आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
श्लोक 112 से 121 वृषभदेव का उपदेश
वृषभदेव राजकुमारों को समझाते हैं कि अभिमानी और बलवान होने के बावजूद उन्हें दूसरों के सेवक नहीं बनना चाहिए। वे कहते हैं कि विनाशी राज्य, चंचल जीवन, और यौवन का उन्माद व्यर्थ है। सेनाएं, धन, और विषय भोग तृष्णा को बढ़ाते हैं और तृप्ति नहीं देते। वे कहते हैं कि भाइयों ने सभी विषयों का आस्वादन किया, फिर भी संतोष नहीं मिला। वृषभदेव सलाह देते हैं कि जब तक पुण्य का उदय है, भरत को राज्य करने देना चाहिए और इस अस्थिर राज्य के लिए व्यर्थ विवाद नहीं करना चाहिए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
मानखण्डनसम्भूतपरिभूति भयातिगाः । योगिनः सुखमेधन्ते वनेषु हरिभिः समम् ॥११२॥
मानभङ्गसे उत्पन्न हुए तिरस्कार के भयसे दूर रहनेवाले योगी लोग वनों में सिहोंके साथ सुखसे बढ़ते रहते हैं ।। ११२॥
The yogis, who keep far from the fear of disdain born of dishonor, dwell joyfully in the forests, thriving in peace amidst the lions.112
श्लोक ( Shlok ) 113
ब्रुवाणानिति साक्षेपं स्थापयन्पथि शाश्वते । भगवानिति तानुच्चैरन्वशादनुशासिता ॥११३॥
इस प्रकार आक्षेपसहित कहते हुए राजकुमारों को अविनाशी मोक्षमार्गमें स्थित करते हुए हितोपदेशी भगवान् वृषभदेव इस प्रकार उपदेश देने लगे ।।११३।।
Thus, offering words laced with pointed counsel and guiding the princes upon the eternal path of liberation, the benevolent Lord Ṛṣabhadeva began to impart his sacred instruction.113
श्लोक ( Shlok ) 114
महामना वपुष्मन्तो वयस्सत्त्वगुणान्विताः । कथमन्यस्य संवाह्या यूयं भद्रा द्विपा इव ।११४।।
महा अभिमानी और उत्तम शरीरको धारण करनेवाले तथा तारुण्य अवस्था, बल और गुणोंसे सहित तुम लोग उत्तम हाथियोंके समान दूसरोंके संवाहय अर्थात् सेवक (पक्ष में वाहन करने योग्य सवारी) कैसे हो सकते हो ? ।।११४।॥
Endowed with noble forms, radiant youth, strength, and virtues, and bearing great pride, how can you—like majestic elephants—become mere bearers for others, fit to serve as steeds in the train of men?114
श्लोक ( Shlok ) 115
भङ्गिना किमु राज्येन जीवितेन चलेन किम् । किञ्च भो यौवनोन्मादैरैश्वर्यबलदूषितैः ॥११५॥
हे पुत्रो, इस विनाशी राज्यसे क्या हो सकता है ? इस चंचल जीवनसे क्या हो सकता है ? और ऐश्वर्य तथा बलसे दूषित हुए इस यौवनके उन्मादसे क्या हो सकता है ? ॥ ११५।।
O sons, what worth lies in this perishable kingdom? What lasting gain is found in this fleeting life? And what can come of the delusion born of youth, tainted by wealth and power?115
श्लोक ( Shlok ) 116
कि बलैर्बलिनां गम्यै कि “हार्येंर्वस्तुवाहनैः । तृष्णाग्निबोधनैरेभिः कि धनैरिन्धनैरिव ॥११६॥
जो बलवान् मनुष्योंके द्वारा जीती जा सकती है ऐसी सेनाओंसे क्या प्रयोजन है? जिनकी चोरी की जा सकती है ऐसे सोना चाँदी हाथी घोड़ा आदि पदार्थोंसे क्या प्रयोजन है ? और ईधनके समान तृष्णारूपी अग्निको प्रज्वलित करनेवाले इस धनसे भी क्या प्रयोजन है ? ॥११६।।
What purpose do armies serve, when they may be vanquished by mightier men? What worth is there in gold, silver, elephants, or horses—treasures that may be stolen? And of what use is wealth, which but fuels the fire of craving, like ghee poured into a blazing flame?116
श्लोक ( Shlok ) 117
भुक्त्वापि सुचिरं कालं यैर्न तृप्तिः क्लमः परम् । विषयैस्तैरलं भुक्तैर्विषमिश्रैरिवाशनैः ॥११७॥
चिरकाल तक भोग कर भी जिनसे तृप्ति नहीं होती, उल्टा अत्यन्त परिश्रम ही होता है ऐसे विष मिले हुए भोजन के समान इन विषयोंका उपभोग करना व्यर्थ है ।। ११७।।
The enjoyment of sense-objects is in vain—for even after long indulgence, they bring no true satisfaction, but only ceaseless toil. Like food laced with poison, they deceive the soul while draining its strength.117
श्लोक ( Shlok ) 118
किं च भो विषयास्वादः कोऽप्यनास्वादितोऽस्ति वः । स एव पुनरास्वादः किं तेनास्त्याशितम्भवः ॥११८॥
हे पुत्रो, तुमने जिसका कभी आस्वादन नहीं किया हो ऐसा भी क्या कोई विषय बाकी है ? यह सब विषयोंका वही आस्वाद है जिसका कि तुम अनेक बार आस्वादन (अनुभव) कर चुके हो फिर भला तुम्हें इनसे संतोष कैसे हो सकता है ? ॥११८॥
O sons, is there any sense-pleasure left that you have not already tasted? All these are but the same flavors of experience, which you have partaken of countless times. How, then, can such worn-out enjoyments ever bring you contentment?118
श्लोक ( Shlok ) 119
यत्र शस्त्राणि मित्राणि शत्रवः पुत्रबान्धवाः। कलत्रं सर्वभोगीणा धरा राज्यं धिगीदृशम् ॥११९॥
जिसमें शस्त्र मित्र हो जाते हैं, पुत्र और भाई वगैरह शत्रु हो जाते हैं तथा सबके भोगने योग्य पृथिवी ही स्त्री हो जाती है ऐसे राज्यको धिक्कार हो ।।११९।।
Fie upon such a kingdom—where weapons become friends, sons and brothers turn into foes, and the very Earth, meant for all to share, is claimed and possessed as a woman to be enjoyed.119
श्लोक ( Shlok ) 120
भुनक्तु नृपशार्दूलो भरतो भरतावनिम् । यावत्पुण्योदयस्तावत्तत्रालं वोऽतितिक्षया ॥१२०॥
जब तक पुण्यका उदय है तब तक राजाओंमें श्रेष्ठ भरत इस भरत क्षेत्रकी पृथिवीका पालन करें इस विषयमें तुम लोगों का क्रोध करना व्यर्थ है ।॥१२०॥
So long as the tide of merit rises, let Bharata—foremost among kings—rule over this land of Bhārata. In this matter, your anger is futile and without cause.120
श्लोक ( Shlok ) 121
तेनापि त्याज्यमेवेदं राज्यं भङ्गि यदा तदा । हेतोरशाश्वतस्यास्य युध्वध्वे वत किं मुधा ॥ १२१॥
यह विनश्वर राज्य भरतके द्वारा भी जब कभी छोड़ा ही जावेगा इसलिये इस अस्थिर राज्यके लिये तुम लोग व्यर्थ ही क्यों लड़ते हो ।।१२१॥
his perishable kingdom shall one day be relinquished even by Bharata himself; why then do you contend in vain for the sake of such a fleeting dominion?121
श्लोक 122 से 131
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
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