आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 बाहुबली का परिषह-जय और कषाय-विजय
बाहुबली याचना परिषह सहन कर मौन रहते हैं। वे क्षमा से क्रोध, सरलता से माया, और संतोष से लोभ जीतते हैं। स्वेद, मल, तृण-स्पर्श, और रोग-परिषह को धैर्यपूर्वक सहन करते हैं। ज्ञान के अहंकार का त्याग कर प्रज्ञा-परिषह जीतते हैं। सत्कार-पुरस्कार और अलाभ-परिषह में संतुष्ट रहते हैं। कामदेव को जीतकर इंद्रियों पर नियंत्रण पाते हैं। वे आहार, भय, मैथुन, और परिग्रह जैसी संज्ञाओं को नष्ट करते हैं। परिषह-जय से उनकी कर्म-निर्जरा होती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
‘याचित्रियेण नास्येष्टा विष्वाणेन तनुस्थितिः । तेन वाचंयमो भूत्वा याञ्चाबाधामसोढ सः ।। १२२॥
याचनासे प्राप्त हुए भोजनके द्वारा शरीर-की स्थिति रखना उन्हें इष्ट नहीं था इसलिये वे मौन रहकर याचना परिषहको बाधाको सहन करते थे ॥१२२॥
To sustain the body through alms begged with speech was not his wish; thus, in steadfast silence, he endured the hardship of the yāchanā pariṣaha—the trial of restraint from asking, bearing it without complaint.122
श्लोक ( Shlok ) 123
जल्लं मलं तृणस्पर्श सोऽसोढो ढोत्तमक्षमः । व्युत्सृष्टतनुसंस्कारो निर्विशेषसुखासुखः ॥ १२३॥
जिन्होंने उत्तम क्षमा धारण की है, शरीरका संस्कार छोड़ दिया है और जिन्हें सुख तथा दुःख दोनों ही समान हैं ऐसे उन मुनिराजने स्वेद मल तथा तृण स्पर्श परिषह-को भी सहन किया था ।। १२३।।
He who had embraced the supreme virtue of forgiveness, who had forsaken all concern for the body, and to whom pleasure and pain were alike—such a noble sage bore without distress the trials of sweat, filth, and the harsh touch of grass and thorns.123
श्लोक ( Shlok ) 124
रोगस्यायतनं देहमा ध्यायन् धीरधीरसौ। विविधातङ्कजां बाधां सहते स्म सुदुःसहाम् ।।१२४।।
‘यह शरीर रोगोंका घर है’ इस प्रकार चिन्तवन करते ही वे धीरवीर बुद्धिके धारक बाहुबली बड़ी कठिनतासे सहन करने के योग्य रोगोंसे उत्पन्न हुई बाधाको भी सहन करते थे ॥१२४।॥
“This body is but a dwelling place of disease”—thus reflecting, the steadfast and valiant Bahubali, endowed with resolute wisdom, endured even the most grievous afflictions of illness, though they were arduous to bear.124
श्लोक ( Shlok ) 125
प्रज्ञा परिषहं प्राज्ञो ज्ञानजं गर्वमुत्सृजन् । आसर्वज्ञं तदुत्कर्षात् स ससाह ससाहसः ॥१२५।।
ज्ञानका उत्कर्ष सर्वज्ञ होने तक है अर्थात् जबतक सर्वज्ञ न हो जावे तबतक ज्ञान घटता बढ़ता रहता है इसलिये ज्ञानसे उत्पन्न हुए अहंकार-का त्याग करते हुए अतिशय बुद्धिमान् और साहसी वे मुनिराज प्रज्ञा परिषहको सहन करते थे । भावार्थ केवलज्ञान होनेके पहले सभीका ज्ञान अपूर्ण रहता है ऐसा विचार कर वे कभी ज्ञानका गर्व नहीं करते थे ।। १२५।।
True knowledge attains its perfection only in omniscience; until then, it ever waxes and wanes. Realizing this, the exceedingly wise and valiant sage renounced all pride born of learning and humbly endured the prajñā pariṣaha—the trial of intellect. Aware that all knowledge remains incomplete until the dawn of omniscience, he never succumbed to arrogance born of wisdom. 125
श्लोक ( Shlok ) 126
स सत्कारपुरस्कारे नासीज्जातु समुत्सुकः । पुरस्कृतो मुदं नागात् सत्कृतो न स्म तुष्यति ॥ १२६॥
वे अपने सत्कार पुरस्कारमें कभी उत्कण्ठित नहीं होते थे । यदि किसीने उन्हें अपने कार्य में अगुआ बनाया तो वे हर्षित नहीं होते थे और किसीने उनका सत्कार किया तो संतुष्ट नहीं होते थे। भावार्थ अपने कार्य में किसीको अगुआ बनाना पुरस्कार कहलाता है तथा स्वयं आये हुएका सम्मान करना सत्कार कहलाता है वे मुनिराज सत्कार पुरस्कार दोनोंमें ही निरुत्सुक रहते थे उन्होंने सत्कार पुरस्कार परिषह अच्छी तरह सहन किया था ।।१२६।॥
Never did he yearn for honor or reward. If someone placed him at the forefront of a task, he felt no elation; if another offered him reverence, he remained untouched by satisfaction. For to be appointed as a leader is called reward, and to be respectfully received is honor—yet the noble sage remained indifferent to both. Thus did he gracefully endure the satkāra-puraskāra pariṣaha—the trial of honor and reward.126
श्लोक ( Shlok ) 127
परीषहमलाभं च सन्तुष्टो जयति स्म सः ।अज्ञानादर्शनोद्भूता बाधासीन्नास्य योगिनः ॥१२७॥
सदा सन्तुष्ट रहनेवाले बाहुबलीजीने अलाभ परिषहको जीता था तथा अज्ञान और अदर्शनसे उत्पन्न होनेवाली बाधाएं भी उन मुनिराजको नहीं हुई थीं ।॥१२७।।
Ever content in all circumstances, Bahubali had triumphed over the alābha pariṣaha—the trial of lack and loss. Moreover, the noble sage remained untouched by the afflictions born of ignorance and spiritual obscuration; such was the radiance of his unwavering inner light.127
श्लोक ( Shlok ) 128
परीवजयादस्य विपुला निर्जराऽभवत् । कर्मणां निर्जेरोपायः परीषहजयः परः ॥ १२८॥
इस प्रकार परिषहों के जीतने से उनके बहुत बड़ी कर्मोंकी निर्जरा हो गई थी सो ठीक ही है क्योंकि परिषहोंको जीतना ही कर्मोंकी निर्जरा करनेका श्रेष्ठ उपाय है ॥ १२८॥
Thus, by conquering the pariṣahas—the trials and hardships—he brought about the profound shedding of vast and weighty karmas. And rightly so, for the victory over such afflictions is indeed the most noble means of karmic eradication.128
श्लोक ( Shlok ) 129
क्रोधं तितिक्षया मानमुत्सेक परिवर्जनैः। मायामृजुतया लोभं सन्तोषेण जिगाय सः ॥१२९॥
उन्होंने क्षमासे क्रोध को, अहंकारके त्यागसे मानको, सरलतासे मायाको और संतोषसे लोभको जीता था ॥ १२९।।
With forgiveness, he vanquished anger; with the renunciation of pride, he overcame arrogance; with simplicity, he subdued deceit; and with contentment, he conquered greed.129
श्लोक ( Shlok ) 130
पञ्चेन्द्रियाण्यनायासात् सोऽजयज्जितमन्मथः । विषयेन्धनदीप्तस्य कामाग्नेः शमनं तपः ॥ १३०॥
काम देवको जीतने वाले उन मुनिराज ने पांच इन्द्रियोंको अनायास ही जीत लिया था सो ठीक ही है क्योंकि विषयरूपी ईंधन जलती हुई कामरूपी अग्निको शमन करने-वाला तपश्चरण ही है। भावार्थ इन्द्रियोंको वश करना तप है और यह तभी हो सकता है जब कामरूपी अग्निको जीत लिया जावे ॥ १३०॥
The sage who had triumphed over the god of desire had, with effortless grace, subdued all five senses. And rightly so—for the fire of passion, once ablaze, can be extinguished only through the austerities that withhold the fuel of sensual pleasures. In truth, mastery over the senses is born of such ascetic conquest.130
श्लोक ( Shlok ) 131
आहारभयसंज्ञे च समैथुनपरिग्रहे । अनङ्गविजयादेताः संज्ञाः क्षपयति स्म सः ॥ १३१॥
उन्होंने कामको जीत लेनेसे आहार, भय, मैथुन और परिग्रह इन संज्ञाओंको नष्ट किया था ।। १३१।।
By conquering desire, he annihilated the four primal instincts—hunger, fear, lust, and attachment to possessions.131
श्लोक 132 से 141
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
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