आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251
श्लोक 252 से 261 वन और मकान
कल्पवृक्ष वनों में बावड़ियाँ और सभागृह थे। वनवेदिका चार गोपुरद्वारों से घिरी थी। आगे सुवर्ण खंभों वाले मकान थे। ये चंद्रकांत दीवारों से चित्रित थे। देव संगीत और नृत्य से आराधना करते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 252 to 261
श्लोक ( Shlok ) 252
चैत्यद्रुमेषु पूर्वोक्ता वर्णनात्रापि योज्यताम् । किं तु कल्पद्रुमा ऐते संकल्पितफलप्रदाः ॥२५२॥
पहले चैत्यवृक्षों में जिस शोभा का वर्णन किया गया है वह सब इन सिद्धार्थवृक्षों में भी लगा लेना चाहिए किंतु विशेषता इतनी ही है कि ये कल्पवृक्ष अभिलषित फल के देने वाले थे ।।252।।
The splendor that has been previously described in the Chaitya trees should also be applied to these Siddhārtha trees. However, the distinction lies in the fact that these Kalpavṛkṣas (wish-fulfilling trees) had the special quality of granting desired fruits to those who sought them. ॥252॥
श्लोक ( Shlok ) 253
कचिद् वाप्यः क्वचिन्नद्य क्वचित् सैकतमण्डलम् । क्ववचित्सभागृहादीनि बभुरत्र वनान्तरे ॥२५३॥
उन कल्पवृक्षों के वनों में कहीं बावड़ियाँ, कहीं नदियाँ, कहीं बालू के ढेर और कहीं सभागृह आदि सुशोभित हो रहे थे ।।253।।
In the forests of those Kalpavṛkṣas (wish-fulfilling trees), there were beautifully adorned stepwells, flowing rivers, sandbanks, and grand assembly halls, all enhancing the beauty of the surroundings. ॥253॥
श्लोक ( Shlok ) 254
वनवीथीमिमामन्तर्वव्रेऽसौ वनवेदिका। कल धौतमयी तुङ्गचतुर्गोपुरसंगता ॥२५४॥
उन कल्पवृक्षों की वनवीथी को भीतर की ओर चारों तरफ से वनवेदिका घेरे हुए थी, वह वनवेदिका सुवर्ण की बनी हुई थी, और चार गोपुरद्वारों से सहित थी ।।254।।
The forest avenue of those Kalpavṛkṣas was surrounded on all four sides by a Vanavedikā (forest terrace) from the inside. This Vanavedikā was made of gold and was adorned with four grand entrance gates (Gopura-dvāras). ॥254॥
श्लोक ( Shlok ) 255
तत्र तोरणमाङ्ग ल्यसंपदः पूर्ववर्णिताः । गोपुराणि च पूर्वोक्तमानोन्मानाम्यमुत्र च ॥२५५॥
उन गोपुर-द्वारों में तोरण और मंगलद्रव्यरूप संपदाओं का वर्णन पहले ही किया जा चुका है तथा उनकी लंबाई चौड़ाई आदि भी पहले के समान ही जानना चाहिए ।।255।।
The toranas (archways) and the auspicious treasures within those Gopura-dvāras (grand entrance gates) have already been described earlier. Similarly, their length, width, and other dimensions should also be understood as being the same as previously mentioned. ॥255॥
श्लोक ( Shlok ) 256
प्रतोलीं तामथोल्लङ्ध्य परतः परिवीथ्य भूत्। प्रासादपक्ति र्विंविधा निर्मिता सुरशिल्पिभिः ॥२५६॥
उन गोपुरद्वारों के आगे भीतर की ओर बड़ा लंबा-चौड़ा रास्ता था और उसके दोनों ओर देवरूप कारीगरों के द्वारा बनायी हुई अनेक प्रकार के मकानों की पंक्तियाँ थीं ।।256।।
Ahead of those Gopura-dvāras (grand entrance gates), on the inner side, there was a vast, long, and wide pathway. On both sides of this pathway, rows of various types of mansions were constructed by divine artisans, displaying remarkable craftsmanship. ॥256॥
श्लोक ( Shlok ) 257 – 258
हिरण्मयमहास्तम्भा वज्राधिष्टानबन्धनाः । चन्द्रकान्तशिलाकान्तमितयो रत्नचित्रिताः ॥२५७॥
सहर्म्या द्वितलाः केचित् केचिच्च त्रिचतुस्तलाः। चन्द्रशालायुजः केचिद् बलभिच्छन्दशोभिनः ॥२५८॥
जिनके बड़े-बड़े खंभे सुवर्ण के बने हुए हैं, जिनके अधिष्ठान-बंधन अर्थात् नींव वज्रमयी हैं, जिनकी सुंदर दीवालें चंद्रकांतमणियों की बनी हुई हैं और जो अनेक प्रकार के रत्नों से चित्र-विचित्र हो रहे हैं ऐसे वे सुंदर मकान कितने ही दो खंड के थे, कितने ही तीन खंड के और कितने ही चार खंड के थे, कितने ही चंद्रशालाओं (मकानों के ऊपरी भाग) से सहित थे तथा कितने ही अट्टालिका आदि से सुशोभित थे ।।257-258।।
The beautiful mansions had large golden pillars, foundations made of unbreakable Vajra (diamond-like material), and walls crafted from radiant Chandrakanta gems. They were adorned with various types of precious stones, creating intricate and mesmerizing patterns. Some of these magnificent buildings had two stories, some had three, while others had four levels. Some were decorated with Chandrashalas (crescent-shaped rooftops), while others were further embellished with tall towers and ornate attics, making them exceptionally splendid. ॥257-258॥
श्लोक ( Shlok ) 259
प्रासादास्ते स्म राजन्ते स्वप्रभामग्नमूर्तयः । नभोलिहानाः कूटा ग्रेर्ज्योत्स्नयेव विनिर्मिताः ॥२५९॥
जो अपनी ही प्रभा में डूबे हुए हैं ऐसे वे मकान अपने शिखरों के अग्रभाग से आकाश का स्पर्श करते हुए ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो चाँदनी से ही बने हों ।।259।।
The mansions, bathed in their own radiant glow, appeared to be touching the sky with their towering peaks. They were so magnificent and luminous that they seemed as if they were entirely made of moonlight. ॥259॥
श्लोक ( Shlok ) 260
कूटागारसभागेहप्रेक्षाशालाः क्वचिद् विभुः । सशय्याः “सासनास्तुङ्ग सोपानाः श्वेतिताम्बराः ॥२६०॥
कहीं पर कूटागार (अनेक शिखरों वाले अथवा झूला देने वाले मकान), कहीं पर सभागृह और कहीं पर प्रेक्षागृह (नाट्यशाला अथवा अजायबघर) सुशोभित हो रहे थे, उन कूटागार आदि में शय्याएँ बिछी हुई थीं, आसन रखे हुए थे, ऊँची-ऊँची सीढ़ियाँ लगी हुई थीं और उन सबने अपनी कांति से आकाश को सफेद-सफेद कर दिया था ।।260।
In some places, lofty pavilions (kūṭāgāras) with multiple peaks or gently swaying structures stood gloriously, while elsewhere, grand assembly halls and magnificent theaters (prékṣāgṛhas) adorned the landscape. Within these splendid edifices, luxurious couches were spread, elegant seats were arranged, and towering stairways ascended gracefully. Their dazzling brilliance was so immense that they seemed to have painted the sky in a radiant white hue. ॥260॥
श्लोक ( Shlok ) 261
तेषु देवाः सगन्धर्वाः सिद्धा विद्याधराः सदा। पन्नगाः किन्नरैः सार्द्धमरमन्त कृतादराः ॥२६१॥
उन मकानों में देव, गंधर्व, सिद्ध (एक प्रकार के देव), विद्याधर, नागकुमार और किन्नर जाति के देव बड़े आदर के साथ सदा क्रीड़ा किया करते थे ।।261।।
In those magnificent mansions, Devas (celestial beings), Gandharvas (heavenly musicians), Siddhas (a type of divine beings), Vidyadharas (masters of mystical sciences), Nagakumaras (serpent deities), and Kinnaras (celestial singers and dancers) always engaged in joyful play with great reverence and delight. ॥261॥
श्लोक 262 से 271
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251