आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 पर्वत और नमि-विनमि का राज्य
अजगर बिल में जीवों को खाता था। पर्वत समुद्र को स्पर्श करता था। गंगा-सिंधु इसके तट को विदीर्ण करती थीं। मेघ शिखरों पर गरजते थे। सारस और मेघ शब्द करते थे। विद्याधरी गीत गाती थी। यह वृषभजिनेंद्र सा था। धरणेंद्र ने नमि-विनमि की प्रशंसा की। उसने उन्हें रथनूपुरचक्रवाल में राज्याभिषेक किया। नमि दक्षिण और विनमि उत्तर श्रेणी के अधिपति बने।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
रन्धा दद्रेरयमजगर सामिकर्षन् स्वमङ्गं पुञ्जी भूतो गुरुरिव गिरेरान्त्रभारी निकुञ्जे : रुद्धश्वासं वदनकुहरं व्याददात्या पतद्भि र्वन्यैः सत्वैः किल बिलधिया क्षुत्प्रतीकारमिच्छुः ॥१७२॥
इधर यह लतागृह में अजगर पड़ा हुआ है, यह पर्वत के बिल में से अपना आधा शरीर बाहर निकाल रहा है और ऐसा जान पड़ता है मानो एक जगह इकट्ठा हुआ पहाड़ की अंतड़ियों का बड़ा भारी समूह ही हो । इसने श्वास रोककर अपना मुँहरूपी बिल खोल रखा है और उसे बिल समझ कर उसमें पड़ते हुए जंगली जीवों के द्वारा यह अपनी क्षुधा का प्रतिकार करना चाहता है ।।172।।
“Here, in the vine-covered retreat, a massive python lies coiled, extending half its body out of the mountain’s cavern. It appears as though a great heap of the mountain’s very entrails has gathered in one place. Holding its breath, it keeps its gaping mouth open like a dark cave, waiting for unsuspecting wild creatures to wander in, seeking shelter—only to satisfy its hunger.”
श्लोक ( Shlok ) 173
अयं जलनिधेर्जलं स्पृशति सानुभिर्वारिधि-स्ततटानि शिशिरीकरोति गिरिभर्तुरस्यान्वहम् । महद्विधुतवी चिशीकरशतै रजस्त्रोत्थितैः महानुपगतं जनं शिशिरयत्य नुष्णाशयः ॥१७३॥
यह पर्वत अपने लंबे फैले हुए शिखरों से समुद्र के जल का स्पर्श करता है और यह समुद्र वायु से कंपित होकर निरंतर उठती हुई लहरों की अनेक छोटी-छोटी बूँदों से प्रतिदिन इस गिरिराज के तटों को शीतल करता रहता है सो ठीक ही है क्योंकि जिनका अंतःकरण शीतल अर्थात् शांत होता है ऐसे महापुरुष समीप में आये हुए पुरुष को शीतल अर्थात् शांत करते ही हैं ।।173।।
“This mountain, with its vast and towering peaks, reaches out to touch the waters of the ocean. In turn, the ocean, stirred by the wind, sends forth countless tiny droplets through its ever-rising waves, gently cooling the slopes of this mighty peak each day. And rightly so, for just as great souls, whose hearts are calm and serene, bring peace to those who come near them, so too does the ocean soothe the mountain’s edges with its cooling touch.”
श्लोक ( Shlok ) 174
गङ्गासिन्धू हृदयमिवास्य स्फुटमद्रेः भित्वा यातां रसिकतयामू तटभागम् । स्पृष्ट्वा स्पृष्ट्वा पवनविधूतोर्मिंकरैः स्वै र्भेद्यं स्त्रीणां ननु महतामप्युरु चेतः ॥१७४॥
ये गंगा और सिंधु नदियां रसिक अर्थात् जलसहित और पक्ष में शृंगार रस से युक्त होने के कारण इस पर्वत के हृदय के समान तट को विदीर्ण कर तथा वायु के द्वारा हिलती हुई तरंगोंरूपी अपने हाथों से बार-बार स्पर्श कर चली जा रही हैं सो ठीक ही है क्योंकि बड़े पुरुषों का बड़ा भारी हृदय भी स्त्रियों के द्वारा भेदन किया जा सकता है ।।174।।
“These rivers, the Ganga and the Sindhu, filled with their flowing waters and adorned with the essence of beauty, carve through the very heart-like banks of this mountain. As they move along, their waves, stirred by the wind, reach out like gentle hands, caressing the slopes again and again. And rightly so, for even the vast and mighty hearts of great men can be pierced by the delicate touch of women.”
श्लोक ( Shlok ) 175
सानूनस्य द्रुतमुपयान्ती घनसारात् सारासारा जलदघटेयं समसारान् । तारातारा धरणिधरस्य स्वरसारा साराद् व्यक्तिं मुहुरुपयाति स्तनितेन ॥१७५॥
जिसकी जल-वर्षा बहुत ही उत्कृष्ट है, जो मुक्ताफल अथवा नक्षत्रों के समान अतिशय निर्मल है और जिसकी गर्जना भी उत्कृष्ट है ऐसी यह मेघों की घटा, अधिक मजबूत तथा जिसके सब स्थिर अंश समान हैं ऐसे इस विजयार्ध पर्वत के शिखरों के समीप यद्यपि बार-बार और शीघ्र-शीघ्र आती है तथापि गर्जना के द्वारा ही प्रकट होती है । भावार्थ―इस विजयार्ध पर्वत के सफेद शिखरों के समीप छाये हुए सफेद-सफेद बादल जब तक गरजते नहीं हैं तब तक दृष्टिगोचर नहीं होते ।।175।।
“The dense cluster of clouds, whose rainfall is exceptionally pure, whose droplets resemble pearls or shining stars, and whose thunder is magnificent, gathers repeatedly near the peaks of this mighty Vijayardha mountain. Though these clouds swiftly form and dissolve near its firm and uniform slopes, they remain unseen until they announce their presence through their roaring thunder.
(Interpretation) – The white clouds hovering over the bright, white peaks of the Vijayardha mountain remain invisible until they thunder, revealing their presence.”
श्लोक ( Shlok ) 176
सारासारा सारसमाला सरसीयं सारं कूजत्यत्र वनान्ते सुरकान्ते । सारासारा नीरदमाला नभसीयं तारं मन्द्रं” निस्वनतीतः स्वनसारा ॥१७६॥
इधर देवों से मनोहर वन के मध्यभाग में तालाब के बीच इधर-उधर श्रेष्ठ गमन करने वाली यह सारस पक्षियों की पंक्ति उच्च स्वर से शब्द कर रही है और इधर आकाश में जोर से बरसती और शब्द करती हुई यह मेघों की माला उच्च और गंभीर स्वर से गरज रही है ।।176।।
“Here, in the enchanting forest beloved by the gods, a flock of cranes moves gracefully across the lake, calling out in high-pitched tones. Meanwhile, in the sky above, a dense cluster of clouds pours down rain and thunders loudly, resonating with a deep and powerful roar.”
श्लोक ( Shlok ) 177
श्रित्वास्थाद्रेः सारमणीद्धं तटभागं सारं तारं चारुतरागं रमणीयम् । संभोगान्ते गायति कान्तं रमयन्ती सा रन्तारं चारुतरागं रमणीयम् ॥१७७॥
रमण करने के योग्य, श्रेष्ठ निर्मल और सुंदर शरीर वाले अपने पति को प्रसन्न करने वाली कोई स्त्री संभोग के बाद इस पर्वत के श्रेष्ठमणियों से दैदीप्यमान तटभाग पर बैठकर जिसके अवांतर अंग अतिशय सुंदर हैं, जो श्रेष्ठ है, ऊँचे स्वर से सहित है और बहुत मनोहर है ऐसा गाना गा रही है ।।177।।
“A woman, possessing a pure and beautiful form, delighting her beloved, and worthy of enjoyment, sits upon the radiant shores of this mountain, illuminated by its finest jewels. After their union, she sings a song—sublime, melodious, and enchanting—her inner beauty shining as brilliantly as her voice resounds in the air.”
श्लोक ( Shlok ) 178
इह खचरवधूनितम्बदेशे ललितलतालयसंश्रिताः सहेशाः। प्रणयपरवशाः समिद्धदीप्तीर्हिंयमुपयान्ति विलोक्य सिद्धनार्यः ॥१७८॥
इधर इस पर्वत के मध्यभाग पर सुंदर लतागृह में बैठी हुई पतिसहित प्रेम के परवश और दैदीप्यमान कांति की धारक विद्याधरियों को देखकर जाति के देवों की स्त्रियां लज्जित हो रही हैं ।।178।।
“Here, in the midst of this mountain, seated within the beautiful vine-covered pavilions, the radiant and love-struck Vidyadhari women, lost in passion alongside their beloved, shine with an enchanting glow. Seeing them, the celestial women of their kind feel a sense of shyness and admiration.”
श्लोक ( Shlok ) 179
श्रीमानयं नृसुरखेचरचारणानां सेव्यो जगत्त्रय गुरुर्विंधु वीध्रकीर्तिः । तुङ्गः शुचिर्भरतसंश्रित पादमूलः पायाद युवां पुरुरिवानवमो महीध्रः ॥१७९॥
यह विजयार्ध पर्वत भी वृषभ जिनेंद्र के समान है क्योंकि जिस प्रकार वृषभजिनेंद्र श्रीमान् अर्थात् अंतरंग और बहिरंग लक्ष्मी से सहित हैं उसी प्रकार यह पर्वत भी श्रीमान् अर्थात् शोभा से सहित है । जिस प्रकार वृषभजिनेंद्र मनुष्य देव विद्याधर और चारण ऋद्धिधारी मुनियों के द्वारा सेवनीय हैं उसी प्रकार यह पर्वत भी उनके द्वारा सेवनीय है अर्थात् वे सभी इस पर्वत पर विहार करते हैं । वृषभजिनेंद्र जिस प्रकार तीनों जगत् के गुरु हैं उसी प्रकार यह पर्वत भी तीनों जगत् में गुरु अर्थात् श्रेष्ठ है । जिस प्रकार वृषभजिनेंद्र चंद्रमा के समान उज्ज्वल कीर्ति के धारक हैं उसी प्रकार यह पर्वत भी चंद्र-तुल्य उज्ज्वल कीर्ति का धारक है, वृषभजिनेंद्र जिस प्रकार तुंग अर्थात् उदार हैं उसी प्रकार यह पर्वत भी तुंग अर्थात् ऊँचा है, वृषभजिनेंद्र जिस प्रकार शुचि अर्थात् पवित्र हैं उसी प्रकार यह पर्वत भी शुचि अर्थात् शुक्ल है तथा जिस प्रकार वृषभजिनेंद्र के पादमूल अर्थात् चरणकमल भरत चक्रवर्ती के द्वारा आश्रित हैं उसी प्रकार इस पर्वत के पादमूल अर्थात् नीचे के भाग भी दिग्विजय के समय गुफा में प्रवेश करने के लिए भरत चक्रवर्ती के द्वारा आश्रित हैं अथवा इसके पादमूल भरत क्षेत्र में स्थित हैं । इस प्रकार भगवान वृषभजिनेंद्र के समान अतिशय, उत्कृष्ट यह विजयार्ध पर्वत तुम दोनों की रक्षा करे ।।179।।
“This Vijayardha Mountain is indeed comparable to Lord Vrishabh Jinendra. Just as Vrishabh Jinendra is endowed with both inner and outer prosperity, this mountain too is graced with immense beauty and grandeur. Just as Vrishabh Jinendra is revered by humans, gods, Vidyadharas, and ascetic sages possessing miraculous powers, so too is this mountain a place of pilgrimage and residence for them.
Vrishabh Jinendra, as the supreme teacher of the three worlds, holds an exalted status, and similarly, this mountain is esteemed as the greatest among all. Just as Vrishabh Jinendra’s glory radiates like the moon, this mountain too shines with moon-like brilliance. He is lofty in virtue, and this mountain is equally towering in height. He is pure and sacred, and so is this mountain, gleaming in pristine whiteness.
Furthermore, just as the feet of Lord Vrishabh Jinendra were venerated by Emperor Bharata, who sought refuge in him, so too has this mountain’s base served as a sanctuary for Bharata Chakravarti during his conquests. Or rather, its very foundation rests within Bharata Kshetra.
May this supremely excellent and magnificent Vijayardha Mountain, akin to the divine Lord Vrishabh Jinendra, protect you both!”
श्लोक ( Shlok ) 180
इत्थं गिरः फणिपतौ सनयं ब्रुवाणे तो तं गिरीन्द्रमभिनन्द्य कृतावतारौ । प्राविक्षतां सममनेन पुरं पराद्धर्यमुत्तुङ्ग केतुरथ नूपुरचक्रवालम् ॥ १८० ॥
इस प्रकार युक्तिसहित धरणेंद्र के वचन कहने पर उन दोनों राजकुमारों ने भी उस गिरिराज की प्रशंसा की और फिर उस धरणेंद्र के साथ-साथ नीचे उतरकर अतिशय-श्रेष्ठ और ऊंची-ऊंची ध्वजाओं से सुशोभित रथनूपुरचक्रवाल नाम के नगर में प्रवेश किया ।।180।।
“In this way, after Dharanendra spoke these words with logical reasoning, both princes also praised that majestic mountain. Then, along with Dharanendra, they descended and entered the exceedingly magnificent city named Rathanupurachakravala, which was adorned with lofty and splendid banners.”
श्लोक ( Shlok ) 181
तत्राधिरोप्य परिविष्टरमीशितारौ युष्माकमित्यभि दधत्खचरान्समस्तान् । राज्याभिषेकमनयोः प्रचकार धीरो विद्याधरीकरधृतैः पृथुहेमकुम्भैः ॥१८१॥
धरणेंद्र ने वहां दोनों को सिंहासन पर बैठाकर सब विद्याधरों से कहा कि ये तुम्हारे स्वामी हैं और फिर उस धीर-वीर धरणेंद्र ने विद्याधरियों के हाथों से उठाये हुए सुवर्ण के बड़े-बड़े कलशों से इन दोनों का राज्याभिषेक किया ।।181।।
“Dharanendra seated both of them on the throne and announced to all the Vidyadharas that they were their new rulers. Then, with great composure and valor, Dharanendra performed their coronation using large golden urns carried by the Vidyadharis.”
श्लोक 182 से 192
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आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171