आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
श्लोक 142 से 151
मागधदेव का प्रबोधन और चक्रवर्ती की पहचान
देवों ने कहा कि चक्रवर्ती के बाण पर अंकित नाम उनकी पहचान प्रकट करता है। उन्होंने मागधदेव को क्रोध त्यागकर चक्रवर्ती की आज्ञा मानने और बाण की पूजा कर उन्हें अर्पित करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि चक्रवर्ती के साथ वैर से शांति नहीं मिलेगी और पूज्य पुरुषों की पूजा से दोनों लोकों में उन्नति होती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
बलिनामपि सन्त्येव बलीयांसो मनस्विनः । बलवानहमस्मीति नोत्सेक्तव्यमतः परम् ॥१४२॥॥
हे प्रभो, बलवान् मनुष्यों की अपेक्षा और भी अधिक बलवान् तथा बुद्धिमान् हैं इसलिये मैं बलवान् हूं इस प्रकार कभी गर्व नहीं करना चाहिये ॥ १४२॥
“O Lord, there are men even stronger and wiser than the strong, therefore one should never be proud merely by thinking, ‘I am powerful.’ “ (142)
श्लोक ( Shlok ) 143
न किञ्चिदप्यनालोच्य विधेयं सिद्धिकाम्यता । ततः शरः कुतस्त्योऽयं किमीयो वेति मृग्यताम् ॥१४३॥
सिद्धि अर्थात् सफलताकी इच्छा करनेवाले पुरुष को बिना विचारे कुछ भी कार्य नहीं करना चाहिये इसलिये यह बाण कहां से आया है ? और किसका है ? पहले इस बातकी खोज करनी चाहिये ॥ १४३॥
“A man who desires success should not act without careful thought; therefore, we must first investigate — from where has this arrow come, and whose is it?” (143)
श्लोक ( Shlok ) 144
श्रुतं च बहुशोऽस्माभि राप्तीयं पुष्कलं वचः। जिनाश्चक्रधरैस्सार्ध वर्त्स्पन्तीहेति भारते ॥१४४।।
इस भारतवर्षमें चक्र-वतियों के साथ तीर्थ कर निवास करेंगे, अवतार लेंगे ऐसे आप्त पुरुषों के यथार्थ वचन हम लोगों ने अनेक बार सुने हैं ।॥ १४४।॥
“In this land of Bhāratavarṣa, we have often heard the true words of trustworthy men, that Tīrthaṅkaras and Chakravartins will dwell and take incarnations here.” (144)
श्लोक ( Shlok ) 145
नूनं चक्रिण एवायं जयाशंसी शरागमः । धूतान्धतमसोद्योतः सम्भाव्योऽन्यत्र किं रवेः ॥१४५।।
विजयको सूचित करनेवाला यह बाण अवश्य ही चक्रवर्ती का ही होगा क्योंकि सघन अन्धकार को नष्ट करने वाला प्रकाश क्या सूर्य के सिवाय किसी अन्य वस्तु में भी संभव हो सकता है ? अर्थात् नहीं ।। १४५।।
“This arrow, which proclaims victory, must indeed belong to a Chakravartin; for, can the dense darkness be dispelled by anything other than the sun? Certainly not.” (145)
श्लोक ( Shlok ) 146
अथवा खलु संशय्य चक्रपाणेरयं शरः । व्यनक्ति व्यक्तमेवैनं तन्नामाक्षरमालिका ॥१४६॥
अथवा इस विषय में संशय करना व्यर्थ है। यह बाण चक्रवर्ती का ही है, क्योंकि इस पर खुदे हुए नाम के अक्षरों की माला साफ साफ ही चक्रवर्तीको प्रकट कर रही है ।। १४६।।
“Or rather, it is futile to have any doubt in this matter. This arrow indeed belongs to the Chakravartin, for the string of clearly inscribed letters on it unmistakably reveals the Chakravartin.” (146)
श्लोक ( Shlok ) 147
तदेन शरमभ्यर्च्य गन्धमाल्याक्षतादिभिः । पूज्याद्येव विभोराज्ञा गत्वास्माभिः शरार्पणा ॥१४७।।
इसलिये गन्ध माला अक्षत आदि से इस बाण की पूजा कर हम लोगों को आज ही वहां जाकर उनका यह बाण उन्हें अर्पण कर देना चाहिये और आज ही उनकी आज्ञा मान्य करनी चाहिये ।। १४७।।
“Therefore, after worshipping this arrow with fragrant garlands, unbroken rice, and other offerings, we should go there today itself, present this arrow back to him, and from today itself accept his command with reverence.” (147)
श्लोक ( Shlok ) 148
मा गा मागध वैचित्यं कार्यमेतद् विनश्चिनु । न युक्तं तत्प्रतीपत्वं तव तद्देशवासिनः ॥१४८॥
हे मागध, आप किसी प्रकारके विकारको प्राप्त मत हृजिये, और हम लोगोंके द्वारा कहे हुए इस कार्यका अवश्य ही निश्चय कीजिये, क्योंकि उनके देशमें रहनेवाले आपको उनके साथ विरोध करना उचित नहीं है ।॥१४८॥
“O Māgadha, do not let yourself be overcome by agitation, and surely decide upon the action we have suggested. For it is not proper for those residing in his domain to oppose him.” (148)
श्लोक ( Shlok ) 149
तदलं देव संरभ्य तत्प्रातीप्य न शान्तये । महतः सरिदोघस्य कः प्रतीपं तरन् सुखी ॥१४९॥
इसलिये हे देव, क्रोध करना व्यर्थ है, चक्रवर्ती के साथ वैर करनेसे कुछ शान्ति नहीं होगी क्योंकि नदीके बड़े भारी प्रवाह के प्रतिकूल तैरनेवाला कौन सुखी हो सकता है? अर्थात् कोई नहीं ॥१४९॥
“Therefore, O Lord, it is useless to be angry. No peace can be gained by enmity with the Chakravartin, for who can find happiness swimming against the mighty current of a river? Indeed, no one.” (149)
श्लोक ( Shlok ) 150
बलवाननुवर्त्यश्चेद नुनेयोऽद्य चक्रभृत । महत्सु वैतसी वृत्तिमामनन्त्यविपत्करीम् ॥१५०॥
यदि बलवान् मनुष्यको अनुकूल बनाये रखना चाहिये यह नीति है तो चक्रवर्ती को आज ही प्रसन्न करना चाहिये, क्योंकि बड़े पुरुषों के विषय में बेंतके समान नम् वृत्ति ही दुःख दूर करनेवाली है ऐसा विद्वान् लोग मानते हैं ।॥१५०।।
“If it is wise policy to keep powerful men favorable, then the Chakravartin must be pleased today itself; for regarding great men, scholars believe that a humble attitude, like the flexibility of a reed, alone removes sorrow.” (150)
श्लोक ( Shlok ) 151
इहामुत्र च जन्तूनामु न्नतै पूज्यपूजनम्। तापं तत्रानुबध्नाति पूज्यपूजाव्यतिक्रमः ॥१५१॥
पूज्य मनुष्यों की पूजा करने से इस लोक तथा परलोक दोनों ही लोकोंमें जीवोंकी उन्नति होती है और पूज्य पुरुषों की पूजा का उल्लंघन अर्थात् अनादर करने से दोनों ही लोकों में पाप बन्ध होता है ॥ १५१।
“By worshipping revered individuals, beings progress in both this world and the next; whereas by neglecting or dishonoring them, one incurs sin in both worlds.” (151)
श्लोक 152 से 161
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141