आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 159 : म्लेच्छ राजाओं का समर्पण और भरत की महिमा
म्लेच्छ राजाओं ने भय सहित भरत को नमस्कार किया और रत्न भेंट किए। भरत ने उनका सत्कार कर विदा किया। दंडरत्न के बल पर विजयार्थ पर्वत के समीपवर्ती राजाओं को जीता गया। सेनापति को पुनः प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया। भरत ने विजयार्थ पर्वत से छत्र, चमर, सिंहासन और अनुपम आभूषण प्राप्त किए, जो मेरु पर्वत के कल्पवृक्ष सा शोभित करते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 152 to 159
श्लोक ( Shlok ) 152
मुखरैर्जयकारेण म्लेच्छराजैः ससाध्वसम् । प्रणेमे प्रभुरभ्येत्य ललाटस्पृष्टभूतलैः ॥ १५२॥
जिन्होंने अपने ललाटसे पृथिवीतल का स्पर्श किया है और जो जय-जय शब्द करनेसे वाचालित हो रहे हैं ऐसे म्लेच्छ राजाओं ने भयसहित सामने आकर भरत को नमस्कार किया ॥१५२।।
“The Mleccha kings, trembling with fear, came forward and bowed before Bharata—touching their foreheads to the earth and murmuring with voices trembling in cries of ‘Victory! Victory!'” ॥१५२॥
श्लोक ( Shlok ) 153
तदुपाहृत’ रत्नाद्यैरर्चयन्नुपढौकितैः । नामादेशं च ‘तानस्मै प्रभवेऽसौ न्यवेदयत् ॥१५३॥
उन म्लेच्छ राजाओंके द्वारा उपहारमें लाये हुए रत्न आदिको सामने रखकर सेनापतिने महाराज भरत से नाम ले लेकर सबका परिचय कराया ।।१५३।।
“Placing before the throne the jewels and other gifts brought by the Mleccha kings, the commander introduced each of them to King Bharata by name, presenting their tributes with due formality.” ॥१५३॥
श्लोक ( Shlok ) 154
सप्रसादं च सम्मान्य सत्कृतास्ते महीभुजः । प्रभोरनुमताद् भूयः स्वमोकः प्रत्ययासिषुः ॥१५४।।
महाराजने प्रसन्नताके साथ सन्मान करके उन सब राजाओंका सत्कार किया, तदनन्तर वे राजा महाराजकी अनुमतिसे अपने अपने स्थान पर वापिस चले गये ।। १५४।॥
“With great pleasure, the King honored and welcomed each of those kings. Afterward, with the King’s permission, they returned to their respective realms.” ॥१५४॥
श्लोक ( Shlok ) 155
इत्थं पुण्योदयाच्चक्री बलात् प्रत्यन्तपालकान् । विजिग्ये दण्डमात्रेण जयः पुण्यादृते कुतः ॥१५५।।
इस प्रकार चक्रवर्ती ने पुण्य कर्मके उदयसे केवल दण्डरत्नके द्वारा ही विजयार्ध पर्वतके समीपवर्ती राजाओंको जबर्दस्ती जीत लिया था सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यके बिना विजय कहांसे हो सकती है ? ।१५५।
“Thus, the Chakravarti, through the rise of virtuous deeds, forcibly subdued the kings near Mount Vijayaardha, using only the rod-jewel. This was only fitting, for without virtue, where can there be victory?” ॥१५५॥
श्लोक ( Shlok ) 156
अथ नृपतिसमाजेनर्चितः सानुरागं विजितसकलदुर्गः प्रह्वयन् म्लेच्छनाथान् । पुनरपि विजयायायोजि सोऽग्रेसरत्वे जय इव जयचिह्नर्मानितो रत्नभर्त्रा ॥१५६॥
अथानन्तर-अनेक राजाओंके समूहने प्रेमपूर्वक जिसका सत्कार किया है, जिसने सब किले जीत लिये हैं, जिसने म्लेच्छ राजाओंको नम्म्रीभूत किया है, जो साक्षात् विजयके समान सुशोभित हो रहा है और विजयके चिह्नोंसे जिसका सन्मान किया गया है ऐसे उस सेनापति को रत्नोंके स्वामी भरत महाराजने विजय प्राप्त करनेके लिये फिर भी प्रधान सेनापतिके पदपर नियुक्त किया ॥१५६॥
“Then, after being lovingly honored by a host of kings, having conquered all forts, humbled the Mleccha kings, and resplendent like the very embodiment of victory itself—adorned with the marks of triumph—the commander was once again appointed to the position of chief commander by King Bharata, the master of jewels, for further conquests.” ॥१५६॥
श्लोक ( Shlok ) 157
जयति जिनवराणां शासनं यत्प्रसादात् पदमिदमधिराज्ञां प्राप्यते हेलयैव । समुचितनिधिरत्नप्राज्यभोगोपभोगप्रकटितसुखसारं भूरि संपत्प्रसारम् ॥१५७।।
योग्य निधियाँ, रत्न तथा उत्कृष्ट भोग-उपभोगकी वस्तुओं के द्वारा जिसमें सुखोंका सार प्रकट रहता है, और जिसमें अनेक सम्पदाओंका प्रसार रहता है ऐसा यह चक्रवर्तीका पद जिसके प्रसादसे लीला मात्रमें प्राप्त हो जाता है ऐसा यह जिनेन्द्र भगवान्का शासन सदा जयवन्त रहे ।। १५७।।
“May the throne of the Chakravarti, a seat adorned with worthy treasures, jewels, and the finest objects of enjoyment—where the essence of bliss is ever manifest and the spread of riches is boundless—be ever blessed, and may the rule of Lord Jinendra, whose grace grants such attainment with ease, remain forever victorious.” ॥१५७॥
श्लोक ( Shlok ) 158
छत्रं चन्द्रकरापहासि रुचिरं चामीकरप्रोज्ज्वलद् -दण्डं चामरयुग्मकं सुरसरिड्डिण्डीरपिण्डच्छविः ।रुक्माद्रेरिव संविभक्तमपरं कूटं मृगेन्द्रासनं लेभेऽसौ विजयार्द्धनाथ विजयाद्रवान्यधान्यान्यपि ।।१५८।।
महाराज भरतने विजयार्ध पर्वतक स्वामीको जीतकर उससे चन्द्रमाकी किरणोंकी हंसी करनेवाला सुन्दर छत्र, सुवर्णमय देदीप्यमान दण्डोंसे युक्त तथा गङ्गा नदीके फेनके समान कान्तिवाले दो मनोहर चमर, सुमेरु पर्वतसे अलग किये हुए उसके शिखरके समान सिंहासन तथा और भी अन्य अनेक रत्न प्राप्त किये थे ॥१५८॥
“King Bharata, having subdued the lord of Mount Vijayaardha, received from him a beautiful umbrella, shining with the laughter of moonbeams, two charming fly-whisks, radiant like the foam of the Ganges, adorned with golden rods that gleamed with brilliance, a throne like the summit of Mount Meru, and many other priceless jewels.” ॥१५८॥
श्लोक ( Shlok ) 159
गीर्वाणः कृतमाल इप्यभिमतः संपूज्य तं सादरं ‘प्रादादाभरणानि यानि न पुनस्तेषामिहास्त्यु न्मितिः ।
सम्म्म्राट् तैरचका दलङ्कृततनुः कल्पद्रुमः पुप्पितो मेरोः सानुमिवाश्रितो मणिमयं सोऽध्यासितो विष्टरम् ॥१५९॥
“The divine being, renowned for his garlands, bestowed upon King Bharata, as a mark of respect, those exquisite ornaments—none could be found in Bharatakṣetra worthy of comparison to them. Adorned with these unparalleled jewels and seated upon a throne of precious gems, King Bharata, in that moment, radiated with the grandeur of a flourishing wish-fulfilling tree, akin to the summit of Mount Meru, resplendent beyond measure.” ॥१५९॥
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणश्रीमहापुराणसङ्ग्र हे विजयार्द्धगुहाद्वारोद्धाटनवर्णनं नामैत्रिंशत्तमं पर्व ॥ ३१ ॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके हिन्दी भावानुवादमें विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़नेका वर्णन करनेवाला इकतीसवां पर्व समाप्त हुआ ।॥ ३१ ॥
“Thus, the thirty-first chapter, which describes the opening of the cave door of Mount Vijayaardha, has been concluded, as narrated in the Hindi translation of the Triṣaṣṭilakṣaṇa Mahāpurāṇa composed by the venerable Jinseṇācārya.”॥ ३१ ॥
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन
पर्व 32 – श्लोक 1 से 12
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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