आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71 आकाश की शोभा
आकाश मणियों की कांति से व्याप्त था। वह संध्या, समुद्र, और मोतियों से सुशोभित था। देवांगनाएँ कल्पलताओं-सी लगती थीं। उनके मुख सरोवर-से थे। भ्रमर कामदेव की डोरी-से थे। देवों का आगमन समुद्र-सा था। वह ज्योतिषी सृष्टि-सा प्रतीत होता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
इन्द्रनीलमयाहार्य रुचिभिः क्वचिदाततम् । स्वामाभां बिभराभास धौतासिनिभमम्बरम् ॥६२॥
स्वच्छ तलवार के समान सुशोभित आकाश कहीं-कहीं पर इंद्रनीलमणि के बने हुए आभूषणों को कांति से व्याप्त होकर अपनी निराली ही कांति धारण कर रहा था ।।62।।
The clear, sword-like radiant sky was, in certain places, illuminated by the brilliance of ornaments made of Indranila (sapphire) gems, adopting a unique and mesmerizing splendor of its own. ( 62)
श्लोक ( Shlok ) 63
पद्मरागरुचा व्याप्तं क्वचिद्व्यो मतलं बभौ । सान्ध्यं रागमिवाविभ्रदनुरञ्जितदिद्मुखम् ॥६३॥
वही आकाश कहं पर पद्मराग मणियों की कांति से व्याप्त हो रहा था जिससे ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो समस्त दिशाओं को अनुरंजित करने वाली संध्याकाल की लालिमा ही धारण कर रहा हो ।।63।।
In some places, the sky was illuminated by the radiance of Padmaraga (ruby) gems, making it appear as if it had adorned the reddish glow of the evening twilight, which paints all directions in its enchanting hue. ( 63)
श्लोक ( Shlok ) 64
क्वचिन्मरकतच्छाया समाक्रान्तमभान्नमः । स शेवलमिवाम्भोधेर्जलं पर्यन्तसंश्रितम् ॥६४॥
कहीं पर मरकतमणि की छाया से व्याप्त हुआ आकाश ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो शैवाल से सहित और किनारे पर स्थित समुद्र का जल ही हो ।।64।।
In some places, the sky, infused with the green radiance of emerald (Marakata) gems, appeared as if it were the waters of an ocean near the shore, adorned with floating moss and aquatic plants. (64)
श्लोक ( Shlok ) 65
देवाभरणमुक्तौघशबलं सहविद्रुभम् । भेजे पयोमुचां वर्त्म विनीलं जलधेः श्रियम् ॥६५॥
देवों के आभूषणों में लगे मोतियों के समूह से चित्र-विचित्र तथा मूंगाओं से व्याप्त हुआ वह नीला आकाश समुद्र की शोभा को धारण कर रहा था ।।65।।
The blue sky, adorned with the radiant clusters of pearls embedded in the ornaments of the gods and illuminated by the brilliance of coral gems, resembled the mesmerizing beauty of the vast ocean. ( 65)
श्लोक ( Shlok ) 66
तन्व्यः सुरुचिराकारा लसदंशुकभूषणाः । तदामरस्त्रियो रेजुः कल्पवल्ल्य इवाम्बरे ॥६६॥
जो शरीर से पतली हैं, जिनका आकार सुंदर हैं और जिनके वस्त्र तथा आभूषण अतिशय दैदीप्यमान हो रहे हैं ऐसी देवांगनाएं उस समय आकाश में ठीक कल्पलताओं के समान सुशोभित हो रही थीं ।।66।।
The celestial maidens (Devanganas), with their slender bodies, graceful forms, and dazzling garments and ornaments, appeared in the sky like heavenly wish-fulfilling creepers (Kalpalatas), enhancing the divine splendor of the scene. ( 66)
श्लोक ( Shlok ) 67
स्मेरवक्त्राम्बुजा रेजुर्नयनोत्पलराजिताः । सरस्य इव लावण्यरसापूर्णाः सुराङ्गनाः ॥६७॥
उन देवांगनाओं के कुछ-कुछ हँसते हुए मुख कमलों के समान थे, नेत्र नीलकमल के समान सुशोभित थे और स्वयं लावण्यरूपी जल से भरी हुई थीं इसलिए वे ठीक सरोवरों के समान शोभायमान हो रही थीं ।।67।।
The celestial maidens (Devanganas) appeared like enchanting lakes, as their gently smiling faces resembled blooming lotuses, their beautiful eyes shone like blue lotus flowers, and their entire being was filled with the radiance of grace and charm, like water filling a serene pond. ( 67)
श्लोक ( Shlok ) 68
तासां स्मेराणि वक्त्राणि पद्मबुद्ध्या नुधावताम् । रंजे मधुलिहां माला धनुर्ज्येव मनोभुवः ॥६८॥
कमल समझकर उन देवांगनाओं के मुखों की ओर दौड़ती हुई भ्रमरों की माला कामदेव के धनुष की डोरी के समान सुशोभित हो रही थी ।।68।।
The garland of bees, mistaking the faces of the celestial maidens (Devanganas) for lotus flowers, swarmed toward them, appearing as the bowstring of Kamadeva’s (the god of love) bow, adding to the enchanting beauty of the scene. (68)
श्लोक ( Shlok ) 69
हाराश्रितस्तनोपान्ता रेजुरप्सरसस्तदा। दधाना इव निर्मोकसमच्छायं स्तनांशुकम् ।। ६९॥
जिनके स्तनों के समीप भाग में हार पड़े हुए हैं ऐसी वे देवांगनाएँ उस समय ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो साँप की काँचली के समान कांति वाली चोली ही धारण कर रही हों ।।69।।
The celestial maidens (Devanganas), adorned with necklaces resting near their bosoms, appeared as if they were wearing bodices shimmering like the glistening sloughed skin of a serpent, enhancing their divine radiance. ( 69)
श्लोक ( Shlok ) 70
सुरानकमहाध्वानः पूजावेलां परां दधत् । प्रचरद्देवकल्लोलो बभौ देवागमाम्बुधिः ॥७०॥
उस समय वह देवों का आगमन एक समुद्र के समान जान पड़ता था क्योंकि समुद्र जिस प्रकार अपनी गरजना से वेला अर्थात् ज्वार-भाटा को धारण करता है उसी प्रकार वह देवों का आगमन भी देवों के नगाड़ों के बड़े भारी शब्दों से पूजा-वेला अर्थात् भगवान् की पूजा के समय को धारण कर रहा था, और समुद्र में जिस प्रकार लहरें उठा करती हैं उसी प्रकार उस देवों के आगमन में इधर-उधर चलते हुए देवरूपी लहरें उठ रही थी ।।70।।
At that moment, the arrival of the gods resembled a vast ocean, for just as the sea, with its thunderous roar, carries the rising tides, so too was the divine procession filled with the resounding echoes of celestial drums, marking the sacred time of worship. And just as waves rise and fall in the ocean, the gods moving in different directions appeared like waves surging in the divine assembly. ( 70)
श्लोक ( Shlok ) 71
ज्योतिर्मय इवैतस्मिन् आते सृष्ट्यन्तरे भृशम्। ज्योतिर्गणा ह्वियेवासन् विच्छायत्वाद्लक्षिताः ॥७१॥
जिस समय वह प्रकाशमान देवों की सेना नीचे की ओर आ रही था उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो ज्योतिषी देवों की एक दूसरी ही सृष्टि उत्पन्न हुई हो और इसलिए ही ज्योतिषी देवों के समूह लज्जा से कांतिरहित होकर अदृश्य हो गये हों ।।71।।
As the radiant army of gods descended toward the earth, it appeared as if a new celestial creation had emerged, outshining the luminaries of the heavens. Overwhelmed by this divine brilliance, the assemblage of celestial bodies (Jyotishi Devas) seemed to fade away in shame, their radiance dimmed into invisibility. (71)
श्लोक 72 से 81
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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