आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21
श्लोक 22 से 31 : नदियों का पार करना
भरत ने निमग्नजला (नीचे ले जाने वाली) और उन्मग्नजला (ऊपर उछालने वाली) नदियों की विषमता देखी। स्थपति (सिलावट) रत्न ने इनके प्रवाह को वायु प्रभाव से समझा और पुल बाँधने का निर्णय लिया। उसने वनों से बड़े वृक्ष मँगवाए और मजबूत खंभों पर क्षणभर में पुल तैयार किया। सेना ने आनंद के साथ कोलाहल किया और नदियों को पार कर दूसरी ओर पहुँची।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
तयोरारात्तटे सैन्यं निवेश्य भरतेश्वरः । वैषम्यमुभयोर्नद्योः प्रेक्षांञ्चक्रे सकौतुकम् ॥२२॥
महाराज भरतेश्वर उन दोनों नदियों के किनारेके समीप ही सेना ठहरा कर कौतुकके साथ उन दोनों नदियों की विषमता देखने लगे ।।२२।।
“King Bharata, halting his army near the banks of both rivers, stood in wonder as he observed the contrasting natures of the two rivers.” (22)
श्लोक ( Shlok ) 23
एकाऽधः पातयत्यन्या “दार्वाद्युत्प्लावत्यरम् । मिथोविरुद्धसाङ्गत्ये सङ्गते ते कथंचन ।॥२३॥
इन दोनोंमेंसे एक अर्थात् निमग्नजला तो लकड़ी आदिको शीघ्र ही नीचे ले जा रही है और दूसरी अर्थात् उन्मग्नजला प्रत्येक पदार्थको शीघ्र ही ऊपरकी ओर उछाल रही है। यद्यपि ये दोनों परस्पर विरुद्ध हैं तथापि किसी प्रकार यहाँ आकर सिन्धु नदीमें मिल रही है ॥२३॥
“Of the two, one—the Nimagna-jala—quickly carries down wood and other objects, while the other—the Unmagna-jala—swiftly propels them upward. Though these rivers are opposites in nature, they both converge here and merge into the Sindhu River.” (23)
श्लोक ( Shlok ) 24
नद्योरुत्तरणोपायः को नु स्यादिति तर्कयन् । द्रुतमाह्वापयामास तत्रस्थः स्थपतिं पतिः ॥२४॥
इन नदियोंके उतरनेका उपाय क्या है ? इस प्रकार विचार करते हुए चक्रवर्तीने वहां खड़े खड़े ही शीघ्र ही अपने स्थपति (सिलावट) रत्नको बुलाया ॥ २४।।
“Pondering how to resolve the descent of these rivers, the Emperor quickly summoned his chief architect (Sthapati), the master of the Silāvat gem, while still standing there.” (24)
श्लोक ( Shlok ) 25
‘तयोरारात्तटे पश्यन्नुत्पतन्निपतज्जलम् । दृष्टचैव तुलयामास’ जलाञ्जलिमिव क्षणम् ॥२५॥
जिनका पानी ऊपर तथा नीचेकी ओर जा रहा है ऐसी उन दोनों नदियोंको देखते हुए सिलावट रत्नने उन्हें अपनी दृष्टिमात्रसे ही क्षणभरमें अंजलि भर जलके समान तुच्छ समझ लिया ॥२५॥
“Upon observing the two rivers, whose waters flowed both upward and downward, the Silāvat gem, with a mere glance, regarded them as insignificant—no more than a handful of water in the palm of his hand.” (25)
श्लोक ( Shlok ) 26
उपर्युच्छ वासयत्येनां महान् वायुः स्फुरन्नधः । वायुस्तदन्यथावृत्ति रमुप्यां च विजृम्भते ॥२६॥
उसने समझ लिया कि इस उन्मग्नजला नदीको इसके नीचे रहनेवाला महावायु ऊपरकी ओर उछा-लता है और इस निमग्नजला नदीको उसके ऊपर रहनेवाला महावायु नीचेकी ओर ले जाता है ।।२६।।
“He deduced that the Unmagna-jala river, with the great wind below it, was propelled upward, while the Nimagna-jala river, with the great wind above it, was carried downward.” (26)
श्लोक ( Shlok ) 27
उपनाहादृते कोऽन्यः प्रतीकारोऽनयोरिति । भिषग्वर इवारेभे संक्रमोपक्रमं कृती ॥२७॥
इसलिये इन दोनोंका पुल बाँधनेके सिवाय और क्या उपाय हो सकता है ऐसा विचार कर उत्तम वैद्यके समान कार्यकुशल सिलावट रत्नने उन नदियोंके पार होनेका उपाय अर्थात् पुल बाँधनेका उपाय प्रारम्भ कर दिया ॥ २७॥
“Thinking that there was no other solution but to build a bridge across the two rivers, the skilled Silāvat gem, like an eminent physician, began the task of constructing a bridge to span the rivers.” (27)
श्लोक ( Shlok ) 28
अमानुषेष्वरण्येषु ये केचन महाद्रुमाः । स तानानाययामास दिव्यशक्त्यनुभावतः ॥२८॥
उसने अपनी दिव्य शक्तिकी सामर्थ्यसे निर्जन वनोंमें जो कुछ बड़े बड़े वृक्ष थे वे मँगवाये । भावार्थ अपने आश्रित देवोंके द्वारा सघन जंगलोंसे बड़े बड़े वृक्ष मँगवाये ॥२८॥
“Through the power of his divine abilities, he summoned from the desolate forests the great trees that stood there. In essence, he had large trees brought forth from the dense woodlands by his attendant deities.” (28)
श्लोक ( Shlok ) 29
सारदारुभिरुत्तम्भ्य स्तम्भानन्तर्जलस्थितान्। स्थपतिः स्थापयामास “तेषामुपरि सङ्क्रमम् ॥२ ९॥
उसने मजबूत लकड़ियोंके द्वारा जलके भीतर मजबूत खम्भे खड़े कर उनपर पुल तैयार कर दिया ॥२९॥
“With sturdy logs, he erected strong pillars within the water and upon them constructed the bridge.” (29)
श्लोक ( Shlok ) 30
बलव्यसनमाशङ्क्य चिरवृत्तौ स धीरधीः । क्षणान्निष्पादयामास सङ्क्रमं प्रभुशासनात् ॥३०॥
अधिक समय लगनेपर सेनाके दुःख होगा इस बातका विचार कर उस गंभीर बुद्धिके धारक सिलावटने भरतेश्वरकी आज्ञा से क्षण भरमें ही पुल तैयार कर दिया था ।॥३०॥
“Reflecting that delay would bring hardship to the army, the Silāvat, endowed with profound intellect, completed the bridge in but a moment—at the command of King Bharata.” (30)
श्लोक ( Shlok ) 31
कृतः कलकलः सैन्यैर्निष्ठिते सेतुकर्मणि । तदेव च बलं कृत्स्नमु त्ततार परं तटम् ॥३१॥
पुल तैयार होते ही सेनाओंने आनन्दसे कोलाहल किया और उसी समय चक्रवर्तीकी समस्त सेना उतरकर नदियोंके उस किनारे पर जा पहुंची ।॥३१॥
As soon as the bridge was completed, the armies raised a joyous tumult, and at that very moment, the entire imperial host descended and reached the farther shore of the rivers. ॥31॥
श्लोक 32 से 41
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21
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