आदिपुराण भाग – 2 पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71
वन्य जीवों का क्षोभ
सेना के क्षोभ से हाथी, सर्प, और अजगर भयभीत हैं। शुकर और गैंडा सेना को व्याकुल करते हैं। सिंह, भैंसा, और अन्य क्रूर जीव वन से निकलकर सेना का भय बढ़ाते हैं। अष्टापद नामक जीव छलांग मारकर भी दुखी नहीं होता। मृग और खरगोश भय से इधर-उधर दौड़ते हैं, जिससे सेना का क्षोभ बढ़ता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 27 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
शनैः प्रयाति सञ्जिघ्रन दिशः प्रोत्क्षिप्तपुष्करः। स महाहिरिवाद्रीन्द्रो भद्रोऽयं गजयूथपः ॥६२॥
हाथियोंके झुण्डकी रक्षा करनेवाला यह भद्र गजराज सूंड़को ऊंचा उठाता हुआ तथा दिशाओंको सूंघता हुआ धीरे धीरे ऐसा जा रहा है मानो शेषनाग सहित सुमेरु पर्वत ही जा रहा हो ॥ ६२।।
“This noble elephant king, protector of the herd, walks slowly with its trunk raised high, sniffing the directions, as if Mount Sumeru itself were moving along with the serpent Shesha.” (62)
श्लोक ( Shlok ) 63
महाहिरयमायामं मिमान’ इव भूरुहाम्। श्वसन्नायच्छते कच्छादू र्ध्वीकृतशरीरकः ॥६३॥
जिसने अपने शरीरके ऊर्ध्वभागको ऊंचा उठा रक्खा है ऐसा यह बड़ा भारी सर्प जलवाले प्रदेशसे सांस लेता हुआ इस प्रकार आ रहा है मानो वृक्षोंकी लम्बाईको नापता हुआ ही आ रहा हो ।॥६३।।
“This massive serpent, with the upper part of its body raised high, emerges from the watery region, breathing as it comes—appearing as though it is measuring the height of the trees.” (63)
श्लोक ( Shlok ) 64
‘शयुपोता निकुञ्जेषु पुञ्जीभूता वसन्त्यमी । वनस्येवान्त्रसन्तानाश्चमूक्षोभाद्विनिः सृताः ॥६४॥
इधर इस लतागृहमें इकट्ठे हुए ये अजगरके बच्चे इस प्रकार श्वास ले रहे हैं मानो सेनाके क्षोभसे वनकी अंतड़ियों के समह ही निकल आये हों ॥६४।।
“Here in this bower of creepers, these gathered young pythons are breathing in such a way as if, stirred by the turmoil of an army, the very entrails of the forest have emerged.” (64)
श्लोक ( Shlok ) 65
अयमेकचरः पोत्रसमुत्खातान्तिकस्थलः। रुणद्धि वर्त्म सैन्यस्य वराहस्तीव्ररोषणः ॥६५॥
जो अकेला ही फिरा करता है, जिसने अपनी नाक से समीपके स्थल खोद डाले हैं, और जो अत्यन्त क्रोबी है ऐसा यह शूकर सेना का मार्ग रोक रहा है ॥६५॥
“This boar, fierce by nature, roaming alone, has dug up the nearby ground with its snout and now stands blocking the path of the army.” (65)
श्लोक ( Shlok ) 66
सेनिकैरर्यमारुद्धः पाषाणलकुटादिभिः । व्याकुलीकुरुते सैन्यं गण्डो गण्ड इव स्फुटम् ॥६६॥
सेना के लोगोंने जिसे पत्थर लकड़ी आदिसे रोक रक्खा है ऐसा यह गंड अर्थात् छोटे पर्वतके समान दिखनेवाला गैंडा हाथी स्पष्ट रूपसे सेनाको व्याकुल कर रहा है ।॥६६॥
“This rhinoceros, appearing like a small mountain, has been restrained by the soldiers with stones, wood, and the like—yet it is clearly agitating the entire army.” (66)
श्लोक ( Shlok ) 67
प्राणा इव वनादस्माद् विनिष्कामन्ति सन्तताः । सिंहा बहुदवज्वाला” धुन्वानाः केसरच्छटाः ॥६७॥
जो दावानल की ज्वाला के समान पीले और विस्तृत गर्दन पर के बालों के समूहों को हिला रहे हैं ऐसे ये सिंह इस वन से इस प्रकार निकल रहे हैं मानो उसके प्राण ही निकल रहे हों ।॥ ६७।।
“These lions, emerging from the forest as if its very life is departing, are shaking the golden, flowing manes on their broad necks—like flames of a blazing wildfire.” (67)
श्लोक ( Shlok ) 68
गुग्गुलूनां वनादेष महिषो घनकर्बुरः । निर्याति मृत्युदंष्ट्राभविषाणाग्राति भीषणः ॥६८॥
जो मेघके समान कर्बुर वर्ण है, जिसके सींगका अग्रभाग यमराजकी दाढ़के समान है तथा जो अत्यन्त भयंकर है ऐसा यह भैंसा इस गुगुल के वन से बाहर निकल रहा है ।। ६८।।
“This buffalo, dark and mottled like a raincloud, with the tip of its horn resembling the fang of Yama himself, and terrifying in appearance, is emerging from the gugul forest.” (68)
श्लोक ( Shlok ) 69
ललद्वालधयो लोलजिह्वा व्यालोहितेक्षणाः । व्याला बलस्य साक्षोभममी तन्वन्त्यनाकुलाः ॥६९।।
जिनकी पूंछ हिल रही है, जिह्वा चंचल हो रही है और नेत्र अत्यन्त लाल हो रहे हैं ऐसे ये सिंह आदि क्रूर जीव स्वयं व्याकुल न होकर ही सेना का क्षोभ बढ़ा रहे हैं ।॥६९॥
“These fierce creatures—like lions—though not themselves agitated, are increasing the army’s turmoil, with their tails flicking, tongues flickering, and eyes glowing intensely red.” (69)
श्लोक ( Shlok ) 70
शरभः सं समुत्पत्य पतन्नुत्तापितोऽपि सन् । नैष दुःखासिकां वेद चरणैः पृष्ठवर्तिभिः ॥७०॥
यह अष्टापदः आकाशमें उछलकर यद्यपि पीठके बल गिरता है तथापि पीठपर रहनेवाले पैरोंसे यह दुःख का अनुभव नहीं करता। भावार्थ अष्टापदः नामका एक जंगली जानवर होता है उसके पीठ पर भी चार पांव होते हैं। जब कभी वह आकाश में छलांग मारने के बाद चित्त अर्थात् पीठ के बल गिरता है तो उसे कुछ भी कष्ट नहीं होता क्योंकि वह अपने पीठ पर के पैरों से संभलकर खड़ा हो जाता है ॥७०॥
“This Ashtāpada, even when leaping into the sky and falling on its back, feels no pain—because it has legs on its back as well. Despite the fall, it steadies itself using those legs and rises unharmed.” (70)
(Note: The Ashtāpada is a wild animal said to have eight legs—four on its back and four below.)
श्लोक ( Shlok ) 71
चमरोऽयं ‘चमूरोधाद् विद्रुतो द्रुतमुत्पतन् । क्षोभं तनोति सैन्यस्य दर्पो रूपीव दुर्धरः ॥७१॥
जो मूर्तिमान् अहंकारके समान है, दुर्जेय है और सेना से घिर जाने के कारण जल्दी जल्दी छलांग मारता हुआ इधर-उधर दौड़ रहा है ऐसा यह मृग सेनाका क्षोभ बढ़ा रहा है ।। ७१।।
“This stag, which is like a manifestation of pride, formidable in nature, and leaping swiftly in all directions due to being surrounded by the army, is increasing the turmoil of the forces.” (71)
श्लोक 72 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61