सुभद्रा और कामदेव की रूपकात्मकता
कवि सुभद्रा के रूप, स्पर्श, सुगन्ध, रस, और शब्द को कामदेव के पांच बाण मानते हैं। उसका कोमल शरीर कामदेव का धनुष है। उसकी हंसी, चितवन, और कपट कामदेव के अंग हैं। सुभद्रा के स्तन हेमन्त में भरत के रोमांच को शान्त करते हैं। वसन्त में वह चम्पा-चोटी और मधु-लाल नेत्रों से शोभती है। कोयल और भृंगों की ध्वनि कामदेव के आक्रमण-सी लगती है।
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
पञ्च बाणाननङ्गस्य वदन्त्येतान कुण्ठितान् । पुष्पेषुसंकथालोक प्रसिद्ध्यैव गता प्रथाम् ॥११२॥
कविलोग, जिनका कहीं प्रतिबन्ध नहीं होता ऐसा सुभद्राका रूप, कोमल स्पर्श, मुखकी सुगन्ध, ओठोंका रस और संगीतमय सुन्दर शब्द इन पाँचको ही कामदेवके पाँच बाण बतलाते हैं। लोकमें जो कामदेवके पांचो बाणोंकी चर्चा है वह रूढ़ि मात्रसे ही प्रसिद्ध हो गई है ।। ११२ ॥
Poets, unfettered by any constraint, declare that Subhadra’s form, her tender touch, the fragrance of her breath, the sweetness of her lips, and the melodious beauty of her words—these five are none other than the five arrows of the god of love. The renown of these five arrows of Kamadeva has spread throughout the world, becoming established lore by mere tradition.112
श्लोक ( Shlok ) 113
धनुर्लतां मनोजस्य प्राहुः पुष्पमत्रों जडाः । सुकुमारतरं स्त्रैणं वपुरेवातनोर्धनुः ॥११३॥
मूर्ख लोग कहते हैं कि कामदेवका धनुष फूलोंका है परन्तु वास्तव में स्त्रियोंका अत्यन्त कोमल शरीर ही उसका धनुष है ।। ११३।।
Fools say that the bow of Kamadeva is fashioned of flowers; yet truly, it is the exceedingly tender body of a woman that forms his bow.113
श्लोक ( Shlok ) 114
पञ्च बाणाननङ्गस्य नियच्छन्ति कुतो जडाः । यदेव कामिनां हारि तदस्त्रं कामदीपनम् ॥११४॥
न जाने क्यों मूर्ख लोग कामदेवको पांच बाण ही प्रदान करते हैं अर्थात् उसके पांच बाण बतलाते हैं क्योंकि जो कुछ भी कामीलोगों के चित्तको हरण करनेवाला है वह सभी कामको उत्तेजित करनेवाला कामदेवका बाण है। भावार्थ कामदेवके अनेक बाण हैं ।॥ ११४॥
t is unknown why fools assign Kamadeva only five arrows, limiting him thus, when in truth all that captivates the hearts of lovers is but an arrow of Kamadeva, stirring desire’s flame. In essence, Kamadeva wields countless arrows.114
श्लोक ( Shlok ) 115
स्मितमालोकितं हासो जल्पितं मदमन्मनम् । कामाङ्गमिदमंवान्यत् कैतवं तस्य पोषकम् ॥११५।।
स्त्रियोंका मन्द हास्य, तिरछी चितवन, जोरसे हंसना और कामके आवेशसे अस्पष्ट बोलना यही सब काम-देव के अङ्ग हैं इनके सिवाय जो उनका कपट है वह इन्हीं सबका पोषण करनेवाला है ।। ११५।।
A woman’s gentle smile, her sidelong glance, her hearty laughter, and her tender, hesitant speech—these are all limbs of Kamadeva. Beyond these, her very artifice serves only to nourish and sustain them. 115
श्लोक ( Shlok ) 116
आरूढयौवनोष्माणौ स्तनावस्या हिमागमे । रोम्णां हृषितमस्याङ्गे शिशिरोत्थं विनिन्यतुः ॥११६॥
जो जवानी के कारण गर्म हो रहे हैं ऐसे सुभद्रा के दोनों स्तन हेमन्तऋतुमें ठण्डसे उठे हुए भरत के शरीर के रोमांचों को दूर करते थे ।।११६।।
Subhadra’s breasts, warmed by youthful vitality, dispelled the chills that lingered upon Bharata’s body during the cold season of Hemanta.116
श्लोक ( Shlok ) 117
हिमानिलैः कुचोत्कम्पमाहितं सा हृतक्लमै । प्रेयस्करतलस्पर्शेरपनिन्ये ऽङ्कशायिनी ॥११७॥
गोदमें शयन करनेवाली सुभद्रा शीतलवायुकेद्वारा उत्पन्न हुई स्तनोंकी कँपकँपीको क्लेश दूर करनेवाले प्रिय पतिके करतलके स्पर्शसे दूर करती थी ।।११७।।
Subhadra, reclining in her lap, dispelled the trembling of her breasts—caused by the cold breeze—through the soothing touch of her beloved husband’s palm.117
श्लोक ( Shlok ) 118
साशोककलिकां चूतमञ्जरीं कर्णसङ्गिनीम् । दधती चम्पकप्रोत्तैः केशान्तैः साऽरुचन्मधौ ॥११८।।
अशोकवृक्षकी कलीके साथ साथ कानोंमें लगी हुई आमकी मंजरीको धारण करती हुई वह सुभद्रा वसन्तऋतुमें चम्पाके फूलोंसे गुंथी हुई चोटीसे बहुत ही अधिक सुशोभित हो रही थी ।।११८।।
Adorned with mango blossoms nestled beside the buds of the Ashoka tree, Subhadra, in the spring season, was becoming exceedingly radiant—her braid entwined with fragrant champaka flowers. 118
श्लोक ( Shlok ) 119
मधौ मधुमदारक्तलोचनामास्खलद्गतिम् । बहु मेने प्रियः कान्तां मूर्तामिव मदश्रियम् ॥११९॥
वसन्तऋतुमें मधुके मदसे जिसकी आंखें कुछ कुछ लाल हो रही हैं और जिसकी गति कुछ कुछ लड़खड़ा रही है- स्खलित हो रही है ऐसी उस सुभद्राको भरत महाराज मूर्तिमती मदकी शोभाके समान बहुत कुछ मानते थे ।।११९।।
In the spring season, her eyes slightly reddened with the intoxication of nectar, and her movements somewhat faltering and unsteady—such was Subhadra, whom King Bharata esteemed greatly, like the very embodiment of intoxicating delight. 119
श्लोक ( Shlok ) 120
कलैरलिकुलक्वाणै सान्यपुष्टविकूजितैः । मधुरं मधुरभ्यष्टोत् तुष्टये वामुं विशाम्पतिम् ॥१२०॥
वह वसन्तऋतु सन्तुष्ट होकर भ्रमरोंकी सुन्दर झंकार और कोकिलाओंकी कमनीय कूकसे मानो राजा भरतकी सुन्दर स्तुति ही करता था ॥१२०॥
The spring season, pleased and content, seemed to offer King Bharata its own beautiful praise—through the melodious hum of the bees and the enchanting call of the cuckoos.120
श्लोक ( Shlok ) 121
‘कलकण्ठीकलक्वाणछित रलिझङकृतैः। व्यज्यते स्म स्मराकाण्डावस्कन्दो डिण्डिमायितैः ॥ १२१।।
कोयलोंके सुन्दर शब्दोंसे मिली हुई भ्रमरोंकी झंकार-से ऐसा जान पड़ता था मानो कामदेवने नगाड़ोंके साथ अकस्मात् आक्रमण ही किया हो-छापा ही मारा हो ।॥ १२१ ॥
The enchanting notes of the cuckoos mingled with the buzzing chorus of the bees, as if Kamadeva himself had suddenly launched a surprise attack—striking with drums in hand. 121
श्लोक 122 से 131
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
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