आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130
श्लोक 131 से 141 : वृषभाचल का दर्शन
वृषभाचल सौ योजन ऊँचा, स्फटिक मणियों से सुशोभित, और देवों-विद्याधरों का निवास था। भरत ने इसे अपने यश का प्रतिबिंब माना। वन का वायु उनका स्वागत करता था। उन्होंने विद्याधरों और किन्नरों के यश-गीत सुने। वृषभाचल की स्फटिक दीवारें विजयलक्ष्मी का दर्पण सी थीं। भरत ने वहाँ असंख्य चक्रवर्तियों के नाम देखे, जिससे उनका अभिमान नष्ट हुआ और संसार को स्वार्थपरायण समझा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 131 to 141
श्लोक ( Shlok ) 131 –135
यो योजनशतोच्छ्रायो मूले तावच्च विस्तृतः । तदर्द्धविस्तृतिर्मूरध्नि भुवो मौलिरिवोद्गतः ॥१३१॥यस्योत्संगभुवो रम्याः कदली षण्डमण्डितैः । सम्भोगाय नभोगानां कल्पन्ते स्म लतालयेः ॥१३२॥सनागम सनागैश्च सपुन्नागैः परिष्कृतम् । ‘तदुपान्ते वनं सेव्यं मुच्यते जातु नामरैः ॥१३३॥स्वतट स्फटिकोत्सर्प त्प्र भादिग्धहरिन्मुखम् । शरदभ्रैरिवारब्धव्युषं सनभोजुषम् ॥१३४॥तं शैलं भुवनस्यैकं ललामेव निरूपयन्। कलयामास लक्ष्मीवान् स्वयशः प्रतिमानकम् ॥१३५॥
जो सौ योजन ऊँचा है, मूल तथा ऊपर क्रमसे सौ और पचास योजन चौड़ा है एवं ऊपर की ओर उठा हुआ होनेसे पृथिवीके मस्तकके समान जान पड़ता है। जिसके ऊपरके गनोहर प्रदेश केलोंके समूहसे सुशोभित लतागृहोंसे आकाशगामी देव तथा विद्याधरोंके उपभोग करने योग्य हैं, नाग सहजना और नागकेशरके वृक्षोंसे घिरे हुए तथा सेवन करने योग्य जिस पर्वत के समीपके वनों को देव लोग कभी नहीं छोड़ते हैं। अपने तटपर लगे हुए स्फटिक मणियोंकी फैलती हुई प्रभासे जिसने समस्त दिशाएँ व्याप्त कर ली हैं, जिसका शरीर शरऋतुके बादलों से बना हुआ-सा जान पड़ता है और जो सदा देव तथा विद्याधरोंसे सहित रहता है, ऐसे उस पर्वतको लोकके एक आभूषणके समान देखते हुए श्रीमान् भरतने अपने यशका प्रतिविम्व माना था ।।१३१-१३५॥
“Rising to a height of a hundred yojanas, and with its base and summit stretching a hundred and fifty yojanas in width, this mountain ascends so majestically that it appears to be the very crown of the earth. Its lofty regions, adorned with clusters of bananas and surrounded by bower-houses, are fit for the enjoyment of celestial beings and Vidyādharas. It is encircled by trees of Nāga-sajna and Nāga-kesara, and its adjacent forests, which the gods never abandon, are enriched by the radiance of crystals scattered across its shores, illuminating all directions. Its form seems to have been sculpted from the clouds of the Sharā season, and it is ever accompanied by gods and Vidyādharas. Thus, viewing this mountain as an ornament of the world, the illustrious Bharat considered it a reflection of his own glory.” (131–135)
श्लोक ( Shlok ) 136
तमेकपाण्डुरं” शैलमा कल्पान्तमनश्वरम् । स्वयशोराशिनीकाशं पश्यन्नभिननन्दः सः ॥१३६॥
जो एक सफेद रंगका है और जो कल्पान्त काल तक कभी नष्ट नहीं होता ऐसे उस वृषभाचलको अपने यशकी राशिके समान देखते हुए महाराज भरत बहुत ही आनन्दित हुए थे ।। १३६।।
“Beholding the white-hued Vṛṣabhācala, which endures undiminished until the end of time, and considering it akin to the repository of his own glory, King Bharat was filled with immense joy.” (136)
श्लोक ( Shlok ) 137
सोऽचलः प्रभुमायान्तं मायान्तमखिलद्विषाम् । प्रत्यग्रहीदिवाभ्येत्य “विष्वद्रयग्भिर्वनानिलैः ॥१३७॥
उस समय वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो समस्त शत्रुओं की मायाको नष्ट करनेवाले चक्रवर्ती भरतको अपने समीप आता हुआ जानकर चारों ओर बहनेवाले वनके वायुके द्वारा सामने जाकर उनका स्वागत सत्कार ही कर रहा हो ॥१३७।।
“At that moment, the mountain seemed as though, sensing the approach of Emperor Bharat—the destroyer of all enemies’ illusions—it had sent forth the forest winds flowing on every side to advance and offer him a gracious welcome.” (137)
श्लोक ( Shlok ) 138
तत्तटोपान्तविश्रान्तखचरोरगकिन्नरैः । प्रोद्गीयमानममलं शुश्रुवे स्वयशोऽमुना ॥१३८ ।।
वहांपर भरतने उस पर्वतके किनारे के समीप विश्राम करते हुए विद्याधर नागकुमार और किन्नर देवों के द्वारा गाया हुआ अपना निर्मल यश भी सुना था ।।१३८ ।।
“There, near the slope of that mountain, Bharat heard his own spotless glory being sung by the Vidyādharas, Nāga princes, and celestial Kinnaras as they rested in its tranquil environs.” (138)
श्लोक ( Shlok ) 139
जयलक्ष्मीमुखालोक मंगलादर्श विभ्रमाः । तत्तटीभित्तयो जहुर्मनोऽस्य स्फटिका मलाः ॥१३९।।
स्फटिकके समान निर्मल और विजयलक्ष्मीके मुख देखने के लिये मंगलमय दर्पणके समान उस वृषभाचलके किनारे की दीवाले भरतका मन हरण कर रही थीं ।॥ १३९।।
“Like crystal in its clarity, the wall upon the edge of Mount Vrishabha shone resplendent—like an auspicious mirror fashioned to behold the radiant face of Vijayalakshmi. Its divine beauty stole away the heart of Bharata.” ॥139॥
श्लोक ( Shlok ) 140
अधिमेखलमस्यासीच्छिलाभित्तिषु चक्रिणः । स्वनामाक्षरविन्यासे धृति र्विश्वक्षमाजितः ॥१४०॥
समस्त पृथिवीको जीतनेवाले चक्रवर्ती भरतको उस पर्वतके किनारेकी शिलाकी दीवालोंपर अपने नामके अक्षर लिखने में बहुत कुछ संतोष हुआ था ।।१४०।।
“To Bharata, the universal emperor who had conquered the entire earth, it brought deep satisfaction to inscribe the letters of his name upon the rocky walls that graced the edge of that sacred mountain.” ॥140॥
श्लोक ( Shlok ) 141
काकिणीरलमादाय यदा लिलिखिषत्ययम् । तदा राजसहस्राणां नामान्यत्रैक्षताधिरायट् ॥१४१॥
चक्रवर्ती भरतने काकिणी रत्न लेकर ज्योंही वहाँ कुछ लिखनेकी इच्छा की त्योंही उन्होंने वहाँ लिखे हुए हजारों चक्रवर्ती राजाओंके नाम देखे ॥ १४१।।
“No sooner had the emperor Bharata, bearing the gem-like stylus of Kākiṇī, resolved to inscribe his will upon the stone, than he beheld the names of thousands of sovereign emperors already etched upon those ancient walls.” ॥141॥
श्लोक 142 से 154
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130
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