आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91 बाहुबली से प्रणाम की अपील
दूत कहता है कि शत्रु का प्रणाम न करना उतना दुख नहीं देता, जितना भाई का अहंकार। वह बाहुबली से अनुरोध करता है कि वे भरत को प्रणाम कर उनकी आज्ञा स्वीकार करें, क्योंकि यह समृद्धि और यश देगा। दूत चेतावनी देता है कि भरत की आज्ञा का उल्लंघन करने वाले शत्रुओं को चक्ररत्न नष्ट करता है। बाहुबली, दूत के वचनों को सुनकर, मंद हास्य के साथ गंभीर वचन कहते हैं, यह स्वीकार करते हुए कि दूत ने भरत की साधु वृत्ति और नीति का उचित प्रदर्शन किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
ताः सम्पदस्तदैश्वर्यं ते भोगाः स परिच्छदः । ये समं बन्धुभिर्भुक्ताः संविभक्तसुखोदयै॥८२॥
सम्पत्तियाँ वही हैं, ऐश्वर्य वही है, भोग वही है और सामग्री वही है जिसे भाई लोग सुखके उदयको बाँटते हुए साथ साथ उपभोग करें ॥८२॥
rue wealth is that, true dominion is that, true enjoyment is that, and true abundance is that alone—when brothers, united in affection, partake together in the rising tide of happiness.82
श्लोक ( Shlok ) 83
अन्यच्च नमिताशेषनूसुरासुरखेचरम् । नाधि राज्यं विभात्यस्य प्रणामविमुखे त्वयि ॥८३॥
दूसरी एक बात यह है कि आपके प्रणाम करनेसे विमुख रहनेपर जिसमें समस्त मनुष्य, देव, धरणेन्द्र और विद्याधर नमस्कार करते हैं ऐसा उनका चक्रवर्तीपना भी सुशोभित नहीं होता है ॥८३॥
There is yet another truth: even the supreme sovereignty of the Emperor—before whom all beings, be they men, gods, Dharaṇendra, or celestial Vidyādharas, bow in reverence—loses its luster should it be deprived of the honor of your obeisance.83
श्लोक ( Shlok ) 84
न दुनोति मनस्तीवं रिपुरप्रणतस्तथा । बन्धुरप्रणमन् गर्वाद् दुविदग्धो यथा प्रभुम् ॥८४॥
प्रणाम नहीं करनेवाला शत्रु स्वामीके मन को उतना अधिक दुखी नहीं करता है जितना कि अपनेको झूठमूठ चतुर माननेवाला और अभिमानसे प्रणाम नहीं करनेवाला भाई करता है ॥८४॥
An enemy who withholds his obeisance does not wound the sovereign’s heart as deeply as does a brother—who, swelled with pride and deeming himself cunning—refrains from bowing in feigned wisdom.84
श्लोक ( Shlok ) 85
“तदुपेत्य प्रणामेन पूज्यतां प्रभुरक्षमी। प्रभुप्रणतिरेवेष्टा प्रसूतिर्ननु सम्पदाम् ॥८५॥
इसलिये आप किसी अपराधकी क्षमा नहीं करनेवाले महाराज भरतके समीप जाकर प्रणामके द्वारा उनका सत्कार कीजिये क्योंकि स्वामीको प्रणाम करना अनेक सम्पदाओंको उत्पन्न करनेवाला है और यही सबको इष्ट है ॥८५॥
Therefore, go forth and pay homage unto Maharaj Bharat, who is not one to pardon transgressions lightly. For reverence shown unto the sovereign through a humble salutation becomes the wellspring of manifold blessings—and this, verily, is the path most cherished by all.85
श्लोक ( Shlok ) 86
अवन्ध्यशासनस्यास्य शासनं ये विमन्वते । शासनं द्विषतां तेषां चक्रमप्रतिशासनम् ।।८६।।
जिसकी आज्ञा कभी व्यर्थ नहीं जाती ऐसे उस भरतकी आज्ञाका जो कोई भी उल्लंघन करते हैं उन शत्रुओंका शासन करनेवाला उसका वह चक्ररत्न है जिसपर स्वयं किसीका शासन नहीं चल सकता ।।८६।।
The sovereign command of that Bharat—whose decrees are never issued in vain—is guarded by his peerless Discus Jewel, the Chakra-ratna, which subjugates all who dare defy his will, and over which none may claim dominion.
श्लोक ( Shlok ) 87
प्रचण्डदण्डनिर्धात निपातपरिखण्डितान् । तदाज्ञाखण्डनव्यग्रान् पश्यैनान् मण्डलाधिपान् ॥८७॥
आप भरतकी आज्ञाका खण्डन करनेसे व्याकुल हुए इन मण्डलाधिपति राजाओंको देखिये जो भयंकर दण्डरूपी वज्र के गिरनेसे खण्ड खण्डहो रहे हैं ।।८७।।
Behold these sovereigns of realms, distraught and shattered asunder by the crushing fall of a dreadful thunderbolt—the punishment wrought by defying the command of Bharat!87
श्लोक ( Shlok ) 88
तदेत्य द्रुतमायुष्मन् पूरयास्य मनोरथम् । युवयोरस्तु साङ्गत्यात् सङ्गतं निखिलं जगत् ॥ ८८॥
इसलिये हे दीर्घायु कुमार, आप शीघ्र ही चलकर इसके मनोरथ पूर्ण कीजिये आप दोनों भाइयोंके मिलापसे यह समस्त संसार मिलकर रहेगा ।।८८।।
Therefore, O long-lived prince, hasten forth to fulfill this noble desire; through the union of you two brothers, the entire world shall dwell together in harmony.88
श्लोक ( Shlok ) 89
इति तद्वचनस्यान्ते कृतमन्दस्मितो युवा । धीरं वचो गभीरार्थमाचचक्षे विचक्षणः ॥८९॥
इस प्रकार उस दूतके कह चुकनेके बाद चतुर और जवान बाहुबली कुमार कुछ मन्दमन्द हँसकर गंभीर अर्थसे भरे हुए धीर वीर वचन कहने लगे ॥८९।।
Thus, after the envoy had finished speaking, the wise and youthful prince Bahubali, with a gentle smile playing upon his lips, spoke solemn and steadfast words, imbued with profound meaning.89
श्लोक ( Shlok ) 90
साधूक्तं साधुवृत्तत्वं त्वया घटयता प्रभोः । वाचस्पत्यं तदेवेष्टं पोषकं स्वमतस्य यत् ॥९०॥
वे बोले कि हे दूत, अपने स्वामी की साधु वृत्तिको प्रकट करते हुए तूने सब सच कहा है क्योंकि जो अपने मतकी पुष्टि करने-वाला हो वही कहना ठीक होता है ।।९०।।
He said, “O messenger, in revealing the noble character of your lord, you have spoken nothing but truth; for it is only fitting that one who steadfastly upholds his own conviction speaks rightly.”90
श्लोक ( Shlok ) 91
साम दर्शयता नाम भेददण्डौ विशेषतः । प्रयुञ्जानेन साध्येऽर्थे स्वातन्त्र्यं दर्शितं त्वया ॥९१॥
साम अर्थात् शान्ति दिखलाते हुए तूने विशेषकर भेद और दण्ड भी दिखला दिये हैं तथा उनका प्रयोग करते हुए तूने यह भी बतला दिया कि तूं अपना अर्थ सिद्ध करनेमें कितना स्वतन्त्र है ? ।।९१।।
By presenting the peaceful overture of Sama, you have also distinctly revealed the divisions and punishments, and in employing them, you have shown how freely you wield your own purpose to establish your meaning.91
श्लोक 92 से 101
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
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