आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191
श्लोक 192 से 201 रत्नत्रय और शुद्ध आहार
मुनियों ने रत्नत्रय (समीचीन दर्शन, ज्ञान, चारित्र) के लिए सावद्य कार्यों का त्याग किया। वे छह काय जीवों की रक्षा करते थे और दीनता से मुक्त होकर मोक्ष को लक्ष्य बनाए रखते थे। तीन गुप्तियों (मन, वचन, काय की संयम) के धारक थे और कामभोगों से उदासीन रहते थे। वे शुद्ध अन्न ही ग्रहण करते थे, और शंकित, अभिहृत, उद्दिष्ट, या क्रयक्रीत आहार से बचते थे। मौन और ईर्यासमिति के साथ भिक्षा लेते थे, और सुख-दुख, मान-अपमान को समान मानते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
जीवाजीवविभागज्ञा ज्ञानोद्योतस्फुरदृशः । सावद्यं परिजहृुस्ते प्रासुकावसथाशनाः ॥१९२॥
वे जीव और अजीवके विभाग को जाननेवाले थे, ज्ञानके प्रकाशसे उनके नेत्र देदीप्यमान हो रहे थे अथवा ज्ञानका प्रकाश ही उनका स्फुरायमान नेत्र था, वे प्रासुक अर्थात् जीवरहित स्थानमें ही निवास करते थे और उनका भोजन भी प्रासुक ही था, इस प्रकार उन्होंने समस्त सावद्य भोगका परिहार कर दिया था ।।१९२।।
They were seers of the distinction between the sentient and the insentient; their eyes shone with the radiance of knowledge—or rather, knowledge itself gleamed forth as their vision. They dwelt in prāsuka, the uninhabited and lifeless places, and partook only of prāsuka sustenance. Thus, they wholly renounced all enjoyment tainted with violence or impurity. 192
श्लोक ( Shlok ) 193
स्याद्यत्किंञ्चिच्च सावद्यं तत्सर्वं त्रिविधेन ते । रत्नत्रितयशुद्ध्यर्थं यावज्जीवमवर्जयन् ॥१९३॥
उन मुनियोंने रत्नत्रयकी विशुद्धिके लिये, संसारमें जितने सावद्य (पापारम्भ-सहित) कार्य हैं उनका जीवन पर्यन्तके लिये त्याग कर दिया था ॥ १९३॥
Those sages, in their pursuit of the purity of the Three Jewels, renounced for life all actions in the world that were tainted with violence or sin, abstaining entirely from deeds fraught with karmic bondage.193
श्लोक ( Shlok ) 194
त्रसान् हरितकायांश्च पृथिव्यप्पवनानलान् । जीवकायानपायेभ्यस्ते स्म रक्षन्ति यत्नतः ॥१९४॥
वे त्रसकाय, वनस्पति काय, पृथिवीकाय, जलकाय, वायु काय और अग्नि काय इन छह कायके जीवोंकी बड़े यत्न से रक्षा करते थे ।।१९४।।
With utmost care and vigilance, they protected the lives of the six classes of beings—those embodied in mobile creatures (trasakāya), plants, earth, water, air, and fire.194
श्लोक ( Shlok ) 195
अदीनमनसः शान्ताः परमोपेक्षेयान्विताः। ‘मुक्तिशाठद्यास्त्रिभिर्गुप्ताः कामभोगेष्वविस्मिताः ॥१९५।।
उन मुनियोंका हृदय दीनतासे रहित था, वे अत्यन्त शान्त थे, परम उपेक्षासे सहित थे, मोक्ष प्राप्त करना ही उनका उद्देश्य था, तीन गुप्तियोंके धारक थे और काम भोगोंमें कभी आश्चर्य नहीं करते थे ॥ १९५॥
Their hearts were free of all weakness and plaint; they were utterly serene, endowed with supreme equanimity, and ever intent upon the attainment of liberation. Steadfast in the observance of the three restraints—of body, speech, and mind—they held no wonder or delight in sensual pleasures.195
श्लोक ( Shlok ) 196
जिनाज्ञानु गताः शश्वत्संसारोद्विग्नमानसाः । गर्भवास जरामृत्युपरिवर्तनभीरवः ॥१९६॥
वे सदा जिनेन्द्रदेवकी आज्ञाके अनुसार चला करते थे, उनका हृदय संसारसे उदासीन रहा करता था और वे गर्भ में निवास करना, बुढ़ापा और मृत्यु इन तीनों के परिवर्तनसे सदा भयभीत रहते थे ।।१९६॥
They ever walked in accordance with the command of the Supreme Jina; their hearts remained detached from the world, and they lived in constant dread of the ceaseless cycle of change—of dwelling in the womb, of the decay of old age, and the finality of death.196
श्लोक ( Shlok ) 197
श्रुतज्ञानदृशो दृष्टपरमार्था विचक्षणाः । ज्ञानदीपिकया साक्षाच्चक्रुस्ते पदमक्षरम् ॥१९७॥
श्रुतज्ञान ही जिनके नेत्र हैं और जो परमार्थको अच्छी तरह जानते हैं ऐसे वे चतुर मुनिराज ज्ञानरूपी दीपिका के द्वारा अविनाशी परमात्म पद का साक्षात्कार करते थे ।। १९७॥
Wise were those noble sages, for whom scriptural knowledge was their very eyes and who beheld the supreme truth with clarity. With the lamp of knowledge ever illumined, they realized the imperishable state of the Supreme Self.197
श्लोक ( Shlok ) 198
ते चिरं भावयन्ति स्म सन्मार्ग मुक्तिसाधनम् । परदत्तविशुद्धान्नभोजिनः पाण्यमत्रकाः ॥१९८।।
जो दूसरेके द्वारा दिये हुए विशुद्ध अन्न का भोजन करते हैं तथा हाथ ही जिनके पात्र हैं ऐसे वे मुनिराज मोक्षके कारणस्वरूप समीचीन मार्गका निरन्तर चिन्तवन करते रहते थे ॥१९८॥
Living on pure alms received from others, with their own hands as their only vessels, those venerable sages dwelt in constant contemplation of the noble path that leads to liberation, ever reflecting upon its true and sacred cause.198
श्लोक ( Shlok ) 199
शङ्किताभिहृतो द्दिष्ट क्रयक्रीतादि लक्षणम् । सूत्रे ‘निषिद्धमाहारं नैच्छन्प्राणात्ययेऽपि ते ॥१९९॥
शंकित अर्थात् जिसमें ऐसी शंका हो जावे कि यह शुद्ध है अथवा अशुद्ध, अभिहृत अर्थात् जो किसी दूसरेके यहांसे लाया गया हो, उद्दिष्ट अर्थात् जो खासकर अपने लिये तैयार किया गया हो, और क्रयक्रीत अर्थात् जो कीमत देकर बाजारसे खरीदा गया हो इत्यादि आहार जैन शास्त्रोंमें मुनियोंके लिये निषिद्ध बताया है। वे मुनिराज प्राण जानेपर भी ऐसा निषिद्ध आहार लेनेकी इच्छा नहीं करते थे ।।१९९।।
Food that is doubtful—wherein one suspects its purity or impurity; food brought from another’s dwelling (abhihṛta); food specially prepared for oneself (uddiṣṭa); and food purchased with money (krayakrīta)—all such types are declared forbidden for monks in the Jain scriptures. Even at the cost of their lives, those noble sages would not harbor the slightest desire for such prohibited sustenance.199
श्लोक ( Shlok ) 200
भिक्षां नियतवेलायां गृहपङ्क्त्यनतिक्रमात् । शुद्धामाददिरे धीरा मुनिवृत्तौ समाहिताः ॥२००॥
मुनियोंकी वृत्तिमें सदा सावधान रहनेवाले वे धीरवीर मुनि घरोंकी पंक्तियोंका उल्लंघन न करते हुए निश्चित समयमें शुद्ध भिक्षा ग्रहण करते थे ॥ २००॥
Ever vigilant in the conduct befitting a monk, those steadfast and courageous sages accepted pure alms at the appointed hour, without transgressing the boundaries of household dwellings or disturbing their ordered rows.200
श्लोक ( Shlok ) 201
शीतमुष्णं विरुक्षं च स्निग्धं सलवणं न वा । तनुस्थित्यर्थमाहारमाजहुस्ते गतस्पृहाः ॥२०१ ll
जिनकी लालसा नष्ट हो चुकी है ऐसे वे मुनिराज शरीरकी स्थितिके लिये ठंडा, गर्म, रूखा, चिकना, नमक-सहित अथवा बिना नमक का जैसा कुछ प्राप्त होता था वैसा ही आहार ग्रहण करते थे ॥२०१॥
Those venerable sages, whose cravings had been utterly extinguished, accepted whatever sustenance came their way—whether cold or hot, dry or unctuous, salted or without salt—solely for the maintenance of the body, without preference or desire.201
श्लोक 202 से 211
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191
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