आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 शत्रु और चक्ररत्न के महत्व पर विचार
भरत कहते हैं कि महापुरुष दूसरों की उन्नति पर ईर्ष्या नहीं करते, परंतु क्षुद्र लोग ऐसा करते हैं। वे संदेह करते हैं कि कोई अहंकारी उनके घर में ही उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर रहा, जिसके कारण चक्र रुक गया। वे कहते हैं कि छोटे शत्रु को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, जैसे आंख में पड़ी धूल या पैर में चुभा कांटा दुख देता है। चक्ररत्न के रुकने का कारण गंभीर है, क्योंकि यह राज्य का प्रमुख अंग है। भरत पुरोहित से इसका कारण जानने को कहते हैं, क्योंकि वे ही इस रहस्य को समझ सकते हैं। पुरोहित को संबोधित कर भरत संक्षिप्त वचनों में अपनी बात रखते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
विमत्सराणि चेतांसि महतां परवृद्धिषु । मत्सरीणि तु तान्येव क्षुद्राणामन्यवृद्धिषु ॥२२।।
महापुरुषोंके हृदय दूसरोंकी वृद्धि होनेपर मात्सर्यसे रहित होते हैं परन्तु क्षुद्र पुरुषोंके हृदय दूसरोंकी वृद्धि होनेपर ईर्ष्या सहित होते हैं ।॥ २२॥
The hearts of the great remain untouched by envy at the prosperity of others, but the hearts of the petty are tainted with jealousy when they behold another’s rise.” ॥22॥
श्लोक ( Shlok ) 23
अथवा दुर्मदाविष्टः कश्चिदप्रणतोऽस्ति मे । स्ववर्ग्यस्तन्मदोच्छित्यै नूनं चक्रेण वक्रितम् ॥२३॥
अथवा दुष्ट अहंकार से घिरा हुआ कोई मेरे ही घरकामनुष्य नम्र नहीं हो रहा है, जान पड़ता है यह चक्र उसीका अहंकार दूर करनेके लिये वक्र हो रहा है ।।२३।।
“Or perhaps some wicked soul, blinded by arrogance, dwells within my own household and refuses to bow in humility—thus, it seems, this discus has turned awry to humble his pride.” ॥23॥
श्लोक ( Shlok ) 24
खलूपेक्ष्य’ लघीया नप्युच्छेद्यो लघु तादृशः । क्षुद्रो रेणुरिवाक्षिस्थो रुजत्यरिरुपेक्षितः ॥२४॥
शत्रु अत्यन्त छोटा भी हो तो भी उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये, द्वेष करने वाला छोटा होनेपर भी शीघ्र ही उच्छेद करने योग्य है क्योंकि आँखमें पड़ी हुई धूलिकी कणिका के समान उपेक्षा किया हुआ छोटा शत्रु भी पीड़ा देनेवाला हो जाता है ।॥ २४॥
“Even a foe of the slightest stature ought not to be disregarded; for though small, an enemy who harbors malice must swiftly be eliminated. Just as a mere speck of dust in the eye, if ignored, becomes a source of torment, so too does a neglected, petty adversary bring pain.” ॥24॥
श्लोक ( Shlok ) 25
बलादुद्धरणीयो हि क्षोदीयानपि कण्टकः । अनुद्धृतः पदस्थोऽसौ भवेत्पीडाकरो भृशम् ॥२५॥
कांटा यदि अत्यन्त छोटा हो तो भी उसे जबरदस्ती निकाल डालना चाहिये क्योंकि पैरमें लगा हुआ काँटा यदि निकाला नहीं जावेगा तो वह अत्यन्त दुःखका देनेवाला हो सकता है ॥ २५।।
“Even the smallest thorn must be forcibly removed, for if left within the foot, it may become a source of great suffering. So too must the slightest cause of pain be promptly cast out.” ॥25॥
श्लोक ( Shlok ) 26
चक्रं नाम परं दैवं रत्नानामिदमग्रिमम् । गतिस्खलनमेतस्य न विना कारणाद् भवेत् ॥२६॥
यह चक्ररत्न उत्तम देवरूप है और रत्नोंमें मुख्य रत्न है इसकी गतिका स्खलन बिना किसी कारण के नहीं हो सकता है ॥ २६॥
“This discus, a supreme celestial jewel and foremost among all gems, does not waver in its course without cause; its faltering motion cannot be without purpose.” ॥26॥
श्लोक ( Shlok ) 27
ततो बाल्यमिदं कार्य यच्चक्रेणार्य सूचितम्। सूचिते खलु राज्याङ्गे” विकृतिर्नाल्पकारणात् ॥२७॥
इसलिये हे आर्य, इस चक्र ने जो कार्य सूचित किया है वह कुछ छोटा नहीं है क्योंकि यह राज्यका उत्तम अङ्ग है इसमें किसी अल्पकारण से विकार नहीं हो सकता है ।।२७।।
“Therefore, O noble one, the purpose indicated by this discus is by no means trifling, for it is a most exalted limb of the realm, and no slight cause can bring about its deviation.” ॥27॥
श्लोक ( Shlok ) 28
तदत्र कारणं चित्यं त्वया धीमन्निदन्तया । अनिरूपित कार्याणां नेह नामुत्र सिद्धयः ॥२८॥
इसलिये हे बुद्धिमान् पुरोहित, आप इस चक्ररत्नके रुकने में क्या कारण है इसका अच्छी तरह विचार कीजिये क्योंकि बिना विचार किये हुए कार्योंकी सिद्धि न तो इस लोक में होती है और न परलोक हीमें होती है ॥ २८॥
“Therefore, O wise priest, do carefully discern the cause behind the halting of this divine discus; for actions undertaken without due deliberation bear fruit neither in this world nor in the next.” ॥28॥
श्लोक ( Shlok ) 29
त्वयीदं कार्यविज्ञानं तिष्ठते दिव्यचक्षुषि । तमसां छेदने कोऽन्यः प्रभवेदंशुमालिनः ॥२९॥
आप दिव्य नेत्र हैं इसलिये इस कार्य का ज्ञान आपमें ही रहता है अर्थात् आप ही चक्ररत्नके रुकनेका कारण जान सकते हैं क्योंकि अन्धकारको नष्ट करने में सूर्यके सिवाय और कौन समर्थ हो सकता है ? ॥२९॥
“You are the divine eye, and thus the knowledge of this matter abides in you alone—for who but the sun is capable of dispelling the darkness? Only you can discern the cause behind the halting of the discus.” ॥29॥
श्लोक ( Shlok ) 30
निवेद्य कार्यमित्यस्मै देवज्ञाय मिताक्षरैः । विरराम प्रभुः प्रायः प्रभवो मितभाषिणः ॥३०॥
इस प्रकार महाराज भरत थोड़े ही अक्षरोंके द्वारा इस निमित्तज्ञानीके लिये अपना कार्य निवेदन कर चुप हो रहे सो ठीक ही है क्योंकि प्रभु लोग प्रायः थोड़े ही बोलते हैं ।॥ ३०॥
“Thus, King Bharat, with but few words, humbly conveyed his purpose to the one knowledgeable in this matter and fell silent. This is indeed fitting, for it is customary for those of noble stature to speak little.” ॥30॥
श्लोक ( Shlok ) 31
ततः प्रसन्नगम्भीरपदालङकार कोमलाम् । भारतीं भरतेशस्य प्रबोधायेति सोऽब्रवीत् ॥३१॥
तदनन्तर निमित्त-ज्ञानी पुरोहित भरतेश्वरको समझाने के लिये प्रसन्न तथा गम्भीर पद और अलंकारोंसे कोमल वचन कहने लगा ।॥३१॥
“Thereafter, the wise priest, with both a joyful and solemn demeanor, began to speak in tender words, adorned with profound expressions and dignified embellishments, in order to enlighten King Bharat.” ॥31॥
श्लोक 32 से 41
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
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