आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
श्लोक 1 से 11 : चक्रवर्ती भरत का उत्तर दिशा विजय अभियान
चक्रवर्ती भरत उत्तर दिशा को जीतने के लिए विशाल घुड़सवार सेना के साथ निकले। उनकी सेना के घोड़ों की गति, पराक्रम, शिक्षा और जाति को विशेषज्ञों ने पहचाना। घोड़े तेजी से मार्ग तय करते हुए धूल उड़ाते और छाया को तोड़ते प्रतीत होते थे। उनकी चंचलता केवल गति में थी, स्वभाव में स्थिरता थी। अठारह करोड़ उत्तम घोड़ों की सेना सिन्धु नदी को हानि पहुँचाती हुई आगे बढ़ी, जो मानो भरत के आगमन से संतुष्ट होकर उनकी सेवा कर रही थी।
श्लोक 12 से 21 : सिन्धु नदी और विजयार्थ पर्वत की ओर प्रस्थान
भरत ने सिन्धु नदी के किनारे-किनारे उत्तर दिशा के राजाओं को वश में करते हुए विजयार्थ पर्वत की ओर प्रस्थान किया। यह पर्वत मणियों के नौ शिखरों, हिलते वृक्षों, झरनों और वनों से सुशोभित था, मानो भरत का स्वागत करने को आतुर हो। पर्वत के वन फूलों की पराग और कोकिलों के शब्द से सजा था, जो भरत के सम्मान में प्रस्तुत प्रतीत होता था। सेना के आगमन से वन की भूमि दब गई, और पशु भयभीत हो गए।
श्लोक 22 से 31: सेना के प्रभाव से वन का क्षोभ
सेना के शोर से वन के पशु, जैसे श्वेत हाथी, सिंह, भैंसा, और छोटे जीव, भयभीत होकर गुफाओं में छिप गए। हरिण, सूअर और अन्य प्राणी अपने स्थान छोड़कर भागे। सेना के शांत होने पर ही पशु धीरे-धीरे अपने स्थानों पर लौटे। इस प्रकार, भरत की सेना का प्रभाव वन के प्राणियों पर गहरा पड़ा, और प्रकृति भी उनके आगमन से प्रभावित हुई।
श्लोक 32 से 41 : विजयार्थ पर्वत पर सेना का पड़ाव
सेना विजयार्थ पर्वत के पाँचवें कूट पर रुकी, जहाँ सेनापतियों ने वन में डेरे लगवाए। वन के सघन वृक्षों और लतागृहों ने सैनिकों को आश्रय दिया। वन में प्रवेश से सैनिकों का राग बढ़ा, जिससे वैराग्य की धारणा मूर्खतापूर्ण प्रतीत हुई। विजयार्थ पर्वत का स्वामी विजयार्थ देव भरत के दर्शन हेतु आया, जो शिखरों, हारों और कड़ों से सुशोभित था।
श्लोक 42 से 51: विजयार्थ देव द्वारा भरत का अभिषेक
विजयार्थ देव ने स्वयं को पर्वत का रक्षक और भरत का अनुयायी बताते हुए उनकी आज्ञा स्वीकार की। उन्होंने तीर्थजल से भरत का अभिषेक किया, जिसमें देवांगनाओं का नृत्य और किन्नरों के मंगलगीत शामिल थे। देव ने भरत को रत्न, छत्र, चमर और सिंहासन भेंट किए। प्रसन्न भरत ने देव को सम्मानित कर विदा किया।
श्लोक 52 से 61: विजयार्थ पर्वत की विजय और उत्तरार्ध की आकांक्षा
विजयार्थ पर्वत की विजय को दक्षिण भारत की विजय मानकर भरत ने चक्ररत्न की पूजा की। फिर भी, उत्तरार्ध जीतने की उनकी आकांक्षा बनी रही। सेना पर्वत की पश्चिम गुहा के समीप ठहरी, जहाँ भरत ने कई दिन बिताए। गंगा और सिन्धु के बीच के राजा उनके दर्शन को आए और भेंट स्वरूप रत्न आदि अर्पित किए।
श्लोक 62 से 71 : राजाओं का समर्थन और युद्ध की तैयारी
समीपवर्ती राजाओं ने भरत की सेना को भूसा और ईंधन प्रदान किया। कुरु देश के जयकुमार सहित अनेक राजा और योद्धा भरत के समर्थन में आए। म्लेच्छ राजाओं को जीतने के लिए धनुष-बाण और तलवारों से सुसज्जित सेना तैयार हुई। योद्धा शत्रुओं को हराने के लिए उत्साहित थे, और उनके कवच और शस्त्र युद्ध की तैयारी को दर्शाते थे।
श्लोक 72 से 81 : सेना की रचना और योद्धाओं का उत्साह
सेना के रथ शस्त्रों से भरे थे, और रथी योद्धा पैदल सैनिकों से श्रेष्ठ प्रतीत होते थे। राजाओं ने हाथियों और घुड़सवारों की रक्षा के लिए शूरवीर नियुक्त किए। विभिन्न व्यूह रचनाओं (दण्ड, मण्डल, भोग, असंहृत) के साथ सेना तैयार हुई। योद्धा परस्पर प्रेरणादायक बातें करते हुए भरत के कार्यों की महिमा और विजय की आकांक्षा व्यक्त करते थे। कुछ सैनिक पर्वत और नदियों की बाधाओं से चिंतित थे, पर उत्साह के साथ शिविर में पहुँचे।
श्लोक 82 से 91: विजयार्थ पर्वत पर सेना का एकत्रीकरण
चक्रवर्ती भरत के हिमवान् पर्वत तक विजय के उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए राजा लोग सामग्री से भरे कोठों के साथ निकले। अनेक सामंत अपनी सेनाओं के साथ भरत के समीप आए और उनकी जय-जयकार की। सामंतों के समूह से भरत की सेना समुद्र की तरह भर गई। विजयार्थ पर्वत सेनाओं से आच्छादित हो स्वर्ग सा सुशोभित हुआ। सेना के शब्दों से पर्वत शब्दमय हो गया, मानो गुफाओं से प्रतिध्वनि के साथ रो रहा हो।
श्लोक 92 से 101 : कृतमाल देव का आगमन और भरत का सत्कार
भरत ने आकाश में देदीप्यमान मुकुट और आभूषणों से सुशोभित कृतमाल देव को देखा, जो चम्पा की माला पहने कल्पवृक्ष सा प्रतीत होता था। भरत ने देव का सत्कार कर आसन प्रदान किया। कृतमाल देव ने विनयपूर्वक भरत की प्रशंसा की, उन्हें जगत का कल्याणकारी और देवों के प्रिय बताया। उन्होंने भरत के शासन, चक्ररत्न, और दंड नीति की महिमा का वर्णन किया, स्वयं को उनके समक्ष तुच्छ बताया।
श्लोक 102 से 111 : कृतमाल देव की भक्ति और सेवा
कृतमाल देव ने भरत को छह खंडों का शासक और ऐश्वर्यशाली बताया, उनकी कीर्ति और सरस्वती की स्वच्छंदता की प्रशंसा की। उन्होंने सेना के शब्दों से भयभीत होकर भरत की सेवा में आने की बात कही। देव ने स्वयं को विजयार्थ पर्वत का निवासी और मर्मज्ञ बताते हुए भरत के अधीन होने की घोषणा की, कहा कि उनकी जानकारी समस्त द्वीप और समुद्र तक फैली है।
श्लोक 112 से 121 : कृतमाल देव की सहायता और गुफा द्वार का उद्घाटन
कृतमाल देव ने भरत को सर्वत्र भ्रमण करने वाला और पर्वत का मर्मज्ञ बताया, फिर चौदह आभूषण भेंट किए। भरत ने हर्षित होकर सत्कार किया और देव को गुफा द्वार खोलने का उपाय बताने हेतु विदा किया। सेनापति को गुफा शांत होने तक पश्चिम खंड जीतने की आज्ञा दी गई। सेनापति दंडरत्न और अश्वरत्न के साथ गुफा की ओर बढ़ा, सिन्धु नदी की वेदी को पार कर विजयार्थ पर्वत की वेदिका पर पहुँचा।
श्लोक 122 से 131: गुफा द्वार का खुलना और म्लेच्छ खंड में प्रवेश
सेनापति ने दंडरत्न से गुफा द्वार पर प्रहार किया, जिससे द्वार खुला और गर्मी निकली। द्वार के किवाड़ चिल्लाते और पसीने से तर प्रतीत हुए। गुफा से निकला शब्द पर्वत के रोने सा लगा। सेनापति को गर्मी ने स्पर्श नहीं किया, और आकाश से फूल बरसे। वह सिन्धु नदी के पश्चिम तट की वेदिका को पार कर म्लेच्छ खंड में प्रवेश किया, जहाँ प्रजा घबरा गई और कुछ लोग भागने लगे।
श्लोक 132 से 141 : म्लेच्छ राजाओं का वशीकरण
सेनापति ने प्रजा को आश्वस्त किया और म्लेच्छ राजाओं को चक्रवर्ती की आज्ञा स्वीकार करने का आदेश दिया। बुद्धिमान लोगोंने आशीर्वाद के साथ आज्ञा स्वीकारी। सेनापति ने संधि-विग्रह जैसे उपायों से राजाओं को वश किया, कुछ को आवागमन रोककर और कुछ को दुख देकर अधीन किया। म्लेच्छों से कन्या और रत्न भेंट में लिए, जिन्हें धर्मक्रियाओं के अभाव में म्लेच्छ माना गया।
श्लोक 142 से 151 : सेनापति की वापसी और सत्कार
सेनापति म्लेच्छ खंड को वश कर म्लेच्छ राजाओं की सेना के साथ लौटा, मानो मूर्तिमान प्रताप हो। उसने सिन्धु नदी और विजयार्थ पर्वत की वेदिका को पार किया, गुफा की गर्मी शांत कर उसकी रक्षा का उपाय किया। वापसी पर राजाओं ने नगाड़ों के साथ उसका स्वागत किया। वह राजमार्ग से भरत के डेरे में पहुँचा, सभामंडप में नमस्कार कर सत्कार प्राप्त किया।
श्लोक 152 से 159 : म्लेच्छ राजाओं का समर्पण और भरत की महिमा
म्लेच्छ राजाओं ने भय सहित भरत को नमस्कार किया और रत्न भेंट किए। भरत ने उनका सत्कार कर विदा किया। दंडरत्न के बल पर विजयार्थ पर्वत के समीपवर्ती राजाओं को जीता गया। सेनापति को पुनः प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया। भरत ने विजयार्थ पर्वत से छत्र, चमर, सिंहासन और अनुपम आभूषण प्राप्त किए, जो मेरु पर्वत के कल्पवृक्ष सा शोभित करते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
कौबेरीमथ निर्जेतुमाशामभ्युद्यतो विभुः । प्रतस्थ वाजिभूयिष्ठै साधनैः स्थगयन् दिशः ॥१॥
अथानन्तर-उत्तर दिशाको जीतने के लिये उद्यत हुए चक्रवर्ती भरत जिनमें अनेक घोड़े हैं ऐसी सेनाओंसे दिशाओंको व्याप्त करते हुए निकले ।।१।।
“Thereafter, Emperor Bharata, resolved to conquer the northern direction, set forth, his armies—teeming with countless horses—advancing and pervading the quarters of the sky.”1
श्लोक ( Shlok ) 2
धौरित ‘र्गत मुत्सा हैः सत्त्वं शिक्षां च लाघवैः। जाति वपुर्गणैस्तज्ज्ञास्तदाश्वानां विजज्ञिरे ॥२॥
उस समय घोड़ोंके गुण जानने वाले लोगोंने धौरित नामकी गतिसे उनकी चाल जानी, उत्साहसे उनका बल जाना, स्फतिके साथ हलकी चाल चलनेसे उनकी शिक्षा जानी और शरीरके गुणोंसे उनकी जाति जानी ।।२।।
“At that time, those well-versed in the qualities of horses discerned their swiftness by the gait known as Dhaurita, their strength by the vigor of their spirit, their training by the lightness of their pace alongside crystal, and their breed by the attributes of their form.”2
श्लोक ( Shlok ) 3
धौरितं गतिचातुर्य मुत्साहस्तु पराक्रमः । शिक्षाविनयसंपत्ती रोमच्छाया वपुर्गुणः ॥३॥
गतिकी चतुराईको धौरित, उत्साहको पराक्रम, विनयको शिक्षा और रोमोंकी कान्तिको शरीरका गुण कहते हैं ।।३।।
“They say that the agility of movement is known as Dhaurita, valor springs from spirited enthusiasm, training is marked by gentle discipline, and the radiance of the hair reveals the noble qualities of the body.”3
श्लोक ( Shlok ) 4
पुरोभागा निवात्येतुं पश्चाद्भागैः कृतोद्यमाः । प्रययुर्द्रुतमध्वानमध्वनीना स्तुरङ्गमाः ॥४॥
अच्छी तरह मार्ग तय करनेवाले घोड़े मार्गमें बहुत जल्दी जल्दी जा रहे थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो अपने पीछेके भागोंसे अगले भागोंको उल्लंघन ही करना चाहते हों ।।४।।
“The well-trained horses sped swiftly along the path, as though their foreparts sought to outpace and overleap their hindquarters, so great was the urgency and grace of their motion.”4
श्लोक ( Shlok ) 5
खुरोद् धूतान् महीरेणून् स्वाङ्गस्पर्शभयादिव । केचिद् व्यती युरध्यध्वं महाश्वाः कृतविक्रमाः ॥५॥
अपने खुरोंसे उड़ती हुई पृथिवी की धूलिका कहीं हमारे ही शरीर के साथ स्पर्श न हो जावे ? इस भय से ही मानों अनेक बड़े बड़े घोड़े अपना पराक्रम प्रकट करते हुए मार्ग में उस धूलिको उल्लंघन कर रहे थे ।।५।।
“As though fearing that the dust of the earth, stirred by their own hooves, might touch their very bodies, the mighty steeds appeared to leap over it mid-course, displaying their prowess with magnificent force upon the road.”5
श्लोक ( Shlok ) 6
छायात्मनः सहोत्थानं” केचित्सोढुमिवाक्षमाः । खुरैरघट्टन् वाहाः स तु सौक्ष्म्यान्नबाधितः ॥६॥
कितने ही घोड़े अपनी छाया का भी अपने साथ चलना नहीं सह सकते थे. इसलिये ही मानो वे उसे अपने खुरों से तोड़ रहे थे परन्तु सुक्ष्म होने से उस छाया को कुछ भी बाधा नहीं होती थी ।।६।।
“So intolerant were many of the steeds, that they seemed unwilling even to let their own shadows accompany them. Thus did they strike at them with their hooves—as though to shatter them—yet, being subtle and insubstantial, the shadows passed unhindered.”6
श्लोक ( Shlok ) 7
केचिन्नृत्तमिवातेनु र्महीरङ्गे तुरङ्गमाः । कमैश्चङ्क्रमणारम्भे कृतमड्डुक वादनैः ॥७॥
कितने ही घोड़े ऐसे जान पड़ते थे मानों चलने के प्रारम्भमें बजते हुए नगाड़े आदि बाजों के साथ साथ अपने पैरोंसे पृथ्वीरूपी रङ्गभूमिपर नृत्य ही कर रहे हों ।।७।।
“Many a steed appeared, at the very onset of motion, to be dancing upon the earth—like performers upon a vast arena—keeping rhythm with the resounding drums and other instruments that thundered alongside their stride.”7
श्लोक ( Shlok ) 8
स्थिरप्रकृतिसत्त्वानामश्वानां चलताऽभवत् । प्रचलत्खुरसंक्षुण्णभुवां गतिषु केवलम् ।।८।।
जिनका स्वभाव और पराक्रम स्थिर है परन्तु जिन्होंने अपने चलते हुए खुरोंसे पृथ्वी खोद डाली है ऐसे घोड़ोंकी चंचलता केवल चलने में ही थी अन्यत्र नहीं थी ॥८॥
“Though steadfast in nature and resolute in valor, these steeds had torn into the earth with their pounding hooves—yet their restlessness was confined to their gait alone, and nowhere else did it dwell.”8
श्लोक ( Shlok ) 9
कोटयोऽष्टादशास्य स्युर्वाजिनां वायरंहसाम्। आजानेयप्रधानानां योग्यानां चक्रवर्तिनः ॥९ll
जिनका वेग वायुके समान है, जो उत्तम जातिके हैं और जो योग्य हैं ऐसे चक्रवर्ती के घोड़ों की संख्या अठारह करोड़ थी ।।९।।
“The steeds of the Emperor—fleet as the wind, of noble breed, and worthy in every regard—numbered eighteen crores in all.”9
श्लोक ( Shlok ) 10
रुद्धरोधोवनाक्षुण्णतटभूर्हासयंत्यपः । सिन्धोः प्रतीपतां भेजे प्रयान्ती सा पताकिनी ॥१०॥
जिसने किनारे के बन रोक लिये हैं, जिसने किनारेकी पृथिवी तोड़ दी है और जो जलको कम करती जाती है ऐसी चलती हुई वह सेना मानो सिन्धु नदीके साथ शत्रुता ही धारण कर रही थी। भावार्थ वह सेना सिन्धु नदीको हानि पहुँचाती हुई जा रही थी ॥१०॥
“The advancing army, which had dammed the shores, shattered the earth along the banks, and caused the waters to recede, seemed to be waging war against the mighty Sindhu River itself. In essence, this army moved forward, bringing harm to the river as it passed.”10
श्लोक ( Shlok ) 11
प्रभोरिवागमात्तुष्टा सिन्धुः सैन्याधिनायकान् । तरङ्गपवनैर्मन्दमासिषेवे सुखाहरैः ॥११॥
वह सिन्धु नदी मानो चक्रवर्ती भरतके आनेसे संतुष्ट होकर ही सुख देनेवाले अपनी लहरोंकी पवनसे धीरे धीरे सेनाके मुख्य लोगोंकी सेवा कर रही थी ॥११॥
“The Sindhu River, seemingly contented by the arrival of Emperor Bharata, gently bestowed her blessings upon the leaders of the army, as though with the soothing breeze of her waves, offering them comfort and service.”11
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129