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श्लोक 73 से 81 : तप का प्रभाव
छह माह उपवास में उनका शरीर दैदीप्यमान रहा। आहार न लेने पर भी परिश्रम नहीं हुआ। उनके केश जटाएँ बन गए। जटाएँ कालिमा सी फैलीं। वन में उनकी कांति सूर्य सी थी। वृक्ष और लताएँ उनकी भक्ति करती थीं। फूल उनके चरणों में गिरते थे। हरिण शांतता दिखाते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 73 to 81
श्लोक ( Shlok ) 73
महानशनमस्यासीत् तपः षण्मासगोचरम् । शरीरो पचयस्त्विद्धः तथैवास्थादहो धृत्तिः ॥७३॥
यद्यपि भगवान् ने छह महीने का महोपवास तप किया था तथापि उनके शरीर का उपचय पहले की तरह ही दैदीप्यमान बना रहा था । इससे कहना पड़ता है कि उनकी धीरता बड़ी ही आश्चर्यजनक थी ।।73।।
Although the Lord had undertaken a great fast for six months, His body’s nourishment remained as radiant as before. This compels us to say that His perseverance was truly astonishing. ॥73॥
श्लोक ( Shlok ) 74
नानाशुषो ऽप्यभूद्भर्तुः स्वल्पोऽप्यङगे परिश्रमः। निर्माणातिशयः कोऽपि दिव्यः स हि महात्मनः ॥७४॥
यद्यपि भगवान् बिल्कुल ही आहार नहीं लेते थे तथापि उनके शरीर में रंचमात्र भी परिश्रम नहीं होता था । वास्तव में भगवान वृषभदेव की शरीररचना अथवा उनके निर्माण नामकर्म का ही यह कोई दिव्य अतिशय था ।।74।।
Although the Lord did not consume any food at all, there was not the slightest sign of fatigue in His body. In reality, this was a divine marvel of Lord Rishabha’s bodily composition or His Nirman Nama Karma. ॥74॥
श्लोक ( Shlok ) 75
संस्कारविरहात् केशा जटीभूतास्तदा विभोः । नूनं तेपि तपः क्लेशमनुसोढुं तथा स्थिताः ॥७५॥
उस समय भगवान के केश संस्काररहित होने के कारण जटाओं के समान हो गये थे और वे मालूम होते ने मानो तपस्या का क्लेश सहन करने के लिए ही वैसे कठोर हो गये हों ।।75।।
At that time, due to the absence of any grooming, the Lord’s hair had turned into matted locks, appearing as though they had become rugged solely to endure the hardships of penance. ॥75॥
श्लोक ( Shlok ) 76
मुनेर्मूर्ध्नि जटा दूरं प्रसस्त्रुः पवनोद्धताः । ध्यानाग्निनेव तप्तस्य जीवस्वर्णस्य कालिकाः ॥७६॥
जटाएं वायु से उड़कर महामुनि भगवान वृषभदेव के मस्तक पर दूर तक फैल गयी थीं, सो ऐसी जान पड़ती थीं मानो ध्यानरूपी अग्नि से तपाये हुए जीवरूपी स्वर्ण से निकली हुई कालिमा ही हो ।।76।।
The matted locks, blown by the wind, spread far across the head of the great sage, Lord Rishabha. They appeared as if they were the darkness emerging from the gold-like soul, purified by the fire of meditation. ॥76॥
श्लोक ( Shlok ) 77
तत्तपोऽतिशयात्तस्मिन् काननेऽभूत् परा द्युतिः । नक्तं दिवा च बालार्कतेजसेवाततान्तिके ॥७७॥
भगवान के तपश्चरण के अतिशय से उस विस्तृत वन में रात-दिन ऐसी उत्तम कांति रहती थी जैसी कि प्रातःकाल के सूर्य के तेज से होती है ।।77।।
Due to the intensity of the Lord’s austerities, the vast forest remained illuminated day and night with a divine radiance, akin to the brilliance of the morning sun. ॥77॥
श्लोक ( Shlok ) 78
शाखाः पुष्पफलानम्राः शाखिनां तत्र कानने । बभुर्भगवतः पादौ नमन्त्य इव भक्तितः ॥७८॥
उस वन में पुष्प और फल के भार से नम्र हुई वृक्ष की शाखाएँ ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो भक्ति से भगवान् के चरणों को नमस्कार ही कर रही हों ।।78।।
In that forest, the branches of the trees, bowed down by the weight of flowers and fruits, appeared so graceful as if they were offering obeisance at the feet of the Lord with devotion. ॥78॥
श्लोक ( Shlok ) 79
तस्मिन् वने वनलता भृङ्गसंगीतनिःस्वनैः । ‘उपवीणितमातेनुरिव भक्त्या जगद्गुरोः ॥७९॥
उस वन में लताओं पर बैठे हुए भ्रमर संगीत के समान मधुर शब्द कर रहे थे जिससे वे वनलताएं ऐसी मालूम होती थी मानो भक्तिपूर्वक वीणा बजाकर जगद्गुरु भगवान वृषभदेव का यशोगान ही कर रही हों ।।79।।
In that forest, the bees sitting on the creepers were producing sweet, melodious sounds, resembling music. It seemed as if those forest creepers were devoutly playing the veena and singing the glories of the universal teacher, Lord Rishabha. ॥79॥
श्लोक ( Shlok ) 80
पर्यन्तवर्तिनः क्ष्माजा गलद्भिः कुसुमैः स्वयम् । पुष्पोपहारमा तन्वन्निव भक्त्यास्य पादयोः ॥८०॥
भगवान के समीपवर्ती वृक्षों से जो अपने आप ही फूल गिर रहे थे उनसे वे वृक्ष ऐसे जान पड़ते थे मानो भक्तिपूर्वक भगवान् के चरणों में फूलों का उपहार ही विस्तृत कर रहे हों अर्थात् फूलों की भेंट ही चढ़ा रहे हों ।।80।।
The flowers that were spontaneously falling from the trees near the Lord made those trees appear as if they were devotedly offering a grand floral tribute at His feet, as a gesture of reverence and worship. ॥80॥
श्लोक ( Shlok ) 81
मृगशावाः पदोपान्तं स्वैरमध्यासिता मुनेः । तदाश्रमस्य शान्तत्वमाचख्युः सामिनिद्रिताः ॥८१॥
भगवान के चरणों के समीप ही अपनी इच्छानुसार कुछ-कुछ निद्रा लेते हुए जो हरिणों के बच्चे बैठे हुए थे वे उनके आश्रम की शांतता बतला रहे थे ।।81।।
The young deer, sitting near the Lord’s feet and resting peacefully at their will, reflected the tranquility of His hermitage. ॥81॥
श्लोक 82 से 92
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
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