भरतेश्वर के वैभव का वर्णन
श्लोक 1 से 11 भरत का अयोध्या में अभिषेक
चक्रवर्ती भरत, दिग्विजय पूर्ण कर अयोध्या में ध्वजाओं से सुशोभित वैभवपूर्ण प्रवेश करते हैं। राजाओं, अन्तःपुर, और नगरवासियों द्वारा उनका भव्य अभिषेक किया जाता है, जिसमें वृषभदेव के अभिषेक जैसी विधियां अपनाई जाती हैं। देव और राजा उन्हें आभूषण पहनाते हैं और जयघोष करते हैं। गंगा-सिन्धु देवियां तीर्थजल से अभिषेक करती हैं। अभिषिक्त भरत सिंहासन पर विराजते हैं, और गणबद्ध देव उनके मुकुट नवा-नवाकर सेवा करते हैं।
श्लोक 12 से 21 भरत की विनम्रता और वैभव
हिमवान, विजयार्ध, मागध, और विद्याधर भरत को नमस्कार करते हैं। अभिषेक के बावजूद भरत को अहंकार नहीं होता, क्योंकि वे भाइयों को विभूति न बांट पाने का पश्चाताप करते हैं। बाहुबली के संघर्ष से उनका तेज और बढ़ता है। निष्कंटक राज्य प्राप्त कर वे सूर्य-से देदीप्यमान होते हैं। उनकी प्रजा योग और क्षेम से सनाथ रहती है। भरत निधियों और रत्नों का यथायोग्य उपयोग करते हैं, जिससे उनका यश प्रथम चक्रवर्ती के रूप में फैलता है।
श्लोक 22 से 31 भरत की सेना और शारीरिक बल
गौतमस्वामी राजा श्रेणिक के प्रश्न पर भरत की विभूति का वर्णन करते हैं। उनके पास 84 लाख ऐरावत हाथी, 84 लाख रथ, 18 करोड़ घोड़े, और 84 करोड़ पैदल सिपाही हैं। भरत का शरीर वज्रवृषभनाराच संहनन से अभेद्य और समचतुरस्र संहनन से सुंदर है। उनकी कान्ति सुवर्ण-सी और शरीर 64 लक्षणों से युक्त है। उनका शारीरिक बल छह खंडों के राजाओं से अधिक है, और उनका चक्र-शासन सभी राजा स्वीकार करते हैं।
श्लोक 32 से 41 भरत का साम्राज्य और रानियां
भरत के 32 हजार मुकुटबद्ध राजा, 32 हजार देश, और 32 हजार उच्च कुल की देवियां हैं। इसके अतिरिक्त 32 हजार प्रियरानियां और 32 हजार कामोत्तेजक रानियां उनके अन्तःपुर में हैं। ये 96 हजार रानियां कल्पलता और कमलिनी-सी शोभती हैं। उनके शरीर कामदेव की शक्ति को बढ़ाते हैं। उनकी जंघाएं, कमर, और नाभि कामदेव के तरकस, कुटी, और कूपिका-सी प्रतीत होती हैं।
श्लोक 42 से 51 रानियों की शारीरिक शोभा
रानियों की रोमराजि, स्तन, और भुजाएं कामदेव की लकड़ी, पिटारा, और पाश-सी हैं। उनका कण्ठ, मुख, और नेत्र कामदेव के उच्छ्वास, सुख-भवन, और बाणों-से युक्त हैं। उनके ललाट, बाल, और केश-लताएं कामदेव के खेल-मैदान और जाल-सी प्रतीत होती हैं। ये रानियां अपनी शारीरिक चेष्टाओं से भरत का मन हरण करती हैं। उनके स्पर्श, अवलोकन, और मधुर शब्दों से भरत को संतोष मिलता है।
श्लोक 52 से 61 रानियों का कामदेव और साम्राज्य
रानियों की हंसी और आलिंगन से सुरत-वृक्ष फलता है। उनकी चेष्टाएं कामदेव को विभिन्न रसों से युक्त करती हैं, जो प्रेम, क्रोध, और संभोग में बदलता रहता है। भरत इन रानियों के साथ कामदेव-से क्रीड़ा करते हैं। उनके साम्राज्य में 32 हजार नाटक, 72 हजार नगर, और 96 करोड़ गांव हैं, जो स्वर्ग-से सुशोभित हैं।
श्लोक 62 से 71 साम्राज्य की समृद्धि
भरत के साम्राज्य में 99 हजार द्रोणामुख (बंदरगाह), 48 हजार पत्तन, 16 हजार खेट, 56 अन्तरद्वीप, और 14 हजार संवाह हैं। उनके पास 1 करोड़ हंडे, 1 लाख करोड़ हल, 3 करोड़ गौशालाएं, 700 कुक्षिवास, और 28 हजार सघन वन हैं। ये समृद्धियां उनके साम्राज्य को धन-धान्य और व्यवस्था से परिपूर्ण बनाती हैं।
श्लोक 72 से 81 भरत के म्लेच्छ राजा और नौ निधियां
महाराज भरत के अधीन 18,000 म्लेच्छ राजा हैं, जिनके क्षेत्रों में रत्न-खानें हैं। उनके पास काल, महाकाल, नैसर्ण्य, पाण्डुक, पद्म, माणव, पिङ्गल, शंख, और सर्वरत्न नामक नौ निधियां हैं, जो उनकी आजीविका को निश्चिंत रखती हैं। काल निधि से शास्त्र और संगीत उत्पन्न होते हैं। महाकाल निधि से छह कर्मों के साधन, नैसर्ण्य से शय्या-आसन, पाण्डुक से धान्य और रस, पद्म से वस्त्र, पिङ्गल से आभूषण, माणव से नीति-शस्त्र, शंख से सुवर्ण, और सर्वरत्न से विविध रत्न उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 82 से 92 चौदह रत्न और सुभद्रा का परिचय
भरत के पास जीव और अजीव भेद से चौदह रत्न हैं। चक्र, छत्र, दण्ड, असि, मणि, चर्म, और काकिणी अजीव रत्न हैं, जबकि सेनापति, गृहपति, हाथी, घोड़ा, स्त्री, सिलावट, और पुरोहित सजीव रत्न हैं। ये रत्न अयोध्या और विजयार्ध शैल पर उत्पन्न हुए। ये निधियां और रत्न भरत के हृदय को बलिष्ठ बनाते हैं। सुभद्रा नामक उनकी स्त्री-रत्न, विद्याधर वंश की, शिरीष-फूल-सी कोमल, चम्पा-कली-सी कान्तिमान, और कामोत्तेजक है।
श्लोक 93 से 101 सुभद्रा की शारीरिक शोभा
सुभद्रा के चरण नूपुरों की ध्वनि से कामदेव के नगाड़ों-से बजते हैं। उनकी जंघाएं और नितम्ब कामदेव की नसैनी और गृह-से हैं। रोमावली से कामदेव-रूपी सर्प उनकी नाभि से स्तनों तक पहुंचता है। वह हार और चोली से सर्पिणी-सी शोभती है। उसकी भुजाएं कल्पवृक्ष के अंकुर, करतल विजय-रेखाओं से युक्त, और मुख कामदेव की आयुधशाला-सा है।
श्लोक 102 से 111 सुभद्रा की रूप-महिमा
सुभद्रा का मुख चन्द्र-कान्ति को जीतता है, और कान सोने के पत्रों से देवांगनाओं को पराजित करते हैं। उसके कपोल कामदेव के दर्पण, नाक सुगन्ध-सूंघने वाली, और नेत्र परस्पर स्पर्धा करते हैं। ललाट नीलकमल-माला-सा और केश कामदेव का पाश-से शोभते हैं। उसका रूप तीनों लोकों को जीतता है। भरत उसके रूप, स्पर्श, और संगीतमय शब्दों से सन्तुष्ट होकर क्रीड़ा करते हैं।
श्लोक 112 से 121 सुभद्रा और कामदेव की रूपकात्मकता
कवि सुभद्रा के रूप, स्पर्श, सुगन्ध, रस, और शब्द को कामदेव के पांच बाण मानते हैं। उसका कोमल शरीर कामदेव का धनुष है। उसकी हंसी, चितवन, और कपट कामदेव के अंग हैं। सुभद्रा के स्तन हेमन्त में भरत के रोमांच को शान्त करते हैं। वसन्त में वह चम्पा-चोटी और मधु-लाल नेत्रों से शोभती है। कोयल और भृंगों की ध्वनि कामदेव के आक्रमण-सी लगती है।
श्लोक 122 से 131 ऋतुओं में सुभद्रा के साथ क्रीड़ा
वसन्त का चैत्र मास सुगन्ध से भरा है, और मलय-वायु कामदेव की घोषणा-सी करता है। ग्रीष्म में सुभद्रा जल-स्नान और चन्दन-लेप से भरत को शान्त करती है। मालती-मालाएं पहनकर वह रातें प्रेममयी बनाती है। वर्षा में वह मेघ-गर्जना से भयभीत होकर भरत से आलिंगन करती है। नदियों, मयूरों, और बक-फूलों की सुगन्ध कामी लोगों को सन्तुष्ट करती है।
श्लोक 132 से 141 वर्षा और शरद में सुभद्रा का सौन्दर्य
वर्षा में मेघमाला और जल-धाराएं पथिकों को बांधती हैं, और सुभद्रा सुगन्धित मुख से भरत के साथ रात्रि व्यतीत करती है। शरद में भरत सप्तच्छद वनों में सुभद्रा के साथ विहार करते हैं। चांदनी रातों में वे उसकी हार-युक्त स्तनों को प्रेम करते हैं। सुभद्रा की माला और कमल भरत के वक्ष पर लटकते हैं, जिन्हें वह प्रेम से सूंघती है, और दोनों मिलकर ऋतुओं का सुख भोगते हैं।
श्लोक 142 से 151 भरत के भोग और वैभव
चक्रवर्ती भरत सुभद्रा के साथ प्रेम और रति-सुख में लीन होकर दस भोग-साधनों—निधियां, रानियां, नगर, शय्या, आसन, सेना, नाट्यशाला, वर्तन, भोजन, और सवारी—का उपभोग करते हैं। वे इन साधनों से संतृप्त होकर एकछत्र पृथ्वी का पालन करते हैं। उनके 16,000 गणबद्ध देव निधियों, रत्नों, और उनकी रक्षा में तत्पर रहते हैं। क्षितिसार कोट, सर्वतोभद्र गोपुर, नन्द्यावर्त छावनी, वैजयन्त महल, और दिकस्वस्तिका सभाभूमि उनके वैभव को दर्शाते हैं।
श्लोक 152 से 161 भरत के महल और आयुध
भरत के पास सुविधि लकड़ी, गिरिकूटक राजमहल, वर्धमानक नृत्यशाला, धारागृह, गृहकूटक, पुष्करावर्त महल, और कुबेरकान्त भण्डारगृह हैं। वसुधारक कोठार और जीमूत स्नानगृह उनकी समृद्धि को बढ़ाते हैं। अवतंसिका रत्नमाला, देवरम्या चांदनी, सिंहवाहिनी शय्या, और अनुत्तर सिंहासन उनकी शोभा हैं। सूर्यप्रभ छत्र, विद्युत्प्रभ कुण्डल, विषमोचिका खड़ाऊं, अभेद्य कवच, और अजितंजय रथ उनके युद्ध-सामर्थ्य को दर्शाते हैं।
श्लोक 162 से 171 भरत के शस्त्र
भरत के पास वज्रकाण्ड धनुष, अमोघ बाण, वज्रतुण्डा शक्ति, सिंहाटक भाला, लोहवाहिनी छुरी, मनोवेग कणप, और सौनन्दक तलवार हैं, जो युद्ध में अजेय हैं। भूतमुख खेट और सुदर्शन चक्र शत्रुओं को परास्त करते हैं। चण्डवेग दण्ड और वज्र-चर्म उनकी सेना को जल-उपद्रव से बचाते हैं। ये शस्त्र उनकी विजयलक्ष्मी को सुदृढ़ करते हैं।
श्लोक 172 से 181 भरत के रत्न
भरत के चूड़ामणि चिन्तामणि और चिन्ताजननी काकिणी रत्न उनकी शोभा बढ़ाते हैं। अयोध्य सेनापति, बुद्धिसागर पुरोहित, कामवृष्टि गृहपति, और भद्रमुख शिलावट उनके सजीव रत्न हैं। विजयपर्वत हाथी, पवनंजय घोड़ा, और सुभद्रा स्त्री-रत्न उनके वैभव का हिस्सा हैं। ये दिव्य रत्न देवों द्वारा संरक्षित और शत्रुओं से अजेय हैं।
श्लोक 182 से 190 भरत की भोग-सामग्री
भरत की आनन्दिनी भेरियां और गम्भीरावर्त शंख 12 योजन तक बजते हैं। वीरांगद कड़े, 48 करोड़ पताकाएं, और महाकल्याण भोजन उनकी समृद्धि दर्शाते हैं। अमृतगर्भ मोदक, अमृतकल्प स्वाद्य, और अमृत पानक उनके भक्ष्य-पेय हैं। ये भोग-साधन उनके पुण्य के फल हैं, जो अद्वितीय और केवल उनके लिए हैं।
श्लोक 191 से 201 पुण्य की महिमा और भरत का वैभव
भरत की समृद्धि—रूप, शरीर, निधियां, रत्न, अन्तःपुर, और भोग—पुण्य के उदय से प्राप्त है। पुण्य बिना विजयलक्ष्मी, प्रताप, और कीर्ति असंभव है। पण्डितों को पुण्य-संचय का उपदेश दिया जाता है। भरत का समय भोगों में क्षण-भर-सा बीतता है। वे साम्राज्यलक्ष्मी का एकछत्र पालन करते हैं, बिना व्याकुल हुए।
श्लोक 202 से 205 भरत और वृषभदेव की महिमा
भरत ने छह खण्डों की पृथ्वी को भरतभूमि बनाया, शत्रुओं का नाश कर उसका पालन किया। उनकी लक्ष्मी निधियों और रत्नों से युक्त है। वे प्रथम चक्रवर्ती हैं। वृषभदेव, तीनों लोकों के गुरु, स्तुति और ध्यान के योग्य हैं, जो भव्यों को कल्याण देते हैं। वे संसार-भय से रक्षा करते हैं।
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथ निर्वतिताशेषदिग्जयो भरतेश्वरः । पुरं साकेतमुत्केतु प्राविक्षत् परया श्रिया ।॥ १ ॥
अथानन्तर जिसने समस्त दिग्विजय समाप्त कर लिया है ऐसे भरतेश्वरने जिसमें अनेक ध्वजाएँ फहरा रही हैं ऐसे अयोध्यानगरमें बड़े वैभवके साथ प्रवेश किया ।।१।।
Thereafter, having completed his conquest of all directions, the mighty King Bharateshvara entered the resplendent city of Ayodhya—where countless banners fluttered aloft—with great splendour and majesty.1
श्लोक ( Shlok ) 2
‘तत्रास्य मुपशार्दूलैः अभिषेकः कृतो मुदा । ‘चातुरन्तजयश्रीस्ते प्रथतां भुवनेष्विति ॥ २ ॥
चतुरंग विजयसे उत्पन्न हुई आपकी लक्ष्मी संसारमें अतिशय वृद्धि और प्रसिद्धिको प्राप्त होती रहे यही विचार कर बड़े बड़े राजाओंने उस अयोध्या नगरमें हर्ष के साथ महाराज भरतका अभिषेक किया था ।।२।।
Reflecting that the prosperity born of your fourfold conquest might ever flourish and bring you unmatched fame throughout the world, the great kings, with hearts full of joy, anointed Maharaja Bharata in that illustrious city of Ayodhya.2
श्लोक ( Shlok ) 3
तमभ्यषिञ्चन् पौराश्च सान्तःपुरपुरोधसः । चिरायुः पृथिवीराज्यं “क्रियाद् देव भवानिति ॥ ३ ॥
हे देव, आप दीर्घजीवी होते हुए चिरकालतक पृथिवीका राज्य करें, इस प्रकार कहते हुए अन्तःपुर तथा पुरोहितोंके साथ नगरके लोगोंने उनका अभिषेक किया था ॥३॥
“O Lord, may you reign over the earth for countless ages with long life and enduring glory”—thus proclaiming, the citizens of the city, along with the royal household and the priests, performed his consecration with reverence and joy. 3
श्लोक ( Shlok ) 4
राज्याभिषेचने भर्तुर्यो विधिवृषभेशिनः । स सर्वोऽत्रापि तीर्थाम्बुस म्भारादिः कृतो नृपैः ॥ ४ ॥
जो विधि भगवान् वृषभदेवके राज्याभिषेकके समय हुई थी, तीर्थोंका जल इकट्ठा करना आदि वह सब विधि महाराज भरतके अभिषेकके समय भी राजाओंने की थी ॥४॥
The very rites that were performed at the consecration of Lord Ṛṣabhadeva—such as the gathering of sacred waters from holy pilgrim-sites—were likewise observed by the assembled kings at the coronation of Maharaja Bharata.4
श्लोक ( Shlok ) 5
‘तथाऽभिषिक्तस्तेनैव विधिनाऽलङ्कृतोऽधिराट् । तथैव जयघोषादिः प्रयुक्तः सामरैनृपैः ॥ ५ ॥
देवोंके साथ साथ राजाओंने भगवान् वृषभदेवके समान ही भरतेश्वरका अभिषेक किया था, उसी प्रकार आभूषण पहिनाये थे और उसी प्रकार जयघोषणा आदि की ॥५॥
Together with the gods, the kings anointed Bharateshvara just as they had once anointed Lord Ṛṣabhadeva—adorning him with the same splendour of ornaments and proclaiming the same victorious5
श्लोक ( Shlok ) 6
तथैव सत्कृता विश्वे पार्थिवाः ससनाभयः । तथैव तर्पितो लोकः परया दानसम्पदा ॥ ६ ॥
उसीप्रकार परिवार-के लोगोंके साथ साथ राजाओंका सत्कार किया गया था, और उसीप्रकार दानमें दी हुई सम्पत्ति से सब लोग संतुष्ट किये गये थे ॥ ६।
In like manner, honour was bestowed upon the royal household and the assembled kings, and with generous gifts and treasures bestowed in charity, all were made content and filled with joy.6
श्लोक ( Shlok ) 7
‘तथाध्वनन् महाघोषा नान्दीघोषा महानकाः । प्रक्षुभ्यदब्धिनिर्घोषो येषां घोषैरधः कृतः ॥ ७ ॥
जिनके शब्दोंने क्षोभित हुए समुद्रके शब्दको भी तिरष्कृत कर दिया था ऐसे बड़े बड़े शब्दोंवाले मांगलिक नगाड़े उसीप्रकार बजाये गये थे ।।७।।
Then resounded the auspicious kettledrums, whose mighty reverberations—so thunderous—surpassed even the roar of the agitated sea; they were sounded in the very same splendid manner.7
श्लोक ( Shlok ) 8
आनन्दिन्यो महाभेर्यस्तथैवाभिहता मुहुः । संगीतविधिरारब्धः तथा प्रमदमण्डपे ॥ ८ ॥
उसी प्रकार आनन्दकी महाभेरियां बार बार बजाई जा रही थीं और आनन्दमण्डपमें संगीतकी विधि भी उसी प्रकार प्रारम्भ की गई थी ॥८॥
In that same manner, the great drums of joy were sounded again and again, and within the pavilion of festivity, the rites of music and celebration were likewise solemnly begun.8
श्लोक ( Shlok ) 9
मूर्धाभिषिक्तैः प्राप्ताभिषेकस्यास्याजनि द्युतिः । मेराविवाभिषिक्तस्य नाकीन्द्रैरादिवेधसः ॥ ९ ॥
मेरु पर्वतपर इन्द्रोंके द्वारा अभिषेक किये हुए आदिब्रह्मा भगवान् वृषभदेवकी जैसी कान्ति हुई थी उसी प्रकार राजाओंके द्वारा अभिषेकको प्राप्त हुए महाराज भरतकी भी हुई थी ।।९।।
The same divine radiance that adorned Lord Ṛṣabhadeva—when He was anointed by the Indras upon Mount Meru—shone forth likewise from Maharaja Bharata, when he was consecrated by the assembled kings.9
श्लोक ( Shlok ) 10
गङगासिन्धू सरिद्देव्यौ साक्षतैस्तीर्थवारिभिः । ‘अभ्यौक्षिष्टां तमभ्येत्य रत्नभृङ्गारसम्भृतैः ॥ १० ॥
गंगा-सिन्धु नदियोंकी अधिष्ठात्री गंगा-सिन्धु नामकी देवियोंने आकर रत्नोंके भृङ्गारोंमें भरे हुए अक्षत सहित तीर्थजलसे भरत-का अभिषेक किया था ।।१०।।
The goddesses Ganga and Sindhu—the divine presiding deities of the sacred rivers Ganga and Sindhu—came forth and anointed Bharata with sanctified waters drawn from holy pilgrim-sites, accompanied by unbroken rice and gem-studded vessels of celestial splendour.10
श्लोक ( Shlok ) 11
कृताभिषेकमेनं च नृपासनमधिष्ठितम् । गणबद्धामरा भेजुः प्रणम्रैर्मणिमौलिभिः ॥ ११ ॥
जिनका अभिषेक समाप्त हो चुका है और जो राजसिंहासनपर बैठे हुए हैं ऐसे महाराज भरतकी अनेक गणबद्धदेव अपने मणिमयी मुकुटोंको नवा-नवा कर सेवा कर रहे थे ।।११।।
Having completed his consecration and seated upon the royal throne, Maharaja Bharata was attended by numerous assemblies of celestial beings, who, renewing their jeweled crowns, served him with devoted reverence.11
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
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