आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
श्लोक 92 से 101 भाइयों का पिता के प्रति समर्पण
भाई स्वीकार करते हैं कि भरत का संदेश उचित है, परंतु वे अपने पिता वृषभदेव को ही प्रमाण मानते हैं, जिन्होंने उन्हें ऐश्वर्य प्रदान किया। वे कहते हैं कि वे स्वतंत्र नहीं, बल्कि पिता की आज्ञा के अधीन हैं और भरत से कुछ लेना-देना नहीं चाहते। भाइयों ने दूतों का सत्कार किया, उपहार और पत्र के साथ उन्हें विदा किया, और फिर अपने पिता वृषभदेव के पास पहुंचे। वहां उन्होंने विधिपूर्वक प्रणाम और पूजा की, यह कहते हुए कि वे केवल उनकी ही उपासना करेंगे, क्योंकि उनकी कृपा से ही उन्हें समृद्धि मिली है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
यदुक्तमादिराजेन तत्सत्यं नोऽभिसम्मतम् । गुरोरसन्निधौ पूज्यो ज्यायान्भ्राताऽनुजैरिति ॥९२॥
कि जो आदिराजा भरतने कहा है वह सच है और हम लोगोंको स्वीकार है क्योंकि पिताके न होनेपर बड़ा भाई ही छोटे भाइयोंके द्वारा पूज्य होता है ॥९२॥
That which the noble King Bharata hath declared is verily true, and we all do accept it; for when the father is no more, it is the elder brother who is held worthy of reverence by the younger brethren.Verse 92
श्लोक ( Shlok ) 93
प्रत्यक्षो गुरुरस्माकं प्रतपत्येष विश्वदृक् । स नः प्रमाणमैश्वर्यं तद्वितीर्णमिदं हि नः ॥९३॥
परन्तु समस्त संसारको जानने देखनेवाले हमारे पिता प्रत्यक्ष विराज-मान हैं वे ही हमको प्रमाण है, यह हमारा ऐश्वर्य उन्हींका दिया हुआ है ।। ९३ ।।
Yet our revered father, who beholdeth and knoweth the entire world, is present before us in manifest form. He alone is our authority; this sovereignty of ours is but a gift bestowed by him.Verse 93
श्लोक ( Shlok ) 94
तदत्र गुरुपादाज्ञा तन्त्रा न स्त्ररिणों वयम् । न देयं भरतेशेन नादेयमिह किञ्चन ॥९४॥
इसलिये हम लोग इस विषयमें पिताजी के चरण कमलों की आज्ञाके आधीन हैं, स्वतन्त्र नहीं हैं। इस संसारमें हमें भरतेश्वरसे न तो कुछ लेना है और न कुछ देना है ।। ९४।।
Therefore, in this matter, we remain wholly subject to the command of our father’s lotus feet, and are not free to act of our own accord. In this world, we neither seek aught from Lord Bharata, nor owe him anything in return.Verse 94
श्लोक ( Shlok ) 95
यत्तु नः संविभागार्थमिदमामन्त्रण कृतम् । चक्रिणा तेन सुप्रीता प्रीणाश्च’ वयमागलात् ॥९५॥
तथा चक्रवर्ती ने हिस्सा देनेके लिये जो हम सबको आमन्त्रण दिया है अर्थात् बुलाया है उससे हम लोग बहुत संतुष्ट हुए हैं और गले तक तुप्त हो गये हैं ।। ९५।।
Moreover, the gracious summons extended to us by the Emperor, inviting us to share in the kingdom, hath brought us great contentment — yea, we are satisfied to the very brim, even to the depths of our being.Verse 95
श्लोक ( Shlok ) 96
इति सत्कृत्य तान्दूतान् सन्मानै प्रभुवत्प्रभौ । विहितोपायनाः सद्यः प्रतिलेखैर्व्यसर्जयन् ॥९६॥
इस प्रकार राजाओंकी तरह योग्य सन्मानोंसे उन दूतों का सत्कार कर तथा भरतके लिये उपहार देकर और बदलेके पत्र लिखकर उन राजकुमारोंने दूतोंको शीघ्र ही विदा कर दिया ।।९६।।
Thus, with honours befitting royal envoys, the princes received the messengers, offering them due hospitality, presenting gifts for Bharata, and sending in return letters of reply — and thereafter, they swiftly bade them farewell.Verse 96
श्लोक ( Shlok ) 97
दूतसात्कृतसन्मानाः प्रभुसात्कृतवीचिकाः । गुरुसात्कृत्य तत्कार्य प्रापुस्ते गुरुसन्निधिम् ॥९७॥
इस प्रकार जिन्होंने दूतोंका सन्मान कर भरतके लिये योग्य उत्तर दिया है ऐसे वे सब राजकुमार, पूज्य पिताजीका दिया हुआ कार्य उन्हींको सौंपने के लिये उनके समीप पहुंचे ।।९७।।
Having thus honoured the envoys and sent a fitting reply unto Bharata, all those noble princes approached their venerable father, that they might humbly place into his hands the charge entrusted to them by him.Verse 97
श्लोक ( Shlok ) 98
गत्वा च गुरुमद्राक्षुर्मितोचितपरिच्छदाः । महागिरिमिवोत्तुङ्गं कैलासशिखरालयम् ॥९८॥
जिनके पास परिमित तथा योग्य सामग्री है ऐसे उन राजकुमारोंने किसी महापर्वतके समान ऊंचे और कैलासकी शिखरपर विद्यमान पूज्य पिता भगवान् वृषभदेवके जाकर दर्शन किये ॥ ९८ ॥
Those princes, possessing modest yet worthy offerings, came into the presence of their revered father — the venerable Lord Ṛṣabhadeva — who stood like a lofty mountain, enthroned upon the summit of Kailāsa; and they beheld him with deepest reverence.Verse 98
श्लोक ( Shlok ) 99
प्रणिपत्य विधानेन प्रपूज्य च यथाविधि । व्यजिज्ञपन्निदं वाक्यं कुमारा मारविद्विषम् ॥९९॥
उन राजकुमारोंने विधिपूर्वक प्रणाम किया, विधिपूर्वक पूजा की और फिर कामदेवको नष्ट करनेवाले भगवान्से नीचे लिखे वचन कहे ।।९९।।
The princes, with due reverence, offered their salutations in the prescribed manner, performed the sacred rites of worship with devotion, and then addressed the Lord—He who had reduced Kāma to ashes—with the following words:Verse 99
श्लोक ( Shlok ) 100
त्वत्तः स्मो लब्धजन्मानस्त्वत्तः प्राप्ताः परां श्रियम् । त्वत्प्रसादैषिणो देव त्वत्तो नान्यमुपास्महे ॥१००॥
हे देव, हम लोगोंने आपसे ही जन्म पाया है, आपसे ही यह उत्कृष्ट विभूति पाई है और अब भी आपकी प्रसन्नताकी इच्छा रखते हैं, हम लोग आपको छोड़कर और किसीकी उपासना नहीं करना चाहते ।। १००।।
O Lord, it is from You alone that we have received our very birth; from You have we attained this supreme glory. Even now, we seek but Your gracious favor. We desire to worship none but You—never shall our devotion turn elsewhere.Verse 100
श्लोक ( Shlok ) 101
गुरुप्रसाद इत्युच्चैर्जनो वक्त्येष केवलम् । वयं तु तद्रसाभिज्ञास्त्वत्प्रसादार्जित श्रियः ॥१०१॥
इस संसारमें लोग यह ‘पिताजीका प्रसाद है’ ऐसा केवल कहते ही हैं परन्तु आपके प्रसादसे जिन्हें उत्तम सम्पत्ति प्राप्त हुई है ऐसे हम लोग इस वाक्यके रसका अनुभव ही कर चुके हैं ।। १०१।।
In this world, men often utter the words, “This is my father’s blessing,” merely as a form of speech. But we, who have been graced with noble fortune through Your benediction, have truly tasted the deep sweetness of that utterance—its essence known to us not in word alone, but in lived experience.Verse 101
श्लोक 102 से 111
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
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