आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 : सेना की रचना और योद्धाओं का उत्साह
सेना के रथ शस्त्रों से भरे थे, और रथी योद्धा पैदल सैनिकों से श्रेष्ठ प्रतीत होते थे। राजाओं ने हाथियों और घुड़सवारों की रक्षा के लिए शूरवीर नियुक्त किए। विभिन्न व्यूह रचनाओं (दण्ड, मण्डल, भोग, असंहृत) के साथ सेना तैयार हुई। योद्धा परस्पर प्रेरणादायक बातें करते हुए भरत के कार्यों की महिमा और विजय की आकांक्षा व्यक्त करते थे। कुछ सैनिक पर्वत और नदियों की बाधाओं से चिंतित थे, पर उत्साह के साथ शिविर में पहुँचे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
अस्त्रैर्व्यस्त्रैश्च शस्त्रैश्च शिरस्त्रैः सतनुत्रकैः । दधुर्जयनशालानां लीलां रथ्याः सुसम्भृताः।७२।
आग्नेय बाण आदि अस्त्र, महा-स्तम्भ आदि व्यस्त्र, तलवार धनुष आदि शस्त्र, शिरकी रक्षा करनेवाले लोहके टोप और कवच आदिसे भरे हुए रथोंके समूह ठीक आयुधशालाओंकी शोभा धारण कर रहे थे ।।७२।।
Chariots arrayed in splendid formation, bristling with fire-arrows and divine missiles, towering engines of war, gleaming swords and mighty bows, adorned with iron helms and mail that guarded the heads and hearts of warriors—stood resplendent, like mobile armories radiating the majesty of a grand arsenal.72
श्लोक ( Shlok ) 73
रथिनो रथकट्यासु गुर्वीरायुधसंपदः । समारोप्यापि पत्तिभ्यो भेजुरेवातिगौरवम् ॥७३॥
रथोंमें सवार होनेवाले योद्धा यद्यपि भारी भारी शस्त्रोंको रथोंपर रखकर जा रहे थे तथापि वे पैदल चलनेवाले सैनिकोंकी अपेक्षा अधिक गौरव अर्थात् भारीपन (पक्षमें श्रेष्ठता) को प्राप्त हो रहे थे। भावार्थ पैदल चलनेवाले सैनिक अपने शस्त्र कन्धेपर रखकर जा रहे थे और रथोंपर सवार होनेवाले सैनिक अपने सब शस्त्र रथोंपर रखकर जा रहे थे तो भी वे पैदल चलनेवालोंकी अपेक्षा अधिक भारी हो रहे थे यह बड़े आश्चर्यकी बात है परन्तु अति गौरव शब्दका अर्थ अतिशय श्रेष्ठता लेनेपर वह आश्चर्य दूर हो जाता है। पैदल सैनिकोंकी अपेक्षा रथपर सवार होनेवाले सैनिक श्रेष्ठ होते ही हैं ।॥ ७३।।
Though the warriors riding the chariots had laid down their heavy arms within the chariots themselves, while the foot soldiers bore their weapons upon their shoulders, yet the chariot-borne warriors appeared more weighty—more majestic—than those on foot.
A marvel indeed, that those relieved of burden should seem the weightier! Yet the wonder fades when one discerns the deeper truth: the word gāurava signifies not mere physical weight, but a loftiness of rank and splendor. And verily, those who ride the chariots are, by nature of their station, nobler than those who march on foot.73
श्लोक ( Shlok ) 74
हस्तिनां पदरक्षार्यै सुमभ योजिता नृपैः । राजन्यैः सह युध्वानः कृताश्चाभिनिषादिनः ॥७४।॥
राजाओंने हाथियोंके पैरोंकी रक्षा करनेके लिये जिन शूरवीर योद्धाओंको नियुक्त किया था वे अनेक राजाओंके साथ युद्ध करते थे और उन हाथियोंके चारों ओर विद्यमान रहते थे अथवा समय पर महावत भी बनाये जाते थे ।।७४।।
The valiant warriors appointed by the kings to guard the feet of their royal elephants were themselves seasoned in battle, having fought alongside many monarchs. Ever present around the elephants, they stood as living ramparts—at times even assuming the role of mahouts when the moment demanded.74
श्लोक ( Shlok ) 75
प्रवीरा राजयुध्यानः क्लृप्ताः पत्तिषु नायकाः । अश्वीये च ससन्नाहाः सोत्तरङ्गा स्तुरङ्गिणः ॥७५।।
जो राजाओंके साथ भी युद्ध करनेवाले थे ऐसे श्रेष्ठ शूर वीर पैदल सेनाके सेनापति बनाये गये थे और जो घुड़सवार कवच पहिने हुए तथा लहराते हुए नदीके प्रवाहके समान थे उन्हें घुड़सवार सेनाका सेनापति बनाया था ।।७५।।
Those foremost among warriors—so valiant that they had even contended in battle with kings—were appointed as commanders of the infantry. And those cavalrymen, clad in gleaming armor and swift as the flowing currents of a river, were chosen to lead the horse-mounted ranks.75
श्लोक ( Shlok ) 76
आरचय्य बलान्येके स्वानीक्षांचक्रिरे नृपाः । दण्डमण्डलभोगासंहृतव्यूहैः सुयोजितैः ॥७६॥
कितने ही राजा लोग अच्छी तरह रचे हुए दण्डव्यूह, (दण्डके आकार सेनाको सीधी रेखामें खड़ा रखना) मण्डल व्यूह, (मण्डलके आकार गोल चक्कर लगाकर खड़ा रखना), भोगव्यूह (अर्धगोला-कार खड़ा करना) और असंहृत व्यूह, (फैलाकर खड़ा करना) से अपनी सेनाकी रचना कर उसे देख रहे थे ॥७६।।
Many kings stood surveying their armies, arrayed in masterfully wrought formations—Daṇḍa-vyūha, straight as a staff; Maṇḍala-vyūha, circling like the turning heavens; Bhoga-vyūha, curved like a crescent moon; and the expansive Asaṁhṛta-vyūha, fanned wide in unconstrained display. With these grand arrays, the monarchs beheld their martial strength with regal pride.Verse 76
श्लोक ( Shlok ) 77 –79
चक्रिणोऽवसरः कोऽस्य योऽस्माभिः साध्यतेऽल्पकैः । भक्तिरेषा तु नः काले प्रभोर्यदनुसर्पणम् ॥७७।।प्रभोरवसरः सार्यः प्रसार्य नो यशोधनम् । विरोधिबलमुत्सार्य सन्धार्य पुरुषव्रतम् ॥७८॥द्रष्टव्या विविधा देशा लब्धव्याश्च जयाशिषः । इत्युदाचक्रिरे ऽन्योन्यं भटाः श्लाघ्यैरुदाहृतैः ॥७९।।
इस चक्रवर्तीका ऐसा कौन-सा कार्य है जिसका हम तुच्छ लोग स्मरण भी कर सकते हों अर्थात् कार्यका सिद्ध करना तो दूर रहा उसका स्मरण भी नहीं कर सकते, फिर भी हम लोग जो स्वामीके पीछे पीछे चल रहे हैं सो यह हम लोगोंकी इस समयपर होने वाली भक्ति ही है। हम लोगोंको स्वामीका कार्य सिद्ध करना चाहिये, अपना यशरूपी धन फैलाना चाहिये, शत्रुओंकी सेना दूर हटानी चाहिये, पुरुषार्थ धारण करना चाहिये, अनेक देश देखने चाहिये और विजयके अनेक आशीर्वाद प्राप्त करने चाहिये, इस प्रकार प्रशंसनीय उदाहरणों के द्वारा योद्धा लोग परस्परमें बातचीत कर रहे थे ।। ७७-७९।।
What deed of this universal emperor could we, humble as we are, even hope to recall—let alone accomplish? His works lie beyond the grasp of mere remembrance. And yet, we follow in his footsteps; this, in truth, is the devotion that arises within us in this solemn hour.
It is our duty to fulfill the will of our sovereign—to extend the glory of our own renown, to drive back the armies of the foe, to embody valor, to behold distant lands, and to win blessings of victory from many quarters.
Thus, in noble and spirited discourse, the warriors stirred one another with words worthy of emulation. 77–79
श्लोक ( Shlok ) 80
गिरिदुर्गोऽयमुल्लङ्घयो महत्यः सरितोऽन्तरा । इत्यपायेक्षिणः केचिदयानं बहु मेनिरे ॥८०॥
यह दुर्गम पर्वत उल्लंघन करना है और बीचमें बड़ी-बड़ी नदियाँ पार करनी हैं इस प्रकार अनेक विघ्न-बाधाओं का विचार करते हुए कितने ही लोग आगे नहीं जाना ही अच्छा समझते थे ।।८०।।
“To cross these forbidding mountains, to ford the great rivers that lie between—such perilous obstacles lie ahead,” thought many among them. And thus, weighed down by the thought of countless hindrances, not a few deemed it wiser to proceed no further. 80
श्लोक ( Shlok ) 81
इति नानाविधैर्भावै संजल्पेश्च लघुत्थिताः । प्रस्थिताः सैनिकाः प्रापन् सेश्वराः शिबिरं प्रभोः ॥८१॥
इस प्रकार अनेक प्रकारके भावों और परस्परकी बातचीतके साथ जल्दी उठकर जिन्होंने प्रस्थान किया है ऐसे सैनिक लोग अपने अपने स्वामियों सहित चक्रवर्तीके शिविरमें जा पहुंचे ॥८१॥
Thus, amid diverse sentiments and mutual exchanges of thought, the soldiers who rose early and set forth in haste, journeyed with their respective lords and at last arrived at the imperial camp of the Chakravartin. 81
श्लोक 82 से 91
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71