आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111 समवसरण की संरचना और पूजा
चक्रवर्ती भरत ने रत्नमयी स्तूपों का दर्शन किया, जो जिनेन्द्र प्रतिमाओं और तोरणों से सुशोभित थे। आश्चर्यचकित होकर उन्होंने इनकी पूजा की और कक्ष को पार किया। आकाशस्फटिक से निर्मित तीसरा कोट देखा, जो जिनेन्द्र की समीपता से शुद्ध प्रतीत होता था। कल्पवासी देवों से आज्ञा लेकर वे सभा में प्रवेशे। वहाँ एक योजन विस्तृत श्रीमण्डप में बारह संघों—मुनि, देवियाँ, राजा, और पशु—का दर्शन किया। उन्होंने तीन कटनीदार पीठ की प्रदक्षिणा की, धर्मचक्रों और चक्र, हाथी आदि चिह्नों वाली आठ महाध्वजाओं की पूजा की।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 33 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
स्तूपाश्च रत्ननिर्माणाः सान्तरा रत्नतोरणैः । समन्ताज्जिनबिम्बैस्ते निचिताङ्गाश्चकाशिरे ॥१०२॥
जिनके बीच बीचमें रत्नोंके तोरण लगे हुए हैं और जिनपर चारों ओरसे जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाएँ विराजमान हैं ऐसे वे रत्नमयी स्तूप भी बहुत अधिक सुशो-भित हो रहे थे ॥१०२॥
Amidst them stood the jewel-encrusted stūpas, adorned with arching gateways of precious gems, and graced on all sides by the resplendent images of Lord Jina—each one shining forth with sublime radiance, enhancing the sanctity of the entire realm.102
श्लोक ( Shlok ) 103
तां पश्यत्रर्चयंस्तांश्च तांश्च तांश्च स कीर्तयन् । तां च कक्षां व्यतीयाय विस्मयं परर्मायिवान् ॥१०३॥
उन स्तूपोंको देखते हुए, उनकी पूजा करते हुए और उन्हींका वर्णन करते हुए जिन्हें परम आश्चर्य प्राप्त हो रहा है ऐसे भरतने क्रम-क्रमसे उस कक्षाको उल्लंघन किया ॥१०३।।
Beholding those stūpas, worshipping them with reverence, and describing their wondrous beauty as he went—his heart filled with awe—Bharata gradually made his way through that chamber, crossing it step by step with deep devotion.103
श्लोक ( Shlok ) 104
नभःस्फटिकनिर्माणं प्राकारवलयं ततः । ‘प्रत्यास तेर्जिनस्येव लब्धशुद्धि ददर्श सः ॥१०४॥
आगे चलकर उन्होंने आकाशस्फटिकका बना हुआ तीसरा कोट देखा। वह कोट ऐसा जान पड़ता था मानो जिनेन्द्रदेवकी समीपताके कारण उसे शुद्धि ही प्राप्त हो गई हो ।।१०४।।
Advancing onward, he beheld the third enclosure, fashioned from celestial crystal. It seemed as though, by its very nearness to Lord Jina, it had attained a state of utter purity and sanctity.104
श्लोक ( Shlok ) 105
तत्र कल्पोपमै ‘र्देवैः र्महादौवारपालकैः । सादरं सोऽभ्यनुज्ञातः प्रविवेश सभां विभोः ॥१०५॥
वहां महाद्वारपालके रूपमें खड़े हुए कल्पवासी देवोंसे आदरसहित आज्ञा लेकर भरत महाराजने भगवान्की सभामें प्रवेश किया ॥१०५।।
There, receiving permission with great reverence from the Kalpavasi deities, who stood as majestic gatekeepers, King Bharata entered the divine assembly of the Lord.105
श्लोक ( Shlok ) 106
समन्ताद्योजनायामविष्कम्भपरिमण्डलम् । श्रीमण्डपं जगद्विश्वमपश्यन्मान्तमात्मनि ॥१०६॥
वहां उन्होंने चारों ओरसे एक योजन लम्बा, चौड़ा, गोल और अपने भीतर समस्त जगत को स्थान देनेवाला श्रीमण्डप देखा ॥१०६॥
Within, he beheld a magnificent Śrīmaṇḍapa, measuring one yojana in length and width, perfectly circular in shape, and encompassing within it the entire cosmos—a divine pavilion that held all of existence in its sacred embrace. 106
श्लोक ( Shlok ) 107 – 109
तत्रापश्यन्मुनीनिद्धबोधान्देवीश्च कल्पजाः । सार्यिका नृपकान्ताश्च ज्योतिर्वन्योरगामरीः ॥१०७॥भावनव्यन्तरज्योतिः कल्पेन्द्रान्पार्थिवान्मृगान् । भगवत्पादसंप्रेक्षाप्रीतिप्रोत्फुल्ललोचनान् ॥१०८।। गणानिति क्रमात् पश्यन्परीयाय परन्तपः । त्रिमेखलस्य पीठस्य प्रथमां मेखलां श्रितः ॥१०९।
उसी श्रीमण्डपके मध्यमें उन्होंने जिनेन्द्र भगवान्के चरणोंके दर्शन करने से उत्पन्न हुई प्रीतिसे जिनके नेत्र प्रफुल्लित हो रहे हैं ऐसे क्रमसे बैठे हुए उज्ज्वल ज्ञानके धारी मुनि, कल्पवासिनी देवियां, आर्यिकाओंसे सहित रानी आदि स्त्रियां, ज्योतिषी, व्यन्तर और भवनवासी देवोंकी देवियां, भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और कल्पवासी देव, राजा आदि मनुष्य और मृग आदि पशु ऐसे बारह संघ देखे तथा इन्हींको देखते हुए महाराज भरतने तीन कटनीदार पीठकी प्रथम कटनीका आश्रय लेकर उसकी प्रदक्षिणा दी ॥१०७-१०९॥
In the center of that divine Śrīmaṇḍapa, King Bharata witnessed the sight of enlightened monks, their eyes radiant with the joy born of gazing upon the feet of Lord Jina, sitting in their orderly ranks, adorned with the bright light of wisdom. Alongside them were the Kalpavāsinī goddesses, the noble queens with their attendants, the celestial women of the Vyantara, Bhavana, and Jotishi realms, as well as the Kalpavāsi gods, kings, men, and animals such as deer. These twelve divine assemblies filled the space, each one emanating a sacred presence.
While gazing upon them, King Bharata, with utmost reverence, took refuge in the first kaṭanī of the three-tiered Pīṭha, circumambulating it in a circle, further honoring the sanctity of the sacred space.107 – 109
श्लोक ( Shlok ) 110
तत्रानर्च मुदा चक्री धर्मचक्रचतुष्टयम् । यक्षेन्द्रं विर्धृतं मूर्ध्ना ब्रध्नबिम्बानुकारि यत् ।।११०॥
उस प्रथम कटनीपर चक्रवर्तीने, जिन्हें यक्षों के इन्द्रों ने अपने मस्तक पर धारण कर रखा है और जो सूर्यके बिम्बका अनुकरण कर रहे हैं ऐसे चारों दिशाओंके चार धर्मचक्रोंकी प्रसन्नताके साथ पूजा की ॥११०।।
Upon the first kaṭanī, the Emperor reverently worshiped the four Dharmachakras—one in each of the four directions—whose radiance, akin to the sun’s brilliance, was honored by the Yakṣa kings, who bore them upon their heads with great devotion and joy.110
श्लोक ( Shlok ) 111
द्वितीयमेखलायां च ‘प्रार्चदष्टौ महाध्वजान् । चक्रेभोक्षाब्ज पञ्चास्यस्त्रग्वस्त्रगरुडाङ्कितान् ॥ १११॥
दूसरी कटनीपर उन्होंने चक्र, हाथी, बैल, कमल, सिंह, माला, वस्त्र और गरुड़के चिह्नोंसे चिह्नित आठ महाध्वजाओंकी पूजा की ॥ १११।।
On the second kaṭanī, he worshiped the eight grand flags, each marked with the sacred symbols of the wheel, the elephant, the bull, the lotus, the lion, the garland, the garment, and the Garuda, offering his reverence to these divine ensigns with profound devotion.
श्लोक 112 से 123
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
Download PDF