आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11
श्लोक 12 से 21 सेना की शोभा और योद्धाओं का उत्साह
धनुर्धारी योद्धा बाणों से भरे तरकसों के साथ वृक्षों-से सुशोभित होते हैं। रथी योद्धा युद्धरूपी समुद्र पार करने वाले खेवटियों-से प्रतीत होते हैं। कवच और तलवारों से सजे योद्धा उल्काओं-से चमकते हैं, जो शत्रुओं के सामने पराक्रम प्रदर्शित करते हैं। कुछ योद्धा तलवार में अपना प्रतिबिंब देखकर या उसे तोलकर स्वामी के सम्मान का गौरव अनुभव करते हैं। मुकुटबद्ध राजाओं की सेनाएं रत्नों की किरणों से दीप्तिमान होकर लोकपालों-सी शोभती हैं। योद्धा व्याकुल स्त्रियों को आश्वासन देते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
धन्विनः शरनाराच’ सन्धृतेषुधयों बभुः । वनक्ष्माजा महाशाखाः कोटरस्थैरिवाहिभिः ॥१२॥
जिनके तरकस अनेक प्रकारके बाणों-से भरे हुए हैं ऐसे धनुर्धारी लोग इस प्रकार जान पड़ते थे मानो बड़ी बड़ी शाखावाले वनके वृक्ष कोटरोंमें रहनेवाले सर्पोंसे ही सुशोभित हो रहे हों ।॥१२॥
The archers, their quivers laden with arrows of diverse kinds, appeared as if they were the very trees of a vast forest—adorned and guarded by serpents coiled within their hollows.12
श्लोक ( Shlok ) 13
रथिनो रथकट्यासु सम्भृतोचितहेतयः । सङ्ग्रामवार्धितरणे प्रस्थिता नाविका इव ॥१३॥
जिन्होंने रथोंके समूहमें युद्ध के योग्य सब शस्त्र भर लिये हैं ऐसे रथोंपर बैठनेवाले योद्धा लोग इस प्रकार चल रहे थे मानो युद्धरूपी समुद्रको पार करनेके लिये नाव चलानेवाले खेवटिया ही हों ।॥१३॥
The warriors seated upon chariots, fully armed with every weapon fit for battle, advanced as though they were boatmen skillfully steering their vessels across the vast ocean of war.13
श्लोक ( Shlok ) 14
भटा हस्त्युरसं भेजुः सशिरस्त्रतनुत्रकाः । समुत्खातनिशातासिपाणयः पादरक्षणे० ॥१४॥
जिन्होंने शिर-पर टोप और शरीरपर कवच धारण किया है तथा हाथमें पैनी तलवार ऊँची उठा रक्खी है ऐसे कितने ही योद्धा लोग हाथियोंके पैरोंकी रक्षा करनेके लिये उनके सामने चल रहे थे ।।१४।।
Many warriors, clad in helmets upon their heads and armor upon their bodies, brandishing sharp swords held high, marched before the elephants to shield their mighty feet from harm.14
श्लोक ( Shlok ) 15
पुष्फुरुः स्फुरदस्त्रोवा भटाः संदंशिताः परे । ओत्पातिका इवानीलाः सोल्का मेघाः समुत्थिताः ॥ १५।।
जिनके हाथोंम शस्त्रोंके समूह चमक रहे हैं और जो लोहेके कवच पहने हुए हैं ऐसे कितने ही योद्धा ऐसे देदीप्यमान हो रहे थे मानो किसी उत्पातको सूचित करनेवाले उल्कासहित काले काले मेव ही उठ रहे हों ।।१५।।
Countless warriors, their hands gleaming with clusters of weapons and clad in iron armor, shone forth like dark meteors blazing across the sky—harbingers of impending turmoil and destruction.15
श्लोक ( Shlok ) 16
करवालं करालाग्र करें कृत्वा भटोऽपरः । पश्यन् मुखरसं तस्मिन् “स्वशौर्य परिजज्ञिवान् ॥१६॥
कोई अन्य योद्धा पैनी धारवाली तलवार हाथमें लेकर उसमें अपने मुखका रङ्ग देखता हुआ अपने पराक्रमका परिज्ञान प्राप्त कर रहा था ।।१६।।
Some warriors, grasping sharp-edged swords in hand, beheld their own reflections upon the gleaming blade, thereby discerning the measure of their own valor and strength.16
श्लोक ( Shlok ) 17
कराग्रविधृतं खङ्गं तुलयन् कोऽप्यभाद् भरः । “प्रमिमित्सुरिवानेन स्वामिसत्कारगौरवम् ॥१७॥
कोई अन्य योद्धा हाथके अग्र भागपर रखी हुई तलवारको तोलता हुआ ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो वह उससे अपने स्वामी के आदर-सत्कारका गौरव ही तोलना चाहता हो ।।१७।।
Others, weighing their swords carefully upon the palms of their hands, seemed adorned with the solemn dignity of one who measures not the blade alone, but the honor and esteem due to their lord.17
श्लोक ( Shlok ) 18
महामुकुटबद्धानां साधनानि प्रतस्थिरे । पादातहास्तिकाश्वीयरथकट्या परिच्छदैः ॥१८॥
पैदल सेना, हाथियोंके समूह, घुड़सवार और रथोंके समूह आदि सामग्रीके साथ साथ महामुकुट-बद्ध राजाओंकी सेनाएँ भी चल रही थीं ।॥१८॥
Alongside the foot soldiers, elephant battalions, cavalry, and chariot divisions, marched the armies of crowned monarchs—resplendent and formidable in their regal splendor.18
श्लोक ( Shlok ) 19
बभुर्मकुटबद्धास्ते रत्नांशूदग्रमोलयः । सलीलालोकपालानामंशा भुवमिवागताः ॥१९॥
रत्नोंकी किरणोंसे जिनके मुकुट ऊँचे उठ रहे हैं ऐसे वे मुकुटवद्ध राजा इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे मानो लीला सहित लोकपालोंके अंश ही पृथ्वीपर आ गये हों ।॥१९॥
Those crowned kings, their diadems soaring high and sparkling with the radiance of precious gems, shone forth as if the very guardians of the realms—endowed with divine play—had descended upon the earth itself.19
श्लोक ( Shlok ) 20
परिवेष्ट्य निरैयन्त पार्थिवाः पृथिवीश्वरम् । दूरात् स्वबलसामग्रीं दर्शयन्तो यथायथम् ॥२०॥
अनेक राजा लोग महाराज भरतको घेरकर चल रहे थे और दूरसे ही अपनी सेनाकी सामग्री यथायोग्यरूपसे दिखलाते जाते थे ।॥२०॥
Many kings surrounded Emperor Bharata as they marched, while from afar they displayed their martial forces in proper array, proclaiming their strength and allegiance.20
श्लोक ( Shlok ) 21
प्रत्यग्रसमरारम्भसंश्रवोद्भान्तचेतसः । भटीराश्वासयामासुर्भटाः “प्रत्याय्यधीरितैः ॥२१॥
युद्धका प्रारम्भ सुनकर जिनके चित्त व्याकुल हो रहे हैं ऐसी स्त्रियोंको वीर योद्धा बड़ी धीरता-के साथ समझाकर आश्वासन दे रहे थे ॥ २१।।
Whereupon the trumpet of war sounded, and the hearts of certain women quailed with anxious dread, the noble warriors, with unshaken composure, dispelled their fears with steadfast words of reassurance.21
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11
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