आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
श्लोक 92 से 101 : विन्ध्याचल से पश्चिम की ओर प्रस्थान
विन्ध्याचल के वनराजाओं ने औषधियाँ और भील राजाओं ने हाथियों के दाँत व मोती भेंट किए। सेना ने नर्मदा पार कर पश्चिम दिशा की ओर प्रस्थान किया। भरत का प्रताप आगे बढ़ा, धूल ने सूर्य का तेज रोक दिया। लाट देश के राजा उनकी आज्ञा में आए। सोरठ और पंजाब के राजाओं ने हाथी भेंट किए। चक्ररत्न से भयभीत राजा ग्रहों की तरह वश में आए। भरत ने दिग्गज जैसे अभिमानी राजाओं को जीता। सोरठ के राजाओं ने ऊँट और घोड़ियाँ भेंट कीं, और भरत गिरनार पर्वत पर पहुँचे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 30 – Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
कृतावासं च तत्रैनं ददृशुस्तद्वनाधिपाः । वन्यैरुपायनै श्लाध्यैरगदैश्च महौषधैः ॥९२॥
विन्ध्याचलके वनोंके राजाओंने वनोंमें उत्पन्न हुई रोग दूर करनेवाली और प्रशंसनीय बड़ी बड़ी औषधियां भेंट कर वहाँपर निवास करनेवाले राजा भरतके दर्शन किये ॥९२।।
The sovereigns of the Vindhya forests came forth to behold King Bharata, who dwelt there; and as tribute, they offered noble and renowned herbs born of the woods—potent in curing ailments and worthy of praise.92
श्लोक ( Shlok ) 93
उपानिन्युः करीन्द्राणां दन्तानस्मै समौक्तिकान् । किरातवर्या “वर्या हि स्वोचिता सत्क्रिया प्रभौंः ॥९३॥
भीलों के राजाओंने बड़े बड़े हाथियोंके दांत और मोती महाराज भरतकी भेंट किये, सो ठीक ही है क्योंकि स्वामीका सत्कार अपनी योग्यताके अनुसार ही करना चाहिये ।।९३।।
The chieftains of the Bhīlas offered unto Emperor Bharata mighty elephant tusks and lustrous pearls—and rightly so, for a sovereign ought to be honored in accordance with his grandeur.93
श्लोक ( Shlok ) 94
पश्चिमार्धेन विन्ध्याद्रिमुल्लङ्घ्योत्तीर्य नर्मदाम् । विजेतुमपरामाशां प्रतस्थे चक्रिणो बलम् ॥९४॥
विन्ध्या-चलको पश्चिमी किनारेके अन्तभागसे उल्लंघन कर और नर्मदा नदीको पार कर चक्रवर्ती की सेनाने पश्चिम दिशाको जीतनेके लिये प्रस्थान किया ।।९४।।
Crossing the western edge of the Vindhya range and fording the sacred Narmadā River, the imperial army of the Chakravartin set forth to conquer the western quarter of the land.94
श्लोक ( Shlok ) 95
गत्वा किञ्चिदु दग्भूयः प्रतीचीं दिशमानशे । प्राक् प्रतापोऽस्य दुर्वारः सचक्रं चरमं बलम् ॥९५।।
वह सेना पहले तो कुछ उत्तर दिशाकी ओर बढ़ी और फिर पश्चिम दिशामें व्याप्त हो गई। सेनामें सबसे आगे महाराज भरतका दुनिवार प्रताप जा रहा था और उसके पीछे पीछे चक्रसहित सेना जा रही थी।। ९५।।
At first, the army advanced somewhat toward the north, and then spread wide across the western quarter. At its forefront blazed the irresistible might of Emperor Bharata, and following in his wake moved the army, complete with its mighty war-wheels.95
श्लोक ( Shlok ) 96
तदा प्रचलदश्वीयखुरोद्धूतं महीरजः । न केवलं द्विषां तेजो रुरोध द्युमणेरपि ॥९६॥
उस समय वेगसे चलते हुए बोड़ोंके समूहके खुरोंसे उड़ी हुई पृथिवीकी धूलिने केवल शत्रुओंके ही तेजको नहीं रोका था किन्तु सूर्यका तेज भी रोक लिया था ॥९६॥
At that time, the dust flung high by the hooves of the swiftly charging cavalry did not merely veil the brilliance of the enemy—it dimmed even the radiance of the sun itself.96
श्लोक ( Shlok ) 97
लाटा ललाट” संघुष्टभूपृष्ठाश्चाटुभाषिणः । लालाटिक पदं भेजुः प्रभोराज्ञावशीकृताः ॥९७॥
जिन्होंने अपने ललाटसे पृथिवीतलको घिसा है और जो मधुर भाषण कर रहे हैं ऐसे भरतकी आज्ञासे वश किये हुए लाट देशके राजा उनके लालाटिक पदको प्राप्त हुए थे। (ललाटं पश्यति लाला-टिकः-स्वामी क्या आज्ञा देते हैं ? यह जाननेके लिये जो सदा स्वामीके मुखकी ओर ताका करते हैं उन्हें लालाटिक कहते हैं।) ।॥९७।।
Those kings of the Lāṭa region, who with their foreheads had humbled themselves upon the earth and who spoke with sweet and submissive words, were brought into subjugation by the command of Bharata, and thus attained the honor of his forehead’s mark—that is, they ever kept their gaze fixed upon his countenance, awaiting his will.97
श्लोक ( Shlok ) 98
केचित्सौराष्ट्रिकैर्नागैः परे पाञ्चनदैर्गजैः । तं तद्वनाधिपा वीक्षाञ्चक्रिरे चक्रचालिताः ॥९८॥
चक्र रत्नसे विचलित हुए कितने ही वनके राजा ओंने सोरठ देशमें उत्पन्न हुए और कितने ही राजाओंने पंजाबमें उत्पन्न हुए हाथी भेंट देकर भरतके दर्शन किये ॥९८॥
Many forest chieftains, shaken by the might of the Discus-jewel, approached Bharata bearing tribute—some bringing elephants born in the land of Saurāṣṭra, and others offering those reared in the plains of Pañjāb, all seeking the honor of his audience.98
श्लोक ( Shlok ) 99
चक्रसन्दर्शनादेव त्रस्ता निर्मण्डलग्रहाः । ग्रहा इव नृपाः केचित् चक्रिणो वशमाययुः ९९॥
जो चक्रके देखनेसे ही भयभीत हो गये हैं और जिन्होंने अपने देशका अभिभान छोड़ दिया है ऐसे कितने ही राजा लोग सूर्य चन्द्र आदि ग्रहोंके समान चक्रवर्तीके बश हो गये थे । भावार्थ- जिस प्रकार समस्त ग्रह भरतके वशीभूत थे- अनुकूल थे उसी प्रकार उस दिशाके समस्त राजा भी उनके वशीभूत हो गये थे ॥९९॥
Many kings, who trembled at the mere sight of the Discus and had cast aside all pride in their dominions, came under the sway of the Emperor—just as the sun, moon, and other celestial bodies remain ever obedient to their sovereign course.99
श्लोक ( Shlok ) 100
दिश्यानिव द्विपान् क्ष्मायान्पृथुवंशान्मदोद्धुरान् । प्रचक्रे “प्रगुणांश्चक्री बलादाक्रम्य दिक्पतीन् ॥१००।।
चक्रवर्ती भरतने दिग्गजों के समान पृथुवंश अर्थात् उत्कृष्ट वंशमें उत्पन्न हुए (पक्षमें पीठपरकी चौड़ी रीढ़से सहित) और मदो-दूर अर्थात् अभिमानी (पक्षमें मदजलसे उत्कट) राजाओंको जबर्दस्ती आक्रमण कर अपने वश किया था ।।१००।।
Emperor Bharata, the sovereign of all, forcefully subdued those kings born of noble and exalted lineages—those with broad, lion-like shoulders, and those proud and intoxicated with their own arrogance—bringing them under his command.100
श्लोक ( Shlok ) 101
नृपान् सौराष्ट्रकानुष्ट्र “वामीशतभृतो पदान्। सभाजयन् प्रभुर्भेजे रम्या रैवतकस्थलीः ।। १०१।।
सैकड़ों ऊंट और घोड़ियोंकी भेंट लेकर आये हुए सोरठ देशके राजाओं से सेवा कराते हुए अथवा उनसे प्रीतिपूर्वक साक्षात्कार (मुलाकात) करते हुए चक्रवर्ती भरत गिरनार पर्वतके मनोहर प्रदेशोंमें जा पहुंचे ।।१०१ ॥
Emperor Bharata, having received tribute in the form of hundreds of camels and horses from the kings of Saurāṣṭra, either compelling their service or meeting them with affectionate regard, journeyed on to the enchanting regions of the Girnār mountain.101
श्लोक 102 से 111
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91