आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231
श्लोक 232 से 242 जाक्षर और योग का निराकरण
‘अर्हद्भ्यो नमः’ से अर्हंत अवस्था मिलती है। ‘नमः सिद्धेभ्यः’ मनोरथ पूर्ण करता है। ‘नमोऽर्हत्परमेष्ठिने’ दुःख हरता है। पंच परमेष्ठियों का बीज मोक्ष देता है। यह ब्रह्मतत्त्व को जानने में सहायक है। ध्यान से आनंद और ऋद्धियाँ मिलती हैं। बीज न जानने वाला बंधन में रहता है। अन्य मतों में जीव नित्य हो तो ध्यान असंभव है।
English translation of Ādi purāṇa parv 21 – Shlok 232 to 242
श्लोक ( Shlok ) 232
षडक्षरात्मकं बीजमिवार्हद्भेयो नमोऽस्त्विति । ध्यात्वा मुमुक्षुरा र्हन्त्यमनन्तगुणमृच्छति ॥२३२॥
अथवा ‘अर्हद᳭भ्यो नमः’ अर्थात् ‘अर्हंतों के लिए नमस्कार हो’ इस प्रकार छह अक्षर वाला जो बीजाक्षर है उसका ध्यान कर मोक्षाभिलाषी मुनि अनंत गुणयुक्त अर्हंत अवस्था को प्राप्त होता है ।।232।।
“Or, by meditating on the six-syllabled seed mantra ‘Arhadebhyo Namah’, which means ‘Salutations to the Arhants’, a monk desiring liberation attains the state of an Arhant, endowed with infinite virtues.” 232
श्लोक ( Shlok ) 233
नमः सिद्धेभ्य इत्येतद्दशार्धस्त वनाक्षरम् । जपञ्जप्येषु भव्यत्मा स्वेष्टान् कामानवाप्स्यति ॥ २३३॥
अथवा जप करने योग्य पदार्थों में से ‘नम: सिद्धेभ्यः’ अर्थात् ‘सिद्धों के लिए नमस्कार हो’ इस प्रकार सिद्धों के स्तवनस्वरूप पाँच अक्षरों का जो भव्य जीव जप करता है वह अपने इच्छित पदार्थों को प्राप्त होता है अर्थात् उसके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं ।।233।।
“Or, among the objects worthy of chanting, the noble soul who recites the five-syllabled mantra ‘Namah Siddhebhyaḥ’, meaning ‘Salutations to the Siddhas’, as a form of praise to the Siddhas, attains his desired objectives, meaning all his aspirations are fulfilled.” 233
श्लोक ( Shlok ) 234
अष्टाक्षरं परं बीजं नमोऽर्हंत्परमेष्ठिने । इतीदमनुसंस्मृत्य पुनर्दुःखं न पश्यत्ति ॥२३४॥
अथवा ‘नमोऽर्हत्परमेष्ठिने’ अर्थात् ‘अरहंत परमेष्ठी के लिए नमस्कार हो’ यह जो आठ अक्षर वाला परम बीजाक्षर है उसका चिंतवन करके भी यह जीव फिर दुःखों को नहीं देखता है अर्थात् मुक्त हो जाता है ।।234।।
“Or, by meditating on the supreme eight-syllabled seed mantra ‘Namo Arhat Parameṣṭhine’, meaning ‘Salutations to the Supreme Arhant’, the soul no longer experiences suffering, that is, it attains liberation.”234
श्लोक ( Shlok ) 235
यत्षोडशाक्षरं बीजं सर्वबीजपदान्वितम् । तत्ववितदनुध्यायन् ध्रुवमेष मुमुक्षते ॥२३५॥
तथा ‘अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यो नमः’ अर्थात् ‘अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सर्व साधु इन पाँचों परमेष्ठियों के लिए नमस्कार हो’ इस प्रकार सब बीज पदों से सहित जो सोलह अक्षर वाला बीजाक्षर है उसका ध्यान करने वाला तत्त्वज्ञानी मुनि अवश्य ही मोक्ष को प्राप्त होता है ।।235।।
“And by meditating on the sixteen-syllabled seed mantra ‘Arhat Siddhāchāryopādhyāya Sarva-Sādhubhyo Namah’, meaning ‘Salutations to the five supreme beings—Arhants, Siddhas, Acharyas, Upadhyayas, and all Sadhus’, the enlightened monk undoubtedly attains liberation.” 235
श्लोक ( Shlok ) 236
पञ्च ब्रह्ममयैर्मन्त्रैः सकलीकृत्यनिष्कलम्। परं तत्वमनुध्यायन् योगी स्याद् ब्रह्म तत्व वित् ।। २३६॥
अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सर्वसाधु इस प्रकार पंचब्रह्मस्वरूप मंत्रों के द्वारा जो योगिराज शरीररहित परमतत्त्व परमात्मा को शरीरसहित कल्पना कर उसका बार-बार ध्यान करता है वही ब्रह्मतत्त्व को जानने वाला कहलाता है ।।236।।
The supreme yogi who repeatedly meditates on the fivefold divine mantras—Arhant, Siddha, Acharya, Upadhyaya, and all Sadhus—by envisioning the formless supreme soul (Paramātma) as embodied, is truly known as one who realizes the essence of the divine.”236
श्लोक ( Shlok ) 237
योगिनः परमानन्दो योऽस्य स्याञ्चित्त “निर्वृतेः । स एवैश्वर्य “पर्यन्तो योगजाः किमुतर्द्धयः ॥२३७॥
ध्यान करने वाले योगी के चित्त के संतुष्ट होने से जो परम आनंद होता है वही सबसे अधिक ऐश्वर्य है फिर योग से होने वाली अनेक ऋद्धियों का तो कहना ही क्या है । भावार्थ―ध्यान के प्रभाव से हृदय में जो अलौकिक आनंद प्राप्त होता है वही ध्यान का सबसे उत्कृष्ट फल है और अनेक ऋद्धियों की प्राप्ति होना गौण फल है ।।237।।
“When the meditative yogi’s mind attains satisfaction, the supreme bliss that arises is the greatest wealth. What more can be said about the many supernatural powers (Riddhis) that come through yoga?
Meaning: The extraordinary joy experienced in the heart through meditation is the highest reward, while the attainment of various mystical powers is only a secondary outcome.” 237
श्लोक ( Shlok ) 238
अणिमादिगुणर्युक्तमेश्वर्यं परमोदयम् । भुक्त्वेहैव पुनर्मुक्त्वा मुनिर्निर्वाति योगवित् ॥२३८॥
योग को जानने वाला मुनि अणिमा आदि गुणों से युक्त तथा उत्कृष्ट उदय से सुशोभित इंद्र आदि के ऐश्वर्य का इसी संसार में उपभोग करता है और बाद में कर्मबंधन से छूटकर निर्वाण स्थान को प्राप्त होता है ।।238।।
“The sage who understands yoga, endowed with supernatural powers like Aṇimā (the ability to become minute) and illuminated by supreme destiny, enjoys the grandeur of Indra and other celestial beings in this very world. Eventually, freed from the bondage of karma, he attains Nirvana.”238
श्लोक ( Shlok ) 239
बीजान्येतान्यजानानो नाममात्रेण मन्त्रवित्। मिथ्याभिमानोपहतो बध्यते कर्मबन्धनैः ॥२३९॥
इन ऊपर कहे हुए बीजों को न जानकर जो नाम मात्र से ही मंत्रवित् (मंत्रों को जानने वाला) कहलाता है और झूठे अभिमान से दग्ध होता है वह सदा कर्मरूपी बंधनों से बँधता रहता है ।।239।।
“He who does not truly understand the sacred seed mantras mentioned above but merely claims to be a knower of mantras by name, and is consumed by false pride, remains forever bound by the fetters of karma.” 239
श्लोक ( Shlok ) 240 – 242
नित्यो वा स्यादनित्यो वा जीवो योगाभि मानिनाम् । नित्यश्चेदवि कार्यत्वान्न ध्येयध्यानसंगतिः ॥ २४०॥
सुखासुखानुभवन स्मरणेच्छाद्य संभवात् । प्रागेवास्य न दिध्यासा दूरात्तत्वानुचिन्तनम् ॥२४१॥
तश्चि वृत्तौ कुतो ध्यानं कुतस्त्यो वा फलोदयः । बन्धमोक्षाद्यधिष्ठाना “प्रक्रियाप्यफला ततः । २४२।
अब यहाँ से अन्य मतावलंबी लोगों के द्वारा माने गये योग का निराकरण करते हैं―योग का अभिमान करने वाले अर्थात् मिथ्या योग को भी यथार्थ योग मानने वालों के मत में जीव पदार्थ नित्य है ? अथवा अनित्य ? यदि नित्य है तो वह अविकार्य अर्थात् विकार (परिणमन) से रहित होगा और ऐसी अवस्था में उसके ध्येय के ध्यानरूप से परिणमन नहीं हो सकेगा । इसके सिवाय नित्य जीव के सुख-दुःख का अनुभव स्मरण और इच्छा आदि परिणमनों का होना भी असंभव है इसलिए जब इस जीव के सर्वप्रथम ध्यान की इच्छा ही नहीं हो सकती तब तत्त्वों का चिंतन तो दूर ही रहा । और तत्त्वचिंतन के बिना ध्यान कैसे हो सकता है ? ध्यान के बिना फल की प्राप्ति कैसे हो सकती है? और उसके बिना बंध तथा मोक्ष के कारणभूत समस्त क्रियाकलाप भी निष्फल हो जाते हैं ।।240-242।।
“Now, let us refute the misconceptions about yoga held by followers of other doctrines—
Those who take pride in yoga and mistake false yoga for true yoga must answer: Is the soul eternal or non-eternal?
- If it is eternal, then it must be unchangeable, free from transformation. In that case, it cannot engage in meditation on its object of focus.
- Moreover, an unchangeable soul would be incapable of experiencing pleasure, pain, memory, desire, and other transformations.
Thus, if the soul cannot even develop an initial desire for meditation, then how can it contemplate reality?
Without contemplation of reality, meditation is impossible.
Without meditation, attaining the ultimate goal is impossible.
And without that, all efforts leading to bondage and liberation become futile.” 240-242
श्लोक 243 से 251
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