आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 चंद्रोदय और उसका प्रभाव
लोग अंधकार में व्याकुल होकर सोना बेहतर समझते हैं। घरों में दीपक अंधकार को भेदने वाली सुइयों-से प्रतीत होते हैं। चंद्रमा किरणों से अंधकार नष्ट कर, दूध-सा संसार को नहलाता है। वह राजा-सा अनुराग और किरणों से युक्त मंडल धारण करता है। चंद्रमा हरिण चिह्न के साथ अंधकार को भगाता है, जैसे सिंह के सामने हाथी भागते हैं। उसकी चांदनी आकाशरूपी समुद्र के प्रवाह-सी और हंसों से युक्त सरोवर-सी लगती है। चंद्रमा अमृतमय किरणों से विश्व को प्रकाशित करता है, पर स्वाभाविक कलंक से मुक्त नहीं होता।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
प्रसह्य तमसा रुद्धो लोकोऽन्तऽर्व्याकुलीभवन् । दृष्टित्रैफल्य दृष्टेर्नु बहु मेने शयालुताम् ॥ १७२॥
जबर्दस्ती अन्धकारसे घिरे हुए लोग भीतर ही भीतर व्याकुल हो रहे थे और उनकी दृष्टि भी कुछ काम नहीं देती थी इसलिये उन्होंने सोना ही अच्छा समझा था ॥ १७२।।
The people, forcibly enveloped by darkness, grew restless within, their sight proving of little use—thus, they deemed sleep the only refuge.172
श्लोक ( Shlok ) 173
दीपिका रचिता रेजुः प्रतिवेश्म स्फुरत्त्विषः । घनान्धतमसोद्भदे प्रक्लृप्ता इव सूचिकाः ॥१७३॥
घर घर में लगाये हुए प्रकाशमान दीपक ऐसे अच्छे सुशोभित हो रहे थे मानो अत्यन्त गाढ़ अन्धकार-को भेदन करनेके लिये बहुत सी सुइयां ही तैयार की गई हों ।॥ १७३।।
The lamps lit in every home shone forth splendidly, as if countless needles had been fashioned to pierce through the thickest darkness.173
श्लोक ( Shlok ) 174
तमो विधूय दूरेण जगदानन्दिभिः करै । उदियाय शशी लोकं क्षीरेण क्षालयन्निव ।॥१७४।॥
इतने ही में जगत्को आनन्दित करनेवाली किरणोंसे अन्धकारको दूरसे ही नष्ट कर चन्द्रमा इस प्रकार उदय हुआ मानो लोकको दूधसे नहला ही रहा हो ।॥ १७४।।
Then, the moon—bringing joy to the world—rose, its rays dispelling the darkness from afar, as if bathing the realm in a gentle flood of milk.174
श्लोक ( Shlok ) 175
अखण्डमनुरागेण निजं मण्डलमुद्वहन् । सुराजेव कृतानन्दमुदगाद् विधुरुत्करः ॥१७५।।
वह चन्द्रमा किसी उत्तम राजाके समान संसारको आनन्दित करता हुआ उदय हुआ था, क्योंकि जिस प्रकार उत्तम राजा अनुराग अर्थात् प्रेमसे अपने अखण्ड (संपूर्ण) मण्डल अर्थात् देशको धारण करता है उसी प्रकार वह चन्द्रमा भी अनुराग अर्थात् लालिमासे अपने अखण्डमण्डल अर्थात् प्रतिबिम्बको धारण कर रहा था और उत्तम राजा जिस प्रकार चारों ओर अपना कर अर्थात् टैक्स फैलाता है उसी प्रकार वह चन्द्रमा भी चारों ओर अपने कर अर्थात् किरणें फैला रहा था ।।१७५।।
That moon rose, delighting the world like a noble king, who, with boundless affection, governs his entire realm. Just as such a king lovingly embraces his vast domain, so too did the moon hold its entire reflected sphere in tender embrace; and just as the king spreads his taxes far and wide, so did the moon extend its rays in all directions.175
श्लोक ( Shlok ) 176
दृष्ट्वेवाकृष्टहरिणं हरि हरिणलाञ्छनम् । तिमिरौघः प्रदुद्राव करियूथसदृग् महान् ॥१७६॥
हरिणके चिह्न वाले चन्द्रमाको देखकर अन्धकारका समूह बड़ा होनेपर भी इस प्रकार भाग गया था जिस प्रकार कि हरिणको पकड़े हुए सिंहको देखकर हाथियोंका बड़ा भारी झुण्ड भाग जाता है। ॥१७६।।
Upon beholding the moon, marked with the emblem of the stag, the cluster of darkness fled in haste—just as a great herd of elephants scatters at the sight of a lion clutching a deer.176
श्लोक ( Shlok ) 177
तततारावली रेजे ज्योत्स्नापूरः सुधाछवेः । सबुद्बुद इवाकाशसिन्धोरोधः परिक्षरन् ॥१७७॥
जिसमें ताराओंकी पङक्ति फैली हुई है ऐसा चन्द्रमाकी चांदनीका समूह उस समय ऐसा अच्छा जान पड़ता था मानो बुद्बुदों सहित ऊपरसे पड़ता हुआ आकाशरूपी समुद्रका प्रवाह ही हो ।।१७७।।
The moonlight, adorned with a procession of stars, then appeared as a gentle current flowing from above—like a celestial ocean cascading down in shimmering ripples.177
श्लोक ( Shlok ) 178
हंसपोत इवान्विच्छन्’ शशी तिमिरशैवलम् । तारा सहचरीक्रान्तं विजगाहे नभःसरः ॥१७८॥
हंसके बच्चे के समान वह चन्द्रमा अन्धकाररूपी शैवालको खोजता हुआ तारे रूपी हंसियोंसे भरे हुए आकाशरूपी सरोवरमें अवगाहन कर रहा था-इधर-उधर घूम रहा था ।।१७८।।
Like a swan’s chick seeking its mother, the moon searched through the darkness—woven like seaweed—and bathed amidst the stars, the swan-like birds, in the vast lake of the sky, wandering here and there.178
श्लोक ( Shlok ) 179
तमो निःशेषमुद्धूय जगदाप्लावयन् करैः । प्रालेयांशुस्तदा विश्वं सुधामयमिवातनोत् ॥१७९॥
समस्त अन्धकारको नष्ट कर जगत्को किरणोंसे भरते हुए चन्द्रमा-ने उस समय यह समस्त संसार अमृतमय बना दिया था ॥ १७९।।
Dispelling all darkness and filling the world with its radiant beams, the moon, at that moment, transformed the entire cosmos into a realm of immortality.179
श्लोक ( Shlok ) 180
तमो दूरं विधूयाऽपि विधुरासीत् कलङ्कवान् । निसर्गजं तमो नूनं महताऽपि सुदुस्त्यजम् ॥१८०॥
अन्धकारको दूर करके भी वह चन्द्रमा कलंकी बन रहा था सो ठीक ही है क्योंकि स्वाभाविक अन्धकार बड़े पुरुषोंसे छूटना भी कठिन है ।।१८०।।
Though dispelling the darkness, the moon was still becoming a blemish—justly so, for it is no easy task to free great men from the shadows that cling to their very nature. 180
श्लोक ( Shlok ) 181
भिषजेव करैः स्पृष्टा विशस्तिमिरभेदिभिः । शनैर्दृश इवालोकमातेनुः शिशिरत्विषा ॥१८१॥
जिस प्रकार वैद्यके द्वारा तिमिर रोगको नष्ट करनेवाले हाथोंसे स्पर्श की हुई आंखें धीरे धीरे अपना प्रकाश फैलाने लगती है उसी प्रकार चन्द्रमाके द्वारा अन्धकार-को नष्ट करनेवाली किरणोंसे स्पर्श की हुई दिशाएँ धीरे धीरे अपना प्रकाश फैलाने लगी थीं ॥१८१॥
Just as eyes touched by the healing hands of a physician slowly begin to regain their sight and radiance, so too did the directions, touched by the moon’s rays that dispelled the darkness, gradually begin to spread their light once more.181
श्लोक 182 से 191
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
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