आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 : गुफा से बाहर निकलना
भरत ने हाथियों के साथ जलमय मार्ग से कठिन रास्ता तय किया और गुफा के उत्तर द्वार पर पहुँचे। हाथी सेना ने द्वार खोला, और भरत विजयार्थ पर्वत के वन में प्रवेश किए। गुफा से बाहर निकलते सैनिकों को दूसरा जन्म सा अनुभव हुआ। गुफा मानो सेना को उगल रही थी। वन की शाखाएँ और वायु सेना को आश्वासन दे रहे थे। सेनापति ने पश्चिम म्लेच्छ खंड जीता, और भरत मध्यम म्लेच्छ खंड की ओर बढ़े।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
नायकैः सममन्येद्युः प्रभुर्गजघटावृतः । महापथेन तेनैव जलदुर्ग व्यलङ्घयत् ।।३२।।
दूसरे दिन हाथियोंके समूहसे घिरे हुए महाराज भरतने अनेक राजाओं के साथ साथ उसी जलमय महामार्गसे कठिन रास्ता तय किया ।। ३२ ।।
On the following day, King Bharata, surrounded by a host of elephants and accompanied by many monarchs, traversed that watery royal highway, pressing onward through the arduous path. ॥32॥
श्लोक ( Shlok ) 33
ततः कतिपयैरेव प्रयाणैरतिवाहितैः । गिरिदुर्ग विलंघ्योदग्गुहाद्वा रमवासदत् ॥३३॥
तदनन्तर कितने ही मुकाम चलकर और उस पर्वतरूपी दुर्ग (कठिन मार्ग) को उल्लंघन कर वे उस गुफाके उत्तर द्वारपर जा पहुँचे ।। ३३॥
Thereafter, having marched through many halting places and surmounted that mountain-like fortress of a perilous path, they arrived at the northern gate of the cave. ॥33॥
श्लोक ( Shlok ) 34
निरर्गलीकृतं द्वारं ‘पौरस्त्यैरिभसाधनैः । व्यतीत्य प्रभुरस्याद्रेरध्युवास वनावनिम् ॥३४॥
आगे चलनेवाली हाथियोंकी सेनाके द्वारा उघाड़े हुए उत्तर द्वारको उल्लंघन कर चक्रवर्तीने विजयार्ध पर्वतके वनकी भूमिमें निवास किया ॥ ३४।।
Crossing the northern gate that had been forced open by the vanguard of elephants, the Emperor took up his abode upon the forested terrain of Mount Vijayārddha. ॥34॥
श्लोक ( Shlok ) 35
अधिशय्य गुहागर्भ चिरं मातुरिवोदरम् । लब्धं जन्मान्तरं मेने निःसृतैः सैनिकैर्बहिः ॥३५॥
माताके उदर के समान गुहाके गर्भमें चिरकाल तक निवास कर वहाँसे बाहर निकले हुए सैनिकोंने ऐसा माना था मानो दूसरा जन्म ही प्राप्त हुआ हो ।॥ ३५॥
Having long dwelt within the womb-like depths of the cave, the soldiers who emerged from its dark recesses felt as though they had been born anew, as if granted a second birth. ॥35॥
श्लोक ( Shlok ) 36
गुहेयमतिगुध्येव गिलित्वा जनतामिमाम् । जरणाशक्तितो नूनमुज्जगाल बहिः पुनः ॥३६॥
सेनाको बाहर प्रकट करती हुई वह गुफा ऐसी जान पड़ती थी मानो पहले वह बड़ी भारी तृष्णा इस मनुष्य समूहको निगल गई थी परन्तु पचानेकी शक्ति न होनेसे अब उसे फिर बाहर उगल रही हो ।॥ ३६॥
That cave, from whose mouth the army now emerged, seemed as though it had once devoured this multitude of men in the grip of a mighty thirst—but, unable to digest them, was now casting them forth again. ॥36॥
श्लोक ( Shlok ) 37
व्यजनैरिव शाखाग्रैर्वीजयन् वनवीरुधाम् । गुहोष्मणां चिरं खिन्नां चमूमाश्वासयन्मरुत् ॥३७॥
उस समय पंखों के समान वनलताओं की शाखाओं के अग्रभाग से हवा करता हुआ वायु ऐसा जान पड़ता था मानो चिरकाल तक गुफा की गरमीसे दुःखी हुई सेना को आश्वासन ही दे रहा हो ।॥३७॥
At that time, the breeze—fluttering like wings through the leafy tips of forest vines—seemed as though it were offering solace to the army, long tormented by the cave’s oppressive heat. ॥37॥
श्लोक ( Shlok ) 38
तद्वनं पवनाधूतं चलच्छाखाकरोत्करैः । प्रभोरुपागमे तोषान्ननर्तेव धृतार्तवम् ॥३८॥
जिसने ऋतु सम्बन्धी अनेक फल-फूल धारण किये हैं और जो वायुसे हिल रहा है ऐसा वह वन उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो चक्रवर्तीके आनेपर संतुष्ट होकर हिलते हुए अपने शाखा रूपी हाथोंके समूहसे नृत्य ही कर रहा हो ।॥ ३८।।
Clad in blossoms and fruits of many seasons, and swaying gently in the wind, the forest at that moment appeared as though, in delight at the Emperor’s arrival, it were dancing—its branches waving like hands in joyous welcome. ॥38॥
श्लोक ( Shlok ) 39
पूर्ववत् पश्चिमे खण्डे बलाग्रण्या प्रसाधिते । विजेतुं मध्यमं खण्डं साधनैः प्रभुरुद्ययौ ॥३९॥
जब सेनापति पहलेकी तरह यहांके भी पश्चिम म्लेच्छ खण्डको जीत चुका तब महाराज भरत अपनी सेनाओंके द्वारा मध्यम म्लेच्छ खण्डको जीतनेके लिये उद्यत हुए ॥ ३९॥
When the commander had, as before, subdued the western Mleccha region of this land, King Bharata then prepared to conquer, through his armies, the central domain of the Mlecchas. ॥39॥
श्लोक ( Shlok ) 40
न करैः पीडितो लोको न भुवः शोषितो रसः । नार्केणेव जनस्तप्तः प्रभुणाऽभ्युद्यताप्युदक् ॥४०॥
यद्यपि भरत सूर्यके समान उत्तर दिशाकी ओर निकले थे तथापि जिस प्रकार सूर्य अपने कर अर्थात् किरणोंसे लोगोंको पीड़ित करता है, पृथिवी का रस अर्थात् जल सुखा देता है, और मनुष्योंको संतप्त करता है उस प्रकार उन्होंने अपने कर अर्थात् टेक्ससे लोगोंको पीड़ित नहीं किया था, पृथिवीका रस अर्थात् आनन्द नहीं सुखाया था-नष्ट नहीं किया था और न मनुष्योंको संतप्त अर्थात् दुःखी ही किया था ।॥४०॥
Although Bharata had set forth towards the northern direction like the sun, yet unlike the sun, which, with its rays, afflicts the people, parches the earth’s waters, and scorches mankind, he did not harass the people with his commands, nor did he deplete the earth’s joy, nor cause suffering to humanity with his rule. ॥40॥
श्लोक ( Shlok ) 41
कौबेरीं दिशमास्थाय तपत्येकान्ततः करैः । भानुर्भरतराजस्तु भुवस्तापमपाकरोत् ॥४१॥
सूर्य उत्तर दिशामें पहुँचकर अपनी किरणोंसे सन्ताप करता है परन्तु महाराज भरत ने पृथिवी का संताप दूर कर दिया था ॥४१॥
The sun, upon reaching the northern direction, brings torment with its rays; yet King Bharata, through his reign, dispelled the earth’s suffering. ॥41॥
श्लोक 42 से 51
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31
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