आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71
श्लोक 72 से 81 : विन्ध्याचल का सौन्दर्य और विविधता
विन्ध्याचल का वन हाथियों, सर्पों, काँटों और उपद्रवी लोगों से युक्त था, जो इसे दुखदायी बनाता था। वन में विरोधाभास था—मदोन्मत्त हाथियों से युक्त होने पर भी यह समुद्री नमक और शोभंजन लताओं से समृद्ध था। फटे बाँसों से मोतियाँ बिखरती थीं, मानो वनलक्ष्मी हँस रही हो। गुफाओं से झरनों की गंभीर ध्वनि पर्वत की महिमा को कुलाचलों से स्पर्धा करती प्रतीत हुई। पर्वत का विविध रंग, धातुएँ और हरिणों के वर्ण विचित्र आकार बनाते थे। रात में औषधियाँ दीपकों की तरह चमकती थीं। सिंहों द्वारा मारे गए हाथियों के मोतियों से प्रदेश फ बिखरे फूलों जैसा लगता था। चक्रवर्ती भरत ने विन्ध्याचल पर भील और हाथियों को देखा, जो मेघ जैसे काले थे। नदियों को उन्होंने स्त्रियों के समान उत्कंठा से देखा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 30 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
समातङ्गं वनं यस्य सभुजङ्ग परिग्रहम् । विजाति कण्टकाकीर्ण क्वचिद्धत्तेऽतिकष्टताम् ॥७२॥
उस पर्वतका वन कहीं कहीं मातंग अर्थात् हाथियोंसे सहित था अथवा मातंग अर्थात् चांडालोंसे सहित था, भुजंग अर्थात् सर्पोंके परिवारसे युक्त था अथवा भुजंग अर्थात् नीच (विटगुंडे) लोगोंके परिवारसे युक्त था और अनेक प्रकारके काँटोंसे भरा हुआ था अथवा अनेक प्रकारके उपद्रवी लोगोंसे भरा हुआ था इसलिये वह बहुत ही दुःखदायी अथवा शोचनीय अवस्थाको धारण कर रहा था ।।७२।।
That forest upon the mountain was, in places, inhabited by mātaṅgas—either herds of elephants or outcast tribes; it was filled with bhujaṅgas—either serpents or vile, degenerate men; and it teemed with countless thorns—whether of the plant or the troubling human kind. Thus did it appear to be in a state of deep affliction, evoking both sorrow and suffering.72
श्लोक ( Shlok ) 73
क्षीब कुञ्जरयोगेऽपि क्वचिदक्षीबकुञ्जरम् । विपत्रमपि सत्पत्रपल्लवं भाति यद्वनम् ॥७३॥
उस पर्वतपरका वन क्षीबकुंजर अर्थात् मदोन्मत्त हाथियोंसे युक्त होकर भी अक्षीबकुंजर अर्थात् मदोन्मत्त हाथियोंसे रहित था, और विपत्र अर्थात् पत्तोंसे रहित होकर भी सत्पत्रपल्लव अर्थात् पत्तों तथा कोंपलोंसे सहितथा इस प्रकार विरोधरूप होकर भी सुशोभित हो रहा था। भावार्थ इस श्लोकमें विरोधा-भास अलंकार है, विरोध ऊपर दिखाया जा चुका है अब उसका परिहार देखिये- वहाँका वन क्षीवकुंजर अर्थात् मदोन्मत्त हाथियोंसे युक्त होनेपर भी अक्षीबकुंजर अर्थात् समुद्री नमक तथा हाथीदाँतोंको देनेवाला था अथवा सोहाजनाके लतामण्डपोंको प्रदान करनेवाला था और विपत्र अर्थात् पक्षियोंके पंखोंसे सहित होकर भी उत्तम पत्तों तथा नवीन कोंपलोंसे सहित था (अक्षीबं च कुञ्जश्चेत्यक्षीबकुञ्जौ, तो राति ददातीत्यक्षीबकुञ्जरम् अथवा ‘अक्षीबाणां शोभाञ्जनानां कुञ्ज लतागृहं राति ददाति’, ‘सामुद्रं यत्तु लवणमक्षीबं वशिरं च तत्’ ‘कुञ्जो दन्तेऽपि न स्त्रियाम्’ ‘शोभाञ्जने शित्रुतीक्ष्णगन्धकाक्षीवैमोचकाः इति सर्वत्रामरः) ।।७३।।
The forest upon that mountain, though teeming with kṣībakunjaras—elephants maddened by rut—yet seemed devoid of akṣībakunjaras—those that yield salt and ivory; though bereft of vipatra—leaves—yet appeared adorned with satpatra-pallava—tender foliage and fresh shoots. Thus, though cloaked in seeming contradiction, it shone in beauty.
(For in truth, it was abundant with akṣībakunjaras—those that bestow gifts such as sea-salt or fine ivory, or even graceful vine-lattices fashioned from śobhāñjana trees; and though called vipatra, it was indeed adorned with feathers of birds, while still graced with excellent leaves and budding greens.)
श्लोक ( Shlok ) 74
स्फुटद्वेणूदरोन्मुक्तैर्व्यस्तैर्मुक्ताफलैः क्वचित् । वनलक्ष्म्यो हसन्तीव स्फुटद्दन्तांशु यद्वने ॥७४॥
उस पर्वतके वनमें कहीं कहीं पर फटे हुए बांसोंके भीतरसे निकल-कर चारों ओर फैले हुए मोतियोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो वनलक्ष्मियां ही दाँतोंकी किरणें फैलाती हुई हँस रही हों ।॥ ७४।।
n that forest upon the mountain, from the torn hollows of bamboos, pearls had scattered and spread in all directions—so that it seemed as though the forest-goddesses themselves were laughing, their smiles adorned with the radiant gleam of pearly teeth.
श्लोक ( Shlok ) 75
गुहामुखस्फुरद्धीरनिर्झरप्रतिशब्दकैः । गर्जतीव कृतस्पर्धो महिम्ना यः कुलाचलैः ॥७५॥
गुफाओंके द्वारोंसे निकलती हुई झरनोंकी गंभीर प्रतिध्वनियों से वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो अपनी महिमाके कारण कुलाचलोंके साथ स्पर्धा करता हुआ गरज ही रहा हो ।। ७५।।
From the mouths of its caves issued the deep, resounding echoes of waterfalls, and the mountain seemed as though it were roaring aloud—vying in majesty with the noble lords of peaks, the great Kulācalas, as if in proud rivalry of its own grandeur.75
श्लोक ( Shlok ) 76
*स्फुटनिम्नोन्नतोद्देशैश्चित्रवर्णैश्च धातुभिः। मृगरूपैरतकर्येश्च चित्राकारं बिभर्ति यः ॥७६॥
वह पर्वत ऊँचे नीचे प्रदेशोंसे, अनेक रंगकी धातुओंसे और हरिणोंके अचिन्तनीय वर्णोंसे प्रकट रूप ही एक विचित्र प्रकारका आकार धारण कर रहा था ।।७६।।
That mountain, with its undulating slopes, its veins of multicolored ores, and the unimaginable hues of the deer that roamed its flanks, appeared in form as though it had assumed a wondrous and fantastical shape—an ever-shifting vision of marvel.76
श्लोक ( Shlok ) 77
ज्वलन्त्यौषधयो यस्य वनान्तेषु तमीमुखे । देवताभिरिवोत्क्षिप्ता दीपिकास्तिमिरच्छिदः ॥७७॥
उस पर्वतके वनोंमें रात्रि प्रारम्भ होनेके समय अनेक प्रकारकी औषधियाँ प्रकाश-मान होने लगती थीं जो कि ऐसी जान पड़ती थीं मानों देवताओंने अन्धकारको नष्ट करनेवाले दीपक ही जलाकर लटका दिये हों ।॥७७॥
As night began to fall upon the forests of that mountain, countless medicinal herbs began to glow with their own light—so that it seemed as though the gods themselves had kindled and hung luminous lamps to dispel the gathering darkness.77
श्लोक ( Shlok ) 78
क्वचिन्मृगेन्द्रभिन्नेभकुम्भो च्चलितमौक्तिकैः । मदुपान्तस्थलं धत्ते प्रकीर्णकुसुमश्रियम् ॥७८॥
कहीं कहींपर उस पर्वतके समीपका प्रदेश, सिहों के द्वारा फाड़े हुए हाथियोंके मस्तकोंसे उछलकर पड़े हुए मोतियोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो बिखरे हुए फूलोंकी शोभा ही धारण कर रहा हो ॥७८॥
In certain places near that mountain, the ground was strewn with pearls flung from the torn heads of elephants slain by lions—so that it appeared as though it were adorned with the scattered beauty of fallen blossoms.78
श्लोक ( Shlok ) 79
स तमालोकयन् दूरादाससाद महागिरिम् । आह्वयन्तमिवासक्त मरुद्धूतै स्तटद्रुमैः ॥७९॥
जो वायुसे हिलते हुए किनारेके वृक्षों से – बुलाता हुआ सा जान पड़ता था ऐसे अपने में आसक्त उस महापर्वतको दूरसे ही देखते हुए चक्रवर्ती भरत उसपर जा पहुंचे । ॥७९॥
As the great mountain swayed its trees along the edges, stirred by the wind, it seemed as though it were beckoning him near. Drawn to it, the emperor Bharata, gazing upon it from afar, at last arrived at its feet—his heart already held in its silent summons.79
श्लोक ( Shlok ) 80
स तद्वनगतान् दूरादपश्यद् घनकर्बुरान् । ‘सयूथानुद्धनुर्व शान् किरातान् करिणोऽपि च ॥८०॥
वहां जाकर उन्होंने उस पर्वतके वनोंमें रहनेवाले झुण्डके झुण्ड भील और हाथी देखे वे भील मेघोंके समान काले थे और धनुषोंके बाँसोंको ऊँचा उठाकर कंधोंपर रक्खे हुए थे तथा हाथी भी मेघोंके समान काले थे और धनुषके समान ऊँची उठी हुई पीठकी हड्डीको धारण किये हुए थे ॥८०॥
There, upon reaching that place, he beheld in the mountain forests great gatherings of Bhīlas and elephants. The Bhīlas were dark as thunderclouds, bearing upon their shoulders tall bamboo bows lifted high; and the elephants too were cloud-dark, their arched spines rising like bows drawn taut—each a living echo of the other’s form.80
श्लोक ( Shlok ) 81
सरिद्वधूस्तदुत्सङ्गे विवृत्तशफरीक्षणाः । तद्वल्लभा इवापश्यत् स्फुरद्विरुतमन्मनाः ॥८१॥
उस पर्वतके किनारेपर उन्होंने चंचल मछलियां ही जिनके नेत्र हैं और बोलते हुए पक्षियोंके शब्द ही जिनके मनोहर शब्द हैं ऐसी उस विन्ध्याचलकी प्यारी स्त्रियोंके समान नदीरूपी स्त्रियोंको बड़ी ही उत्कण्ठाके साथ देखा ।।८१।।
On the banks of that mountain, he beheld with great longing the river-like women of the Vindhya, whose restless waters mirrored the eyes of glistening fish, and whose melodious calls were like the sweet voices of speaking birds—so enchanting were they in their grace. 81
श्लोक 82 से 91
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
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