आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 भरत की महिमा और आह्वान
दूत कहता है कि भरत ने विजयार्ध पर्वत और समुद्रों तक विजय प्राप्त की, और उनका यश पर्वतों पर कमल-सा सुशोभित है। गंगा-सिंधु के देवताओं ने उनकी पूजा की, और लक्ष्मी उनकी दासी-सी है। भरत का राज्य बाहुबली के बिना अधूरा है, और वे चाहते हैं कि बाहुबली उनके साथ साम्राज्य का उपभोग करें। दूत जोर देता है कि बाहुबली का प्रणाम न करना भरत के चक्रवर्तीपन को फीका करता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
विजयार्द्धाचले यस्य विजयो घोषितोऽमरैः । जयतो विजयार्द्धेशं शरेणामोघपातिना ॥७२॥
व्यर्थ न जाने-वाले बाणके द्वारा विजयार्ध पर्वतके स्वामी विजयार्धदेवको जीतनेवाले उस भरतकी विजय घोषणा देवोंने भी की थी ।॥ ७२॥
By the arrow that never strays in vain,Bharata, conqueror of Vijayarudha—the lord of the mountain Vijayarudha—had his triumph proclaimed even by the gods themselves.72
श्लोक ( Shlok ) 73
कृतमालादयो देवा गता यस्य विधेयताम् । कृतमस्योभयश्रेणीन “भोगजयवर्णनैः ॥७३॥
कृतमाल आदि देव उसकी आधीनता प्राप्त कर चुके हैं और उत्तर दक्षिण दोनों श्रेणियोंके विद्याधरोंने भी उसकी जयघोषणा की है ॥७३॥
The deities of the garlands and other divine realms have yielded to his dominion,and the Vidyadharas of both the northern and southern ranges have also proclaimed his victorious acclaim.73
श्लोक ( Shlok ) 74
गुहाम् खमपध्वान्तं व्यतीत्य जयसाधनैः। उत्तरां विजयाद्रिः यो व्यगाहत तां महीम् ॥७४॥
जिसका अन्धकार दूर कर दिया गया है ऐसे गुफाके दरवाजे को अपनी विजयी सेना के साथ उल्लंघन कर उसने विजयार्ध पर्वतकी उत्तर दिशाकी भूमिपर भी अपना अधिकार कर लिया है ।॥७४।।
He who has dispelled the darkness—having breached the gateway of that cave with his victorious host,he has claimed dominion even over the northern lands of Mount Vijayarudha.74
श्लोक ( Shlok ) 75
म्लेच्छाननिच्छतोऽप्याज्ञां प्रच्छाद्य जयसाधनैः । सेनान्या यो जयं प्राप बलादाच्छिद्य तद्धनम् ।।७५।।
म्लेच्छ लोग यद्यपि उसकी आज्ञा नहीं मानना चाहते थे तथापि उसने सेनापतिके द्वारा अपनी सेनासे हराकर और जबरदस्ती उनका धन छीनकर उनपर विजय प्राप्त की है ।। ७५।।
Though the Mlecchas refused to heed his command,
he nonetheless triumphed over them by dispatching his generals,
seizing their wealth by force and subjugating their might.75
श्लोक ( Shlok ) 76
कृतोऽभिषेको यस्यारादभ्येत्य सुरसत्तमैः । यस्याचलेन्द्रकूटेषु स्थलपद्मायितं यशः ॥७६॥
अच्छे अच्छे देवोंने आकर उसका अभिषेक किया है और उसका निर्मल यश बड़े बड़े पर्वतोंकी शिखरों पर स्थलकमलोंके समान सुशोभित हो रहा है ॥७६॥
Exalted gods of noble mien have come to anoint him,and his pristine glory shines forth,adorned like lotus blooms upon the lofty peaks of towering mountains.76
श्लोक ( Shlok ) 77
रत्नार्घै पर्युपासातां यं स्वर्धन्यधिदेवते । वृषभाद्रितटे येन टङ्ककोत्कीर्णं कृतं यशः ॥७७॥
गङ्गा-सिन्धु दोनों नदियोंके देवताओं ने रत्नोंके अर्थोंके द्वारा उसकी पूजा की है तथा वृषभाचलके तटपर उसने अपना यश टांकीसे उघेर कर लिखा है ॥७७॥
The divine lords of the Ganga and Sindhu rivers have worshipped him with offerings rich in jeweled meaning, and upon the slopes of the sacred Ṛṣabhācala, he has inscribed his glory as though etched with the stroke of a chisel.77
श्लोक ( Shlok ) 78
घटदासीकृता लक्ष्मीः सुराः किङ्करतां गताः । यस्य स्वाधीनरत्नस्य निधयः सुवते धनम् ॥७८॥
उसने लक्ष्मीको घटदासी अर्थात् पानी भरनेवाली दासीके समान किया है, देव उसके सेवक हो रहे हैं, समस्त रत्न उसके स्वाधीन हैं और निधियाँ उसे धन प्रदान करती रहती हैं ।॥७८॥
He has made even Lakṣmī serve like a humble water-bearing maid,
the gods themselves attend upon him as vassals, all the jewels of the world are subject to his will, and the treasures of the earth pour forth their riches at his command.78
श्लोक ( Shlok ) 79
स यस्य जयसैन्यानि निर्जित्य निखिला दिशः । भूमन्ति स्माखिलाम्भोधितटान्तवनभूमिषु ॥७९॥
और उसकी विजयी सेनाओंने समस्त दिशाओंको जीतकर सब समुद्रों के किनारेके वनों की भूमिमें भ्रमण किया है ।॥७९॥
And his victorious armies, having conquered all the quarters of the earth,have traversed the forested lands that grace the shores of every sea.79
श्लोक ( Shlok ) 80
त्वामायुष्मन् जगन्मान्यो मानयन् कुशलाशिषा । समादिशन्ति चक्राङ्कां प्रथयन्नधिराजताम् ॥८०॥
हे आयुष्मन्, जगत में माननीय वही महाराज भरत अपने चक्रवर्तीपने को प्रसिद्ध करते हुए कल्याण करनेवाले आशीर्वादसे आपका सन्मान कर आज्ञा कर रहे हैं ।॥८०॥
O noble one, the venerable Emperor Bharata—renowned throughout the world for his sovereign glory—now honors you with his benediction of well-being, and with that auspicious blessing, he extends his command unto you.80
श्लोक ( Shlok ) 81
मदीयं राज्यमाक्रान्तनिखिलद्वीपसागरम् । राजतेऽस्मत्प्रियभात्रा न बाहुबलिना विना ॥८१॥
कि समस्त द्वीप और समुद्रों तक फैला हुआ, यह हमारा राज्य हमारे प्रिय भाई बाहुबली के बिना शोभा नहीं देता है ॥८१॥
For this empire of mine—vast as it is, extending across all the continents and seas—appears bereft of splendour without the presence of my beloved brother, Bāhubali.81
श्लोक 82 से 91
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71
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