आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141
हाथियों की क्रीड़ा और शोभा
हाथी सूंड़ से पानी उछालते, मृणाल खाते और कमल धारण कर शोभित होते थे। कुछ डरपोक हाथी मृणाल को साँकल समझकर किनारे पर रुक जाते थे। स्नान के बाद वे पराग से शृंगारित होकर तालाबों से बाहर निकलते, पर धूल डालकर फिर मैले हो जाते। उनकी यह प्रवृत्ति उनकी स्वाभाविक प्रकृति को दर्शाती थी। पक्षी उनके भय से किनारे चले जाते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
पीताम्बुरम्बुदस्पर्धि बृंहितो मदकुञ्जरः । दुधाव गण्डकण्डूयां चण्डगण्डूषवारिभिः ॥१३२॥
जो पानी पी चुका है और जिसकी गर्जना मेघों के साथ स्पर्धा कर रही है ऐसा कोई मदोन्मत्त हाथी अपने कुरलेके जलकी तेज फटकार से कपोलों की खुजली शान्त कर रहा था ॥१३२॥
“Having quenched its thirst, a frenzied elephant, whose thunderous roar rivaled the rumbling of clouds, was calming the itch on its cheeks with forceful splashes of water flung from its curled trunk.” (132)
श्लोक ( Shlok ) 133
विमुक्तं व्यक्तसूत्कारं करमुत्क्षिप्य वारणै । वारि स्फटिकदण्डस्य लक्ष्मीमूहे खमुच्चलत् ।।१३३॥
कितने ही हाथी सूड़ ऊंची उठाकर सू सू शब्द करते हुए ऊपरको पानी छोड़ रहे थे, उस समय आकाशकी ओर उछलता हुआ वह पानी ठीक स्फटिक मणिके बने हुए दण्डेकी शोभा धारण कर रहा था ॥१३३।।
“Many elephants, raising their trunks and trumpeting with a ‘sū-sū’ sound, flung streams of water skyward; and that ascending spray shone resplendently, like a shaft of crystal carved from purest gemstone.” (133)
श्लोक ( Shlok ) 134
उदगाहैर्विनिर्धूतश्रमाः केचिन्मतङ्गजाः । ‘बिसभङ्गै रघुस्तृप्तिं हेलया कवलीकृतैः ॥१३४॥
पानीमें प्रवेश करनेसे जिनका सब परिश्रम दूर हो गया है ऐसे कितने ही हाथी लीलापूर्वक मृणाल के टुकड़े खाकर संतोष धारण कर रहे थे ।।१३४।।
“Many elephants, their fatigue dispelled by entering the water, were now contentedly chewing fragments of lotus stalks, partaking of them with playful ease.” (134)
श्लोक ( Shlok ) 135
मृणालैरधिदन्ताग्रमर्पितैर्विबभुर्गजाः । अजस्रमम्बुसंसेकाद् रदैः प्रारोहितैरिव ॥१३५॥
कितने ही हाथी अपने दाँतोंके अग्रभागपर रखे हुए मृणालोंसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो निरन्तर पानीके सींचनेसे उनके दांत ही अंकुरित हो उठे हों ।॥१३५॥
“Many elephants, adorned with lotus stalks resting upon the tips of their tusks, appeared as though their very tusks had sprouted anew—nourished into bloom by the ceaseless watering of the pond.” (135)
श्लोक ( Shlok ) 136
प्रमाद्यन् द्विरदः कश्चिन्मृणालं स्वकरोद्धृतम् । ददावालान” बुध्यैव नियन्त्रे द्विगुणीकृतम् ॥१३६।।
मदसे अत्यन्त उन्मत्त हुआ कोई हाथी अपनी सूड़से ऊपर उठाये हुए मृणालको बाँधनेकी साँकल समझकर उसे दुहरी कर महावतको दे रहा था ।। १३६।।
“One elephant, utterly maddened by rut, mistook the lotus stalk raised in its trunk for a binding chain, and, doubling it over, offered it to the mahout—as though submitting to restraint.” (136)
श्लोक ( Shlok ) 137
चरणालग्नमाकर्षन् मृणालं भीलुको गजः । बहिःसरस्तटं व्यास्थदन्दुतन्तुक “शङ्कया ॥१३७॥
अपने पैरमें लगे हुए मृणालको खींचता हुआ कोई डरपोक हाथी उसे बाँधनेकी साँकल समझकर तालाबके बाहरी तटपर ही खड़ा रह गया था ।।१३७।।
“A timid elephant, feeling a lotus stalk tangled around its foot, mistook it for a fetter—and thus remained standing upon the outer bank of the pond, reluctant to move.” (137)
श्लोक ( Shlok ) 138
करैरुत्क्षिप्य पद्मानि स्थिताः स्तम्बेरमा बभुः । देवतानुस्मृति किञ्चित् कुर्वन्तोऽघोरिवोद्धृतैः ॥१३८॥
अपनी सूंड़ोंसे कमलोंको उठाकर खड़े हुए हाथी ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो हाथोंमें अर्ध लेकर किसी देवताका कुछ स्मरण ही कर रहे हों ।॥ १३८ ॥
“The elephants, standing tall with lotuses held in their trunks, were adorned in such a way that they seemed as though they were offering a silent reverence to the gods, as if holding sacred offerings in their hands.” (138)
श्लोक ( Shlok ) 139
सरस्तरङ्गधौताङ्गा रेजुस्तुङ्गा मतङ्गजाः । शृङ्गारिता इवालग्नैः सान्द्ररम्भोजरेणुभिः ॥१३९॥
जिनके शरीर तालाबकी लहरोंसे धुल गये हैं ऐसे ऊँचे ऊँचे हाथी सघन रूपसे लगे हुए कमलोंकी परागसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो स्नान कराकर उनका शृङ्गार ही किया गया हो ।। १३९॥
“The tall elephants, their bodies cleansed by the waves of the pond, were adorned with the pollen of dense clusters of lotuses, radiating such a splendour as though they had been meticulously adorned after a sacred bath.” (139)
श्लोक ( Shlok ) 140
ययुः करिभिरारुद्धं परिहृत्य सरोजलम् । पतत्रिणः सरस्तीरं तद्युक्तमबलीयसाम् ॥१४०।।
हाथियोंसे घिरे हुए तालाब के जलको छोड़कर सब पक्षी तालाबके किनारेपर चले गये थे सो ठीक ही है क्योंकि निर्बल प्राणियोंको ऐसा ही करना योग्य है ।। १४०।।
“All the birds, leaving the waters of the pond, had gathered on the shore, encircled by the elephants—this is but natural, for it is fitting that the weak should seek refuge in such ways.” (140)
श्लोक ( Shlok ) 141
सरोवगाहनिर्णिक्त मूर्तयोऽपि मतङ्गजाः । रजः “प्रमाथैरात्मानं चक्रुरेव मलीमसम् ॥१४१।।
तालाबोंमें प्रवेश करनेसे जिनके शरीर निर्मल हो गये हैं ऐसे कितने ही हाथी धूल उड़ाकर फिरसे अपने आपको मैला कर रहे थे ॥१४१।।
“Many elephants, whose bodies had been purified by entering the ponds, were now stirring up dust and once again soiling themselves, as though finding delight in the return of their former state.” (141)
श्लोक 142 से 151
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131