आदिपुराण भाग – 2 पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111
रानियों और सेना की स्थिति
रानियों के मुख पर पसीने की बूंदें सौंदर्य रस को पुष्ट करती थीं। घोड़ों के मुख पर फेन और खुर स्खलित हो रहे थे। उत्तम घोड़े तीव्र वेग, सुंदर गमन, और बुद्धि-बल से युक्त थे, जो धूलि से रजस्वला पृथ्वी को घृणा करते हुए दौड़ते थे। पैदल सैनिक जूतों से कांटे-पत्थर लांघते, रथ-घोड़ों से तेज चलते थे। शक्ति, लट्ठ, भाला, और तलवारधारी योद्धा स्पर्धा में जल्दी दौड़ते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 27 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
नृपवल्लभिकावक्त्र पङ्कजेप्वपुषच्छ्रियम् । धर्मबिन्दूद् गमो निर्यल्लावण्यरसपूरवत् ॥१०२॥
रानियोंके मुख-कमलों पर जो पसीने की बूंदें उठी हुई थीं वे निकलते हुए सौन्दर्य रूपी रसके प्रवाहके समान शोभा को पुष्ट कर रही थीं ।॥१०२॥
The droplets of sweat that had arisen on the lotus-like faces of the queens enhanced their beauty, like a stream flowing with the essence of loveliness. ॥102॥
श्लोक ( Shlok ) 103
गलदघर्माम्बुबिन्दूनि मुखानि नृपयोषिताम् ।अवश्यायततानीव राजीवानि विरेजिरे ॥१०३॥
जिनसे पसीनेकी बूंदें टपक रही हैं ऐसे रानियों के मुख ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो ओंस की बूंदों से व्याप्त हुए कमल ही हों ।॥१०३।।
“The faces of the queens, from which droplets of sweat were falling, appeared as graceful as lotuses covered with dewdrops.” ॥103॥
श्लोक ( Shlok ) 104
नृपाङ्गनामुखाब्जानि धर्मबिन्दुभिराबभुः । मुक्ताफलैर्द्वीभूतैरिवालकविभूषणैः ॥१०४।।
जिन पसीने की बूंदों से रानियोंके मुख-कमल सुशोभित हो रहे थे वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो केशपाश को अलंकृत करने वाले मोती ही पिघल पिघल कर तरल रूप हो गये हों ।॥१०४।।
“The droplets of sweat that adorned the lotus-like faces of the queens seemed as though the pearls adorning their tresses had melted into a liquid form.” ॥104॥
श्लोक ( Shlok ) 105
रथवाहा रथानुहुरायस्ताः फेनिलैर्मुखैः। तीवं तपति तिग्मांशौ समेऽपि प्रस्खलत्खुराः ।।१०५।।
उस समय सूर्य बड़ी तेजी के साथ तप रहा था इसलिये जो घोड़े रथोंको ले जा रहे थे उनके मुख परिश्रमसे खुल गये थे, उनमें फेन निकल आया था और उनके खुर समान जमीन पर भी स्खलित होने लगे थे ॥ १०५॥
“At that time, the sun was blazing intensely, and the horses drawing the chariots, exhausted from their labor, had their mouths agape, froth emerging from them, and their hooves began to slip even on the firm ground.” ॥105॥
श्लोक ( Shlok ) 106
ह्रस्ववृत्तखुरास्तुङ्गास्तनुस्निग्धतनूरुहाः । पृथ्वासना महावाहाः प्रययुर्वायुरंहसः ॥१०६॥
जिनके खुर छोटे और गोल हैं, जिनपर छोटे और चिकने रोम हैं, जो बहुत ऊंचे हैं, जिनका आसन अर्थात् पीठ बहुत बड़ी है, और जिनका वेग वायुके समान है ऐसे बड़े बड़े उत्तम घोड़े भी जल्दी जल्दी दौड़े जा रहे थे ॥१०६॥
“Even the finest of steeds—small, round-hoofed, with short, sleek hair, towering in height, broad-backed, and swift as the wind—were racing ahead at great speed.” ॥106॥
श्लोक ( Shlok ) 107
महाजवजुषो वक्त्रादुद्वमन्तः खुरानिव । महोरस्काः स्फुरत्प्रोथा द्रुतं जग्मुर्महाहयाः ॥१०७॥
जो तीव्र वेगसे सहित हैं, जो अपने आगेके खुरोंको मुखसे उगलते हुएके समान जान पड़ते हैं, जिनका वक्षःस्थल बड़ा है और जिनकी नाकके नथने कुछ कुछ हिल रहे हैं ऐसे बड़े बड़े घोड़े जल्दी जल्दी जा रहे थे ।।१०७।।
“Great steeds, possessed of immense speed, seemed as if they were spitting out their forehooves from their mouths. With broad chests and flaring nostrils that quivered slightly, they raced forward swiftly.” ॥107॥
श्लोक ( Shlok ) 108
समुच्छ्रितपुरो भागाः शुद्धावर्ता मनोजवाः । अपर्याप्तेषु मार्गेषु द्रुतमीयुस्तुरङ्गमाः ॥१०८॥
जिनके आगेका भाग बहुत ऊंचा है, जिनके शरीर पर के भंवर अत्यन्त शुद्ध हैं, और जिनका वेग मन के समान है ऐसे घोड़े उस छोटेसे मार्ग में बड़ी शीघ्रता के साथ जा रहे थे ।।१०८॥
“Horses with elevated foreparts, bodies marked by exquisitely pure whorls, and speed equal to that of the mind, were swiftly traversing the narrow path.” ॥108॥
श्लोक ( Shlok ) 109
मेधासत्त्वजवोपेता विनीताश्चटूलक्रमाः । गल्हमाना” इव स्प्रप्टुं महीमश्वा द्रुतं ययुः ॥१०९॥
जो बुद्धि-बल और वेगसे सहित हैं, विनयवान् हैं तथा सुन्दर गमनके धारक हैं ऐसे घोड़े पृथिवीको (रजस्वला अर्थात् धूलिसे युक्त पक्षमें रजोधर्मसे युक्त समझ) उसके स्पर्श करनेमें घृणा करते हुए ही मानो बड़े वेगसे जा रहे थे ।। १०९।।
“Horses endowed with intelligence, strength, and swiftness—graceful in gait and humble in nature—seemed to speed ahead with such force as if scorning to touch the earth, considering it impure like a woman in her time of monthly course.” ॥109॥
श्लोक ( Shlok ) 110
अश्वेभ्योऽपि रथेभ्योऽपि पत्तयो वेगितं ययुः । सोपानत्कैः पदैः स्थाणुकण्टकोपललङि्घनः ॥११०।।
पैदल चलने वाले सैनिक जूता पहने हुए पैरोंसे डूंठ, कांटे तथा पत्थर आदिको लांघते हुए घोड़े और रथों से भी जल्दी जा रहे थे ।।११०।।
“The foot soldiers, wearing boots, were swiftly leaping over stumps, thorns, and stones—moving even faster than the horses and chariots.” ॥110॥
श्लोक ( Shlok ) 111
शाक्तिकाः सह याष्टीकैः प्रासिका धन्वभिः समम् । नैस्त्रिशिकाश्च तेऽन्योन्यं स्पर्धयेव ययुर्द्रुतम् ।१११।
शक्ति नामके हथियार को धारण करने वाले लट्ठ धारण करने वालों के साथ, भाला धारण करनेवाले धनुष धारण करने वालों के साथ और तलवार धारण करने-वाले लोग परस्पर एक दूसरे के साथ स्पर्धा करते हुए ही मानो बड़ी शीघ्रता के साथ जा रहे थे ॥१११।।
“Those wielding weapons of strength—maces, spears, bows, and swords—were seemingly competing with one another, racing forward with great speed.” ॥111॥
श्लोक 112 से 121
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2
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आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101