आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 |
श्लोक 132 से 141 नगरवासियों की प्रार्थना
नगरवासियों ने भगवान को रक्षक माना। वे उनके प्रस्थान पर आश्चर्य करते थे—क्या यह सूर्य या सुमेरु है? उनकी प्रभा और पुण्य अनिर्वचनीय थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
नाथानाथं जनं त्रातुं नान्यस्त्वमिव कर्मठः । तस्मादस्मत्परित्राणे प्रणिधेहि मनः पुनः ॥१३२॥
हे नाथ, अनाथ पुरुषों की रक्षा करने लिए आपके समान और कोई भी समर्थ नहीं है इसलिए हम लोगों की रक्षा करने में आप अपना मन फिर भी लगाइए ।।132।।
O Lord, there is no one as capable as you in protecting the helpless. Therefore, even after renunciation, may you keep your mind engaged in safeguarding us. ॥132॥
श्लोक ( Shlok ) 133
परानुग्रहकाराणि चेष्टितानि तव प्रभो । निर्व्यपेक्षं विहायास्मान् कोऽनुग्राहयस्त्वयापरः ।।१३३।।
हे प्रभो, आपकी समस्त चेष्टाएँ पुरुषों का उपकार करने वाली होती हैं, आप बिना कारण ही हम लोगों को छोड़कर अब और किसका उपकार करेंगे ।।133।।
O Lord, all your actions are for the welfare of mankind. If you leave us without reason, then who else will you bestow your grace upon? ॥133॥
श्लोक ( Shlok ) 134
इति श्लाध्यं प्रसन्नं च सानुतर्ष “सनाथनम् । कैश्चित् संजल्पितं पौरैरारात् प्रणत मूर्द्धभिः ।।१३४।।
इस प्रकार कितने ही नगर निवासियों ने दूर से ही मस्तक झुकाकर प्रशंसनीय, स्पष्ट अर्थ को कहने वाले और कामनासहित प्रार्थना के वचन कहे थे ।।134।।
In this way, many citizens of the city bowed their heads from a distance and spoke words of praise—clear in meaning and filled with heartfelt prayers and desires. ॥134॥
श्लोक ( Shlok ) 135 –137
अयं स भगवान् दूरं देवैरुत्क्षिप्य नीयते । न विश्नः कारणं “किन्नू क्रीडेयमथवेदृशी ।।१३५।।
भवेदपि भवेदेतन्नीतो मेरुं पुराप्ययम् । प्रत्यानीनश्च नाकीन्द्रैर्जन्मोत्सवविधित्सया ॥१३६॥
स एवाद्यापि वृत्तान्तो जात्वस्मद्भाग्यतौ भवेत् । ततो न काचनास्माकं व्यथेत्यन्ये मिथोऽब्रुवन्॥ १३७॥
उस समय कितने ही नगरवासी परस्पर में ऐसा कह रहे थे कि देव लोग भगवान् को पालकी पर सवार कर कहीं दूर ले जा रहे हैं परंतु हम लोग इसका कारण नहीं जानते अथवा भगवान की यह कोई ऐसी ही क्रीड़ा होगी अथवा यह भी हो सकता है कि पहले इंद्र लोग जन्मोत्सव करने की इच्छा से भगवान् को सुमेरु पर्वत पर ले गये थे और फिर वापस ले आये थे । कदाचित् हम लोगों के भाग्य से आज फिर भी वही वृत्तांत हो इसलिए हम लोगों को कोई दु:ख की बात नहीं है ।।135-137।।
At that time, many townspeople were saying among themselves that the celestial beings were carrying the Lord away in a palanquin to some distant place, but they did not know the reason for it. Some thought that it might be one of the divine plays of the Lord. Others speculated that perhaps, in the past, the gods, with a desire to celebrate the Lord’s birth anniversary, had taken Him to Mount Sumeru and later brought Him back. Perhaps, by our good fortune, the same event is happening again today, and therefore, there is no reason for us to be sorrowful. (Verses 135-137)
श्लोक ( Shlok ) 138
किमेष भगवान् भानुरास्थितः शिबिकामिमाम् । देदीप्यतेऽम्बरे भाभिः प्रतुदक्षिव नो दृशः ॥१३८॥
कितने ही लोग आश्चर्य के साथ कह रहे थे कि पालकी पर सवार हुए ये भगवान क्या साक्षात् सूर्य है क्योंकि ये सूर्य की तरह ही अपनी प्रभा के द्वारा हमारे नेत्रों को चकाचौंध करते हुए आकाश में दैदीप्यमान हो रहे हैं ।।138।।
Many people, filled with wonder, were saying, “Is this Lord, seated on the palanquin, actually the Sun Himself? For, like the Sun, He is dazzling our eyes with His radiance and shining brilliantly in the sky.” (138)
श्लोक ( Shlok ) 139
धृतमौलिविभात्युच्चैस्तप्तचामीकरच्छविः । विभुर्मध्ये सुरेन्द्राणां कुलाद्रीणामिवाद्रि राट् ॥१३९॥
जिस प्रकार कुलाचलों के बीच चूलिकासहित सुवर्णमय सुमेरु पर्वत शोभित होता है उसी प्रकार इंद्रों के बीच मुकुट धारण किये और तपाये हुए सुवर्ण के समान कांति को धारण किये हुए भगवान बहुत ही सुशोभित हो रहे हैं ।।139।।
Just as the golden Mount Sumeru, adorned with its peaks, stands splendidly among the mighty mountain ranges, similarly, the Lord, wearing a crown and radiating a brilliance like refined gold, appears exceedingly magnificent among the Indras. ( 139)
श्लोक ( Shlok ) 140
विभोर्मुखो न्मुखीर्दृष्टीर्दधानोऽद्भुतविक्रियः । कः स्विदाज्ञातमस्याज्ञाकरः सोऽयं पुरंदरः ॥१४०॥
जो भगवान के मुख के सामने अपनी दृष्टि लगाये हुए है और जिसकी विक्रियाएँ अनेक आश्चर्य उत्पन्न करने वाली है ऐसा यह कौन है ? हाँ, मालूम हो गया कि यह भगवान का आज्ञाकारी सेवक इंद्र है ।।140।।
Who is this being, gazing intently at the Lord’s face, whose expressions evoke great wonder? Ah! Now it is clear—it is Indra, the devoted servant of the Lord, obedient to His command. ( 140)
श्लोक ( Shlok ) 141
शिविकावाहिनामेषामङ्गभासो महौजसाम् । समन्तात् प्रोल्लसन्त्येतास्तडितामिव रीतयः ॥१४१॥
इधर देखो, यह पालकी ले जाने वाले महातेजस्वी देवों के शरीर की प्रभा चारों ओर फैल रही है और ऐसी मालूम होती है मानो बिजलियों का समूह ही हो ।।141।।
Look over here! The radiance of the immensely powerful celestial beings carrying the palanquin is spreading in all directions, appearing as if it were a cluster of lightning flashes. (Verse 141)
श्लोक 142 से 151
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
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आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 |