आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 183 to 191
श्लोक ( Shlok ) 183
सिंहा इव नृसिंहास्ते’ तस्थुगिरिगुहाश्रयाः । जिनोक्त्यनु गतैः स्वान्तै रनुद्विग्नैः समाहिताः ॥१८३॥
सिंहके समान निर्भय, सब पुरुषोंमें श्रेष्ठ और पर्वतोंकी गुफाओंमें ठहरनेवाले वे मुनिराज जिनेन्द्र-देवके उपदेशके अनुसार चलनेवाले खेदरहित चित्तसे शान्त होकर निवास करते थे ॥१८३॥
Fearless like lions, foremost among men, and dwelling in the caves of mountains, those noble sages abided in tranquil composure, free from all sorrow, living in accordance with the divine teachings of Lord Jina.183
श्लोक ( Shlok ) 184
पाकसत्त्व शताकीर्णा वनभूमि भयानकाम् । तेऽध्यवात्सुस्त “मिस्त्रासु निशासु ध्यानमास्थिताः ॥१८४।॥
वे मुनिराज अंधेरी रातोंके समय सैकड़ों दुष्ट जीवोंसे भरी हुई भयंकर वनकी भूमियोंमें ध्यान धारण कर निवास करते थे ।।१८४।।
Those sage-monks, absorbed in deep meditation, would dwell even during the darkest nights in the dreadful wilderness—lands teeming with hundreds of fierce and wicked creatures—undaunted and unwavering in their spiritual resolve.184
श्लोक ( Shlok ) 185
न्यषेवन्त वनोद्देशान् निषेव्यान्वनदन्तिभिः । ते तद्दन्ताग्रनिर्भिन्नतरुस्थपुटितान्तरान् ॥ १८५॥
जो जंगली हाथियों के द्वारा सेवन करने योग्य हैं तथा जिनके मध्यभाग हाथियोंके दाँतोंके अग्रभागसे टूटे हुए वृक्षोंसे ऊंचे नीचे हो रहे हैं ऐसे वन-के प्रदेशोमें वे महामुनि निवास करते थे ॥ १८५॥
In forest regions traversed by wild elephants, where the terrain was rugged with trees broken and scattered by the thrust of their mighty tusks, those great sages made their abode, undisturbed in their ascetic stillness.185
श्लोक ( Shlok ) 186
वनेषु वनमातङ्गबृ हितप्रतिनादिनीः । दरीस्तेऽध्यूषुरारुष्टैराक्रान्ताः करिशत्रुभिः ॥१८६॥
जिनमें जंगली हाथियोंकी गर्जनाकी प्रतिध्वनि हो रही है और उस प्रतिध्वनिसे कुपित हुए सिहोंसे जो भर रही हैं ऐसी बनकी गुफाओंमें वे मुनि निवास करते थे ॥ १८६॥
In forest caves echoing with the thunderous roars of wild elephants—and resounding further with the wrathful cries of lions stirred by that echo—there did those monks dwell, serene amidst the tumult of the wilderness.186
श्लोक ( Shlok ) 187
स्वाध्याययोगसंसक्ता न स्वपन्ति स्म रात्रिषु । सूत्रार्थभावनोद्युक्ता जागरूकाः सदा यमी ॥१८७॥
वे मुनिराज स्वाध्याय और ध्यानमें आसक्त होकर रात्रियोंमें भी नहीं सोते थे, किन्तु सूत्रोंके अर्थ के चिन्तवनमें तत्पर होकर सदा जागते रहते थे ।।१८७।।
Absorbed in scriptural study and deep meditation, those sage-monks did not sleep even during the night; ever vigilant, they remained awake, steadfastly engaged in contemplating the meanings of the sacred texts. 187
श्लोक ( Shlok ) 188
पल्यङ्केन निषण्णास्ते वीरासनजुषोऽथवा । शयानाचैकपार्श्र्वेन शर्वरीरत्यवाहयन् ॥१८८ ॥
वे मुनिराज पर्यङकासनसे बैठकर, वीरासनसे बैठकर अथवा एक करवट-से ही सोकर रात्रियाँ बिता देते थे ॥१८८।।
Those ascetic sages would pass their nights seated in the lotus posture, or in the steadfast posture of a hero, or lying briefly on one side—content with minimal repose, unwavering in their discipline.188
श्लोक ( Shlok ) 189
त्यक्तोपधिभरा धीरा व्युत्सृष्टाङ्गा निरम्बराः । नैष्किञ्चन्यविशुद्धास्ते मुक्तिमार्गममार्गयन् ॥१८९॥
जिन्होंने परिग्रहका भार छोड़ दिया है, शरीरसे ममत्व दूर कर दिया है, जो वस्त्ररहित हैं और परिग्रहत्यागसे जो अत्यन्त विशुद्ध हैं ऐसे वे धीरवीर मुनि मोक्षका मार्ग ही खोजते रहते थे ।। १८९॥
Having cast off the burden of possessions, severed attachment to the body, and dwelling without clothing—purified to the utmost by renunciation—those steadfast and heroic monks sought only the path to liberation.189
श्लोक ( Shlok ) 190
निव्र्यापेक्षा निराकाङ्क्षा वायुवीथ्यनुगामिनः । व्यहरन् वसुधामेनां सग्रामनगराकराम् ।।१९०।।
किसीकी अपेक्षा न करनेवाले, आकांक्षाओंसे रहित और आकाशकी तरह निर्लेप वे मुनिराज गाँव और नगरोंके समूहसे भरी हुई इस पृथिवीपर विहार करते थे ।।१९०।।
Free from all dependence, devoid of desire, and untouched like the sky itself, those monk-lords wandered upon this earth—across villages and cities alike—unattached and ever serene.190
श्लोक ( Shlok ) 191
विहरन्तो महीं कृत्स्नां ते कस्याप्यनभिद्रुहः । मातृकल्पा दयालुत्वात्पुत्रकल्पेषु देहिषु ॥१९१॥
समस्त पृथिवीपर विहार करते हुए और किसी भी जीवसे द्रोह नहीं करते हुए वे मुनि दयालु होनेसे समस्त प्राणियोंको पुत्रके तुल्य मानते थे और उनके साथ माताके समान व्यवहार करते थे ।।१९१॥
Wandering across the entire earth, and harboring no animosity towards any being, those compassionate monks regarded all creatures as their own children, treating them with the same care and kindness as a mother would.191
श्लोक 192 से 201
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182
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