आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27
श्लोक 28 से 41 पर्वत पर चढ़ाई और शोभा
भरत पैदल कैलास पर चढ़े, बिना खेद के, क्योंकि धर्म कार्यों में कष्ट नहीं होता। मणिमयी सीढ़ियों से वे शिखर पर पहुँचे, जहाँ वन की शीतल वायु ने उनका स्वागत किया। उन्होंने मंदार वनों में देवियों, हरिणियों, अजगरों, और सिंहों को देखा। पुरोहित ने पर्वत की शोभा की प्रशंसा की, जिसमें नदियाँ, वन, और मुनियों जैसे प्रदेश थे, जो द्वंद्व सहते और कल्याण करते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 33 – Shlok 28 to 41
श्लोक ( Shlok ) 28
गिरेरधस्तले दूराद् वाहनादिपरिच्छदम् । विहाय पादचारेण ययौ किल स धर्मधीः ॥२८॥
धर्मबुद्धिको धारण करनेवाले महाराज भरत पर्वतके नीचे दूरसे ही सवारी आदि परिकर को छोड़कर पैदल चलने लगे ॥२८॥
Emperor Bharata, embodying the noble intellect of Dharma, left behind his mount and royal retinue at the base of the mountain and began to ascend on foot from a distance. ||28||
श्लोक ( Shlok ) 29
पद्भ्यामारोहतोऽस्याद्रि नासीत् खेदो मनागपि । हितार्थिनां हि खेदाय नात्मनीनः क्रियाविधिः ॥२ ९ ॥
पैदल ही पर्वतपर चढ़ते हुए भरतको थोड़ा भी खेद नहीं हुआ था सो ठीक ही है क्योंकि कल्याण चाहनेवाले पुरुषोंको आत्माका हित करनेवाली क्रियाओंका करना खेद के लिये नहीं होता है ॥ २९॥
As Bharata ascended the mountain on foot, he felt not the slightest sorrow—and rightly so, for actions that serve the welfare of the soul bring no grief to those who seek the highest good. ||29||
श्लोक ( Shlok ) 30
आरुरोह स तं शैलं सुरशिल्पिविनिर्मितैः । विविक्तैर्मणिसोपानैस्स्वर्गस्येवाधिरोहणैः ॥३०॥
स्वर्गकी सीढियोंके समान देवरूपी कारीगरोंके द्वारा बनाई हुई पवित्र मणिमयी सीढ़ियोंके द्वारा महाराज भरत उस कैलास पर्वतपर चढ़ रहे थे ॥३०॥
By means of sacred jewel-studded stairways, fashioned by celestial artisans and resembling the very steps to heaven, Emperor Bharata ascended the glorious Mount Kailāsa. ||30||
श्लोक ( Shlok ) 31
अधित्यकासु सोऽस्याद्रेः प्रस्थाय वनराजिषु । लम्भितो ऽतिथिसत्कारमिव शीतैर्वनानिलैः ॥३१॥
चढ़ते चढ़ते वे उस पर्वतके ऊपरकी भूमिपर जा पहुंचे और वहां उन्होंने वनकी पंक्तियोंमें वनकी शीतल वायु के द्वारा मानो अतिथिसत्कार ही प्राप्त किया था ॥३१॥
Ascending thus, he reached the summit of that sacred mountain, where amidst rows of forest groves, he seemed to receive a gracious welcome from the cool forest breeze itself—like the honored reception of a noble guest. ||31||
श्लोक ( Shlok ) 32
क्वचिदुत्फुल्लमन्दारवणवीथीविहारिणीः । विविक्त सुमनोभूषाः सोऽपश्यद्वनदेवताः ॥३२॥
वहां उन्होंने कहीं तो फूले हुए मन्दार वनकी गलियोंमें घूमती हुई तथा फूलोंके पवित्र आभूषण धारण किये हुई वनदेवियोंको देखा ।॥३२॥
There, in the blossom-laden alleys of the blooming Mandāra groves, he beheld forest nymphs adorned with sacred garlands of flowers, gracefully wandering amidst the woods. ||32||
श्लोक ( Shlok ) 33
क्वचिद्वनान्तसं सुप्तनिजशावानुशायिनीः । मृगीरपश्यदारब्ध मृदुरोमन्थमन्थराः ॥३३॥
कहीं वनके भीतर अपने बच्चोंके साथ लेटी हुई और धीरे धीरे रोमन्थ करती हुई हरिणियोंको देखा ॥३३॥
In another part of the forest, he saw doe lying with their young ones, gently stirring in quiet delight, as if caressed by the tender breeze. ||33||
श्लोक ( Shlok ) 34
क्वचिन्नि कुञ्चसंसुप्तान् बृहतः शधु पोतकान् । “पुरीतन्निकरानद्रेरिवापश्यत्स पुञ्जितान् ॥३४॥
कहीं लतागृहोंमें सोते हुए और एक जगह इकट्ठे हुए अजगरके उन बड़े बड़े बच्चोंको देखा जो कि उस पर्वतकी अंतड़ियोंके समूह के समान जान पड़ते थे ।॥३४।।
In another place, he saw the great offspring of serpents, coiled together in the vine-covered caves, their massive bodies resembling the very veins of the mountain itself. ||34||
श्लोक ( Shlok ) 35
क्वचिद् गजमदामोदवासितान् गण्डशैलकान् । ददृशे हरिरारोषाद् उल्लिखन्नखराङकुरैः ॥३५॥
और कहींपर हाथियोंके मदसे सुवासित बड़ी बड़ी काली चट्टानोंको हाथी समझकर नखरूपी अंकुरोंसे विदारण करता हुआ सिंह देखा ॥ ३५॥
And in another place, he beheld a lion, its claws tearing through the large, fragrant black stones, mistaking them for elephants intoxicated by the musk. ||35||
श्लोक ( Shlok ) 36
किञ्चिदन्तरमारुह्य पश्यन्नद्रेः परां श्रियम् । प्राप्तावसरमित्यूचे वचनं च पुरोधसा ॥३६॥
भरत महाराज कुछ दूर आगे चढ़कर जब पर्वतकी शोभा देखने लगे तब पुरोहितने अवसर पाकर नीचे लिये अनुसार वचन कहे ॥३६॥
As Emperor Bharata ascended a little further and began to behold the grandeur of the mountain, the priest, seizing the moment, spoke words in accordance with the occasion. ||36||
श्लोक ( Shlok ) 37
पश्य देव गिरेरस्य प्रदेशान्बु हुविस्मयान् । रमन्ते त्रिदशा यत्र स्वर्गावासेऽप्यनादराः ॥३७॥
हे देव, इस पर्वतके अनेक आश्चर्योंसे भरे हुए उन प्रदेशोंको देखिये जिन पर कि देव लोग भी स्वर्गवासमें अनादर करते हुए क्रीड़ा कर रहे हैं ।। ३७।।
“O Divine One,” the priest exclaimed, “behold the wondrous regions of this mountain, teeming with marvels, where even the gods, in their celestial abode, engage in sportive play with utter disregard.” ||37||
श्लोक ( Shlok ) 38
पर्याप्तमेतदेवास्य प्राभवं भुवनातिगम् । देवो यदेनमध्यास्ते चराचरगुरुः पुरुः ॥३८॥
समस्त लोकको उल्लंघन करनेवाली इस पर्वतकी महिमा इतनी ही बहुत है कि चर और अचर–सभीके गुरु भगवान् वृषभदेव इसपर विराजमान हैं ।। ३८।।
The glory of this mountain surpasses all realms, for upon it resides the Lord Ṛṣabhadeva, the Teacher of both the movable and immovable beings, who transcends all worlds. ||38||
श्लोक ( Shlok ) 39
महाद्रिरयमुत्सङ्गसङ्गिनीः सरिदङ्गनाः । शश्वद् विभर्ति कामीव गलन्नीलजलांशुकाः ॥३ ९ ॥
यह महापर्वत अपनी गोदी अर्थात् नीचले मध्यभागमें रहनेवाली और जिनके नीले जलरूपी वस्त्र छूट रहे हैं ऐसी नदीरूपी स्त्रियों को कामी पुरुष की तरह सदा धारण करता है ।। ३९।।
Like a passionate lover, this great mountain ever cradles in its lap—its deep, lower regions—the river-maidens, whose blue garment-like waters slip away as they flow. ||39||
श्लोक ( Shlok ) 40
क्रीडा हेतोरहिं’स्रोऽपि मृगेन्द्रो गिरिकन्दरात् । महाहिमयमाकर्षन्दैर्ध्यान्मुञ्चत्यपारयन् ॥४०॥
यह सिंह अहिंसक होनेपर भी केवल क्रीड़ा के लिये पर्वतकी गुफामेंसे एक बड़े भारी सर्पको खींच रहा है परन्तु लम्बा होनेसे खींचनेके लिये असमर्थ होता हुआ उसे छोड़ भी रहा है ॥४०।।
Though by nature harmless, this lion, merely for sport, is seen dragging a massive serpent from the mountain’s cavern; yet, finding it too long to draw forth, he releases it once more. ||40||
श्लोक ( Shlok ) 41
सर्वद्वन्द्व सहान्सार्वान् जनतातापहारिणः । मुनीनिव वनाभोगानेष धत्तेऽधिमेखलम् ॥४१॥
यह पर्वत अपने तटभागपर ऐसे अनेक वनके प्रदेशोंको धारण करता है जो कि ठीक मुनियोंके समान जान पड़ते हैं क्योंकि जिस प्रकार मुनि सब प्रकारके द्वन्द्व अर्थात् शीत उष्ण आदिकी बाधा सहन करते हैं उसी प्रकार वे वनके प्रदेश भी सब प्रकारके द्वन्द्व अर्थात् पशुपक्षियों आदिके युगल सहन करते हैं, धारण करते हैं, जिस प्रकार मुनि सबका कल्याण करते हैं उसी प्रकार वनके प्रदेश भी सवका कल्याण करते हैं और जिस प्रकार मुनि जनसमूहके संताप अर्थात् मानसिक व्यथाको दूर करते हैं उसी प्रकार वनके प्रदेश भी संताप अर्थात् सूर्यके घामसे उत्पन्न हुई गरमीको दूर करते हैं ॥४१।।
This mountain bears upon its slopes many forest regions that resemble sages in every way—for just as ascetics endure all dualities, such as heat and cold, so do these forests sustain the presence of beasts and birds in their natural pairs; just as sages work for the welfare of all, so too do these woods nurture all beings; and just as sages dispel the mental afflictions of the masses, so do these forest groves alleviate the torment of the sun’s blazing heat. ||41||
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27
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