आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93
श्लोक 94 से 101 भगवान का संबोधन
भगवान ने दोनों पुत्रियों को गोद में बिठाकर प्रेम से विद्या की महत्ता बताई। विद्या को यश, कल्याण, और मनोरथ पूर्ण करने वाली बताया।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 94 to 101
श्लोक ( Shlok ) 94 – 95
प्रणते ते समुत्थाप्य दूरान्नमितमस्तके । प्रीत्या स्वमङ्कमारोप्य स्पृष्ट्वाघ्राय च मस्तके ।।९४।।
सप्रहासमुवाचैवमेतं मन्ये सुरैः समम् । यास्यथोऽद्यामरोद्यानं नैवमेते गताः सुराः ॥९५॥
दूर से ही जिनका मस्तक नम्र हो रहा है ऐसी नमस्कार करती हुई उन दोनों पुत्रियों को उठाकर भगवान् ने प्रेम से अपनी गोद में बैठाया, उनपर हाथ फेरा, उनका मस्तक सूँघा और हँसते हुए उनसे बोले कि आओ, तुम समझती होगी कि हम आज देवों के साथ अमरवन को जायेंगी परंतु अब ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि देव लोग पहले ही चले गए हैं ।।94-95।।
Seeing the two daughters bowing humbly from a distance, the Lord lovingly lifted them up, placed them on His lap, gently caressed them, and affectionately touched their foreheads with His nose. Smiling, He said, “Come, my dear ones. You may have thought that today we would go to Amaravana with the gods, but that is no longer possible, for they have already departed.”
श्लोक ( Shlok ) 96
इस्याक्रीड्य क्षणं भूयोऽप्येवमाख्यद् गिरांपत्तिः । युवां युवजरत्यौ स्थः शीलेन विनयेन च ॥९६।।
इस प्रकार भगवान् वृषभदेव क्षणभर उन दोनों पुत्रियों के साथ क्रीड़ा कर फिर कहने लगे कि तुम अपने शील और विनयगुण के कारण युवावस्था में भी वृद्धा के समान हो ।।96।।
Thus, Lord Vrishabhadeva played with His two daughters for a moment and then said, “Because of your modesty and humility, even in your youth, you possess the wisdom and grace of the elderly.”
श्लोक ( Shlok ) 97
इदं वपुर्वयश्चेदमिदं शीलमनीदृशम् । विद्यया चेद्विभूष्येत सफलं जन्म वामिदम् ॥९७॥
तुम दोनों का यह शरीर, यह अवस्था और यह अनुपम शील यदि विद्या से विभूषित किया जाये तो तुम दोनों का यह जन्म सफल हो सकता है ।।97।।
“If your bodies, this state, and this unique character are adorned with knowledge, then your birth can be truly meaningful.”
श्लोक ( Shlok ) 98
विद्यावान् पुरुषो लोके संमति याति कोविदैः । नारी च तद्वती धते स्रीसृष्टेरग्रिमं पदम् ॥९८॥
“In this world, a knowledgeable man is respected even by scholars, and a woman endowed with knowledge attains the highest position.”
इस लोक में विद्यावान् पुरुष पंडितों के द्वारा भी सम्मान को प्राप्त होता है और विद्यावती स्त्री भी सर्वश्रेष्ठ पद को प्राप्त होती है ।।98।।
श्लोक ( Shlok ) 99
विद्या यशस्करी पुंसां विद्या श्रेयस्करी मता । सम्यगाराधिता विद्यादेवता कामदायिनी ॥९९॥
विद्या ही मनुष्यों का यश करने वाली है, विद्या ही पुरुषों का कल्याण करने वाली है अच्छी तरह से आराधना की गयी विद्या देवता ही सब मनोरथों को पूर्ण करने वाली है ।।99।।
“Knowledge alone brings glory to humans; knowledge alone ensures the well-being of men. Properly revered knowledge itself is the deity that fulfills all desires.”
श्लोक ( Shlok ) 100
विद्या कामदुहा घेनुर्विद्या चिन्तामणिर्नृणाम् । त्रिवर्गफलितां सूते विद्या संपत्परम्पराम् ॥१००॥
विद्या मनुष्यों के मनोरथों को पूर्ण करने वाली कामधेनु है, विद्या ही चिंतामणि है, विद्या ही धर्म, अर्थ तथा काम रूप फल से सहित संपदाओं की परंपरा उत्पन्न करती है ।।100।।
“Knowledge is like the wish-fulfilling Kamadhenu for humans, it is like the Chintamani (a magical gem that grants desires). Knowledge itself gives rise to the continuous wealth of Dharma (righteousness), Artha (prosperity), and Kama (desires).”
श्लोक ( Shlok ) 101
विद्या बन्धुश्च मित्रं च विद्या कल्याणकारकम् । सहयायि धनं विद्या विद्या सर्वार्थसाधनी ॥१०१॥
विद्या ही मनुष्यों का बंधु है, विद्या ही मित्र है, विद्या ही कल्याण करने वाली हे, विद्या ही साथ-साथ जाने वाला धन है और विद्या ही सब प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली है ।।101।।
“Knowledge itself is a person’s relative, knowledge is a true friend, knowledge brings well-being, knowledge is the wealth that always stays with you, and knowledge fulfills all purposes.”
श्लोक 102 से 111
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93