आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 |
श्लोक 162 से 171 वनों का वर्णन
चार वन वीथियाँ नंदन-सी थीं। अशोक, सप्तपर्ण, चंपक, और आम के वृक्ष फूलों से हँसते थे। ये अर्घ लेकर खड़े थे। शाखाएँ नृत्य करती थीं। वृक्ष राजाओं-से सुखद थे। भ्रमर गुणगान करते थे। फूलों की भेंट होती थी। कोयलें इंद्रों को बुलाती थीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
तत्र वीथ्यन्तरेष्वासंश्चतस्रो वनवीथयः । नन्दनाद्या वनश्रेण्यो विभुं द्रष्टुमिवागताः ॥१६२ll
धूपघटों से कुछ आगे चलकर मुख्य गलियों के बगल में चार-चार वन की वीथियाँ थी जो कि ऐसी जान पड़ती थीं मानो नंदन आदि वनों की श्रेणियाँ ही भगवान् के दर्शन करने के लिए आयी हो ।।162।।
A little further from the incense burners, along the sides of the main streets, there were four rows of forests, which seemed as if the series of Nandan and other celestial forests had come to behold the divine vision of the Lord. ||162||
श्लोक ( Shlok ) 163
अशोकसप्तपर्णाह्वचम्पकाम्रमहीरुहाम् । वनानि तान्यधुस्तोषादिवोच्चैः कुसुमस्मितम् ॥१६३॥
वे चारों वन, अशोक, सप्तपर्ण, चंपक और आम के वृक्षों के थे, उन सब पर फूल खिले हुए थे जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो संतोष से हंस ही रहे हों ।।163।।
Those four forests consisted of Ashoka, Saptaparna, Champak, and Mango trees, all of which were in full bloom, making them appear as if they were laughing with contentment. ||163||
श्लोक ( Shlok ) 164
वनानि तरुमिश्चित्रः फलपुष्पोपशोभिभिः । जिगस्थार्ध्यमिवोत्क्षिप्य तस्थुस्तानि जगद्गुरोः ।।१६४॥
फल और फूलों से सुशोभित अनेक प्रकार के वृक्षों से वे वन ऐसे जान पड़ते थे मानो जगद्गुरु जिनेंद्रदेव के लिए अर्घ लेकर ही खड़े हों ।।164।।
Adorned with fruits and flowers, the various trees in those forests appeared as if they were standing in reverence, offering sacred offerings to the universal teacher, Lord Jinendra. ||164||
श्लोक ( Shlok ) 165
वनेषु तरवस्तेषु रेजिरे पवनाहतैः । शाखाकरैर्मुहुर्नृत्यं तन्वाना इव संमदात् ॥१६५ ll
उन वनों में जो वृक्ष थे वे पवन से हिलती हुई शाखाओं से ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो हर्ष से हाथ हिला-हिलाकर बार-बार नृत्य ही कर रहे हों ।।165।।
The trees in those forests, with their branches swaying in the wind, appeared as if they were joyfully raising their hands and dancing repeatedly in delight. ||165||
श्लोक ( Shlok ) 166
“सच्छायाः “सफलास्तुङ्गा जननिर्वृतिहेतवः । सुराजान इवाभूवंस्ते द्रुमाः सुखशीतलाः ॥१६६॥
अथवा वे वृक्ष, उत्तम छाया से सहित थे, अनेक फलों से युक्त थे, तुंग अर्थात् ऊँचे थे, मनुष्यों के संतोष के कारण थे, सुख देने वाले और शीतल थे इसलिए किन्हीं उत्तम राजाओं के समान जान पड़ते थे क्योंकि उत्तम राजा भी उत्तम छाया अर्थात् आश्रय से सहित होते हैं, अनेक फलों से युक्त होते हैं, तुंग अर्थात् उदारहृदय होते हैं, मनुष्यों के सुख के कारण होते हैं और सुख देने वाले तथा शांत होते हैं ।।166।।
Or those trees, endowed with excellent shade, abundant with various fruits, tall in stature, sources of satisfaction for people, and bearers of comfort and coolness, appeared akin to noble kings. For noble kings, too, possess great shelter (protection), are rich in many virtues, are lofty in generosity, bring happiness to their people, and provide peace and solace. ||166||
श्लोक ( Shlok ) 167
पुष्पामोदसमाहूतैः मिलितैरलिनां कुलैः । गायन्त इव गुञ्जन्द्भिर्जिनं रेजुर्वनद्रुमाः ॥१६७॥
फूलों की सुगंधि से बुलाये हुए और इसीलिए आकर इकट्ठे हुए तथा मधुर गुंजार करते हुए भ्रमरों के समूह से वे वृक्ष ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो जिनेंद्रदेव का गुणगान ही कर रहे हों ।।167।।
The trees, adorned with swarms of bees attracted by the fragrance of their flowers, which had gathered there and were humming sweetly, appeared as if they were singing the praises of Lord Jinedra. ||167||
श्लोक ( Shlok ) 168
क्वचिद्विरल मुन्मुक्तकुसुमास्ते महीरुहाः। पुष्पोपहारमातेनुरिव भक्त्या जगद्गुरोः ॥१६८ll
कहीं-कहीं विरलरूप से वे वृक्ष ऊपर से फूल छोड़ रहे थे जिनसे ऐसे मालूम होते थे मानो जगद्गुरु भगवान् के लिए भक्तिपूर्वक फूलों की भेंट ही कर रहे हों ।।168।।
Some of those trees, sparsely shedding flowers from above, appeared as if they were offering floral tributes to the World Teacher with deep devotion. ||168||
श्लोक ( Shlok ) 169
क्वचिद्विरुवतां ध्यानैरलिनां मदमञ्जुभिः । मदनं तर्जयन्तीव वनान्यासन् समन्ततः ॥१६९॥
कहीं-कहीं पर मधुर शब्द करते हुए भ्रमरों के मंद-मनोहर शब्दों से ये वन ऐसे जान पड़ते थे मानो चारों ओर से कामदेव की तर्जना ही कर रहे हों ।।169।।
In some places, with the sweet and gentle humming of bees, these forests seemed as if they were reproaching Kamadeva (the god of love) from all directions. ||169||
श्लोक ( Shlok ) 170
पुंस्कोकिलकलक्वाणैराह्वयन्तीव सेवितुम् । जिनेन्द्रममराधीशान् वनानि विवभुस्तराम् ॥१७०॥
उन वनों में कोयलों के जो मधुर शब्द हो रहे थे उनसे वे वन ऐसे अच्छे सुशोभित हो रहे थे मानो जिनेंद्र भगवान की सेवा करने के लिए इंद्रों को ही बुला रहे हों ।।170।।
In those forests, the sweet melodies of the cuckoos made the surroundings so enchanting as if they were calling upon the Indras to serve Lord Jinendra. ||170||
श्लोक ( Shlok ) 171
पुष्परेणुभिराकीर्णा वनस्याधस्तले मही । सुवर्णरजसास्तीर्णतलेवासीन्मनोहरा ॥१७१॥
उन वनों में वृक्षों के नीचे की पूरी फूलों के पराग से ढकी हुई थी जिससे वह ऐसी मनोहर जान पड़ती थी मानो उसका तलभाग सुवर्ण की धूलि से ही ढक रहा हो ।।171।।
In those forests, the ground beneath the trees was entirely covered with the pollen of flowers, making it appear so enchanting as if its surface were veiled with golden dust. ||171||
श्लोक 172 से 181
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 |