आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
नन्दनप्रतिमे तस्मिन् वने रुद्धातपाङ्घ्रपे । गङ्गाशीतानिलस्पशैस्तद्बलं सुखमावसत् ॥५२॥
जो नन्दन वनके समान है तथा जिसके वृक्ष सूर्य के आताप को रोकनेवाले हैं ऐसे उस वन में भरत की वह सेना गङ्गा नदी के शीतल वायुके स्पर्श से सुखपूर्वक निवास करती थी ॥५२॥
The army of Bharata, which was like the Nandan forest and whose trees blocked the heat of the sun, dwelled happily in that forest, comforted by the cool breeze of the Ganga River. (Verse 52)
श्लोक ( Shlok ) 53
तस्मिन् पौरुषसाध्येऽपि कृत्ये देवं प्रमाणयन् । लवणाब्धिजयोद्युक्तः सोऽभ्यच्छद् दैविकीं क्रियाम् ॥५३॥
यद्यपि मागध देव को वश करना यह कार्य पौरुष-साध्य है अर्थात् पुरुषार्थ से ही सिद्ध हो सकता है तथापि उसमें दैव की प्रमाणता मानकर लवण समुद्र को जीतने के लिये तत्पर हुए भरत महाराज ने भगवान् अरहन्त देव के आराधन करनेका विचार किया ।॥५३॥
Although subduing the Magadha god is a task achievable only through human effort and valor, still, considering the role of divine will in it, King Bharata, determined to conquer the salty ocean, resolved to worship the Supreme Lord Arhant Deva. (Verse 53)
श्लोक ( Shlok ) 54 –55
‘अधिवासितजैत्रास्त्रः स त्रिरात्रमुपोषिवान् । मन्त्रानुस्मृतिपूतात्मा शुचितल्पोपगः शुचिः ॥५४॥
सायं प्रातिकनिःशेषकरणीये समाहितः । पुरोधोऽधिष्ठितां पूजां स व्यधात् परमेष्ठिनाम् ।।५५।।
जिसने मन्त्र तन्त्रों से विजय के शस्त्रों का संस्कार किया है, तीन दिन उपवास किया है, मन्त्रके स्मरण से जिसका आत्मा पवित्र है, जो पवित्र शय्या पर बैठा हुआ है, स्वयं पवित्र है, सायंकाल और प्रातःकाल की समस्त क्रियाओं में सावधान है और पुरोहित जिसके समीप बैठा है ऐसे उन भरत ने पञ्च परमेष्ठीकी पूजा की ॥५४-५५॥
He who has sanctified the weapons of victory through mantras and rituals, who has fasted for three days, whose soul is purified by the remembrance of sacred chants, who is seated upon a holy seat, who himself is pure, who is mindful in all evening and morning rituals, and beside whom sits the chief priest — such a Bharata performed the worship of the Five Supreme Beings (Pañca-Parameṣṭhī). (Verses 54–55)
श्लोक ( Shlok ) 56
सेनान्यं बलरक्षायै नियोज्य विधिवद् विभुः । प्रतस्थे घृतदिव्यास्त्रो जिगीषुर्लवणाम्बुधिम् ।।५६।।
भरत ने विधि-पूर्वक सेना की रक्षा के लिये सेनापति को नियुक्त किया और स्वयं दिव्य अस्त्र धारण कर लवण समुद्र को जीतने की इच्छासे प्रस्थान किया ।॥५६॥
Bharata, following proper procedure, appointed a commander to protect the army, and then, bearing divine weapons, set out with the desire to conquer the salty ocean. (Verse 56)
श्लोक ( Shlok ) 57
प्रतिग्रहा पसारादिचिन्ताऽभून्नास्य चेतसि । “विलिलङ्घयिषोरब्धिमहो स्थैर्य महात्मनाम् ॥५७॥
समुद्र को उल्लंघन करनेकी इच्छा करने वाले भरत के चित्तमें यह भी चिन्ता नहीं हुई थी कि क्या क्या साथ लेना चाहिये और क्या-क्या यहां छोड़ देना चाहिये सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषों का धैर्य ही आश्चर्यजनक होता है ।॥५७॥
In the mind of Bharata, who wished to cross the ocean, there arose no concern about what should be taken along and what should be left behind — and rightly so, for the steadfastness of great souls is truly wondrous. (Verse 57)
श्लोक ( Shlok ) 58
अजितञ्जयमारुक्षद् रथं दिव्यास्त्रसम्भृतम् । योजितं वाजिभि र्दिव्यैः र्जलस्थलविलङि्घभिः ।।५८।।
जो देवोपनीत अस्त्र-शस्त्रों से भरा हुआ है और जिसमें जल स्थल दोनों पर समान रूपसे चलने वाले दिव्य घोड़े जुते हुए हैं ऐसे अजितंजय नाम के रथ पर भरतेश्वर आरूढ हुए ।।५८।।
Bharateshvara mounted the chariot named Ajitajaya, which was filled with divine weapons bestowed by the gods and yoked with celestial horses capable of moving equally on land and water. (Verse 58)
श्लोक ( Shlok ) 59
पत्रश्यामरथं प्रोच्चैश्चलच्चक्राङ्ककेतनम् । तमूहुर्जवना” वाहा दिव्य “सव्येष्ट्टचोदिताः ॥५९॥
जो पत्तों के समान हरितवर्ण है, जिसपर बहुत ऊंचे चक्रके आकारसे चिह्नित ध्वजा फहरा रही है और जो दिव्य सारथि के द्वारा प्रेरित है-हांका जा रहा है-ऐसे उस रथ को वेग-शाली घोड़े ले जा रहे थे ।। ५९ ।।
That chariot, green like leaves, marked with a high flag bearing the symbol of a great disc, and driven by a divine charioteer, was being pulled swiftly by powerful horses. (Verse 59)
श्लोक ( Shlok ) 60
ततोऽस्मै दत्तपुण्याशीः पुरोधा “धृतमङ्गलः । त्वं देव विजयस्वेति स इमामृचमापठत् ॥६०॥
तदनन्तर हे देव, आपकी जय हो इस प्रकार भरत के लिये पवित्र आशीर्वाद देकर मंगल द्रव्य धारण किये हुए पुरोहित ने इस नीचे लिखी हुई ऋचा को पढ़ा ॥६०॥
Thereafter, O Lord, offering sacred blessings for Bharata’s victory, the chief priest, adorned with auspicious objects, recited the following sacred hymn: (Verse 60)
श्लोक ( Shlok ) 61
जयन्ति विधुताशेषबन्धना धर्मनायकाः । त्वं धर्मविजयी भूत्वा तत्प्रसादाज्जयाखिलम् ॥६१॥
समस्त कर्मबन्धन को नष्ट करने वाले धर्मनायक-तीर्थकर देव सदा जयवन्त रहते हैं इसलिये उनके प्रसाद से तू भी धर्मपूर्वक विजय प्राप्त कर, सबको जीत ।।६१।।
The leaders of righteousness, the Tīrthaṅkara Lords, who destroy all bondage of karma, are ever victorious; therefore, by their grace, may you too righteously achieve victory and conquer all. (Verse 61)
श्लोक 62 से 102
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51