आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61: विजयार्थ पर्वत की विजय और उत्तरार्ध की आकांक्षा
विजयार्थ पर्वत की विजय को दक्षिण भारत की विजय मानकर भरत ने चक्ररत्न की पूजा की। फिर भी, उत्तरार्ध जीतने की उनकी आकांक्षा बनी रही। सेना पर्वत की पश्चिम गुहा के समीप ठहरी, जहाँ भरत ने कई दिन बिताए। गंगा और सिन्धु के बीच के राजा उनके दर्शन को आए और भेंट स्वरूप रत्न आदि अर्पित किए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
विजयाद्धे जिते कृत्स्नं जितं दक्षिणभारतम् । मन्वानो निधिराट् तच्च चक्ररत्नमपूजयत् ॥५२॥
विजयार्ध पर्वतके जीत लेनेपर समस्त दक्षिण भारत जीत लिया गयाऐसा मानते हुए चक्रवर्ती ने चक्ररत्नकी पूजा की ॥५२॥
“Believing that the conquest of the Vijayārddha mountain signified the subjugation of all of South India, the Emperor, the Chakravartin, offered his devout worship to the sacred Chakraratna, the jewel of the wheel of sovereignty.”ै
श्लोक ( Shlok ) 53
गन्धै पुष्पश्च धूपैश्च दीपैश्च सजलाक्षतैः । फलैश्च चरुर्भि दिव्यैश्चक्रेज्यां निरवर्तयत् ॥५३॥
उन्होंने चक्ररत्नकी पूजा गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, जल, अक्षत, फल और दिव्य नैवेद्यके द्वारा की थी ॥५३॥
He offered his worship to the Chakraratna with reverent offerings of fragrant incense, flowers, lamps, water, unbroken rice, fruits, and divine food, each gesture infused with sacred devotion.”
श्लोक ( Shlok ) 54
विजयार्द्धजयेऽप्यासीद मन्दोऽस्य जयोद्यमः । उत्तरार्द्धजयाशंसां प्रत्यागूर्णस्य चक्रिणः ॥५४।।
विजयार्ध पर्वत तक विजय कर लेनेपर भी उत्तरार्ध को जीतनेकी आशासे उद्यत हुए चक्रवर्ती का विजयका उद्योग शिथिल नहीं हुआ था ।॥ ५४।।
“Though he had conquered up to the Vijayārddha mountain, the Chakravartin’s resolve for victory did not waver; with his gaze set upon the conquest of the northern realm, his campaign pressed forward undeterred.”
श्लोक ( Shlok ) 55
ततः प्रतीपमागत्य रूप्याद्रः पश्चिमां गुहाम् । निकषा वनमारुध्य बलैरीशो न्यविक्षत ।।५५।।
तदनन्तर-वह भरत कुछ पीछे लौटकर विजयार्ध पर्वतकी पश्चिम गुहाके समीपवर्ती वनको अपनी सेनाके द्वारा घेरकर ठहर गया ।। ५५।।
“Thereafter, Bharata retraced his steps slightly and, halting near the western cave of the Vijayārddha mountain, encamped with his army, surrounding the adjoining forest on all sides.”55
श्लोक ( Shlok ) 56
दक्षिणेन तमद्रीन्द्र मध्ये वेदिकयोर्द्वयोः । बलं निविविशे भर्तुः सिन्धोस्तटवनाद् बहिः ॥५६।।
विजयार्थ पर्वतके दक्षिणकी ओर पर्वत तथा वन दोनोंकी वेदियोंके बीचमें सिन्धु नदी के किनारेके वन के बाहर भरत की सेना ठहरी थी ।॥५६॥
“On the southern side of the Vijayārddha mountain, between the ridges of the hills and the forest, and just beyond the woodland that bordered the banks of the Sindhu river, Bharata’s army had encamped.”56
श्लोक ( Shlok ) 57
भूयो द्रष्टव्यमत्रास्ति बह्वाश्चर्ये धराधरे । इति तत्र चिरावासं बहु मेने किलाधिराट् ॥५७।।
अनेक आश्चर्योसे भरे हुए इस पर्वतपर बहुत कुछ देखने योग्य है यही समझकर चक्रवर्तीने वहां बहुत दिन तक रहना अच्छा माना था ।।५७।।
“Deeming the Vijayārddha mountain—adorned with countless marvels and filled with sights of rare wonder—worthy of deeper acquaintance, the Chakravartin resolved to dwell there for many days.”57
श्लोक ( Shlok ) 58
चिरासनेऽपि तत्रास्य नासीत् स्वल्पोऽप्युपक्षयः । प्रत्युतापूर्वलाभेन प्रभुरापूर्यताब्धिवत् ॥५८॥
वहाँपर बहुत दिनतक रहनेपर भी भरतका थोड़ा भी खर्च नहीं हुआ था, बल्कि अपूर्व अपूर्व वस्तुओंके लाभ होनेसे वह समुद्रके समान भर गया था ।।५८।।
“Though he remained there for many days, Bharata’s wealth did not diminish in the least; on the contrary, through the gain of wondrous and unprecedented treasures, he swelled like the ocean in fullness.” 58
श्लोक ( Shlok ) 59
कृतासनं च तत्रैनं श्रुत्वा द्रष्टुमुपागमन् । पार्थिवाः पृथिवीमध्यात् मध्ये नद्योर्द्वयोः स्थितः ॥५९॥
भरतको वहां रहता हुआ सुनकर गङ्गा और सिन्धु दोनों नदियोंके बीचमें रहनेवाले अनेक राजा लोग अपनी अपनी पृथिवी से उनके दर्शन करनेके लिये आये थे ॥५९॥
“Hearing of Bharata’s stay in that sacred place, many kings dwelling between the Ganga and Sindhu rivers came forth from their own realms, drawn by the desire to behold him.”59
श्लोक ( Shlok ) 60
दूरानतचलन्मौलिसंदष्टकरकुट्मलाः । प्रणमन्तः स्फुटीचक्रुः प्रभौ भक्ति महीभुजः ॥६०॥
दूरसे झुके हुए चंचल मुकुटोंपर जिन्होंने अपने हाथ जोड़कर रक्खे हैं ऐसे नमस्कार करते हुए राजा लोग महाराज भरतमें अपनी भक्ति प्रकट कर रहे थे ॥ ६०॥
“From afar, the assembled kings bowed low, their hands joined in reverence resting upon their quivering crowns—thus did they offer their devotion to the great Emperor Bharata.”60
श्लोक ( Shlok ) 61
कुङ्कुमागरु कर्पूर सुवर्णमणिमौक्तिकैः । रत्नैरन्यैश्च रत्नेशं भक्त्यानर्चुर्नृपाः परम् ॥६१॥
उन राजाओंने केशर, अगुरु, कपूर, सुवर्ण, मोती, रत्न तथा और भी अनेक वस्तुओंसे भक्तिपूर्वक चक्रवर्तीका उत्तम सन्मान किया था ।। ६१।।
“Those kings, with deep devotion, offered the supreme honour to the Chakravartin through gifts of saffron, aloeswood, camphor, gold, pearls, gems, and many other precious offerings.”61
श्लोक 62 से 71
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51