आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 युद्ध की तैयारी और चिंतन
घोड़ों के खुरों से उठी धूल आकाश को ढक लेती है, जिसमें चक्ररत्न का प्रकाश ही मार्गदर्शन करता है। राजा योद्धाओं के वार्तालाप से उत्साहित होते हैं। बाहुबली रणभूमि को तैयार कर प्रतीक्षा करते हैं, जबकि भरत उच्छृंखल होकर उनके समक्ष जाते हैं। लोग चिंतित होकर कहते हैं कि यह युद्ध सेवकों के लिए हानिकारक है। वे भरत के युद्ध को ऐश्वर्य के मद में अयोग्य मानते हैं और दोनों भाइयों को रोकने की कामना करते हैं। बाहुबली को सिंह-सा शूरवीर और भरत को चक्रधारी असाधारण पुरुष मानते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
भूरेणवस्तदाश्वीयखुरोद्धूताः खलङ्धिनि । क्षणविध्नितसंप्रेक्षाः प्रचक्रुरमराङ्गनाः ॥२२॥
उस समय घोड़ोंके खुरोंसे उठी हुई और आकाशको उल्लंघन करनेवाली पृथिवीकी धूल क्षण भरके लिये देवांगनाओंके देखनेमें भी बाधा कर रही थी ।। २२ ।।
At that moment, the dust stirred up by the hooves of steeds rose high, veiling the heavens themselves, and for a brief while, even the celestial maidens found their vision obscured.22
श्लोक ( Shlok ) 23
रजः सन्तमसे रुद्धदिक्चक्रे व्योमलङ्घिनि । चक्रोद्योतो नृणां चक्रे दृशः स्वविषयोन्मुखीः ॥२३॥
समस्त दिशाओंको व्याप्त करनेवाले और आकाशको उल्लंघन करनेवाले उस धूलिसे उत्पन्न हुए अन्धकारमें चक्ररत्नका प्रकाश ही मनुष्यों के नेत्रोंको अपना अपना विषय ग्रहण करनेके सन्मुख कर रहा था ।।२३।।
In that darkness born of the dust that enveloped all directions and soared to the heavens, it was the radiant gleam of the discus-jewel alone that guided human eyes, enabling them to perceive their respective objects.23
श्लोक ( Shlok ) 24
समुद्भटरसप्रायैः भटालापैर्महीश्वराः । प्रयाणके धृतिं प्रापुर्जनजल्पैरपीदृशैः ॥२४।।
राजा लोग रास्ते में अत्यन्त उत्कट वीररससे भरे हुए योद्धाओं के परस्परके वार्तालापसे तथा इसी प्रकारके अन्य लोगोंकी बात-चीतसे ही उत्साहित हो रहे थे ।। २४।।
The kings, as they advanced, drew inspiration from the fervent speech of warriors brimming with intense heroic ardor, as well as from the stirring conversations of others of like spirit along the way.24
श्लोक ( Shlok ) 25
रणभूमि “प्रसाध्यारात् स्थितो बाहुबली नृपः। अयं च नृपशार्दूलः प्रस्थितो निर्नियन्त्रणः ॥२५॥
उधर राजा बाहुबली रणभूमिको दूरसे ही युद्धके योग्य बनाकर ठहरे हुए हैं और इधर राजाओंमें सिंहके समान तेजस्वी महाराज भरत भी यन्त्रणा-रहित (उच्छृङखल) होकर उनके सन्मुख जा रहे हैं ।॥ २५॥
Yonder stood King Bāhubali, having readied the battlefield from afar, poised for war; while here, radiant as a lion among kings, Emperor Bharata advanced toward him, unrestrained and fearless.25
श्लोक ( Shlok ) 26
न विघ्नः किन्नु खल्वत्र स्याद् भ्रात्रोरनयोरिति । प्रायो न शान्तये युद्धमानयोरनुजीविनाम् ॥२६॥
नहीं मालूम इस युद्धमें इन दोनों भाइयों का क्या होगा ? प्रायः कर इनका यह युद्ध सेवकोंकी शान्तिके लिये नहीं है। भावार्थ-इस युद्धमें सेवकों का कल्याण दिखाई नहीं देता है ।। २६ ।।
Who can tell what shall befall these two brothers in this war? Surely, this battle is not waged for the peace of their attendants—for in truth, no welfare of the servants is seen to arise from it.26
श्लोक ( Shlok ) 27
विरूपकमिदं युद्धमारब्धं भरतेशिना । ऐश्वर्यमददुर्वाराः स्वैरिणः प्रभवोऽथवा ॥२७॥
भरतेश्वरने यह युद्ध बहुत ही अयोग्य प्रारम्भ किया है सो ठीक ही है क्योंकि जो ऐश्वर्य के मदसे रोके नहीं जा सकते ऐसे प्रभु लोग स्वेच्छाचारी ही होते हैं ।॥ २७।।
This war, most unworthy in its inception, has been commenced by Lord Bharata—and rightly so, for sovereigns, intoxicated by the pride of dominion and beyond the bounds of restraint, are oft given to acts of sheer self-will.27
श्लोक ( Shlok ) 28
इमे मकुटबद्धाः किं नैनौ वारयितुं क्षमाः । येऽमी समग्रसामग्रया सङ्ग्रामयितुमागताः ॥२८॥
जो ये मुकुटबद्ध राजा समस्त सामग्रीके साथ युद्ध करनेके लिये आये हुए हैं वे क्या इन दोनोंको नहीं रोक सकते हैं ? ॥२८॥
Can these crownéd kings, who have assembled with all their might and resources for war, not restrain these two from such a fratricidal conflict?28
श्लोक ( Shlok ) 29
अहो महानुभावोऽयं कुमारो भुजविक्रमी । क्रुद्धे चक्रधरेऽप्येवं यो योद्ध सम्मुखं स्थितः ॥२९॥
अहो, भुजाओंका पराक्रम रखनेवाला यह कुमार बाहुबली भी महाप्रतापी है जो कि चक्रवर्तीक कुपित होनेपर भी इस प्रकार युद्धके लिये सन्मुख खड़ा हुआ है ।॥ २९॥
Ah, how mighty is this Prince Bāhubali, endowed with the valor of strong arms! Even before the wrath of a universal emperor, he stands undaunted, prepared for battle—truly, he is resplendent in majesty and might.29
श्लोक ( Shlok ) 30
अथवा तन्त्रभूयस्त्वं न जयाङ्गं मनस्विनः । ननु सिंहो जयत्येकः संहितानपि दन्तिनः ॥३०॥
अथवा शूरवीर लोगोंको सामग्रीकी अधिकता विजयका कारण नहीं है क्योंकि एक ही सिंह झुण्डके झुण्ड हाथियोंको जीत लेता है ॥३०।।
Nay, for the truly valiant, abundance of resources is no sure path to victory; does not a lone lion vanquish entire herds of elephants?30
श्लोक ( Shlok ) 31
अयं च चक्रभृद् देवो नेष्टः सामान्यमानुषः । योऽभिरक्ष्यः सहस्त्रेण प्रणत्राणां सुधाभुजाम् ॥३१॥
नमस्कार करते हुए हजारों देव जिसकी रक्षा करते हैं ऐसा यह चक्रको धारण करने-वाला भरत भी साधारण पुरुष नहीं है ।। ३१।।
He who bears the discus, whom thousands of celestials guard with reverent salutations—this Bharata is no ordinary man.31
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
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