आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 |
श्लोक 232 से 241 दीक्षा की महिमा
भगवान ने भोग और लक्ष्मी त्यागकर तप में मन लगाया। उनकी समदर्शिता की व्याजस्तुति की गई। वे सर्वज्ञ और तपस्वी हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 232 to 241
श्लोक ( Shlok ) 232
राज्यलक्ष्मीमसंभोग्यामाकलय्य चलामिमाम् । क्लेशहानाय निर्वाणदीक्षां त्वं प्रत्यपद्यथाः ॥२३२॥
हे नाथ, आप इस राज्यलक्ष्मी को भोग के अयोग्य तथा चंचल समझकर ही क्लेश नष्ट करने के लिए निर्वाणदीक्षा को प्राप्त हुए हैं ।।232।।
“O Lord, considering this Rajyalakshmi (prosperity of the kingdom) as unworthy of enjoyment and fickle, you have attained the vow of renunciation to eliminate all suffering.”
श्लोक ( Shlok ) 233
स्नेहाला नकमुन्मूल्य विशतोऽद्य वनं तव । न कश्चित् प्रतिरोधो ऽभून्मदान्धस्येव दन्तिनः ॥ २३३॥
हे भगवन्, मत्त हस्ती की तरह स्नेहरूपी खूंटा उखाड़कर वन में प्रवेश करते हुए आपको आज कोई भी नहीं रोक सकता है ।।233।।
“O Lord, like a mad elephant uprooting the stake of attachment, no one can stop you today as you enter the forest.”
श्लोक ( Shlok ) 234
स्वप्नसंभोग निर्भासा भोगाः संपत्प्रणश्त्ररी जीवितं चलमित्याधास्त्वं मनः शाश्वते पथि ।।२३४।।
हे देव, ये भोग स्वप्न में भोगे हुए भोगों के समान हैं, यह संपदा नष्ट हो जाने वाली है और यह जीवन भी चंचल है यही विचार कर आपने अविनाशी मोक्षमार्ग में अपना मन लगाया है ।।234।।
“O Lord, realizing that these pleasures are like those experienced in a dream, this wealth is perishable, and life itself is fleeting, you have set your mind on the eternal path of liberation.”
श्लोक ( Shlok ) 235
अवधूय चलां लक्ष्मी निर्धूय स्नेहबन्धनम् । धनं रज इवोद् धूय मुक्त्या संगंस्यते भवान् ॥२३५॥
हे भगवन्, आप चंचल लक्ष्मी को दूर कर स्नेहरूपी बंधन को तोड़कर और धन को धूलि की तरह उड़ाकर मुक्ति के साथ जा मिलेंगे ।।235।।
“O Lord, casting away fickle wealth, breaking the bonds of attachment, and scattering riches like dust, you will unite with liberation.”
श्लोक ( Shlok ) 236
राज्यलक्ष्म्याः परिम्लानिं मुक्तिलक्ष्म्याः परां मुदम् । प्रव्यञ्जयं स्तपोलक्ष्म्या मासजस्त्वं विना रतेः ॥२३६॥
हे भगवन्, आप रति के बिना ही अर्थात् वीतराग होने पर भी राजलक्ष्मी में उदासीनता को और मुक्तिलक्ष्मी में परम हर्ष को प्रकट करते हुए तपरूपी लक्ष्मी में आसक्त हो गये हैं, यह एक आश्चर्य की बात है ।।236।।
“O Lord, even without passion, you display indifference toward royal wealth and supreme joy in the wealth of liberation. Yet, you have become deeply devoted to the wealth of austerity—this is truly astonishing!”
श्लोक ( Shlok ) 237
राज्यश्रियां विरक्तोऽसि संरक्तोऽसि तपः श्रियाम् । मुक्तिश्रियां च सोत्कण्ठो गतैवं ते विरागता ॥ २३७॥
हे स्वामिन्, आप राजलक्ष्मी में विरक्त हैं, तपरूपी लक्ष्मी में अनुरक्त हैं और मुक्तिरूपी लक्ष्मी में उत्कंठा से सहित हैं इससे मालूम होता है कि आपकी विरागता नष्ट हो गयी है । भावार्थ―यह व्याजोक्ति अलंकार है―इसमें ऊपर से निंदा मालूम होती है परंतु यथार्थ में भगवान की स्तुति प्रकट की गयी है ।।237।।
“O Lord, you are detached from royal wealth, devoted to the wealth of austerity, and deeply yearning for the wealth of liberation. This suggests that your dispassion itself has been transcended!”
(Interpretation: This verse employs the Vyajokti (indirect praise) figure of speech—while it appears to be criticism on the surface, in reality, it is a profound glorification of the Lord.)
श्लोक ( Shlok ) 238
ज्ञात्वा हेयमुपेयं च हित्वा हेयभिवाखिलम्। उपादेयमुपादित्सोः कथं ते समदर्शिता ॥२३८॥
हे भगवन् आपने हेय और उपादेय वस्तुओं को जानकर छोड़ने योग्य समस्त वस्तुओं को छोड़ दिया है और उपादेय को आप ग्रहण करना चाहते हैं ऐसी दशा में आप समदर्शी कैसे हो सकते हैं (यह भी व्याजस्तुति अलंकार है) ।।238।।
“O Lord, having discerned what is to be accepted and what is to be renounced, you have abandoned all that is worth leaving and seek to embrace what is truly worthy. In such a state, how can you be called impartial?”
(Interpretation: This verse employs Vyajastuti (indirect praise) as a literary device—while it appears to question the Lord’s equanimity, it actually glorifies His supreme wisdom and discernment.)
श्लोक ( Shlok ) 239
पराधीनं सुखं हित्वा सुखं स्वाधीनमीप्सतः । त्यक्त्वाल्पां विपुलां चर्द्धिं वाञ्छतो विरतिः क्व ते ॥ २३९॥
आप पराधीन सुख को छोड़कर स्वाधीन सुख प्राप्त करना चाहते हैं तथा अल्प विभूति को छोड़कर बड़ी भारी विभूति को प्राप्त करना चाहते हैं ऐसी हालत में आपका विरति-पूर्ण त्याग कहाँ रहा ? (यह भी व्याजस्तुति है) ।।239।।
“You wish to abandon dependent happiness to attain independent bliss, and you forsake trivial wealth to acquire immense divine prosperity. In such a case, where is your renunciatory detachment?”
(Interpretation: This verse employs Vyajastuti (indirect praise)—while it seemingly questions the Lord’s renunciation, it actually glorifies His supreme wisdom in choosing the highest and eternal bliss over fleeting material pleasures.)
श्लोक ( Shlok ) 240
“आमनन्त्यात्मविज्ञानं योगिनां हृदयं परम् । कीदृक तवात्मविज्ञानमात्म वत्पश्यतः परान् ॥२४०।।
हे नाथ ! योगियों का आत्मज्ञान मात्र उनके हृदय को जानता है परंतु आप अपने समान परपदार्थों को भी जानते हैं इसलिए आपका आत्मज्ञान कैसा है ? ।।240।।
“O Lord! The self-realization of yogis is known only to their own hearts, but you possess the knowledge of external realities as well, just as you know yourself. So, what kind of supreme self-knowledge do you possess?”
श्लोक ( Shlok ) 241
तथा परिचरन्त्येते यथा पूर्व सुरासुराः । त्वामुपास्ते च गूढं श्रीः कुतस्त्यस्ते तपःस्मयः ॥२४१॥
हे नाथ, समस्त सुर और असुर पहले के समान अब भी आपकी परिचर्या कर रहें हैं और यह लक्ष्मी भी गुप्तरीति से आपकी सेवा कर रही है तब आपके तप का भाव कहाँ से आया अर्थात् आप तपस्वी कैसे कहलाये? ।।241।।
“O Lord, all the gods and demons continue to serve you as before, and even the goddess of wealth secretly remains in your service. In such a case, how can you be considered an ascetic?”
श्लोक 242 से 251
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
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