what is sought—and Kṣema—the preservation of what is gained—remained present, the subjects, feeling secure under his sheltering care, continually enjoyed prosperity and well-being. 17
श्लोक ( Shlok ) 18
यथास्वं संविभज्यामी सम्भुक्ता निधयोऽमुना । सम्भोगः संविभागश्च फलमर्थार्जने द्वयम् ॥ १८ ॥
महाराज भरतने निधियोंका यथायोग्य विभागकर उनका उपभोग किया था सो ठीक ही है क्योंकि स्वयं संभोग करना और दूसरेको विभाग कर देना ये दो ही धन कमाने के मुख्य फल हैं ।।१८।।
Maharaja Bharata, having duly distributed the treasures according to their rightful measure, wisely partook of what remained; for truly, the two principal fruits of wealth’s acquisition are to enjoy it oneself and to allocate it generously to others.18
श्लोक ( Shlok ) 19
रत्नान्यपि यथाकामं निविष्टानि निधीशिना । रत्नानि ननु तान्येव यानि यान्त्युपयोगिताम् ॥ १ ९ ॥
निधियोंके स्वामी भरतने रत्नोंका भी इच्छानुसार उपभोग किया था सो ठीक ही है क्योंकि वास्तवमें रत्न वही हैं जो उपयोगमें आवें ॥१९॥
Bharata, the lord of treasures, indulged freely in the use of gems as he wished; rightly so, for gems are truly precious only when brought into joyful and purposeful use.19
श्लोक ( Shlok ) 20
मनुश्चक्रभृतामाद्यः षट्खण्डभरताधिपः । राजराजोऽधिराट् सम्प्राडित्यस्योद्धोषितं यशः ॥ २० ॥
यह सोलहवां मनु है, चक्रतियोंमें प्रथम चक्रवर्ती है, षट् खण्ड भरतका स्वामी है, राजराजेश्वर है, अधिराट् है और सम्राट् है इस प्रकार उसका यश उद्घोषित हो रहा था ।।२०।।
He is the sixteenth Manu, the foremost among the Chakravartins, the sovereign lord of the six realms of Bharata, the king of kings, the supreme monarch, and the emperor—thus was his glory proclaimed far and wide.20
श्लोक ( Shlok ) 21
नन्दनो वृषभेशस्य भरतः शातमातुरः । इत्यस्य रोदसी व्याप शुभ्रा कीर्तिरनश्वरी ॥ २१ ॥
यह भरत भगवान् वृषभदेवका पुत्र है और इसकी माताके सौ पुत्र हैं इस प्रकार इसकी कभी नष्ट नहीं होनेवाली उज्वल कीर्ति आकाश तथा पृथिवीमें व्याप्त हो रही थी ॥२१॥
This Bharata is the son of Lord Ṛṣabhadeva, and by his mother, he is brother to a hundred sons; thus, his ever-undiminishing radiant fame spread throughout the heavens and the earth.21
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11
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