आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 101 दान के गुण और भगवान की महिमा
दान के सात गुण—श्रद्धा, शक्ति, भक्ति, विज्ञान, अक्षुब्धता, क्षमा, त्याग—कहे गए। नवधा भक्ति में पड़गाहन और शुद्धि शामिल थी। श्रेयान्स ने प्रासुक आहार दिया। भगवान पाणिपात्र से खड़े होकर आहार लेते थे। वे नग्न-दिगंबर, अस्नान, और केशलोंच करते थे। श्रेयान्स ने ईख का रस दान कर सुशोभित हुआ।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 82 to 101
श्लोक ( Shlok ) 82
श्रद्धा शक्तिश्च भक्तिश्व विज्ञानं चाप्यलुब्धता । क्षमा त्यागश्च सप्तैते प्रोक्ता दानपतेर्गुणाः ॥८२॥
श्रद्धा, शक्ति, भक्ति, विज्ञान, अक्षुब्धता, क्षमा और त्याग ये दानपति अर्थात् दान देने वाले के सात गुण कहलाते हैं ।।82।।
“Faith, strength, devotion, wisdom, steadfastness, forgiveness, and renunciation—these are the seven virtues of a true donor.” (82)
श्लोक ( Shlok ) 83
श्रद्धास्तिक्य मनास्तिक्ये प्रदाने स्यादनादरः । भवेच्छक्तिरनालस्यं भक्तिः स्यात्तद्गुणादरः ॥८३॥
श्रद्धा आस्तिक्य बुद्धि को कहते हैं, आस्तिक्य बुद्धि अर्थात् श्रद्धा के न होने पर दान देने में अनादर हो सकता है । दान देने में आलस्य नहीं करना सो शक्ति नाम का गुण है, पात्र के गुणों में आदर करना सो भक्ति नाम का गुण है ।।83।।
“Faith (Śraddhā) is the firm belief in spiritual truths. Without such faith, one may become indifferent to giving. The absence of hesitation in offering charity is the virtue called strength (Shakti). Showing reverence for the qualities of a worthy recipient is the virtue known as devotion (Bhakti).” ( 83)
श्लोक ( Shlok ) 84
विज्ञानं स्यात् क्रमज्ञत्वं “देयासक्तिरलुब्धता । क्षमा तितिक्षा ददतस्त्यागः सद्व्ययशीलता ॥८४॥
दान देने आदि के क्रम का ज्ञान होना सो विज्ञान नाम का गुण है, दान देने की शक्ति को अलुब्धता कहते हैं, सहनशीलता होना क्षमा गुण है और उत्तम द्रव्य दान में देना सो त्याग है ।।84।।
“Having the knowledge of the proper method of giving charity is the virtue called wisdom (Vijnana). The ability to give selflessly is known as non-avarice (Alubdhata). Patience and forbearance constitute the virtue of forgiveness (Kshama). Offering the finest and most worthy possessions in charity is the virtue of renunciation (Tyaga).” ( 84)
श्लोक ( Shlok ) 85
इति सप्तगुणोपेतो दाता स्यात् पात्रसंपदि । व्यपेतश्च निदानादेर्दोंषान्निश्रेयसोद्यतः ॥८५॥
इस प्रकार जो दाता ऊपर कहे हुए सात गुणों से सहित और निदान आदि दोषों से रहित होकर पात्ररूपी संपदा में दान देता है वह मोक्ष प्राप्त करने के लिए तत्पर होता है ।।85।।
“Thus, a donor who possesses the seven aforementioned virtues and is free from faults such as selfish motives, and who gives charity to a worthy recipient, becomes prepared for the attainment of liberation.” (85)
श्लोक ( Shlok ) 86 – 87
प्रतिग्रहण मत्युच्चैः स्थानेऽस्य विनिवेशनम् । पादप्रधावनं चार्चा नतिः शुद्धिश्च सा त्रयी ।॥८६॥
विशुद्दिश्चा शनस्येति नवपुण्यानि दानिनाम् । स तानि कुशलो भेजे पूर्वसंस्कारचोदितः ॥८७॥
मुनिराज का पड़गाहन करना, उन्हें ऊँचे स्थान पर विराजमान करना, उनके चरण धोना, उनकी पूजा करना, उन्हें नमस्कार करना, अपने मन, वचन, काय की शुद्धि और आहार की विशुद्धि रखना, इस प्रकार दान देने वाले के यह नौ प्रकार का पुण्य अथवा नवधा भक्ति कहलाती है । अतिशय चतुर श्रेयान्सकुमार ने पूर्वपर्याय के संस्कारों से प्रेरित होकर वे सभी भक्तियाँ की थीं ।।86-87।।
“Welcoming the ascetic, offering them a high seat, washing their feet, worshiping them, bowing in reverence, maintaining purity of mind, speech, and body, and ensuring the purity of the offered food—these constitute the nine types of merit or the ninefold devotion (Navadha Bhakti) of a donor. The exceptionally wise Prince Shreyans, inspired by the impressions of his past life, performed all these devotions.” ( 86-87)
श्लोक ( Shlok ) 88
इष्टश्चायं विशिष्टश्चेत्यसौं तुष्टिं परां श्रितः। ददे भगवते दानं प्रासुकाहारकल्पितम् ॥८८॥
ये भगवान् अतिशय इष्ट तथा विशिष्ट पात्र हैं ऐसा विचार कर परम संतोष को प्राप्त हुए श्रेयान्सकुमार ने भगवान् के लिए प्रासुक आहार का दान दिया था ।।88।।
“Recognizing that the Lord was the most revered and distinguished recipient, Prince Shreyans, filled with immense satisfaction, offered pure and sanctified food as alms to the Lord.” ( 88)
श्लोक ( Shlok ) 89
संतोषो याचनापायो नैःसंग्यं स्वप्रधानता । इति मत्वा गुणान् पाणिपात्रेणाहारमिच्छते ॥८९॥
तुष्टिर्विशिष्टपीठादिसं प्राप्तावन्यथा द्विषिः। असंयमश्च सत्यैवमिति स्थित्वाशनैषिणे ॥९०॥
कायासुखतितिक्षार्थ सुखासक्तेश्च हानये । धर्मप्रभावनार्थ च कायक्लेशमुपेयुषे ॥९१॥
नैष्किञ्चन्यप्रधानं यत् परं निर्वाणकारणम् । हिंसारक्षण “याञ्चादिदोषैरस्पृष्टमूर्जितम् ॥९२॥
“अशक्यं प्रार्थनीयत्वरहितं च समीयुपे। जातरूपं यथाजातमविकारमविप्लवम् ॥९३॥
तैलादेर्याचनं तस्य लाभालाभ द्वये सति । रागद्वेषद्वया संगः केशजप्राणिहिंसनम् ॥९४॥
इत्यादिदोषसद्भावादस्नानव्रतधारिणे। हायनाम शने ऽप्यङ्गे पुष्टिं दीप्तिं च विभ्रते ॥९५॥
क्षुर क्रियायां तद्योग्य साधनार्जनरक्षणे। तदपाये च चिन्ता स्यात् केशोत्पाटमितीच्छते ॥९६॥
पञ्चभिः समिता यास्मै त्रिभिर्गुप्ताय तायिने। महाव्रताय महते निर्मोहाय निराशिषे॥९७॥
संयमक्रियया सर्वप्राणिभ्योऽभयदायिने । सर्वीयज्ञानदानाय सार्वाय प्रभविष्णवे ॥९८॥
दातुराहारदानस्य महा निस्तार कात्मने। त्रिजगत्सर्वभूतानां हितार्थ मार्गदेशिने ॥९९॥
श्रेयान् सोमप्रभेणामा लक्ष्मीमत्या च सादरम्। रसमिक्षोरदात् प्रासु मुत्तानीकृतपाणये ॥१००॥
जो भगवान् संतोष रखना, याचना का अभाव होना, परिग्रह का त्याग करना, और अपने आपकी प्रधानता रहना आदि अनेक गुणों का विचार कर पाणिपात्र से ही अर्थात् अपने हाथों से ही आहार ग्रहण करते थे । उत्तम आसन मिलने से संतोष होगा, यदि उत्तम आसन नहीं मिला तो द्वेष होगा और ऐसी अवस्थाओं में असंयम होगा ऐसा विचार कर जो भगवान् खड़े होकर ही भोजन करते थे । शरीरसंबंधी दुःख सहन करने के लिए, सुख की आसक्ति दूर करने के लिए और धर्म की प्रभावना के लिए जो भगवान कायक्लेश को प्राप्त होते थे । जिसमें अकिंचनता की ही प्रधानता है, जो मोक्ष का साक्षात् कारण है, हिंसा, रक्षा और याचना आदि दोष जिसे छू भी नहीं सकते हैं, जो अत्यंत बलवान् हैं, साधारण मनुष्य जिसे धारण नहीं कर सकते, जिसे कोई प्राप्त नहीं करना चाहता, और जो तत्काल में उत्पन्न हुए बालक के समान निर्विकार तथा उपद्रवरहित है ऐसे नग्न-दिगंबर रूप को जो भगवान् धारण करते थे । तैल आदि की याचना करना, उसके लाभ और अलाभ में राग-द्वेष का उत्पन्न होना, और केशों में उत्पन्न होने वाले जूँ आदि जीवों की हिंसा होना इत्यादि अनेक दोषों का विचार कर जो भगवान् अस्नान व्रत को धारण करते थे अर्थात् कभी स्नान नहीं करते थे । एक वर्ष तक भोजन न करने पर भी जो शरीर में पुष्टि और दीप्ति को धारण कर रहे थे । यदि क्षुरा आदि से बाल बनवाये जायेंगे तो उसके साधन क्षुरा आदि लेने पड़ेंगे, उनकी रक्षा करनी पड़ेगी और उनके खो जाने पर चिंता होगी ऐसा विचार कर जो भगवान् हाथ से ही केशलोंच करते थे । जो भगवान् पाँचों इंद्रियों को वश कर लेने से शांत थे, तीनों गुप्तियों से सुरक्षित थे, सबकी रक्षा करने वाले थे, महाव्रती थे, महान थे, मोहरहित थे और इच्छारहित थे । जो संयम रूप क्रिया से सब प्राणियों के लिए अभय दान देने वाले थे, सबका हित करने वाले थे, सर्वहितकारी ज्ञान-दान देने में समर्थ थे । जो आहार-दान देने वाले को शीघ्र ही संसार-सागर से पार करने वाले थे, तीनों लोको के समस्त जीवों का हित करने के लिए मोक्षमार्ग का उपदेश देने वाले थे और जिन्होंने अपने दोनों हाथ उत्तान किये थे अर्थात् दोनों हाथों को सीधा मिलाकर अंजली (खोवा) बनायी थी ऐसे भगवान् वृषभदेव के लिए श्रेयान्सकुमार ने राजा सोमप्रभ और रानी लक्ष्मीमती के साथ-साथ आदरपूर्वक ईख के प्रासुक रस का आहार दिया था ।।89-100।।
“The Lord accepted alms using only His hands as a vessel, considering virtues such as contentment, the absence of begging, renunciation of possessions, and self-reliance. He remained standing while eating, contemplating that sitting might lead to attachment if a comfortable seat was obtained, or resentment if it was not, which could result in a lack of self-restraint.
To endure bodily hardships, eliminate attachment to comfort, and glorify the path of righteousness, He practiced austerities. He adopted the naked Digambara form, which symbolizes absolute non-possession, is a direct path to liberation, and is untouched by faults like violence, attachment, or desire. This form is difficult for ordinary people to embrace, unwanted by many, yet remains as pure and untroubled as a newborn child.
He never bathed, considering that seeking oil and other bathing materials could lead to attachment, desire, and harm to minute life forms in water. Even after a year without food, His body remained radiant and strong. He plucked His own hair by hand, avoiding the need for razors or other tools, which would require possession, protection, and concern over their loss.
The Lord, having conquered the five senses, remained tranquil, safeguarded by the three restraints (mind, speech, and body), and observed the great vows (Mahavratas). He was free from delusion and desires, granting fearlessness to all beings through His discipline and benefiting all through the gift of knowledge.
Bestowing the gift of liberation upon those who offered Him alms, He uplifted souls from the ocean of worldly existence and preached the path to salvation for the well-being of all beings across the three realms. With both hands joined together in the Anjali (hollowed palms) posture, the venerable Lord Rishabha Deva accepted the sanctified sugarcane juice offered with great reverence by Prince Shreyans, along with King Somaprabha and Queen Lakshmimati.” (89-100)
श्लोक ( Shlok ) 101
पुण्ड्रेक्षुरसधारान्तां भगवत्पाणिपात्रके । स समावर्जयन् रेजे पुण्यधारामिवामलाम् ॥१०१॥
वह राजकुमार श्रेयान्स भगवान के पाणिपात्र में पुण्यधारा के समान उज्ज्वल पौंडे और ईख के रस की धारा छोड़ता हुआ बहुत अच्छा सुशोभित हो रहा था ।।101।।
“Prince Shreyans looked exceedingly radiant as he poured the pure stream of sugarcane juice and auspicious Paunḍe into the Lord’s hand, resembling a sacred flow of merit.” ( 101)
श्लोक 102 से 111
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