आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 पर्वत का माहात्म्य
पर्वत जिनेंद्र से अचल और शुद्ध था। वह दो गुफाओं से शोभायमान था। नौ कूट मुकुट से थे। वह पचास योजन चौड़ा और पचीस योजन ऊँचा था। रत्न पाषाण गरम थे। सिंह और कोयल शब्दायमान थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
अक्षरत्वादभेद्यत्वादलङ्घ्यत्वान्महोन्नतेः । गुरुत्वाच्च जगद्धातुरा तन्वानमनुक्रियाम् ॥१७२॥
अथवा वह पर्वत जगत् के विधातात्मा जिनेंद्रदेव का अनुकरण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार जिनेंद्रदेव अक्षर अर्थात् विनाशरहित हैं उसी प्रकार वह पर्वत भी प्रलय आदि के न पड़ने से विनाशरहित था, जिस प्रकार जिनेंद्रदेव अभेद्य हैं उसी प्रकार वह पर्वत भी अभेद्य था अर्थात् वज्र आदि से उसका भेदन नहीं हो सकता था, जिनेंद्रदेव जिस प्रकार अलंघ्य हैं अर्थात् उनके सिद्धांतों का कोई खंडन नहीं कर सकता उसी प्रकार वह पर्वत भी अलंघ्य अर्थात् लाँघने के अयोग्य था, जिनेंद्रदेव जिस प्रकार महोन्नत अर्थात् अत्यंत श्रेष्ठ हैं उसी प्रकार वह पर्वत भी महोन्नत अर्थात् अत्यंत ऊंचा था ओर जिनेंद्रदेव जिस प्रकार जगत् के गुरु है उसी प्रकार वह पर्वत भी गुरु अर्थात् श्रेष्ठ अथवा भारी था ।।172।।
Or perhaps that mountain was imitating the divine qualities of Lord Jinedra, the creator and sustainer of the universe. Just as Lord Jinedra is akshara (imperishable), so too was the mountain, remaining undestroyed even during cosmic dissolution. Just as Lord Jinedra is abhedya (indestructible), the mountain was also unbreakable, unaffected by weapons like the thunderbolt. Just as Lord Jinedra is alanghya (unconquerable), with principles that cannot be refuted, the mountain too was alanghya, impossible to cross. Just as Lord Jinedra is mahonatta (supremely exalted), the mountain too was mahonatta, towering in height. And just as Lord Jinedra is the spiritual teacher of the world, the mountain too was guru, meaning both grand and revered. ॥172॥
श्लोक ( Shlok ) 173
‘दिग्जयप्रसवागारं दधानं तद् गुहाद्वयम् । सुसंवृतं सुगुप्तं च गूढान्तर्गर्भनिर्गमम् ॥१७३॥
वह विजयार्ध, चक्रवर्त्ती के दिग्विजय करने के लिए प्रसूतिगृह के समान दो गुफाएँ धारण करता था क्योंकि जिस प्रकार प्रसूतिगृह ढका हुआ और सुरक्षित होता है उसी प्रकार वे गुफाएँ भी ढकी हुई और देवों द्वारा सुरक्षित थीं तथा जिस प्रकार प्रसूतिगृह के भीतर का मार्ग छिपा हुआ होता है उसी प्रकार उन गुफाओं के भीतर जाने का मार्ग भी छिपा हुआ था ।।173।।
That mountain, Vijayardha, bore two caves that served as a prasutigriha (birth chamber) for the universal emperor’s conquest of the directions. Just as a prasutigriha is enclosed and well-protected, these caves were also covered and safeguarded by the gods. And just as the inner passage of a prasutigriha remains hidden, the entrance to these caves was also concealed. ॥173॥
श्लोक ( Shlok ) 174
कूटैर्नवभिरुत्तुङ्गै र्भूदेव्या मकुटोपमैः । विराजमानमानीलवनालीपरिधान कम् ॥ १७४॥
वह पर्वत ऊँचे-ऊंचे नौ कूटों से शोभायमान था जो कि पृथिवी देवी के मुकुट के समान जान पड़ते थे और उसके चारों ओर जो हरे-हरे वनों की पंक्तियाँ शोभायमान थीं वे उस पर्वत के नील वस्त्रों के समान मालूम होती थीं ।।174।।
That mountain was adorned with nine towering peaks, which appeared like the crown of Goddess Earth. Surrounding it were rows of lush green forests that seemed like the mountain’s deep blue garments. ॥174॥
श्लोक ( Shlok ) 175
पृथुं पञ्चाशतं मूले तदर्थ व समुच्छ्रितम् । ततुर्यमवगाढं गां दिव्ययोजनमानतः ॥१७५॥
वह बड़े योजन के प्रमाण से मूल भाग में पचास योजन चौड़ा था, पचीस योजन ऊँचा था और उससे चौथाई अर्थात् छह सौ पचीस सही एक बटा चार योजन पृथ्वी के नीचे गड़ा हुआ था ।।175।।
That great mountain had a base width of fifty yojanas and a height of twenty-five yojanas. Additionally, one-fourth of its height, that is, six hundred twenty-five and one-fourth yojanas, was embedded beneath the earth. ॥175॥
श्लोक ( Shlok ) 176
सहीतलाद्दशोत्पत्य त्रिंशद्योजनविस्तृतम् । ततोऽप्यूर्ध्वं दशोत्पत्य दशविस्तृतमग्रतः ॥ १७६॥
पृथ्वीतल से दस योजन ऊपर जाकर वह तीस योजन चौड़ा था और उससे भी दस योजन ऊपर जाकर अग्रभाग में सिर्फ दस योजन चौड़ा रह गया था ।।176।।
Rising ten yojanas above the earth’s surface, the mountain had a width of thirty yojanas. Another ten yojanas higher, its uppermost part narrowed down to just ten yojanas in width. ॥176॥
श्लोक ( Shlok ) 177
क्वचिदुन्नतमानिम्नं क्वचित् समतलं क्वचित् । क्वचिदुच्चावचग्रावस्थपुटं दधतं तटम् ॥१७७॥
इसका किनारा कहीं ऊँचा था, कहीं नीचा था, कहीं सम था और कहीं ऊँचे-नीचे पत्थरों से विषम था ।।177।।
Its edges varied in form—some parts were high, some low, some even, and some rugged with uneven rocks. ॥177॥
श्लोक ( Shlok ) 178
क्वचिद् ब्रध्नकरोतप्तरत्नग्रावाग्रगोचरात् । अपसर्पत् कपिव्रातकृतकोलाहलाकुलम् ॥१७८॥
कहीं-कहीं उस पर्वत पर लगे हुए रत्नमयी पाषाण सूर्य की किरणों से बहुत ही गरम हो गये थे इसलिए उसके आगे के प्रदेश से वानरों के समूह हट रहे थे जिससे वह पर्वत उन वानरों द्वारा किये हुए कोलाहल से आकुल हो रहा था ।।178।।
In some places, the gemstone-laden rocks of the mountain became intensely heated by the sun’s rays. As a result, groups of monkeys retreated from those areas, filling the mountain with the clamor of their restless cries. ॥178॥
श्लोक ( Shlok ) 179
क्वचित् कण्ठीरवारावत्रस्तानेकपयूथपम् । कलकण्ठी कलालापवाचालितवनं क्वचित् ॥ १७९॥
उस पर्वत पर कहीं तो सिंहों के शब्दों से अनेक हाथियों के झुंड भयभीत हो रहे थे और कहीं कोयलों के मधुर शब्दों से वन वाचालित हो रहे थे ।।179।।
On that mountain, in some places, the roars of lions terrified herds of elephants, while in other areas, the sweet calls of cuckoos filled the forests with melodious sounds. ॥179॥
श्लोक ( Shlok ) 180
क्वचिच्छिखीमुखो द्गीर्णकेकारावविभीषितैः । सर्पै सत्रासमासृप्त कान्तारान्तबिलान्तरम् ॥१८०॥
कहीं मयूरों के मुख से निकली हुई केका वाणी से भयभीत हुए सर्प बड़े दुःख के साथ वनों के भीतर अपने-अपने बिलों में घुस रहे थे ।।180।।
In some places, the loud cries of peacocks frightened the snakes, causing them to retreat sorrowfully into their burrows deep within the forests. ॥180॥
श्लोक ( Shlok ) 181
चामीकरमय प्रस्थच्छाया संश्रयिणीर्मृगीः । हिरण्मयीरिवारूढ तच्छाया दधतं क्वचित् ॥१८१॥
कहीं उस पर्वत पर सुवर्णमय तटों की छाया में हरिणियाँ बैठी हुई थी उन पर उन सुवर्णमय तटों की कांति पड़ती थी जिससे वे हरिणियाँ सुवर्ण की बनी हुई-सी जान पड़ती थीं ।।181।।
In some places on that mountain, deer rested in the shade of golden-colored slopes. The radiant glow of those golden slopes fell upon them, making the deer appear as if they were made of gold. ॥181॥
श्लोक 182 से 191
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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