आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66
श्लोक 67 से 81
पर्वतों और दुर्गम क्षेत्रों की विजय
सेना तैरश्चिक, वैडूर्य, पुष्पगिरि जैसे पर्वतों को लांघती है और ऋक्षवान्, कम्बल आदि की गुफाओं में विश्राम करती है। सैनिक दुस्तर नदियों और दुरारोह पर्वतों को सुगम बनाते हैं। भरत उपसमुद्र और द्वीपों के राजाओं को वश में करते हैं, उनके किलों को जीतते हैं, और रत्न लेकर उन्हें पुनः स्थापित करते हैं। वे दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान कर त्रिकलिंग, केरल, पाण्ड्य आदि देशों को जीतते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 67 to 81
श्लोक ( Shlok ) 67
तैरश्चिकं गिरि क्रान्त्वा रुद्ध्वा वैडूर्यभूधरम् । भटाः कूटाद्रिमुल्लङ्घय पारियात्रमशिश्रियन् ॥६७॥
सैनिकों-ने तैरश्चिक नामके पर्वतको लांघकर वैडूर्य नामका पर्वत जा घेरा और फिर कूटा-चलको उल्लंघन कर पारियात्र नामका पर्वत प्राप्त किया ।। ६७।।
“The soldiers, crossing the mountain known as Tairashchik, surrounded the mountain called Vaidurya, and then, after surpassing the Koota-Chal, reached the mountain named Pariyatra.” (Verse 67)
श्लोक ( Shlok ) 68
गत्वा पुष्पगिरे प्रस्थान् सानृन् सितगिरेरपि । गदागिरेर्निकुञ्जेषु बलान्यस्य विशश्रमुः ॥६८॥
भरतकी वह सेना पुष्प गिरिके शिखरोंपर चढ़कर स्मितगिरि के शिखरोंपर जा चढ़ी और फिर वहांसे चलकर उसने गदा नामक पर्वतके लतागृहोंमें विश्राम किया ॥६८॥
“The army of Bharata ascended the peaks of Pushpagiri, then climbed to the summits of Smitagiri, and from there, journeying further, took rest in the groves of the Gadagiri mountain.” (Verse 68)
श्लोक ( Shlok ) 69
वातपृष्ठदरीभागा नृक्षवत् कुक्षिभिः समम् । तत्सैनिकाः श्रयन्ति स्म कम्बलाद्रितटान्यपि ॥६९।।
भरतके सैनिकोंने ऋक्षवान् पर्वतकी गुफाओंके साथ साथ वातपृष्ठ पर्वतकी गुफाओंका आश्रय लिया और फिर वहांसे चलकर कम्बल नामक पर्वतके किनारोंपर आश्रय प्राप्त किया ।। ६९॥
“The soldiers of Bharata took shelter in the caves of the Rikkshavan mountain, as well as in the caves of Vataprishta mountain, and then, journeying further, found refuge along the slopes of the Kambala mountain.” (Verse 69)
श्लोक ( Shlok ) 70
वासवन्तं महाशैलं विलङ्घयासुरधूपने’। स्थित्वाऽस्य सैनिकाः प्रापन् मदेभानङ्गरेयिकान् ॥७०।।
वे सैनिक वासवन्त नामके महापर्वत को उल्लंघन कर असुरधूपन नामक पर्वतपर ठहरे और फिर वहांसे चलकर मदेभ तथा अंगिरेयिक पर्वतपर जा पहुंचे ॥७०॥
“The soldiers, crossing the great mountain known as Vasvanta, rested upon the mountain called Asuradhupana, and then, continuing their journey, reached the peaks of Madebha and Angireyika.” (Verse 70)
श्लोक ( Shlok ) 71
निःसपत्नमिति भ्रेमु रितश्चेतश्च सैनिकाः । द्विपान् वनविभागेषु कर्षन्तोऽस्य निजैर्गजैः ॥७१॥
सेनाके लोग उन देशोंको शत्रुरहित समझकर अपने हाथियोंके द्वारा वनके प्रदेशों में हाथी पकड़ते हुए जहां तहां घूम रहे थे ॥ ७१ ॥
“The soldiers, considering those lands free of enemies, roamed through the forested regions, capturing elephants with their own elephants, wherever they went.” (Verse 71)
श्लोक ( Shlok ) 72
दुस्तराः सुतरा जाताः सम्भुक्ताः सरितो बलैः । स्वारोहाश्च दुरारोहा गिरयः क्षुण्णसानवः ॥७२॥
जो नदियां दुस्तर अर्थात् कठिनाईसे तैरने योग्य थीं वे ही नदियां सैनिकोंके द्वारा उपभुक्त होनेपर सुतर अर्थात् सुखसे तैरने योग्य हो गई थीं। इसी प्रकार जो पर्वत दुरारोह अर्थात् कठिनाईसे चढ़ने योग्य थे वे ही पर्वत सैनिकोंके द्वारा शिखरोंके चूर्ण हो जानेसे स्वारोह अर्थात् सुखपूर्वक चढ़ने योग्य हो गये थे ॥७२॥
“The rivers, which were once impassable and difficult to cross, became easily navigable after being traversed by the soldiers. Similarly, the mountains, once hard to climb, were rendered easy to ascend as the soldiers wore down their peaks through constant passage.” (Verse 72)
श्लोक ( Shlok ) 73
राष्ट्राव्यवधयस्तेषां राष्ट्रीयाश्च महीभुजः । फलाय जज्ञिरे भर्तुर्योजिताश्चामुना फलैः ॥७३॥
देश, उनकी सीमाएं और देशोंके राजा लोग सम्राट् भरतेश्वरको फल प्रदान करने के लिये ही उत्पन्न हुए थे तथा बदलेमें भरत ने भी उन्हें अनेक फलोंसे युक्त किया था। भावार्थ–सम्राट् भरत जहां जहां जाते थे वहां वहांके लोग उन्हें अनेक प्रकारके उपहार दिया करते थे और भरत भी उनके लिये अनेक प्रकारकी सुविधाएं प्रदान करते थे ।। ७३।।
“The lands, their boundaries, and their kings were all born to bestow fruits upon Emperor Bharata, and in return, Bharata enriched them with numerous fruits.
Meaning: Wherever Emperor Bharata went, the people of those regions would offer him various gifts, and Bharata, in turn, provided them with a multitude of comforts and benefits.”** (Verse 73)
श्लोक ( Shlok ) 74
नृपानवारपारीणान् द्वैप्यानप्युपसागरे । बली बलैरवष्टभ्य प्रायोपवनजान् गजान् ॥७४॥
जो राजा लोग उपसमुद्रके उस पार रहते थे अथवा उप-समुद्रके भीतर द्वीपोंमें रहते थे उन सबको बलवान् भरतने सेनाके द्वारा अपने वश किया था तथा वनमें उत्पन्न होनेवाले हाथियोंको पकड़ पकड़-कर उनका पोषण किया था ।। ७४।॥
“The kings who resided beyond the sub-sea or on the islands within the sub-sea, were all brought under the sway of the mighty Bharata through his army, and he captured the elephants born in the forests, nurturing them with care.” (Verse 74)
श्लोक ( Shlok ) 75
रत्नान्यपि विचित्राणि तेभ्यो लब्ध्वा यथेप्सितस् । तानेवास्थापयत्तत्र सन्तुष्टः प्रभुराज्ञया ॥७५॥
महाराज भरतने उन राजाओंसे अपने इच्छानुसार अनेक प्रकारके रत्न लेकर संतुष्ट हो अपनी आज्ञासे उनके स्थानोंपर उन्हींको फिरसे विराजमान किया था ।॥७५॥
“Emperor Bharata, having taken various precious gems from those kings according to his will and being fully satisfied, reinstalled them in their respective realms, according to his command.” (Verse 75)
श्लोक ( Shlok ) 76
महान्ति गिरिदुर्गाणि निम्नदुर्गाणि च प्रभोः। सिद्धानि बलरुद्धानि किमसाध्यं महीयसाम् ॥७६।।
जो बड़े बड़े किले पहाड़ोंके ऊपर थे और जो जमीनके नीचे बने हुए थे वे सब सेनाके द्वारा घिरकर भरतके वशीभूत हो गये थे, सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषोंको क्या असाध्य है ? ।।७६।।
“The mighty fortresses, both those atop the mountains and those built beneath the earth, were all surrounded by the army and brought under the control of Bharata. This is only fitting, for what is impossible for great souls?” (Verse 76)
श्लोक ( Shlok ) 77
इत्थं स पृथिवीमध्यान् ‘पोरस्त्यान्निर्जयन्नृपान् । प्रतस्थे दक्षिणामाशां “दाक्षिणात्यजिगीषया ॥७७॥
इस प्रकार भरतने पूर्व दिशाके समस्त राजाओंको जीतकर दक्षिण दिशाके राजाओंको जीतनेकी इच्छासे उस पृथिवीके मध्यभागसे दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान किया ।।७७।।
“Thus, having conquered all the kings of the eastern regions, Bharata set out towards the south, with the desire to conquer the kings of the southern lands, departing from the central part of the earth.” (Verse 77)
श्लोक ( Shlok ) 78
यतो यतो बलं जिष्णोः प्रचलत्युद्धनायकम् । ततस्ततः स्म सामन्ता नमन्त्यानम्रमौ लयः ॥७८॥
उत्कृष्ट सेनापति सहित विजयी भरतकी सेना जहां जहां जाती थी वहां वहां के राजा लोग सामन्तों सहित मस्तक झुका झुकाकर उन्हें नमस्कार करते थे ।। ७८।।
“Wherever the victorious army of Bharata, accompanied by its eminent commander, advanced, the kings of those regions, along with their vassals, bowed their heads in reverence and offered obeisance.” (Verse 78)
श्लोक ( Shlok ) 79
त्रिकलिङगाधिपानोद्रान् कच्छान्ध्रविषयाधिपान् । प्रातरान् केरलांश्चोलान् पुन्नागांश्च व्यजेष्ट सः ॥७९॥
दक्षिणमें भरतने त्रिकलिंग, औद्र, कच्छ, प्रातर, केरल, चेर और पुन्नाग देशोंके सब राजाओंको जीता था ।।७९।।
“In the south, Bharata conquered all the kings of the Trikalinga, Audra, Kaccha, Pratara, Kerala, Chera, and Punnaga regions.” (Verse 79)
श्लोक ( Shlok ) 80
“कुडुम्बानोलिकांश्चैव स माहिषकमेकुरान् । पाण्ड्यानन्तरपाण्डयांश्च दण्डेन वशमानयत् ॥८०॥
तथा कूट, ओलिक, महिष, कमेकुर, पाण्डय और अन्तरपाण्ड्य देशके राजाओं को दण्डरत्नके द्वारा अपने वशीभूत किया था ।।८०।।
“And Bharata subdued the kings of the Kuta, Olik, Mahisha, Kamekura, Pandya, and Antarapandya regions through the might of his punitive forces.” (Verse 80)
श्लोक ( Shlok ) 81
नृपानेतान् विजित्याशु प्रणमय्य स्वपादयोः । हृत्वा तत्साररत्नानि प्रभुः प्रापत् परां मुदम् ॥८१॥
सम्म्राट् भरतने इन सब राजाओंको शीघ्र ही जीतकर उनसे अपने चरणोंमें प्रणाम कराया और उनके सारभूत रत्न लेकर परम आनन्द प्राप्त किया ।॥८१॥
“Emperor Bharata swiftly conquered all these kings, made them bow at his feet, and, taking from them their choicest treasures, attained supreme delight.” (Verse 81)
श्लोक 82 से 90
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आदिपुराण भाग – 2 :
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