आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 संध्या का सौंदर्य और रात्रि का आगमन
संध्या, सूर्य द्वारा छोड़े जाने पर लालिमा से युक्त होकर अग्नि में प्रवेश करती-सी प्रतीत होती है। यह सिन्दूर और जवाकुसुम-सी लालिमा पश्चिम दिशा में मूंगों के बगीचे-सी शोभती है। संध्या की लाली चकवियों के मन को संताप देती है, मानो प्रेमी स्त्रियों का अनुराग एकत्रित हो। सूर्य के पीछे चलती संध्या सती-सी लगती है। चकवा-चकवियां नियति के कारण बिछड़ते हैं, और गाढ़ अंधकार फैलने से संसार में तेजस्वी के अभाव में अंधेरा छा जाता है। रात्रि तारों से युक्त नीलवस्त्रधारी अभिसारिणी-सी सुशोभित होती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
अनुरक्तापि सन्ध्येयं परित्यक्ता विवस्वता । प्रविष्टेवाग्निमारक्तच्छविरालक्ष्यताम्बरे ॥१६२॥
यद्यपि यह संध्या अनुरक्त अर्थात् प्रेम करनेवाली (पक्षमें लाल) थी तथापि सूर्यने उसे छोड़ दिया था इसलिये ही वह लाल रंगकी संध्या आकाशमें ऐसी जान पड़ती थी मानो उसने अग्निमें ही प्रवेश किया हो। भावार्थ-पतिव्रता स्त्रियां पतियोंके द्वारा अपमानित होनेपर अपनी विशुद्धताका परिचय देनेके लिये सीताके समान अग्निमें प्रवेश करती हैं यहांपर कविने भी समासोक्ति अलंकारका आश्रय लेकर संध्यारूपी स्त्रीको सूर्यरूपी पतिके द्वारा अपमा नित होनेपर अपनी विशुद्धता-सच्चरित्रताका परिचय देनेके लिये संध्या कालकी लालिमा रूपी अग्निमें प्रवेश कराया है ॥ १६२॥
Though the evening was anurakta—deeply devoted and tinged with love—yet the sun abandoned her. Thus, she appeared in the sky, clad in crimson hues, as if she had entered the flames themselves.
Just as a chaste wife, scorned by her husband, enters fire to prove her purity—like Sītā—so too, the poet suggests through elegant metaphor, did the evening, forsaken by her lord the sun, enter the fire-like glow of twilight to bear witness to her unwavering fidelity.162
श्लोक ( Shlok ) 163
शनैराकाशवाराशिविद्रुमोद्यानराजिवित् । रुरुचे दिशि वारुण्यां सन्ध्यासिन्दूरसच्छविः ॥१६३॥
सिन्दूरके समान श्रेष्ठ कान्तिको धारण करनेवाली वह संध्या धीरे धीरे पश्चिम दिशामें ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो आकाशम्मी समुद्रमें मूंगोंके बगीचोंकी पंक्ति ही हो ॥ १६३॥
That evening, adorned with a radiant glow like vermilion, slowly graced the western sky, appearing as though it were a row of coral groves blooming upon the ocean of the heavens. 163
श्लोक ( Shlok ) 164
चक्रवाकी मनस्तापदीपनो नु हुताशनः। पप्रथे पश्चिमाशान्ते सन्ध्यारागो जपारुणः ॥१६४॥
जवाके फूलके समान लाल लाल वह संध्याकाल की लाली पश्चिम दिशाके अन्तमें ऐसी फैल रही थी मानो चकवियोंके मनके संतापको बढ़ाने वाली अग्नि ही हो ।।१६४।।
The crimson glow of twilight, red as the hibiscus bloom, spread across the farthest reaches of the western sky, as though it were a fire kindled solely to intensify the anguish burning in the hearts of the chakavī birds.164
श्लोक ( Shlok ) 165
*सान्ध्यो रागः स्फुरन् दिक्षु क्षणमैक्षि प्रियागमे । मानिनीनां मनोरागः कृत्स्नो मूर्छस्त्रिवैकतः ॥१६५।।
समस्त दिशाओंमें फैलती हुई संध्याकालकी लाली क्षण भरके लिये ऐसी दिखाई देती थी मानो पतियोंके आनेपर मान करनेवाली स्त्रियोंके मनका समस्त अनुराग ही एक जगह इकट्ठा हुआ हो ।॥ १६५॥
The evening’s crimson glow, spreading through all the directions, appeared for a moment as though it were the gathered essence of all the longing in the hearts of loving wives, feigning displeasure upon the return of their beloveds.165
श्लोक ( Shlok ) 166
धृतरक्तांशुकां सन्ध्यामनुयान्तीं दिनाधिपम् । बहुमेने सतीं लोकः कृतानुमरणामिव ॥१६६।।
लाल किरणेंरूपी वस्त्र धारणकर सूर्यरूपी पतिके पीछे पीछे जाती हुई संध्याको लोग पतिके साथ मरनेवाली सतीके समान बहुत कुछ मानते थे ।।१६६।।
Clad in garments of crimson rays and following in the wake of her lord, the sun, the evening was regarded by many as a satī—the devoted wife who follows her husband even unto death.166
श्लोक ( Shlok ) 167
चक्रवाकीं धृतोत्कण्ठमनुयान्तीं कृतस्वनाम् । ‘विजहावेव चक्राह्वों नियतिं को नु लङ्घयेत् ॥१६७।।
चकवाने बड़ी उत्कंठासे अपने पीछे पीछे आती हुई और शब्द करती हुई चकवीको आखिर छोड़ ही दिया था सो ठीक ही है क्योंकि नियति अर्थात् दैविक नियमका उल्लंघन कौन कर सकता है ? ॥१६७।।
The chakava, despite the chakavī following him with longing cries, had at last forsaken her—and rightly so, for who can transgress the ordained decree of fate?167
श्लोक ( Shlok ) 168
रवेः किमपराधोऽयं कालस्य नियतेः किमु । रथाङ्गमिथुनान्यासन् वियुक्तानि यतो मिथः ॥१६८॥
उस समय चकवा चकवियोंके जोड़े परस्परमें बिछुड़ गये थे-अलग अलग हो गये थे, सो यह क्या सूर्यका अपराध है? अथवा कालका अपराध है ? अथवा भाग्यका ही अपराध है ? ॥१६८।।
At that hour, the chakava and chakavī pairs were sundered, separated from one another—yet whose fault was it? Was it the sun’s doing? Or the work of Time? Or was it, indeed, the hand of fate alone?168
श्लोक ( Shlok ) 169
घनं तमो विनार्केण व्यानशे निखिला दिशः । विना तेजस्विना प्रायस्तमो रुन्धे न सन्ततम् ॥१६९॥
सूर्यके बिना सब दिशाओंमें गाढ़ अन्धकार फैल गया था सो ठीक ही है क्योंकि तेजस्वीके बिना प्रायः सब ओर अन्धकार ही भर जाता है ॥१६९।।
With the sun gone, dense darkness spread through all directions—and rightly so, for in the absence of the radiant, it is but natural that gloom should prevail on every side.169
श्लोक ( Shlok ) 170
तमोऽवगुण्ठिता रेज रजनी तारकातता । विनीलवसना भास्वन्मौक्तिकेवाभिसारिका ॥१७०॥
अन्धकारसे घिरी हुई और ताराओंसे व्याप्त हुई वह रात्रि ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो नील वस्त्र पहिने हुई और चमकीले मोतियोंके आभूषण धारण किये हुई कोई अभिसारिणी स्त्री ही हो ॥ १७०।।
Enveloped in darkness and adorned with stars, the night appeared resplendent—like a maiden on her secret tryst, clad in deep-blue garments and decked in gleaming pearl-like ornaments.170
श्लोक ( Shlok ) 171
ततान्धतमसे लोके जनैरुन्मीलितेक्षणैः । नादृश्यत पुरः किञ्चित् मिथ्यात्वेनेव दूषितैः ॥१७१॥
जिस प्रकार मिथ्या दर्शनसे दूषित पुरुषोंको कुछ भी दिखाई नहीं देता-पदार्थके स्वरूपका ठीक ठीक ज्ञान नहीं होता उसी प्रकार गाढ़ अन्धकारसे भरे हुए लोकमें पुरुषोंको आंख खोलनेपर भी सामनेकी कुछ भी वस्तु दिखाई नहीं देती थी ।।१७१।।
Just as those deluded by false vision perceive nothing rightly—failing to grasp the true nature of things—so too, in that world steeped in dense darkness, men, though their eyes were open, could see nothing before them.171
श्लोक 172 से 181
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
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आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
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