आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 |
श्लोक 92 से 101 : कृतमाल देव का आगमन और भरत का सत्कार
भरत ने आकाश में देदीप्यमान मुकुट और आभूषणों से सुशोभित कृतमाल देव को देखा, जो चम्पा की माला पहने कल्पवृक्ष सा प्रतीत होता था। भरत ने देव का सत्कार कर आसन प्रदान किया। कृतमाल देव ने विनयपूर्वक भरत की प्रशंसा की, उन्हें जगत का कल्याणकारी और देवों के प्रिय बताया। उन्होंने भरत के शासन, चक्ररत्न, और दंड नीति की महिमा का वर्णन किया, स्वयं को उनके समक्ष तुच्छ बताया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92 – 94
दिव्यः प्रभान्वयः कोऽपि सम्मूर्छति किमम्बरे । तडित्पुञ्जः किमग्न्यर्चिरिति दृष्टः क्षणं जनैः ॥९२॥किमप्येतदधिज्योतिरित्यादावविशेषतः । पश्चादवयवव्यक्त्या प्रव्यक्तपुरुषाकृतिः ॥९३॥ कृतमालश्रुतिव्यक्त्यै” कृतमालः स चम्पकैः । कृतमाल इवोत्फुल्लो निदध्ये प्रभुणाऽग्रतः ॥९४॥
क्या कोई दिव्य प्रभाका समूह आकाशमें फैल रहा है ? अथवा क्या बिजलीका समह है ? अथवा क्या अग्निकी ज्वाला है ? इस प्रकार अनेक कल्पनाओं से लोगोंने जिसे क्षण भर देखा था जो पहले तो यह कोई कान्तिका समूह है इस प्रकार सामान्य रूपसे देखा गया था, परन्तु बादमें अवयवोंके प्रकट होनेसे जिसका पुरुषका-सा आकार साफ साफ प्रकट हो रहा था, जो अपना कृतमाल नाम प्रकट करनेके लिये चम्पाके फूलोंकी माला पहिने हुआ था और जो उससे फूले हुए कृतमाल वृक्षके समान जान पड़ता था ऐसे उस देवको चक्रवर्ती भरतने अपने सामने खड़ा हुआ देखा ।। ९२-९४।।
“Is it a radiant mass of divine light unfurling across the sky? Or a cluster of lightning flashes? Or perhaps a blazing tongue of fire?”—such were the musings stirred in the minds of onlookers who, for but a moment, beheld the wondrous vision. At first, it appeared merely as a luminous form, vague and celestial. But as its limbs grew distinct, a clearly human shape emerged before their eyes.
Adorned with a garland of champaka blossoms—worn to reveal his name, Kṛtamāla—he stood in full splendor, resembling the flourishing Kṛtamāla tree in bloom. And thus, Emperor Bharata saw the divine being standing before him, radiant and resplendent.Verses 92–94
श्लोक ( Shlok ) 95
सप्रणामं च संप्राप्तं तं वीक्ष्य सहसा विभुः । यथार्हप्रतिपत्त्याऽस्मा आसनं प्रत्यपादयत् ॥९५॥
As soon as the celestial being appeared and offered his salutations, Bharata—beholding him suddenly before him—welcomed him with due honor and reverence, and offered him a fitting seat of respect.Verse 95
श्लोक ( Shlok ) 96
प्रभुणाऽनुमतश्चायं कृतासनपरिग्रहः । क्षणं विसिस्मिये पश्यन् धामा मुप्याति’ मानुषम् ॥९६॥
भरतकी आज्ञासे वह देव आसनपर बैठा और उनके लोकोत्तर तेजको देखता हुआ क्षण भरके लिये आश्चर्य करने लगा ।॥९६॥
At Bharata’s command, the celestial being took his seat. But for a moment he sat in silent wonder, beholding the extraordinary radiance that shone from the emperor—marveling at his otherworldly splendor.Verse 96
श्लोक ( Shlok ) 97
संभाषितश्च संभ्राजा पूर्व पूर्वार्द्धभाषिणा। सुरः प्रचक्रमे वक्तुमिति प्रश्रयवद्वचः ॥९७।।
प्रथम ही, पहले बोलनेवाले सम्राट् भरतने जिसके साथ बातचीत की है ऐसा वह देव नीचे लिखे अनुसार विनयसहित वचन कहने लगा ।।९७।।
To him who had first spoken—Emperor Bharata, the initiator of their discourse—the celestial being now responded with words marked by deep humility and reverence, as follows.Verse 97
श्लोक ( Shlok ) 98
क्व वयं क्षुद्रका देवाः क्व भवान्दिव्यमानुषः । पौतन्य “मुचितं मन्ये वाचाटयति नः स्फुटम् । ९८ll
हे देव, हम क्षुद्र देव कहाँ ? और आप दिव्य मनुष्य कहाँ ? तथापि मैं ऐसा मानता हूं कि हम लोगोंका यथायोग्य देवपना ही हम लोगोंको स्पष्ट रूपसे वाचालित कर रहा है अर्थात् जबर्दस्ती बुलवा रहा है ।।९८।।
O Divine One! What are we but lowly celestials—and what are you but a radiant, god-like man? And yet, I believe it is our ordained divinity itself that now compels us to speak—urging forth words unbidden, as though drawn by a higher will.Verse 98
श्लोक ( Shlok ) 99
आयुष्मन् कुशलं प्रष्टुं जिह्रीमः शासितुस्तव । त्वदायत्ता यतः कृत्स्ना जगतः कुशलक्रिया ॥९९ll
हे आयुष्मन्, आप जैसे शासन करनेवालोंका कुशल-मंगल पूछनेके लिये हम लोग लज्जित हो रहे हैं क्योंकि इस जगत्का सब तरहका कल्याण करना आपके ही आधीन है ।। ९९।।
O Auspicious One, we feel humbled even to inquire after the well-being of one such as you—ruler of the world—for indeed, the welfare of all creation rests under your sovereign care.Verse 99
श्लोक ( Shlok ) 100
लोकस्य कुशलाधाने ” निरूढं यस्य कौशलम् । कुशलं दक्षिणस्याऽस्य बाहोस्ते क्ष्मां जिगीषतः । १००ll
जगत का कल्याण करनेके लिये जिसकी चतुराई प्रसिद्ध है और जो समस्त पृथिवीको जीतना चाहती है ऐसी आपकी इस दाहिनी भुजाकी कुशलता है न ? ॥१००।।
Is not your right arm—renowned for its wisdom in securing the world’s welfare and ever eager to conquer the whole of the earth—endowed with undiminished prowess?Verse 100
श्लोक ( Shlok ) 101
देवानां प्रिय देवत्वं तवाशेषजगज्जयात् । नाम्नैव तु वयं देवा जातिमात्रकृतोक्तयः ।।१०१।।
हे देव, आप देवोंके भी प्रिय हैं, आपने समस्त जगत्को जीत लिया है इसलिये यह देवपना आपके ही योग्य है हम लोग तो नाममात्रके ही देव हैं- केवल देव जातिमें जन्म होनेसे ही देव कहलाने लगे हैं। यहाँ पर ‘देवानां’ ‘प्रिय’ ये दोनों ही पद पृथक् पृथक् हैं, अथवा ऐसा कार्य करना चाहिये कि हे प्रिय, समस्त जगत्को जीतनेसे आप देवोंके भी देव हैं ।।१०१॥
O Divine One, you are dear even to the gods themselves, for you have conquered the entire world—and thus, true divinity belongs to you alone. We are but nominally called devas, bearing the title only by birth. Indeed, one may say: O beloved one, by your conquest of all the worlds, you have become the god of the gods.Verse 101
श्लोक 102 से 111
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 |