आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41
श्लोक 42 से 51 पर्वत की महिमा
पर्वत के झरने सिंहों को तर्जना करते प्रतीत होते थे। पुरोहित ने भरत की तुलना पर्वत से की, जो सेवकों और भद्र हाथियों को धारण करता था। वन में सिहों, हरिणों, और मुनियों की उपस्थिति थी, जो शांति और भय का मिश्रण दर्शाती थी। सिंह और हरिण शांतिपूर्वक विचरण करते थे, जो जिनेन्द्र की उपस्थिति से संभव था।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 33 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
हरीन्नखर निर्भिन्नमदद्विरदमस्तकान् । निर्झरैः पापभीत्येव तर्जयत्येष सारवैः ॥४२॥
यह पर्वत शब्द करते हुए झरनोंसे ऐसा जान पड़ता है मानो जिन्होंने अपने नखोंसे मदोन्मत्त हाथियों के मस्तक विदारण किये हैं ऐसे सिंहोंको पापके डरसे तर्जना ही कर रहा हो-डाट ही दिखा रहा हो ॥४२।।
With the roaring of its waterfalls, this mountain seems as though it were rebuking the lions—those who, with their claws, have torn open the foreheads of intoxicated elephants—warning them sternly, as if out of fear of sin. ||42||
श्लोक ( Shlok ) 43
धत्ते सानुचरान् भद्रान् उच्चैर्वंशान् स्ववग्रहान् । वनद्विपानयं शैलो भवानिव महीभुजः ॥४३॥
हे नाथ, जिस प्रकार आप सानुचर अर्थात् सेवकों सहित, भद्र, उच्च कुलमें उत्पन्न हुए और उत्तम शरीरवाले अनेक राजाओंको धारण करते हैं उन्हें अपने आधीन रखते हैं, उसी प्रकार यह पर्वत भी सानुचर अर्थात् शिखरोंपर चलनेवाले, पीठपरकी उच्च रीढ़से युक्त और उत्तम शरीरवाले भद्र जातिके जंगली हाथियोंको धारण करता है ।॥४३॥
O Lord, just as you, accompanied by your attendants, bear sway over many noble kings—born of illustrious lineages, possessing fine forms, and devoted in service—so too does this mountain sustain upon its peaks majestic wild elephants of noble breed, their lofty spines rising like regal crests. ||43||
श्लोक ( Shlok ) 44
ध्वनतो घनसंघातान् शरभा रभसादमी । द्विरदाशङ्कयोत्पत्य पतन्तो यान्ति शोच्यताम् ॥४४॥
इधर ये अष्टापद, गरजते हुए मेघों के समूहको हाथी समझकर उनपर उछलते हैं परन्तु फिर नीचे गिरकर शोचनीय दशाकों प्राप्त हो रहे हैं ।।४४।॥
Behold these Aṣṭāpada peaks—they mistake the roaring masses of clouds for elephants and leap toward them, only to fall back down, meeting with pitiable fates. ||44||
श्लोक ( Shlok ) 45
कपोलकाषसंरुग्ण त्वचो मदजलाविलाः । द्विपानां वनसम्भोगं सूचयन्तीह” शाखिनः ।॥४५।।
कपोलोंके घिसनेसे जिनकी छाल घिस गई है और जो मंदरूपी जलसे मलिन हो रहे हैं ऐसे इस वनके वृक्ष हाथियोंकी वनक्रीड़ा को साफ साफ सूचित कर रहे हैं ।॥४५॥
The trees of this forest, their bark worn away by the rubbing of elephant cheeks and stained by the mire of mountain streams, clearly bear witness to the playful wanderings of the elephants within. ||45||
श्लोक ( Shlok ) 46
शाखामृगा’ मुगेन्द्राणां गर्जितैरिह तर्जिताः । पुञ्जीभूता निकुञ्जेषु पश्य तिष्ठन्ति साध्वसात् ॥४६॥
इधर देखिये, सिहोंकी गर्जनासे डरे हुए ये बन्दर भयसे इकट्ठे होकर लतामण्डपोंमें बैठे हुए हैं ।॥४६।।
Look here—frightened by the thunderous roars of lions, these monkeys have gathered together in fear and now sit huddled within the leafy bowers of the forest. ||46||
श्लोक ( Shlok ) 47
मुनीन्द्रपाठनिर्घोषेरितो रम्यमिदं वनम् । तृणाग्रकवलग्रासिकुरंगकुलसङ्कुलम् ॥४७॥
यह वन इधर तो बड़े बड़े मुनियोंके पाठ करने के शब्दोंसे रमणीय हो रहा है और इधर तृणोंके अग्रभागका ग्रास खानेवाले हरिणों के समहसे व्याप्त हो रहा है ॥ ४७।।
This forest, on one side, is made delightful by the sacred recitations of great sages, while on the other, it is filled with herds of deer grazing tenderly upon the tips of grass. ||47||
श्लोक ( Shlok ) 48
इतश्च हरिणाराति कठोरारयभीषणम् । विमुक्तकवलच्छेदप्रपलायितकुञ्जरम् ॥४८॥
इधर सिहोंके कठोर शब्दोंसे भयंकर हो रहा है और इधर खाना-पीना छोड़कर हाथियोंके समूह भाग रहे हैं ।॥४८।।
Here, the forest resounds with the fierce and fearsome roars of lions; and there, abandoning food and drink, herds of elephants flee in terror. ||48||
श्लोक ( Shlok ) 49
जरज्जरन्त श्रृङ्गाग्रक्षतवल्मीक रोधसः। इतो रम्या वनोद्देशा वराहोत्खातपल्वलाः ॥४ ९ ॥
इधर, जिनमें वृद्ध जंगली भैंसाओंने सींगोंकी नोकसे बामियोंके किनारे खोद दिये हैं और सुअरोंने छोटे छोटे तालाब खोद डाले हैं ऐसे ये सुन्दर सुन्दर वनके प्रदेश हैं ।॥४९।।
Here, in these beautiful forest regions, the aged wild buffaloes have dug at the edges of the streams with the points of their horns, and the boars have excavated small ponds with their tusks. ||49||
श्लोक ( Shlok ) 50
मृगैः प्रविष्टवेशन्तै ‘वंशस्तम्बोपगै र्गजेः । सूच्यते हरिणाक्रान्तं वनमेतद् भयानकम् ॥५०॥
छोटे छोटे तालाबोंमें घुसे हुए हरिणों और बाँसकी झाड़ियोंके समीप छिपकर खड़े हुए हाथियोंसे साफ साफ सूचित होता है कि इस भयंकर वनपर अभी अभी सिंहने आक्रमण किया है ॥५०॥
The deer, concealed in the small ponds, and the elephants, hidden near the bamboo thickets, clearly indicate that the fierce lion has only just launched an attack upon this dread forest. ||50||
श्लोक ( Shlok ) 51
वनप्रवेशिभि र्नित्यं नित्यं स्थण्डिलशायिभिः । न मुच्यतेऽयमद्रीन्द्रो मुगैर्मुनिगणैरपि ॥५१॥
सदा वनमें प्रवेश करनेवाले और सदा जमीनपर सोनेवाले हरिण और मुनियोंके समूह इस वनको कभी नहीं छोड़ते हैं ।।५१।।
The herds of deer and the groups of sages, who constantly enter the forest and forever rest upon the earth, never forsake this sacred woodland. ||51||
श्लोक 52 से 61
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41
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