आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
श्लोक 1 से 11 : चक्रवर्ती भरत की सेना का नैर्ऋत्य दिशा पर अभियान
चक्रवर्ती भरत अपनी विशाल सेना के साथ नैर्ऋत्य दिशा (दक्षिण-पश्चिम) को जीतने के लिए निकले। उनकी सेना में घोड़े आगे, रथ पीछे, हाथी बीच में और प्यादे सर्वत्र थे। देवों और विद्याधरों की सेना के साथ यह चार अंगों वाली सेना छह अंगों से विस्तारित थी। सेना के आंदोलन से समुद्र लहराने लगा, मानो वह महापुरुषों के अनुकरण का संदेश दे रहा हो। विरोधी राजा परास्त हो गए, नदियाँ कीचड़मय और पहाड़ समतल हो गए। भरत की सिद्धियाँ उनके उद्योगों से फलित हुईं। उनकी अजेय शक्ति और सेना ने शत्रुओं पर प्रभाव डाला। योद्धा और बाण समान गुणों वाले थे, दोनों विजय के अंग बने। शत्रुओं के छत्र-चमर छीन लिए गए, जिससे वे सहायता-रहित हो गए। श्लेष अलंकार से युक्त एक श्लोक में विरोधी राजाओं के कुपतित्व (दरिद्रता) का वर्णन है, जो उनकी पराजय के बाद जंगलों में फल खाकर जीवनयापन करते थे। भरत को सन्धि-विग्रह की चिन्ता केवल व्याकरण तक सीमित थी, क्योंकि उन्होंने सभी शत्रुओं को नष्ट कर दिया था।
श्लोक 12 से 21 : समुद्र तट पर सेना का अभियान
भरत की सेना ने सुपारी और नारियल के वनों से घिरे समुद्र तट पर आक्रमण किया। सैनिकों ने सरोवरों की छाया में विश्राम किया और नारियल का रस पिया। ताड़ के वनों में सूखे पत्तों की मर्मर ध्वनि सुनी। भरत ने सुपारी के वृक्षों को पान की लताओं से लिपटे देखकर प्रसन्नता अनुभव की, जो स्त्री-पुरुष के समान प्रतीत होते थे। सूर्यास्त के समय पक्षियों के शब्द मुनियों के स्वाध्याय जैसे लगे। सैनिकों ने कटहल के फल खाए और नारियल का रस, मिरच आदि से भोजन व्यवस्था सुखद रही। मिरच खाकर आंसू बहाते पक्षी और वानरों का दृश्य भी भरत ने देखा।
श्लोक 22 से 34 : वनों और पर्वतों का सौन्दर्य
वनों में फलों से लदे वृक्ष कल्पवृक्ष जैसे लगे। लताओं से लिपटे फलदार वृक्ष सैनिकों को संतुष्ट करते थे। सिंहल द्वीप की स्त्रियाँ नारियल की मदिरा पीकर भरत का यश गाती थीं। त्रिकूट, मलय और पाण्डयकबाटक पर्वतों पर किन्नर देवियाँ और मलय-सह्य के वनों में भील स्त्रियाँ भरत का यश गा रही थीं। मलय गिरि के लतागृहों में चन्दन को हिलाता वायु अतिथि सत्कार करता प्रतीत हुआ। केरल की युवतियाँ सुगन्धित निःश्वास, चन्दन-लेपित शरीर, नृत्य और गीतों से भरत का मन मोह रही थीं।
श्लोक 35 से 50 : दक्षिण और पश्चिम की विजय
भरत ने चोल, केरल और पाण्ड्य राजाओं को परास्त कर उनसे प्रणाम करवाया। कलिंग के विशाल हाथियों ने मलय के छोटे पर्वतों को व्याप्त किया। भरत के हाथियों ने दिग्गजों को अधीन कर लिया। पश्चिम समुद्र तट के राजाओं को जीतकर उनकी सेना समुद्र के दोनों किनारों तक फैली। समुद्र की लहरें सेना के भय से आकुल प्रतीत हुईं। सह्य पर्वत की गोद में लहराता समुद्र दुखी और पराजित जान पड़ा। सेना के आघात से सह्य पर्वत के वृक्ष टूटे, शिखर क्षतिग्रस्त हुए और वह नाममात्र का अचल रहा। भरत के हाथी सह्य से तुंगवरक तक घूमे, पर्वतों को पार किया।
श्लोक 51 से 63 : पश्चिम के हाथी और नदियाँ
भरत ने पश्चिम दिशा के उत्कृष्ट गुणों वाले हाथियों को प्राप्त किया, जो शूरवीर, सुगंधित मद वाले और मजबूत थे। सह्य पर्वत की नदियाँ, जैसे भीमरथी, दारुवेणा, नीरा, मूला, बाणा, गोदावरी आदि, सेना ने पार कीं। इन नदियों में मगरमच्छ, पक्षी और वृक्षों की छाया थी। सेनापति ने जंगली हाथियों को भी पकड़ा।
श्लोक 64 से 71 : विन्ध्याचल की समानता और सौन्दर्य
भरत ने विन्ध्याचल को अपने समान देखा, दोनों भूभृत्, उत्तुंग, पृथुवंश धारक और अलंघ्य थे। विन्ध्य के झरने पताकाओं जैसे शोभित थे। पर्वत समुद्र में प्रवेश करता प्रतीत हुआ, मानो दावानल से भयभीत होकर मित्रता चाहता हो। झरने वृक्षों का पोषण करते थे, और शब्दकारी नदियाँ हँसी करती प्रतीत हुईं। दावानल से जलते शिखर सुवर्ण जैसे लगे।
श्लोक 72 से 81 : विन्ध्याचल का सौन्दर्य और विविधता
विन्ध्याचल का वन हाथियों, सर्पों, काँटों और उपद्रवी लोगों से युक्त था, जो इसे दुखदायी बनाता था। वन में विरोधाभास था—मदोन्मत्त हाथियों से युक्त होने पर भी यह समुद्री नमक और शोभंजन लताओं से समृद्ध था। फटे बाँसों से मोतियाँ बिखरती थीं, मानो वनलक्ष्मी हँस रही हो। गुफाओं से झरनों की गंभीर ध्वनि पर्वत की महिमा को कुलाचलों से स्पर्धा करती प्रतीत हुई। पर्वत का विविध रंग, धातुएँ और हरिणों के वर्ण विचित्र आकार बनाते थे। रात में औषधियाँ दीपकों की तरह चमकती थीं। सिंहों द्वारा मारे गए हाथियों के मोतियों से प्रदेश फ बिखरे फूलों जैसा लगता था। चक्रवर्ती भरत ने विन्ध्याचल पर भील और हाथियों को देखा, जो मेघ जैसे काले थे। नदियों को उन्होंने स्त्रियों के समान उत्कंठा से देखा।
श्लोक 82 से 91 : नर्मदा नदी और विन्ध्याचल की विजय
भरत ने विन्ध्याचल के मध्य में समुद्र तक फैली नर्मदा नदी देखी, जो पृथ्वी की चोटी या विन्ध्य की विजय-पताका सी लगती थी। सेना के क्षोभ से पक्षियों की पंक्तियाँ उड़ती थीं, मानो तोरण बाँधे गए हों। नर्मदा ने रानियों को क्रीड़ा प्रदान की। सेना ने नर्मदा पार कर विन्ध्याचल के उत्तर में आक्रमण किया। पर्वत दोनों दिशाओं में फैला, मानो स्वयं को अर्पित कर रहा हो। सेना का पड़ाव नर्मदा के किनारों पर विन्ध्याचल सा शोभित था। सेना और पर्वत में समानता थी—हाथियों और गंडोपलों, घोड़ों और किन्नरों के कारण। सेना ने विन्ध्याचल के फल-पत्तों का उपभोग कर इसे वन्ध्याचल बना दिया। सैनिकों ने मोतियों और वाँसी चावलों से जिनेन्द्र की पूजा की।
श्लोक 92 से 101 : विन्ध्याचल से पश्चिम की ओर प्रस्थान
विन्ध्याचल के वनराजाओं ने औषधियाँ और भील राजाओं ने हाथियों के दाँत व मोती भेंट किए। सेना ने नर्मदा पार कर पश्चिम दिशा की ओर प्रस्थान किया। भरत का प्रताप आगे बढ़ा, धूल ने सूर्य का तेज रोक दिया। लाट देश के राजा उनकी आज्ञा में आए। सोरठ और पंजाब के राजाओं ने हाथी भेंट किए। चक्ररत्न से भयभीत राजा ग्रहों की तरह वश में आए। भरत ने दिग्गज जैसे अभिमानी राजाओं को जीता। सोरठ के राजाओं ने ऊँट और घोड़ियाँ भेंट कीं, और भरत गिरनार पर्वत पर पहुँचे।
श्लोक 102 से 111 : गिरनार और पश्चिम के राजाओं की भेंट
भरत ने नेमिनाथ का स्मरण कर गिरनार की प्रदक्षिणा की। राजाओं ने रेशमी वस्त्र और सिल्क भेंट किए। भरत ने कुछ को सन्मान, कुछ को स्नेह और कुछ को प्रसन्न दृष्टि से अनुरक्त किया। राजाओं ने हाथी, घोड़े और रत्नों से उनकी पूजा की। तुरुष्क आदि देशों के वेगवान घोड़े और काम्बोज, सैन्धव जैसे कुलीन घोड़े भेंट किए गए। भरत को रत्नों के साथ यश की प्राप्ति हुई। सेनापति ने जल-स्थल मार्ग रोककर पहाड़ी राजाओं को जीता और देश, जंगल, नदियाँ, पर्वत पार कर भरत की आज्ञा स्थापित की।
श्लोक 112 से 121 : पश्चिम समुद्र की ओर विजय
भरत पश्चिम समुद्र की ओर बढ़े, राजाओं का अभिमान और धन हरते हुए। समुद्र नदियों रूपी हाथों से रत्नों का अर्घ देता प्रतीत हुआ। समुद्र को रत्नाकर माना गया, न कि केवल लवण समुद्र। सूर्य का तेज मंद पड़ता था, पर भरत का तेज देदीप्यमान था। चक्ररत्न धारी भरत सूर्य समान चमके। उन्होंने सिन्धु नदी के द्वार पर पड़ाव डाला। सैनिकों ने सिन्धु के वन में निवास किया। पुरोहित ने चक्ररत्न और जिनेन्द्र की पूजा की, और गंधोदक व आशीर्वादों से भरत को आनंदित किया।
श्लोक 122 से 129 : समुद्र में प्रवेश और अंतिम विजय
भरत ने रथ पर चढ़कर लवण समुद्र में प्रवेश किया। उन्होंने प्रभासदेव को जीता और उससे मोतियों, कल्पवृक्ष के फूलों और सुवर्ण का जाल प्राप्त किया। पुण्यकर्म से देवों को जीतकर उन्होंने सिन्धुद्वार पर सारभूत धन प्राप्त किया। लक्ष्मी से अलंकृत भरत समुद्र से निकले, नवीन वर सा शोभित। पूर्व, दक्षिण और पश्चिम दिशाओं को जीतकर, दिक्प slide जैन धर्म के सिद्धांतों के आधार पर, चक्रवर्ती भरत ने समस्त दिशाओं को शत्रुरहित किया। पुण्य से चक्रवर्ती, इंद्र, तीर्थंकर और मोक्ष की लक्ष्मी प्राप्त होती है। अतः जिनेन्द्र के आगम अनुसार पुण्य उपार्जन की सलाह दी गई।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 30 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
‘अथापरान्तं निर्जेतुमुद्यतः प्रभुरुद्ययौ । दक्षिणापरदिग्भागं वशीकुर्वन् स्वसाधनैः ॥१॥
अथानन्तर-पश्चिम दिशाको जीतने के लिये उद्यत हुए चक्रवर्ती भरत अपनी सेनाके द्वारा दक्षिण और पश्चिम दिशाके मध्यभाग (नैर्ऋत्य दिशा) को जीतते हुए निकले ॥१॥
“Thereafter, the sovereign emperor Bharata, resolved to conquer the western quarter, set forth with his army, subjugating along the way the intermediate region between the south and the west—the southwest direction.” ॥1॥
श्लोक ( Shlok ) 2
पुरः प्रयातमश्वोयैः रन्वक् प्रचलितं रथैः । मध्ये हस्तिघटा ‘प्रायात् सर्वत्रैवात्र पत्तयः ॥२॥
उनकी सेना में घोड़ोंके समूह सबसे आगे जा रहे थे, रथ सबसे पीछे चल रहे थे, हाथियोंका समूह बीचमें जा रहा था और प्यादे सभी जगह चल रहे थे ।।२।।
“In his army, the squadrons of horses advanced at the forefront, the chariots followed at the rear, the battalions of elephants moved in the middle, and the infantry marched on all sides.” ॥2॥
श्लोक ( Shlok ) 3
“सदेवबलमित्यस्य चतुरङ्गं विभोर्यलम् । विद्याभृतां बलैः सार्द्ध षड्भिरङ्गैर्विपप्रथे ॥३॥
हाथी, घोड़े, रथ, प्यादे इस प्रकार चार तरहकी भरत की सेना देव और विद्याधरों की सेनाके साथ साथ चल रही थी। इस प्रकार वह सेना अपने छह अंगोंके द्वारा चारों ओर विस्तार पा रही थी ।।३।।
“Elephants, horses, chariots, and infantry—thus the fourfold army of Bharata advanced alongside the hosts of gods and celestial beings. In this manner, the army, through its six divisions, spread forth in all directions.” ॥3॥
श्लोक ( Shlok ) 4
प्रचलद्वलसंक्षोभादु च्चचाल किलार्णवः । महतामनुवृत्ति नु श्रावयन्ननुजीविनाम् ॥४।॥
उस चलती हुई सेना के क्षोभसे समुद्र भी क्षुब्ध हो उठा था- लहराने लगा था और ऐसा जान पड़ता था मानो ‘सबको महापुरुषोंका अनुकरण करना चाहिये’ यही बात सेवक लोगोंको सुना रहा हो ।।४।।
“Stirred by the movement of that advancing army, even the ocean grew agitated and began to surge, as though proclaiming to all: ‘One must follow in the footsteps of the great.’” ॥4॥
श्लोक ( Shlok ) 5
बलैः प्रसह्य निर्भुक्ताः प्रह्वन्ति स्म महीभुजः। सरितः कर्दमन्ति स्म स्थलन्ति स्म महाद्रयः ॥५॥
सेनाके द्वारा जबर्दस्ती आक्रमण किये हुए राजा लोग नम्र हो गये थे, नदियोंमें कीचड़ रह गया था और बड़े बड़े पहाड़-समान जमीन के सदृश हो गये थे ।। ५ ।।
“The kings, subdued by the might of the advancing army, had become humble; the rivers were left muddied in its wake, and towering mountains had been rendered level like the plain.” ॥5॥
श्लोक ( Shlok ) 6
सुरसाः” कृतनिर्वाणाः स्पृहणीया बुभुक्षुभिः। महद्भिः सममुद्योगैः फलन्ति स्मास्य सिद्धयः ।।६।।
जिनका उपभोग अत्यन्त मनो-रम है, जो सतोष उत्पन्न करनेवाली हैं, और जो उपभोग क्री इच्छा करनेवाले मनुष्योंके द्वारा चाहने योग्य हैं ऐसी इस चक्रवर्ती की समस्त सिद्धियां इसके बड़े भारी उद्योगोंके साथ ही साथ फल जाती थीं अर्थात् सिद्ध हो जाती थीं ।॥६॥
“All the accomplishments of this sovereign emperor—delightful in their enjoyment, fulfilling to the heart, and coveted by those who yearn for worldly pleasures—came to fruition alongside his great and tireless efforts.” ॥6॥
श्लोक ( Shlok ) 7
अभेद्या दृढसन्धाना विपक्षजय हेतवः । शक्तयोऽस्य स्फुरन्ति स्म सेनाश्च विजिगीषुषु ॥७॥
जिन्हें कोई भेद नहीं सकता है, जिनका संगठन अत्यन्त मजबूत है और जो शत्रुओंके क्षय का कारण हैं ऐसी भरत की शक्ति तथा सेना दोनों ही शत्रु राजाओं पर अपना प्रभाव डाल रहे थे ॥ ७॥
“Bharata’s might and his army—impenetrable, firmly united, and the cause of the enemy’s downfall—were casting their formidable influence upon the rival kings.” ॥7॥
श्लोक ( Shlok ) 8
फलेन” योजितास्तीक्ष्णाः सपक्षा दूरगामिनः । नाराचैः सममेतस्य योधा जग्मुर्जयाङ्गताम् ॥८।।
भरतके योद्धा उनके बाणोंके समान थे, क्योंकि जिस प्रकार योद्धा फल अर्थात् इच्छानुसार लाभसे युक्त किये जाते थे उसी प्रकार बाण भी फल अर्थात् लोहेकी नोकसे युक्त किये जाते थे, जिस प्रकार योद्धा तीक्ष्ण अर्थात् तेजस्वी थे उसी प्रकार बाण भी तीक्ष्ण अर्थात्पैने थे, जिस प्रकार योद्धा सपक्ष अर्थात् सहायकोंसे सहित थे उसी प्रकार बाण भी सपक्ष अर्थात् पंखोंसे सहित थे, और जिस प्रकार योद्धा दूर तक गमन करनेवाले थे उसी प्रकार बाण भी दूर तक गमन करनेवाले थे, इस प्रकार वे दोनों साथ साथ ही विजयके अंग हो रहे थे ।।८।।
“The warriors of Bharata were likened to his arrows—for just as the arrows were tipped with sharp iron heads, so too were the warriors endowed with rewarding prowess; as the arrows were keen, so were the warriors fierce and radiant; as the arrows bore feathers, so the warriors were accompanied by allies; and as the arrows flew far, so too could the warriors advance great distances. Thus, both became instruments of his victory, alike in purpose and power.” ॥8॥
श्लोक ( Shlok ) 9
दूरमुत्सारिताः सैन्यैः परित्यक्तपरिच्छदाः । विपक्षाः सत्यमेवास्य विपक्षत्व’मुपाययुः ॥९॥
भरत के विपक्ष (विरुद्धः पक्षो येषां ते विपक्षाः) अर्थात् शत्रुओंको उनकी सेनाने दूर भगा दिया था और उनके छत्र चमर आदि सब सामग्री भी छीन ली थी इसलिये वे सचमुच ही विपक्ष-पनेको (विगतः पक्षो येषां ते विपक्षास्तेषां भावस्तत्त्वम्) प्राप्त हो गये थे अर्थात् सहाय रहित हो गये थे ।।९।।
“Bharata’s army had driven his adversaries far from the battlefield, stripping them of their royal emblems—such as umbrellas and chowries—and thus, they truly became vipakṣa, bereft of support and followers, their very ‘side’ having vanished.” ॥9॥
श्लोक ( Shlok ) 10
आक्रान्त भूभृतो नित्यं भुञ्जानाः फलसम्पदम् । कुपतित्वं ययुश्चित्रं कोपेऽप्यस्य विरोधिनः ॥१०॥
यह एक आश्चर्यकी बात थी कि भरतके विरोधी राजा सेनाके द्वारा आक्रमण किये जानेपर तथा उनके क्रोधित होनेपर भी अनेक प्रकारको फल-संपदाओंका उपभोग करते हुए कुपतित्व अर्थात् पृथिवीके स्वामीपनेको प्राप्त हो रहे थे। भावार्थ इस श्लोकमें श्लेष-मूलक विरोधाभास अलंकार है इसलिये पहले तो विरोध मालूम होता है बादमें उसका परिहार हो जाता है। श्लोकका जो अर्थ ऊपर लिखा गया है उससे विरोध स्पष्ट ही झलक रहा है क्योंकि भरतके क्रोधित होनेपर और उनकी सेनाके द्वारा आक्रमण किये जानेपर कोई भी शत्रु सुखी नहीं रह सकता था परन्तु नीचे लिखे अनुसार अर्थ बदल देनेसे उस विरोधका परिहार हो जाता है-भरतके विरोधी राज, लोग, उनके कुपित होने तथा सेनाके द्वारा अक्रमण किये जानेपर अपनी राजधानी छोड़कर जंगलों में भाग जाते थे, वहाँ फल खाकर ही अपना निर्वाह करते थे और इस प्रकार कु-पतित्व अर्थात् कुत्सित राजवृत्ति (दरिद्रता) को प्राप्त हो रहे थे ।।१०।।
“It was indeed a marvel that the rival kings of Bharata, even when assailed by his army and enraged by his might, seemed to be enjoying various kinds of fruits and riches, and were attaining sovereignty—though ill-governed and ruinous. The verse thus presents a poetic paradox: at first glance, it suggests their prosperity amid defeat; but in truth, it reveals that, having fled their capitals and taken refuge in the forests, they survived on wild fruits, thereby attaining not regal power, but ku-patitva—a wretched and degraded form of kingship born of destitution.” ॥10॥
श्लोक ( Shlok ) 11
सन्धिविग्रहचिन्तास्य पदविद्यास्वभूत् परम् । धूतया तव्यपक्षस्य क्वं सन्धानं क्व विग्रहः ॥११॥
उस भरत को सन्धि (स्वर अथवा व्यंजनोंको मिलाना) और विग्रह (व्युत्पत्ति) की चिन्ता केवल व्याकरण शास्त्रमें ही हुई थी अन्य शत्रुओंके विषयमें नहीं हुई थी सो ठीक हो है क्योंकि जिसने समस्त शत्रुओं को नष्ट कर दिया है उसे कहां सन्धि (अपना पक्ष निर्बल होनेपर बलवान् शत्रुके साथ मेल करना) करनी पड़ती है? और कहां विग्रह (युद्ध) करना पड़ता है ? अर्थात् कहीं नहीं ।।११।।
“For Bharata, the concerns of sandhi (union) and vigraha (division) arose solely within the domain of grammar—not in matters of warfare or politics. And rightly so—for one who had vanquished all his foes had no need to seek sandhi in the sense of alliance born of weakness, nor to engage in vigraha as battle. For him, there was neither treaty nor conflict to contend with.” ॥11॥
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169