आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 |
श्लोक 122 से 131 स्वप्न फल और गर्भ
भगवान ने कहा कि सुमेरु से चक्रवर्ती पुत्र, सूर्य से प्रताप, चंद्र से कांति, सरोवर से पवित्र लक्षण, पृथ्वी ग्रसने से पृथ्वी का पालन, और समुद्र से संसार पार करने वाला ज्येष्ठ पुत्र होगा। यशस्वती हर्ष से बढ़ी। अतिगृद्ध का जीव, जो व्याघ्र, देव, सुबाहु, और अहमिंद्र था, यशस्वती के गर्भ में आया। वह गर्भ से सूर्य और प्रतिकूल छाया सहन नहीं करती थी। भगवान उसे मयूर सा उत्सुकता से देखते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
सा पत्यै स्वप्नमालां तां यथादृष्टं न्यवेदयत्। दिव्यचक्षुरसौ देवस्तत्फलानीत्यभाषत ॥१२२॥
तदनंतर उसने रात्रि के समय देखे हुए समस्त स्वप्न भगवान् से निवेदन किये और अवधि-ज्ञानरूपी दिव्य नेत्र धारण करने वाले भगवान् ने भी नीचे लिखे अनुसार उन स्वप्नों का फल कहा कि ।।122।।
“Thereafter, she respectfully conveyed to the Lord all the dreams she had seen during the night. And the Lord, possessing the divine vision of Avadhi-jnana (clairvoyance), revealed the meanings of those dreams as follows.”
श्लोक ( Shlok ) 123
त्वं देवि पुत्रमाप्तासि गिरीन्द्राचक्रवर्तिनम्। तस्य प्रतापितामर्कः शास्त्रीन्दु कान्तिसंपदम् ।।१२३॥
हे देवि, स्वप्नों में जो तूने सुमेरु पर्वत देखा है उससे मालूम होता है कि तेरे चक्रवर्ती पुत्र होगा । सूर्य उसके प्रताप को और चंद्रमा उसकी कांतिरूपी संपदा को सूचित कर रहा है ।।123।।
“O Devi, the Mount Sumeru you saw in your dreams signifies that you will have a Chakravarti (universal emperor) as your son. The Sun indicates his immense glory, while the Moon signifies his radiant prosperity.”
श्लोक ( Shlok ) 124
सरोजाक्षि सरोदृष्टेरसौ पङ्कजवासिनीम्। वोढा व्यूढोरसा पुण्यलक्षणाङ्कितविग्रहः ॥१२४॥
हे कमलनयने, सरोवर के देखने से तेरा पुत्र अनेक पवित्र लक्षणों से चिह्नित शरीर होकर अपने विस्तृत वक्षःस्थल पर कमलवासिनी―लक्ष्मी को धारण करने वाला होगा ।।124।।
“O lotus-eyed one, the sight of the lake in your dream signifies that your son will be adorned with many auspicious marks on his body and will bear Goddess Lakshmi, the lotus-dwelling deity, upon his broad chest.”
श्लोक ( Shlok ) 125
महीग्रसनतः कृत्स्नां महीं सागरवाससम्। प्रतिपालयिता देवि विश्वराट् तव पुत्रकः ॥ १२५॥
हे देवि, पृथ्वी का ग्रसा जाना देखने से मालूम होता है कि तुम्हारा वह पुत्र चक्रवर्ती होकर समुद्ररूपी वस्त्र को धारण करने वाली समस्त पृथ्वी का पालन करेगा ।।125।।
“O Devi, the vision of the earth being swallowed signifies that your son will become a Chakravarti (universal emperor) and will rule over the entire earth, which is adorned with the ocean as its garment.”
श्लोक ( Shlok ) 126
सागराच्चरमाङ्गोऽसौ तरिता जन्मसागरम् । ज्यायान् पुत्रशतस्यायमिक्ष्वाकुकुलनन्दनः ॥ १२६॥
और समुद्र देखने से प्रकट होता है कि वह चरमशरीरी होकर संसाररूपी समुद्र को पार करने वाला होगा । इसके सिवाय इक्ष्वाकु-वंश को आनंद देने वाला वह पुत्र तेरे सौ पुत्रों में सबसे ज्येष्ठ पुत्र होगा ।।126।।
“And the vision of the ocean signifies that he will ultimately renounce his body and cross the ocean of worldly existence. Moreover, he will be the eldest and most illustrious among your hundred sons, bringing great joy to the Ikshvaku dynasty.”
श्लोक ( Shlok ) 127
इति श्रुत्वा वचो भर्तुः सा तदा प्रमदोदयात्। ववृधे जलधेर्वेला यथेन्दो समुदेप्यति ॥ १२७॥
इस प्रकार पति के वचन सुनकर उस समय वह देवी हर्ष के उदय से ऐसी वृद्धि को प्राप्त हुई थी जैसी कि चंद्रमा का उदय होनेपर समुद्र की बेला वृद्धि को प्राप्त होती है ।।127।।
“Hearing these words from her husband, the Devi was filled with immense joy, growing in happiness just as the tide of the ocean rises with the moon’s ascent.”
श्लोक ( Shlok ) 128
ततः सर्वार्थसिद्धिस्थो योऽसौ व्याघ्रचरः सुरः। सुबाहुरहमिन्द्रोऽतश्च्युत्वा तद्गर्भमावसत् ।।१२८॥
तदनंतर राजा अतिगृद्ध का जीव जो पहले व्याघ्र था, फिर देव हुआ, फिर सुबाहु हुआ और फिर सर्वार्थसिद्धि में अहमिंद्र हुआ था, वहाँ से च्युत होकर यशस्वती महादेवी के गर्भ में आकर निवास करने लगा ।।128।।
“Then, the soul of King Atigridh, who had previously been a tiger, then a deity, then Subahu, and later Indra in the Sarvarthasiddhi realm, descended from there and took residence in the womb of the glorious Mahadevi Yashasvati.”
श्लोक ( Shlok ) 129
सा गर्भमवहद् देवी देवाद् दिग्यानुभावजम् । येन नासहतार्क च समाक्रामन्तमम्बरे ॥१२९॥
वह देवी भगवान् वृषभदेव के दिव्य प्रभाव से उत्पन्न हुए गर्भ को धारण कर रही थी । यही कारण था कि वह अपने ऊपर आकाश में चलते हुए सूर्य को भी सहन नहीं करती थी ।।129।।
“That Devi was carrying the divine embryo conceived through the divine influence of Lord Vrishabhadeva. Because of this, she could not even tolerate the sun moving in the sky above her.”
श्लोक ( Shlok ) 130
सापश्यत् स्वमुखच्छायां वीरसूरसिदर्पणे । तत्र प्रातोपिकीं स्वां च छायां नासोढ मानिनी ॥ १३०॥
वीर पुत्र को पैदा करने वाली वह देवी अपने मुख की कांति तलवाररूपी दर्पण में देखती थी और अतिशय मान करने वाली वह उस तलवार में पड़ती हुई अपनी प्रतिकूल छाया को भी नहीं सहन कर सकती थी ।।130।।
“The Devi, who was destined to give birth to a heroic son, would gaze at her radiant face in the sword’s mirror-like surface. Filled with immense pride, she could not even tolerate the adverse reflection of herself appearing in the sword.”
श्लोक ( Shlok ) 131
अन्तर्वत्नी मपश्यत् तां पतिरुत्सुकया दृशा। जछगर्भामिवाम्भोदमाळां काले शिलाबलः १३१॥
जिस प्रकार वर्षा का समय आने पर मयूर जल से भरी हुई मेघमाला को बड़ी ही उत्सुक दृष्टि से देखते हैं उसी प्रकार भगवान् वृषभदेव भी उस गर्भिणी यशस्वती देवी को बड़ी ही उत्सुक दृष्टि से देखते थे ।।131।।
“Just as peacocks eagerly gaze at rain-laden clouds upon the arrival of the monsoon, in the same way, Lord Vrishabhadeva looked upon the pregnant Devi Yashasvati with great eagerness and affection.”
श्लोक 132 से 141
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 |