आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123
श्लोक 124 से 131 पूजा और स्तुति का प्रारंभ
भरत ने भक्तिपूर्वक नमस्कार किया, उनका मुकुट और कुण्डल चञ्चल हो उठे। मोक्ष की इच्छा से उन्होंने जल, चंदन, पुष्पमाला, और अन्य सामग्री से भगवान की पूजा की। पूजा के बाद प्रणाम कर स्तोत्रों से स्तुति शुरू की। उन्होंने भगवान को अपार गुणों वाला, अविनश्वर, और परमात्मा कहा। स्वीकार किया कि उनकी शक्ति सीमित है, पर भक्ति से प्रेरित होकर स्तुति कर रहे हैं। उनकी भक्ति का फल महान है, जैसे स्वामी की सम्पत्ति सेवकों को समृद्ध करती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 33 – Shlok 124 to 131
श्लोक ( Shlok ) 124
दूरानतचलन्मौलिः रालोलमणिकुण्डलः । स रेज प्रणमन् भक्त्या जिनं रत्नैरिवार्घयन् ॥१२४॥
दूर-से ही नम्र होनेके कारण जिनका मुकुट कुछ कुछ हिल रहा है और मणिमय कुण्डल चञ्चल हो रहे हैं ऐसे भक्तिपूर्वक जिनेन्द्रदेवको प्रणाम करते हुए चक्रवर्ती भरत ऐसे जान पड़ते थे मानो उन्हें रत्नोंके द्वारा अर्घ ही दे रहा हो ।। १२४।॥
As the reverent Emperor Bharata bowed from afar, his jeweled crown gently trembled and his gem-studded earrings swayed with devotion—so that he appeared as though he were offering a libation of precious jewels in homage to the Lord, a living arghya unto the glorious Jineśvara. 124
श्लोक ( Shlok ) 125
ततो विधिवदानर्च जलगन्धस्रगक्षतैः । चरुप्रदीपवूपैश्च सफलैः स फलेप्सया ॥१२५।।
तदनन्तर उन्होंने मोक्षरूपी फल प्राप्त करनेकी इच्छा से विधिपूर्वक जल, चन्दन, पुष्पमाला, अक्षत, नैवेद्य, दीप, धूप और फलोंके द्वारा भगवान् की पूजा की ।। १२५॥
Thereafter, with a heart yearning for the supreme fruit of liberation, Emperor Bharata performed the worship of the Blessed Lord in accordance with sacred rites—offering water, sandalwood paste, garlands of flowers, unbroken rice grains, consecrated food, lamps, incense, and fruits, all with deep devotion and reverence.125
श्लोक ( Shlok ) 126
कृतपूजाविधिर्भूयः प्रणम्य परमेष्ठिनन् । स्तोतुं स्तुतिभिरत्युच्चैः रारेभे भरताधिपः ॥१२६॥
पूजाकी विधि समाप्त कर चुकनेके बाद भरतेश्वर ने परमेष्ठी वृषभदेवको प्रणाम किया और फिर अच्छे अच्छे स्तोत्रों के द्वारा उनकी स्तुति करना प्रारम्भकिया ।।१२६।॥
Having completed the sacred rite of worship, the noble Bharateshvara bowed before the Supreme Being, Lord Ṛṣabhadeva, and then began to extol Him with sublime hymns of praise, composed of choicest and most exalted verses.126
श्लोक ( Shlok ) 127
त्वां स्तोप्ये परमात्मानमपारगुणमच्युतम् । चोदितोऽहं बलाद् भक्त्या शक्त्या मन्दोऽप्यमन्दया ॥१२७॥
हे भगवन्, आप परमात्मा हैं, अपार गुणोंके धारक हैं, अविनश्वर हैं और मैं शक्तिसे हीन हूँ तथापि बड़ी भारी भक्तिसे जबर्दस्ती प्रेरित होकर आपकी स्तुति करता हूँ ॥१२७॥
O Lord, You are the Supreme Self—endowed with infinite virtues and untouched by decay; while I am but weak and powerless. Yet, impelled by the force of deep devotion, I dare to offer You this hymn of praise, though I am unworthy and incapable.127
श्लोक ( Shlok ) 128
क्व ते गुणा गणेन्द्राणामप्यगण्या क्व मादृशः । तथापि प्रयते स्तोतुं भक्त्या त्वद्गुणनिघ्नया ।।१२८॥
हे देव, जो गणधर देवोंके द्वारा भी गम्य नहीं हैं ऐसे कहाँ तो आपके अनन्त गुण और कहां मुझ सरीखा मन्द पुरुष ? तथापि आपके गुणोंके आधीन रहनेवाली भक्तिसे प्रेरित होकर आपकी स्तुति करनेका प्रयत्न करता हूँ ॥ १२८॥
O Divine One, where are Your infinite virtues—unfathomable even to the enlightened Gaṇadharas—and where am I, a dull and feeble soul? Yet, moved by devotion that is ever drawn to Your glory, I venture to praise You, though I am utterly unfit for such an exalted task.128
श्लोक ( Shlok ) 129
फलाय त्वद्गता भक्तिः रनल्पाय प्रकल्पते । स्वामिसंपत्प्रपुष्णाति ननु संपत्परम्पराम् ॥१२९॥
हे भगवन्, आपके विषय में की हुई थोड़ी भक्ति भी बहुत भारी फल देनेके लिये समर्थ रहती है सो ठीक ही है क्योंकि स्वामीकी सम्पत्ति सेवक जनोंकी सम्पत्तिकी परम्पराको पुष्ट करती ही है ।। १२९ ।।
O Lord, even a little devotion offered unto You yields boundless fruit—indeed, how could it be otherwise? For the greatness of the Master ever enriches the humble offerings of His servants, sanctifying and magnifying them beyond measure.129
श्लोक ( Shlok ) 130
घातिकर्ममलापायात् प्रादुरासन् गुणास्तव । घनावरणनिर्मुक्तमूर्तेर्भानोर्यथांऽशवः ॥१३०।।
हे नाथ, जिस प्रकार मेघोंके आवरणसे छूटे हुए सूर्यकी अनेक किरणें प्रकट हो जाती हैं उसी प्रकार घातिया कर्मरूपी मलके दूर हो जानेसे आपके अनेक गुण प्रकट हुए हैं ।॥ १३०॥
O Lord, just as myriad rays burst forth from the sun when it is freed from the veil of clouds, so too have Your countless virtues shone resplendent, once the defiling karmas were dispelled from Your being.130
श्लोक ( Shlok ) 131
यथार्थदर्शनज्ञानसुखवीर्यादिलब्धयः । क्षायिक्यस्तव निर्जाता घातिकर्म विनिर्जयात् ॥१३१॥
हे प्रभो, घातिया कर्मोंको जीत लेनेसे आपके यथार्थ दर्शन, ज्ञान, सुख और वीर्य आदि क्षायिक लब्धियाँ प्रकट हुई हैं ।॥१३१।।
O Lord, by conquering the destructive karmas, You have attained the supreme and eternal realizations—true perception, perfect knowledge, infinite bliss, and boundless power.131
श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123
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