आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208
श्लोक 209 से 221 अभिषेक के जल स्रोत
अभिषेक के लिए गंगा, सिंधु, क्षीरसमुद्र आदि का जल लाया गया। भगवान की शोभा और प्रभाव का वर्णन।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 209 to 221
श्लोक ( Shlok ) 209
गङ्गासिन्ध्यो र्महानद्योरप्राप्य धरणीतलम् । प्रपाते हिमवत् कूटाद् यदम्बु समुपाहृतम् ॥२०९॥
भगवान् के राज्याभिषेक के लिए गंगा और सिंधु इन दोनों महानदियों का वह जल लाया गया था जो हिमवतपर्वत की शिखर से धारा रूप में नीचे गिर रहा था तथा जिसने पृथ्वीतल को छुआ तक भी नहीं था । भावार्थ―नीचे गिरने से पहले ही जो बरतनों में भर लिया गया था ।।209।
“For the coronation of Lord Rishabhadeva, the sacred water was brought from the great rivers Ganga and Sindhu. This water originated from the peaks of the Himalayas, flowing down in pure streams, and had never touched the earth—it was collected mid-air before reaching the ground.”
श्लोक ( Shlok ) 210
यच्च गाङ्गं पयः स्वच्छं गङ्गाकुण्डात् समाहृतम् । सिन्धुकुण्डादुपानीतं सिन्धोर्यत् कमपङ्ककम् ॥ २१०
इसके सिवाय गंगाकुंड से गंगा नदी का स्वच्छ जल लाया गया था और सिंधुकुंड से सिंधु नदी का निर्मल जल लाया गया था ।।210।।
“Apart from this, pure water was brought from the Ganga river at Ganga Kund and pristine water from the Sindhu river at Sindhu Kund.”
श्लोक ( Shlok ) 211
शेषव्योमापगानां च सलिलं यदनाविलम् । तत्तत्कुण्डतदापात समासादितजन्मकम् ॥२११॥
इसी प्रकार ऊपर से पड़ती हुई अन्य नदियों का स्वच्छ जल भी उनके गिरने केकुंडों से लाया गया था ।।211।।
“Similarly, the pure water of other cascading rivers was also brought from the pools where their streams descended.”
श्लोक ( Shlok ) 212
श्रीदेवीभिर्यदानीतं पद्मादिसरसां पयः हेमारविन्दकिञ्जल्कपुञ्जसंजातरञ्जनम् ॥२१२॥
श्री ह्री आदि देवियाँ भी पद्म आदि सरोवरों का जल लायी थीं जो कि सुवर्णमय कमलों की केसर के समूह से पीतवर्ण हो रहा था ।।212।।
“The divine goddesses, Shri, Hri, and others, also brought water from lotus-filled lakes. This water had turned golden-yellow due to the pollen of golden lotuses.”
श्लोक ( Shlok ) 213
यद्वारि सारसं हारिकह्लारस्वादु सोत्पलम् । यच्च तन्मौक्तिकोद्गार शारं लावणसैन्धवम् ॥२१३॥
सायंकाल के समय खिलने वाले सुगंधित कमलों की सुगंध से मधुर, अतिशय मनोहर और नीलकमलों सहित तालाबों का जल लाया गया था । जो बाहर प्रकट हुए मोतियों के समूह से अत्यंत श्रेष्ठ है ऐसा लवणसमुद्र का जल भी लाया गया था ।।213।।
“Water was brought from ponds filled with blue lotuses, carrying the sweet fragrance of aromatic lotuses that bloom in the evening, making it extremely pleasant and enchanting. Additionally, water from the Salt Ocean was also brought, which was considered highly pure and excellent, as it contained clusters of naturally occurring pearls.”
श्लोक ( Shlok ) 214
यास्ता नन्दीश्वरद्वीपे वाप्यो नन्दोत्तरादयः । सुप्रसन्नोदकास्तासामापो याश्च विकल्मषाः ॥२१४॥
नंदीश्वर द्वीप में जो अत्यंत स्वच्छ जल से भरी हुई नंदोत्तरा आदि वापिकाएँ हैं उनका भी स्वच्छ जल लाया गया था ।।214।।
“In Nandishwar Dweep, the extremely pure water from the sacred ponds like Nandottara was also brought.”
श्लोक ( Shlok ) 215
यच्चाम्भः संभृतं क्षीरसिन्धो र्नन्दीश्वरार्णवात् । स्वयंभूरमणाब्धेश्च दिव्यैः कुम्भेहिरण्मयैः ॥२१५॥
इसके सिवाय क्षीरसमुद्र, नंदीश्वर समुद्र तथा स्वयंभूरमण समुद्र का भी जल सुवर्ण के बने हुए दिव्य कलशों में भरकर लाया गया था ।।215।।
“Besides this, the water from Kshira Samudra, Nandishwar Samudra, and Swayambhuraman Samudra was also brought in divine golden pitchers.”
श्लोक ( Shlok ) 216
इत्याम्ना तैर्जलैरेभिरभिषिक्तो जगद्गुरुः । स्वयंपूततमेर रपुनान तानि केवलम् ॥२१६॥
इस प्रकार ऊपर कहे हुए प्रसिद्ध जल से जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव का अभिषेक किया गया था । चूँकि भगवान् का शरीर स्वयं ही पवित्र था अत: अभिषेक से वह क्या पवित्र होता ? केवल भगवान् ने ही अपने स्वयं पवित्र अंगों से उस जल को पवित्र कर दिया था ।।216।।
“In this way, the Jagadguru Bhagwan Rishabhdev was anointed with the renowned and sacred waters mentioned earlier. Since the Lord’s body was inherently pure, how could the anointment make Him purer? Rather, it was Bhagwan Himself who sanctified the water with His own divine and pure being.”
श्लोक ( Shlok ) 217
सुरैरावर्जिता वारां धारा मुर्ध्नि विभोरभात् । राजलक्ष्म्या निवेशोऽयमिति धारेव पातिता ॥२१७॥
उस समय भगवान के मस्तक पर देवों के द्वारा छोड़ी हुई जल की धारा ऐसी शोभायमान हो रही थी मानो उस मस्तक को राज्यलक्ष्मी का आश्रय समझ कर ही छोड़ी गयी हो ।।217।।
“At that moment, the stream of water poured by the gods onto Bhagwan’s head appeared so magnificent, as if it had been offered considering His head to be the very abode of royal prosperity.”
श्लोक ( Shlok ) 218
चराचरगुरोर्मूध्नि पतन्त्यो रेजुरप्छटाः । जगत्तापच्छिदः स्वच्छा गुणानामिव संपदः ॥२१८॥
चर और अचर पदार्थों के गुरु भगवान् वृषभदेव के मस्तक पर पड़ती हुई जल की छटाएं ऐसी शोभायमान होती थीं मानो संसार का संताप नष्ट करने वाली और निर्मल गुणों की संपदाएं ही हों ।।218।।
“The sparkling streams of water falling on the head of Bhagwan Rishabhdev, the supreme teacher of both animate and inanimate beings, appeared as if they were the very treasures of pure virtues, capable of destroying the suffering of the world.”
श्लोक ( Shlok ) 219
सुरेन्द्ररभिषिक्तस्य सलिलैः “सौरसैन्धवैः । निसर्गशुचिगात्रस्य पराशुद्धिरभूद् विभोः ॥२१९॥
यद्यपि भगवान् का शरीर स्वभाव से ही पवित्र था तथापि इंद्र ने गंगा नदी के जल से उसका अभिषेक किया था इसलिए उसकी पवित्रता और अधिक हो गयी थी ।।219।।
“Although Bhagwan’s body was inherently pure by nature, Indra performed His anointment with the water of the Ganga River, thereby further enhancing its sanctity.”
श्लोक ( Shlok ) 220
नाकीन्द्राः क्षालयाञ्चकु र्विभोनाङ्गानि केवलम् । प्रेक्षकाणां मनोवृतिं नेत्राण्यपे धनान्यपि ॥२२०॥
उस समय इंद्रों ने केवल भगवान् के अंगों का ही प्रक्षालन नहीं किया था किंतु देखने वाले पुरुषों की मनोवृत्ति, नेत्र और शरीर का भी प्रक्षालन किया था । भावार्थ―भगवान का राज्याभिषेक देखने में मनुष्य के मन, नेत्र तथा समस्त शरीर पवित्र हो गये थे ।।220।।
“At that time, the Indras did not merely cleanse Bhagwan’s divine body but also purified the minds, eyes, and bodies of those who beheld the sacred ceremony.
Meaning: Witnessing Bhagwan’s consecration sanctified the hearts, vision, and entire being of the spectators.”
श्लोक ( Shlok ) 221
नृत्यत्सुराङ्गनापाङ्गशरास्तस्मिन् प्लवेऽम्भसाम्। पायिता नु जलं तीव्रं यच्चेतांस्यभिदन् नृणाम् ॥ २२१॥
उस समय नृत्य करती हुई देवांगनाओं के कटाक्षरूपी बाण उस जल के प्रवाह में प्रतिबिंबित हो रहे थे इसलिए ऐसे मालूम होते थे मानो उन पर तेज पानी रखा गया हो और इसलिए वे मनुष्यों के चित्त को भेदन कर रहे थे । भावार्थ―देवांगनाओं के कटाक्षों से देखने वाले मनुष्य के चित्त भिद जाते थे ।।221।।
“At that time, the glances of the dancing celestial maidens were reflected in the flowing streams of water, making it appear as if sharp, radiant arrows had been placed upon them, piercing the hearts of the onlookers.
Meaning: The captivating glances of the celestial maidens deeply touched and enchanted the minds of those who beheld them.”
श्लोक 222 से 231
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
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