आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |
श्लोक 22 से 31 जीव की दुःखमय यात्रा
पृथ्वीकायिक आदि योनियों में जीव को भारी दुख (खोदा जाना, तपाया जाना) सहना पड़ता है। मनुष्य योनि में भी जन्म, बुढ़ापा, मृत्यु जैसे दुख हैं। जीव संसार में कीचड़ में फँसी गाय की तरह भटकता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
पृथिव्यामप्सु वह्नौ च पवने सवनस्पतौ । बंभ्रम्यते महादुःखमश्नुवानो बताज्ञकः ॥२२॥
बड़े दुःख की बात है कि यह अज्ञानी जीव पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक जीवों में भारी दुःख भोगता हुआ निरंतर भ्रमण करता रहता है ।।22।।
“It is deeply sorrowful that this ignorant being continuously wanders, suffering immense pain in various life forms, including earth-bodied, water-bodied, fire-bodied, air-bodied, and plant-bodied creatures.”
श्लोक ( Shlok ) 23
खननोत्तापनज्वालिज्वालाविध्यापनै रपि ।घनाभिघातैश्छेदैश्च दुःखं तत्रैति दुस्तरम् ॥२३॥
यह जीव उन पृथ्वीकायिक आदि पर्यायों में खोदा जाना, जलती हुई अग्नि में तपाया जाना, बुझाया जाना, अनेक कठोर वस्तुओं से टकरा जाना, तथा छेदा-भेदा जाना आदि के कारण भारी दुःख पाता है ।।23।।
“This being suffers immense pain in the forms of earth-bodied and other creatures—being dug up, burned in blazing fire, extinguished, struck by hard objects, and pierced or torn apart in various ways.”
श्लोक ( Shlok ) 24
सूक्ष्मबादरपर्याप्त तद्विपक्षात्मयोनिषु । पर्यटत्यसकृज्जीवो घटीयन्त्रस्थितिं दधत् ।।२४।।
यह जीव घटीयंत्र की स्थिति को धारण करता हुआ सूक्ष्म बादर पर्याप्तक तथा अपर्याप्तक अवस्था में अनेक बार परिभ्रमण करता रहता है ।।24।।
This living being, assuming the state of a mechanical device (ghatiyantra), repeatedly wanders through subtle and gross sufficient (paryaptak) and insufficient (aparyaptak) conditions many times. ||24||
श्लोक ( Shlok ) 25
त्रसकायेष्वपि प्राणी बधबन्धोपरोधनैः । दुःखासिकामवाप्नोति “सर्वावस्थानुयायिनीम् ॥२५॥
त्रस पर्याय में भी यह प्राणी मारा जाना, बाँधा जाना और रोका जाना आदि के द्वारा जीवनपर्यंत अनेक दुःख प्राप्त करता रहता है ।।25।।
In the state of tras (a sentient being capable of movement), this creature continuously experiences various sufferings throughout its life due to being killed, bound, or restrained, etc. ||25||
श्लोक ( Shlok ) 26
जन्मदुःखं ततो दुःखं जरामृत्युस्ततोऽधिकम् । इति दुःखशतावर्ते जन्माब्धौ स निमग्नवान् ॥२६॥
सबसे प्रथम इसे जन्म अर्थात् पैदा होने का दुःख उठाना पड़ता है, उसके अनंतर बुढ़ापा का दुःख और फिर उससे भी अधिक मृत्यु का दुःख भोगना पड़ता है, इस प्रकार सैकड़ों दुःखरूपी भँवर से भरे हुए संसाररूपी समुद्र में यह जीव सदा डूबा रहता है ।।26।।
First, this being has to endure the suffering of birth. Then comes the suffering of old age, followed by the even greater suffering of death. In this way, the living being remains constantly submerged in the ocean of worldly existence, filled with hundreds of whirlpools of suffering. ||26||
श्लोक ( Shlok ) 27
क्षणान्नश्यन् क्षणाज्जीर्यन् क्षणाज्जन्म समाप्नुवन् । जन्ममृत्युजरातङ्कपङ्के मज्जति गौरिव ॥२७॥
यह जीव क्षण-भर में नष्ट हो जाता है, क्षण-भर में जीर्ण (वृद्ध) हो जाता है और क्षण-भर में फिर जन्म धारण कर लेता है इस प्रकार जन्म-मरण, बुढ़ापा और रोगरूपी कीचड़ में गाय की तरह सदा फंसा रहता है ।।27।।
This living being perishes in a moment, grows old in a moment, and takes birth again in a moment. In this way, it remains forever trapped, like a cow in the mire, in the filth of birth, death, old age, and disease. ||27||
श्लोक ( Shlok ) 28
अनन्तं कालमित्यज्ञस्तिर्यक्त्वे दुःखमश्नुते । दुःखस्य हि परं धाम तिर्यक्त्वं मन्वते जिनाः ॥२८॥
इस प्रकार यह अज्ञानी जीव तिर्यंच योनि में अनंत काल तक दुःख भोगता रहता है सो ठीक ही है क्योंकि जिनेंद्रदेव भी यही मानते हैं कि तिर्यंच योनि दुःखों का सबसे बड़ा स्थान है ।।28।।
Thus, this ignorant being continues to suffer in the Tiryanch (animal) realm for an infinite time. This is only natural, as even the Jinendra (omniscient beings) affirm that the Tiryanch realm is the greatest abode of suffering. ||28||
श्लोक ( Shlok ) 29
ततः कृच्छाद् विनिःसृत्य शिथिले दुष्कृते मनाक । मनुष्यभावमाप्नोति कर्मसारथिचोदितः ॥२९॥
तदनंतर अशुभ कर्मों के कुछ-कुछ मंद होने पर यह जीव उस तिर्यंच योनि से बड़ी कठिनता से बाहर निकलता है और कर्मरूपी सारथि से प्रेरित होकर मनुष्य पर्याय को प्राप्त होता है ।।29।।
Thereafter, as the effects of inauspicious karmas gradually weaken, this being struggles greatly to escape from the Tiryanch (animal) realm. Guided by the charioteer of karma, it eventually attains the human state. ||29||
श्लोक ( Shlok ) 30
तत्रापि विविधं दुःखं शारीरं चैव मानसम् । प्राप्नोत्यनिच्छुरेवात्मा निरुद्धः कर्मशत्रुभिः ॥३०॥
वहाँ पर भी यह जीव यद्यपि दुःखों की इच्छा नहीं करता है तथापि इसे कर्मरूपी शत्रुओं से निरुद्ध होकर अनेक प्रकार के शारीरिक और मानसिक दुःख भोगने पड़ते हैं ।।30।।
Even in the human state, though this being does not desire suffering, it is still obstructed by the enemies in the form of karma and has to endure various physical and mental sufferings. ||30||
श्लोक ( Shlok ) 31
पराराधनदारिद्रयचिन्ता शोकादिसम्भवम् । दुःखं महन्मनुष्याणां प्रत्यक्षं नरकायते ॥३१॥
दूसरों की सेवा करना, दरिद्रता, चिंता और शोक आदि से मनुष्यों को जो बड़े भारी दुःख प्राप्त होते हैं वे प्रत्यक्ष नरक के समान जान पड़ते हैं ।।31।।
The great sufferings that humans endure due to serving others, poverty, anxiety, and grief appear just like a living hell. ||31||
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
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