आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 |
श्लोक 62 से 71 नगरों की अट्टालिकाएँ और गोपुर
परकोटे पर अट्टालिकाएँ तीस धनुष ऊँची थीं। ये सुवर्ण और मणियों से चित्रित थीं। दो अट्टालिकाओं के बीच गोपुर थे। गोपुर पचास धनुष ऊँचे थे। इनके बीच बुरज और देवपथ थे। नगरियाँ वस्त्रधारी स्त्रियों सी थीं। प्रत्येक नगरी में एक हजार चौक और बारह हजार गलियाँ थीं। पाँच सौ दरवाजे श्रेष्ठ थे। नगरियाँ नौ योजन चौड़ी और बारह योजन लंबी थीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
विष्कम्म चतुरस्राश्च तत्राट्टालकपङ् क्तयः । त्रिंशदर्ध च दण्डानां रुन्द्राश्च द्विगुणोच्छ्रिताः ॥६२॥
उस परकोटा पर अट्टालिकाओं की पंक्तियाँ बनी हुई हैं जो कि परकोटा की चौड़ाई के समान चौड़ी है, पंद्रह धनुष लंबी हैं और उससे दूनी अर्थात् तीस धनुष ऊँची है ।।62।।
Rows of mansions are built upon this outer wall, matching its width. These mansions are fifteen dhanush long and twice as high, measuring thirty dhanush in height. ॥62॥
श्लोक ( Shlok ) 63
त्रिंश द्दण्डान्तराश्चैता मणिहेमविचित्रिताः । उत्सेधसदशारोह सोपाना गगनस्पृशः ॥६३॥
ये अट्टालिकाएं तीस-तीस धनुष के अंतर से बनी हुई हैं, सुवर्ण और मणियों से चित्र-विचित्र हो रही हैं, इनकी ऊँचाई के अनुसार चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं और ये सभी अपनी ऊंचाई से आकाश को छू रही हैं ।।63।।
These mansions are built at intervals of thirty dhanush from each other and are exquisitely adorned with gold and gems. Stairs are constructed to ascend them according to their height, and with their towering structures, they seem to touch the sky. ॥63॥
श्लोक ( Shlok ) 64
द्वयोरट्टालयोर्मध्ये गोपुरं रत्नतोरणम् । पञ्चाशद्धनुरुत्सेधं तदर्धमपि विस्तृतम् ॥६४॥
दो-दो अट्टालिकाओं के बीच में एक-एक गोपुर बना हुआ है उस पर रत्नों के तोरण लगे हुए हैं । ये गोपुर पचास धनुष ऊँचे और पच्चीस धनुष चौड़े हैं ।।64।।
Between every two mansions, there stands a gateway (Gopura), adorned with bejewelled arches. These gateways rise to a height of fifty dhanush and have a width of twenty-five dhanush. ॥64॥
श्लोक ( Shlok ) 65
गोपुराट्टालयोर्मध्ये त्रिधा नुष्कावगाहनम् । इन्द्रकोशमभूत् सापि धानैर्युक्तं गवाक्षकैः ॥६५॥
गोपुर और अट्टालिकाओं के बीच में तीन-तीन धनुष विस्तार वाले इंद्र-कोश अर्थात् बुरज बने हुए हैं । बुरज किवाड़सहित झरोखों से युक्त हैं ।।65।।
Between the gateways (Gopuras) and mansions, there are watchtowers (Indra-Kosha), each extending three dhanush in width. These watchtowers are equipped with windows and doors. ॥65॥
श्लोक ( Shlok ) 66
तदन्तरेषु राजन्ते सुस्था देवपथा स्तथा । त्रिहस्तविस्तृताः पार्श्वे तच्चतुर्गुणमायताः ॥६६॥
उन बुरजों के बीच में अतिशय स्वच्छ देवपथ बने हुए हैं जो कि तीन हाथ चौड़े और बारह हाथ लंबे हैं ।।66।
Between these watchtowers, there are extremely clean divine pathways (Devapatha), which are three hands wide and twelve hands long. ॥66॥
श्लोक ( Shlok ) 67
इत्युक्तखातिकावप्रप्राकारैः परितो वृताः। विभासन्ते नगर्योऽमूः परिधा नैरिवाङ्गनाः ॥६७॥
इस प्रकार ऊपर कही हुई परिखा, कोट और परकोटा इनसे घिरी हुई वे नगरियाँ ऐसी सुशोभित होती हैं मानो वस्त्र पहने हुई स्त्रियाँ ही हों ।।67।।
Thus, surrounded by the moats, fortifications, and outer walls described above, these cities appear so magnificent, as if they were women adorned in exquisite garments. ॥67॥
श्लोक ( Shlok ) 68
चतुष्काणां सहस्रं स्याद् वीथ्यस्त द् द्वादशाहतम् । द्वाराण्येक सहस्रं तु महान्ति क्षुद्र काणि वै ॥६८॥
इन नगरियों में से प्रत्येक नगरी में एक हजार चौक हैं, बारह हजार गलियाँ हैं और छोटे-बड़े सब मिलाकर एक हजार दरवाजे हैं ।।68।।
Each of these cities contains one thousand squares (chowks), twelve thousand lanes, and a total of one thousand gates, including both large and small ones. ॥68॥
श्लोक ( Shlok ) 69
तदर्धं तद् द्विशत्यग्रिमाणि द्वाराणि तानि च । सकवाटानि राजन्ते नेत्राणीव पुरश्रिया ॥६९॥
इनमें से आधे अर्थात् पाँच सौ दरवाजे किवाड़सहित हैं और वे नगरी की शोभा के नेत्रों के समान सुशोभित होते हैं । इन पाँच सौ दरवाजों में भी दो सौ दरवाजे अत्यंत श्रेष्ठ हैं ।।69।।
Out of these one thousand gates, five hundred are equipped with doors, and they enhance the beauty of the city like radiant eyes. Among these five hundred gates, two hundred are considered exceptionally grand and magnificent. ॥69॥
श्लोक ( Shlok ) 70
पूर्वापरेण रुन्द्राः स्युर्योजनानि नवैव ताः । दक्षिणोत्तरतो दीर्घा द्वादश प्राङ्मुखं स्थिताः ॥७०॥
ये नगरियाँ पूर्व से पश्चिम तक नौ योजन चौड़ी हैं और दक्षिण से उत्तर तक बारह योजन लंबी है । इन सभी नगरियों का मुख पूर्व दिशा की ओर है ।।70।।
These cities span a width of nine yojanas from east to west and extend twelve yojanas from south to north. All these cities are oriented with their entrances facing the east. ॥70॥
श्लोक ( Shlok ) 71
राजगेहादिविस्तारमासां को नाम वर्णयेत् । ममापि नागराजस्य यत्र मोमुह्यते मतिः ॥७१॥
इन नगरियों के राजभवन आदि के विस्तार वगैरह का वर्णन कौन कर सकता है क्योंकि जिस विषय में मुझ धरणेंद्र की बुद्धि भी अतिशय मोह को प्राप्त होती है तब और की बात ही क्या है ? ।।71।।
Who can possibly describe the vastness of the royal palaces and other structures in these cities? Even my intellect, as Dharaṇendra, becomes utterly overwhelmed when contemplating them—what, then, can be said of others? ॥71॥
श्लोक 72 से 91
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 |