आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31
शत्रुओं का धन-हरण और प्रजा का कल्याण
भरत शत्रुओं के रत्न और धन छीनकर उन्हें निर्धन करते हैं, परंतु आत्मसमर्पण करने वाले राजाओं को उच्च पद प्रदान करते हैं। पृथिवी उनके धन से संतुष्ट हो निर्भय हो जाती है। वे अहंकारी राजाओं को दण्डित और सत्कर्मी राजाओं को सम्मानित करते हैं। प्रजा और राजाओं के कल्याण के लिए योग और क्षेम की चिंता करते हैं। उनका पुण्य और चक्ररत्न विजय के मुख्य साधन हैं, जबकि सेना केवल वैभव के लिए है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
वस्तुवाहनसर्वस्वमाच्छिद्य प्रभुराहरन् । अरित्वमरिचक्रेषु व्यक्तमेव चकार सः ॥२२॥
महाराज भरत ने शत्रुओंके हीरा मोती आदि रत्न तथा सवारी आदि सब धन छीन लिया था और इस प्रकार उन्होंने समस्त अरि अर्थात् शत्रुओंके समूहको स्पष्ट रूप से अरि अर्थात् धन-रहित कर दिया था ।। २२ ।।
“Emperor Bharata took away all the precious jewels, pearls, and steeds of his enemies, and in doing so, he rendered the entire army of foes utterly destitute, bereft of their wealth and glory.” (Verse 22)
श्लोक ( Shlok ) 23
स्वयमर्पितसर्वस्वा नमन्तश्चक्रवर्तिनम् । पूर्वमप्यरयः पश्चादधिकारित्वमाचरन् ॥२३॥
अपने आप समस्त धन भेंट कर चक्रवर्तीको नमस्कार करनेवाले राजा लोग यद्यपि पहले शत्रु थे तथापि पीछेसे वे बड़े भारी अधिकारी हुए थे ।॥२३॥
“Kings, who once stood as enemies, humbled themselves before the Emperor by voluntarily offering all their riches and paying homage. In the end, they became his most honored and trusted allies.” (Verse 23)
श्लोक ( Shlok ) 24
साधनैरमुनाक्रान्ता या धरा धृतसाध्वसा । साधनैरेव तं तोषं नीत्वाऽभूद्धृतसाध्वसा ॥२४॥
जो पृथिवी पहले भरतकी सेनासे आक्रान्त होकर भयभीत हो रही थी वही पृथिवी अब अपने धनसे भरत को संतोष प्राप्त कराकर निर्भय हो गई थी ॥२४॥
“The earth, once struck with fear and ravaged by the might of Bharata’s army, now found peace, having placated the Emperor with her abundant treasures, and was no longer troubled by fear.” (Verse 24)
श्लोक ( Shlok ) 25
कुल्याः कुलधनान्यस्मै दत्वा स्वां भुवमार्जिजन्। कुल्या ” धनजलौघस्य जिगीषोस्ते हि पार्थिवाः ॥२५।।
उच्च कुलोंमें उत्पन्न हुए अनेक राजाओं ने भरतेश्वरके लिये अपनी कुल-परम्परासे चला आया धन देकर फिरसे अपनी पृथिवी प्राप्त की थी सो ठीक ही है क्योंकि कुल्य अर्थात् कुल-परम्परासे आया हुआ धन और कुल्या अर्थात् नहरमें उत्पन्न हुआ जल ये दोनों ही पृथिवीसे उत्पन्न हुए पदार्थ, जीतनेकी इच्छा करनेवाले राजाके होते हैं ।। २५।।
“Numerous kings, born of noble lineages, regained their kingdoms by offering the wealth inherited from their ancestors to Bharateshwar. This was indeed just, for, just as wealth passed down through lineage and water flowing from a canal both spring from the earth, they rightfully belong to the sovereign who seeks victory.” (Verse 25)
श्लोक ( Shlok ) 26
प्रजाः करभराक्रान्ता यस्मिन् स्वामिनि दुःस्थिताः । तमुद्धृत्य पदे तस्य युक्तदण्डं न्यधाद् विभुः ॥२६॥
जिस राजाके रहते हुए प्रजा कर के बोझ से दब कर दुःखी हो रही थी, भरत ने उसे हटाकर उसके पदपर किसी अन्य नीतिमान् राजाको बैठाया था ।।२६।।
“The king, under whose reign the people groaned under the weight of oppression, was deposed by Bharata, who installed a wise and just ruler in his place.” (Verse 26)
श्लोक ( Shlok ) 27
निजग्राह नृपान् दृप्तान नुजग्राह सत्क्रियान् । न्यायः क्षात्रो ऽयमित्येव प्रजाहितविधित्सया ॥२७।।
उन्होंने अहंकारी राजाओंको दण्डित किया था और सत्कार अथवा उत्तम कार्य करने वाले राजाओं पर अनुग्रह किया था सो ठीक ही है क्यों कि प्रजाका हित करने की इच्छा से क्षत्रियों का यह ऐसा न्याय ही है ॥२७॥
“He chastised the prideful kings and bestowed his favor upon those who upheld honor and virtue, and this was right, for it is the sacred duty of Kshatriyas to administer such justice for the welfare of the people.” (Verse 27)
श्लोक ( Shlok ) 28
योगक्षेमौ जगत्स्थित्यै न प्रजास्वेव केवलम् । प्रजापालेप्वपि प्रायस्तस्य चिन्त्यत्वमीयतुः ॥२८।।
राजा भरतने जगत्की स्थितिके लिये केवल प्रजा के विषय में ही योग (नवीन वस्तुको प्राप्त करना) और क्षेम (प्राप्त हुई वस्तुकी रक्षा करना) की चिन्ता नहीं की थी किन्तु प्रजा की रक्षा करने वाले राजाओंके विषय में भी प्रायः उन्हें योग और क्षेमकी चिन्ता रहती थी ॥२८॥
“For the stability of the world, King Bharata was not only concerned with the welfare and protection of his own subjects but also frequently reflected upon the prosperity and security of those kings who diligently guarded their people.” (Verse 28)
श्लोक ( Shlok ) 29
पार्थिवस्यैकराष्ट्रस्य मता वर्णाश्रमाः प्रजाः । पार्थिवाः सार्वभौमस्य प्रजा यत्तेन ते धृताः । २९।
किसी एक देशके राजा की प्रजा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्ण रूप मानी जाती है परन्तु चक्रवर्ती की प्रजा नम्रीभूत हुए राजा लोग ही माने जाते हैं इस-लिये चक्रवर्तीको प्रजा के साथ साथ राजाओं की चिन्ता करना भी उचित है ।। २९॥
“In any single kingdom, the subjects are classified into the four varnas — Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, and Shudras. However, the subjects of a Chakravarti are those kings who have humbled themselves before him. Thus, it is only fitting for the Chakravarti to concern himself not only with the welfare of his subjects but also with the well-being of other kings.” (Verse 29)
श्लोक ( Shlok ) 30
पुण्यं साधनमस्यैकं चक्रं तस्यैव पोषकम् । तद्वयं साध्यसिद्ध्यङ्गं सेनाङ्गानि विभूतये ॥३०॥
भरत के समस्त कार्यों को सिद्ध करनेवाला एक पुण्य ही मुख्य साधन था, और चक्ररत्न उस पुण्यकी पुष्टि करनेवाला था, पुण्य और चक्ररत्न ये दोनों ही उसके साध्य (सिद्ध करने योग्य विजय रूप कार्य) की सिद्धि के अंग थे, बाकी हाथी घोड़े आदि सेना के अंग केवल वैभवके लिये थे ॥३०॥
“The primary force behind the success of all of Bharata’s endeavors was a singular virtue, while the Chakratna served to fortify and affirm that virtue. Both virtue and the Chakratna were essential elements in the realization of his goal — the achievement of supreme victory. The elephants, horses, and other members of his army were but adornments, symbols of majesty.” (Verse 30)
श्लोक ( Shlok ) 31
इति मण्डलभूपालान् बलात् प्राणमयन्नयम् । “मानमेवाभनक् तेषां न सेवाप्रणयं विभुः ॥३१॥
इस प्रकार मण्डलेश्वर राजाओं से बलपूर्वक प्रणाम कराते हुए चक्रवर्ती ने उनका केवल मान भंग ही किया था, अपनी सेवाके लिये जो उनका प्रेम था उसे नष्ट नहीं किया था ।। ३१।।
“Thus, while compelling the kings of the regions to bow in submission, the Chakravarti did not extinguish their affection for him, but merely shattered their arrogance.” (Verse 31)
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21