आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
श्लोक 222 से 224 भरत की महिमा और पिता का संतोष
भरत चंद्रमा सा आनंद बढ़ाता और दुःख शांत करता था। वह उदयाचल सा सुवर्णमय, उदार, और दिग्विजयी था। भगवान वृषभदेव उसके मुख, वचन, और आलिंगन से संतोष प्राप्त करते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 222 to 224
श्लोक ( Shlok ) 222
इत्यानन्दपरम्परां प्रतिदिनं संवर्द्धयन् स्वैर्गुणैः पित्रोर्बन्धुजनस्य च प्रशमयँलोकस्य दुःखासिकाम् ।
नाभेयोदय भूधरादधरित क्षोणीभरा [धरा] दुद्ङ्गतः प्रालेयांशुरिवायभी भरतराई भूलोकमुद्भासयन् ॥२२२
इस प्रकार वह भरत चंद्रमा के समान शोभायमान हो रहा था क्योंकि जिस प्रकार चंद्रमा अपने शीतलता, सुभगता आदि गुणों से सबके आनंद की परंपरा को बढ़ाता है उसी प्रकार वह भरत भी अपने दया, उदारता, नम्रता आदि गुणों से माता-पिता तथा भाईजनों के आनंद की परंपरा को प्रतिदिन बढ़ाता रहता था, चंद्रमा जिस प्रकार लोगों की दुःखमय परिस्थिति को शांत करता है उसी प्रकार वह भरत भी लोगों की दुःखमय परिस्थिति को शांत करता था, चंद्रमा जिस प्रकार समस्त पर्वतों को नीचा करने वाले पूर्वाचल से उदित होता है उसी प्रकार वह भरत भी समस्त राजाओं को नीचा दिखाने वाले भगवान् ऋषभदेवरूपी पूर्वाचल से उदित हुआ था और चंद्रमा जिस प्रकार समस्त भूलोक को प्रकाशित करता है उसी प्रकार भरत भी समस्त लोक को प्रकाशित करता था ।।222।।
Thus, Bharata shone like the moon. Just as the moon, with its coolness and charm, enhances everyone’s joy, Bharata too, with his compassion, generosity, and humility, continually increased the happiness of his parents and brothers. Just as the moon soothes the sorrowful, Bharata also alleviated the suffering of people. Just as the moon rises from the eastern mountain that surpasses all other peaks, Bharata too emerged from Lord Rishabhadeva, who outshines all other kings. And just as the moon illuminates the entire earth, Bharata radiated his brilliance across all realms. ||222||
श्लोक ( Shlok ) 223
श्रीमान् हेमशिलाघनैरपघनैः प्रांशुः प्रकृत्या गुरुः पादाक्रान्तधरातलो गुरुभरं वोढुं क्षमायाः क्षमः ॥ हारं निर्झरचारुकान्तिमुरसा बिभ्रत्तटस्पर्द्धिना चक्रार्कोदयभूधरः स रुरुचे मौलीद्धकूटोद्धरः ॥२२३॥
अथवा वह भरत, चक्ररूपी सूर्य को उदय करने वाले उदयाचल के समान सुशोभित होता था क्योंकि जिस प्रकार उदयाचल पर्वत सुवर्णमय शिलाओं से सांद्र अवयवों से शोभायमान होता है उसी प्रकार वह भरत भी सुवर्ण के समान सुंदर मजबूत शरीर से शोभायमान था, जिस प्रकार उदयाचल ऊँचा होता है उसी प्रकार वह भरत भी ऊंचा (उदार) था, उदयाचल जिस प्रकार स्वभाव से ही गुरु-भारी होता है उसी प्रकार वह भरत भी स्वभाव से ही गुरु (श्रेष्ठ) था, उदयाचल पर्वत ने जिस प्रकार अपने समीपवर्ती छोटे-छोटे पर्वतों से पृथ्वीतल पर आक्रमण कर लिया है उसी प्रकार भरत ने भी अपने पाद अर्थात् चरणों से दिग्विजय के समय समस्त पृथिवीतल पर आक्रमण किया था, उदयाचल जिस प्रकार पृथिवी के विशाल भार को धारण करने के लिए समर्थ है उसी प्रकार भरत भी पृथ्वी का विशाल भार धारण करने के लिए (व्यवस्था करने के लिए) समर्थ था, उदयाचल जिस प्रकार अपने तटभाग पर निर्झरनों की सुंदर कांति धारण करता है उसी प्रकार भरत भी तट के साथ स्पर्धा करने वाले अपने वक्षःस्थल पर हारों की सुंदर कांति धारण करता था, और उदयाचल पर्वत जिस प्रकार दैदीप्यमान शिखरों से सुशोभित रहता है उसी प्रकार वह भरत भी अपने प्रकाशमान मुकुट से सुशोभित रहता था ।।223।।
Or, Bharata shone like Udayachal, the eastern mountain that brings forth the sun of the universal emperor (Chakravarti). Just as Udayachal is adorned with dense golden rocks, Bharata too was radiant with a strong and beautiful body like pure gold. Just as Udayachal stands tall, Bharata was noble and elevated in stature. Just as Udayachal is naturally great and weighty, Bharata too was inherently superior and dignified.
Just as Udayachal, with its towering presence, dominates the smaller surrounding mountains, Bharata too, with his mighty footsteps during his world conquest (Digvijaya), asserted his supremacy over the entire earth. Udayachal is capable of bearing the vast weight of the earth, and similarly, Bharata was capable of upholding and governing the massive responsibility of the world.
Just as Udayachal gleams with the beauty of waterfalls along its slopes, Bharata’s broad chest shone with the splendor of exquisite garlands. And just as Udayachal is resplendent with its radiant peaks, Bharata too was adorned with a brilliant crown, enhancing his divine magnificence. ||223||
श्लोक ( Shlok ) 224
संपश्यनयनोत्सवं सुरुचिरं तद्वक्त्रमप्राकृतं संशृण्वन् कलनिक्कणं श्रुतिसुखं सप्रश्रयं तद्वचः ।
आश्लिप्यन् प्रणतोत्थितं मुहुरमुंस्वोत्संगमारोपयन् श्रीमान्नाभिसुतः परां धृत्तिमगादू वर्त्स्यज्जिनश्रीर्विभुः ॥२२४॥
जिन्हें अरहंत पद की लक्ष्मी प्राप्त होने वाली है ऐसे भगवान् वृषभदेव, नेत्रों को आनंद देने वाले, अत्यंत सुंदर और असाधारण भरत के मुख को देखते हुए, कानों को सुख देने वाले तथा विनयसहित कहे हुए उसके मधुर वचनों को सुनते हुए, प्रणाम करने के बाद उठे हुए भरत का बार-बार आलिंगन कर उसे अपनी गोद में बैठाते हुए परम संतोष को प्राप्त होते थे ।।224।।
Lord Rishabhadeva, who was destined to attain the supreme state of an Arhat, experienced great satisfaction as he gazed upon Bharata’s extraordinarily beautiful and radiant face, which was a delight to the eyes. Listening to Bharata’s sweet, respectful, and pleasing words, which brought joy to the ears, he embraced him repeatedly after Bharata had risen from his bow. Placing him on his lap, Lord Rishabhadeva felt the utmost contentment. ||224||
इत्यार्षे भगवज्जिनंसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंयहे भगवत्कुमारकालयशस्वतोसुनन्दा-विवाहभरतो त्पत्तिवर्णनं नाम पश्चदर्श पर्व ॥१५॥ ॥
इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रह में भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन करने वाला पंद्रहवां पर्व समाप्त हुआ ।।15।।
Thus ends the fifteenth canto, which describes the youth of Lord Rishabhadeva, the marriages of Yashasvati and Sunanda, and the birth of Bharata, in the renowned Triṣaṣṭiśalākāpuruṣa Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the venerable Bhagavān Jinasenāchārya. ||15||
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन
पर्व 16 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221