आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
श्लोक 142 से 151 : सेनापति की वापसी और सत्कार
सेनापति म्लेच्छ खंड को वश कर म्लेच्छ राजाओं की सेना के साथ लौटा, मानो मूर्तिमान प्रताप हो। उसने सिन्धु नदी और विजयार्थ पर्वत की वेदिका को पार किया, गुफा की गर्मी शांत कर उसकी रक्षा का उपाय किया। वापसी पर राजाओं ने नगाड़ों के साथ उसका स्वागत किया। वह राजमार्ग से भरत के डेरे में पहुँचा, सभामंडप में नमस्कार कर सत्कार प्राप्त किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
धर्मकर्मबहिर्भू ता इत्यमी म्लेच्छका मताः । अन्यथाऽन्यै समाचारैरार्यावर्तेन ते समाः ॥१४२ll
ये लोग धर्मक्रियाओंसे रहित हैं इसलिये म्लेच्छ माने गये हैं, धर्मक्रियाओंके सिवाय अन्य आचरणोंसे आर्य खण्डमें उत्पन्न होनेवाले लोगोंके समान हैं ।॥१४२।।
“These people are deemed Mlecchas because they are devoid of sacred rites; yet in all other conduct, they resemble those born in the Arya lands.” ॥१४२॥
श्लोक ( Shlok ) 143
इति प्रसाध्य तां भूमिमभूमि धर्मकर्मणाम् । म्लेच्छराजबलैः सार्द्ध सेनानीर्त्यवृतत् पुनः ।।१४३।।
इस प्रकार वह सेनापति, धर्मक्रियाओंसे रहित उस म्लेच्छभूमिको वश कर म्लेच्छराजाओंकी सेनाके साथ फिर वापिस लौटा ॥ १४३॥
“Thus did the commander, having brought that land of the Mlecchas—bereft of sacred rites—under his control, return, accompanied by the armies of the subdued Mleccha kings.” ॥१४३॥
श्लोक ( Shlok ) 144
रराज राजराजस्य साश्वरत्नचमूपतिः । सिद्धदिग्विजयी जैत्रः प्रताप इव मूर्तिमान् ॥१४४।॥
जिसने दिग्विजय कर लिया है, सबको जीतना ही जिसका स्वभाव है, और जो अश्वरत्नसे सहित है ऐसा वह राजाधि-राज भरतका सेनापति ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो मूर्तिमान् प्रताप ही हो ।॥१४४।।
“He who had conquered the quarters, to whom victory over all came as second nature, and who was adorned with the horse-jewel—such was the commander of the Emperor Bharata, resplendent as though he were the very embodiment of valour itself.” ॥१४४॥
श्लोक ( Shlok ) 145
सतोरणामतिक्रम्य स सिन्धोर्वनवेदिकाम् । विगाढश्च ससोपानां रूप्याद्रेस्तटवेदिकाम् ॥१४५।।
तोरणोंसहित सिन्धु नदीके वनकी वेदीको उल्लंघन कर वह सेनापति सीढियों सहित विजयार्ध पर्वतके वनकी वेदीपर जा चढ़ा ।। १४५।।
“Crossing the forested altar of the Sindhu River—adorned with archways—the commander ascended once more, mounting the forested platform upon the steps of Mount Vijayaardha.” ॥१४५॥
श्लोक ( Shlok ) 146
आरूढो जगतीमद्रेर्व्यूढोरस्को महाभुजः । षड्भिर्मासैः प्रशान्तोष्मं सोऽध्यवासीद् गुहामुखम् ।।१४६।।
जिसका वक्षःस्थल बहुत बड़ा है और जिसकी भुजाएँ बहुत लम्बी हैं ऐसा वह सेनापति पर्वतकी वेदिकापर चढ़कर छह महीने में जिसकी गर्मी शान्त हो गई है ऐसी गुफाके द्वारपर ठहर गया ।। १४६।।
“Broad of chest and long of arm, that commander ascended the mountain’s altar and halted before the cave—its entrance now stilled, the fierce heat within subdued over the course of six months.” ॥१४६॥
श्लोक ( Shlok ) 147
तत्रासीनश्च संशोध्य बह्वपायं गुहोहरम् । कृतारक्षाविधिः सम्यक् प्रत्यायाच्छिबिरं प्रभोः ॥१४७।।
वहाँ ठहरकर उसने अनेक विघ्नों से भरे हुए गुफाके भीतरी भागको शुद्ध (साफ) कराया और फिर अच्छी तरहसे उसकी रक्षा का उपाय कर वह चक्रवर्ती की छावनीमें वापिस लौट अया ।।१४७।।
“There he paused, and cleansing the interior of the cave—laden with many obstacles—he made arrangements for its careful protection. Then, having ensured all was in order, he returned to the Emperor’s encampment.” ॥१४७॥
श्लोक ( Shlok ) 148
अथ सम्मुखमागत्य ‘सानीकैर्नृपसत्तमैः । प्रत्यगृह्यत सेनानीः सजयानकनिस्वनम् ॥१४८॥
सेनापतिके वहां पहुंचने पर अनेक उत्तम उत्तम राजाओने अपनी सेनाओंके साथ सामने जाकर विजयसूचक नगाड़ोंके शब्दोंके साथ साथ उसका स्वागत-सत्कार किया ।। १४८।।
“Upon the commander’s arrival, many illustrious kings advanced with their armies to receive him, welcoming and honoring him to the resounding beat of victory drums.” ॥१४८॥
श्लोक ( Shlok ) 149
विभक्ततोरणामुच्चैः प्रचलत्केतुमालिकाम् । महावीथीमतिक्रम्य प्राविक्षत् स नृपालयम् ॥१४९॥
जिसमें अनेक तोरण लगे हुए हैं और जिसमें बहुत ऊँची अनेक पताकाओंके समूह फहरा रहे हैं ऐसे राजमार्गको उल्लंघन कर वह सेनापति महाराज भरतके डेरेमें प्रविष्ट हुआ ।। १४९।।
“Crossing the royal road adorned with many archways and fluttering with lofty clusters of banners, the commander entered the encampment of the great King Bharata.” ॥१४९॥
श्लोक ( Shlok ) 150
तुरङ्गमवरादूरात् कृतावतरणः कृती । प्रभोर्नृपासनस्थस्य प्रापदास्थानमण्डपम् ॥१५०॥
वह व्यवहारकुशल सेनापति दूरसे ही उत्तम घोड़ेपर से उतर पड़ा और जहाँ महाराज भरत राजसिंहासनपर बैठे हुए थे उस सभा-मण्डपमें जा पहुँचा ॥१५०।।
“That wise and diplomatic commander dismounted from his noble steed at a distance, and proceeded into the royal pavilion where King Bharata sat enthroned upon the regal seat.” ॥१५०॥
श्लोक ( Shlok ) 151
दूरानत चलन्मौलिसंदष्टकरकुडमलः । प्रणनाम प्रभु सभ्यै र्वीक्ष्यमाणः सविस्मितैः ।।१५१।।
दूरसे ही झुके हुए चंचल मुकुटपर जिसने अपने दोनों हाथ जोड़कर रखे हैं और सभासद् लोग जिसे आश्चर्य के साथ देख रहे हैं ऐसा सेनापतिने महाराज भरतको नमस्कार किया ।।१५१॥
“With his restless crown bowed from afar, and his hands joined in reverence upon it, the commander offered obeisance to King Bharata—while the assembled courtiers gazed upon him with wonder.” ॥१५१॥
श्लोक 152 से 159
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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