आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261
श्लोक 262 से 273 मरुदेवी-नाभिराज की महिमा
नाभिराज सुगंध से संतुष्ट। ऋषभदेव स्फटिक दीपक सा। मरुदेवी लक्ष्मी सा, इंद्राणी सेवा करती। तीन लोक जननी। कल्पलता-कल्पवृक्ष सा दंपत्ति। मुख कमल-चंद्र सा, नाभिराज राजहंस-तृष्णायुक्त। तेजःपुंज धारण।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 262 to 273
श्लोक ( Shlok ) 262
नोदरे विकृतिः कापि स्तनौ न नीळ चूचुकौ । न पाण्डुवदनं तस्या गर्भोऽ प्यवृधदद्भुतम् ॥२६२॥
न तो माता के उदर में कोई विकार हुआ था, न उसके स्तनों के अग्रभाग ही काले हुए थे और न उसका मुख ही सफेद हुआ था फिर भी गर्भ बढ़ता जाता था यह एक आश्चर्य की बात थी ।।262।।
“Neither did any distortion occur in the mother’s womb, nor did the front part of her breasts darken, nor did her face turn pale. Yet, her pregnancy continued to grow—this was indeed a miraculous thing.”||262||
श्लोक ( Shlok ) 263
स्वामोदं मुखमेतस्याः राजानायैव सोऽनृपत् । मदालिरिव पद्मिन्याः पद्ममस्पष्टकेसरम् ॥२६३॥
जिस प्रकार मदोन्मत्त भ्रमर कमलिनी के केसर को बिना छुए ही उसकी सुगंध मात्र से संतुष्ट हो जाता है उसी प्रकार उस समय महाराज नाभिराज भी मरुदेवी के सुगंधि युक्त मुख को सूँघकर ही संतुष्ट हो जाते थे ।।263।।
“Just as a maddened bumblebee, without touching the saffron of the lotus, becomes satisfied merely by its fragrance, in the same way, King Nābhirāj, at that time, became content simply by smelling the fragrant face of Marudevi.”||263||
श्लोक ( Shlok ) 264
सोऽभाद् विशुद्धगर्भस्थस्त्रिबोधविमलाशयः । स्फटिकागारमध्यस्यः प्रदीप इव निश्चलः ॥२६४॥
मरुदेवी के निर्मल गर्भ में स्थित तथा मति, श्रुत और अवधि इन तीन ज्ञानों से विशुद्ध अंतःकरण को धारण करनेवाले भगवान् वृषभदेव ऐसे सुशोभित होते थे जैसा कि स्फटिक मणि के बने हुए घर के बीच में रखा हुआ निश्चल दीपक सुशोभित होता है ।।264।।
“Lord Rishabhdev, situated in the pure womb of Marudevi, and possessing the three forms of knowledge—mati (intellectual), shruta (scriptural), and avadhī (clairvoyant)—was radiant like an immovable lamp placed in the center of a house made of crystal gems.”||264||
श्लोक ( Shlok ) 265
कुशेशयशयं देवं सा दुधानोदरेशयम् । कुशेशयशयेवासीन्माननीया दिवौकसाम् ॥२६५॥
अनेक देव-देवियां जिसका सत्कार कर रही हैं और जो अपने उदर में नाभि-कमल के ऊपर भगवान् वृषभदेव को धारण कर रही हैं ऐसी वह मरुदेवी साक्षात् लक्ष्मी के समान शोभायमान हो रही थी ।।265।।
“Marudevi, who was being revered by numerous gods and goddesses and carrying Lord Rishabhdev on the lotus of her navel, was shining brilliantly like the very embodiment of Lakshmi.”||265||
श्लोक ( Shlok ) 266
निगूढं च शची देवी सिषेवे किल साप्सराः । मघोनाघविघाताय ‘प्रहिता तां महासतीम् ॥२६६॥
अपने समस्त पापों का नाश करने के लिए इंद्र के द्वारा भेजी हुई इंद्राणी भी अप्सराओं के साथ-साथ गुप्तरूप से महासती मरुदेवी की सेवा किया करती थी ।।266।।
“To destroy all her sins, Indrani, sent by Indra, along with the celestial nymphs, secretly served the great and virtuous Marudevi.”||266||
श्लोक ( Shlok ) 267
सानंसीन्न परं कंचित् नम्यते स्म स्वयं जनैः । चान्द्री कलेव रुन्द्रश्रीर्देवीव च सरस्वती ॥२६७॥
जिस प्रकार अतिशय शोभायमान चंद्रमा की कला और सरस्वती देवी किसी को नमस्कार नहीं करती किंतु सब लोग उन्हें ही नमस्कार करते हैं इसी प्रकार वह मरुदेवी भी किसी को नमस्कार नहीं करती थी, किंतु संसार के अन्य समस्त लोग स्वयं उसे ही नमस्कार करते थे ।।267।।
“Just as the exceedingly radiant moon and Goddess Saraswati do not bow to anyone, but everyone bows to them, in the same way, Marudevi did not bow to anyone, yet all the people of the world bowed to her.”||267||
श्लोक ( Shlok ) 268
बहुनात्र किमुक्तेन श्लाध्या सैका जगस्त्रये । या स्त्रष्टुर्जंगतां स्रष्ट्री बभूव भुवनाम्बिका ॥२६८॥
इस विषय में अधिक कहने से क्या प्रयोजन है इतना कहना ही बस है कि तीनों लोकों में वही एक प्रशंसनीय थी । वह जगत् के स्रष्टा अर्थात् भोगभूमि के बाद कर्मभूमि की व्यवस्था करने वाले श्रीवृषभदेव की जननी थी इसलिए कहना चाहिए कि वह समस्त लोक की जननी थी ।।268।।
What is the need to say more on this matter? It is enough to say that she was the only one worthy of praise in all three realms. She was the mother of Lord Rishabhdev, the creator of the world and the one who arranged the realm of actions after the realm of enjoyment. Therefore, it should be said that she was the mother of all the worlds.||268||
श्लोक ( Shlok ) 269
सा विवभावमिरामतराङ्गी श्रीभिरुपासितमूत्तिरमूभिः । श्रीभवने भुवनैकललाम्नि श्रीभृ ति भूभृति तन्वति सेवाम् ।। २६९॥
इस प्रकार जो स्वभाव से ही मनोहर अंगों को धारण करने वाली है, श्री, ह्री आदि देवियाँ जिसकी उपासना करती हैं तथा अनेक प्रकार की शोभा व लक्ष्मी को धारण करने वाले महाराज भी स्वयं जिसकी सेवा करते हैं ऐसी वह मरुदेवी, तीनों लोकों में अत्यंत सुंदर श्रीभवन में रहती हुई बहुत ही सुशोभित हो रही थी ।।269।।
“In this way, Marudevi, who naturally possessed enchanting features, was worshipped by goddesses such as Shri and Hri, and was served by kings who embodied various forms of beauty and wealth. Residing in a magnificent abode of beauty in all three realms, she was radiantly adorned.”||269||
श्लोक ( Shlok ) 270
अतिरुचिरतराङ्गी कल्पवल्लीव साभूत् स्मितकुसुममनूनं दर्शयम्ती फलाय ।
नृपतिरपि तदास्या पार्श्ववर्ती रराजे सुरतरुरिव तुङ्गो मङ्गलधीविभूषः ॥ २७०॥
अत्यंत सुंदर अंगों को धारण करने वाली वह मरुदेवी मानो एक कल्पलता ही थी और मंद हास्यरूपी पुष्पों से मानो लोगों को दिखला रही थी कि अब शीघ्र ही फल लगने वाला है । तथा इसके समीप ही बैठे हुए मंगलमय शोभा धारण करने वाले महाराज नाभिराज भी एक ऊँचे कल्पवृक्ष के समान शोभायमान होते थे ।।270।।
“Marudevi, possessing exceedingly beautiful features, was like a wish-fulfilling creeper, subtly showing with her gentle smile, like flowers, that fruits would soon be borne. Sitting nearby, King Nābhirāj, embodying auspicious beauty, also shone like a tall, magnificent wish-fulfilling tree.”||270||
श्लोक ( Shlok ) 271
ललिततरमथास्या वक्त्रपद्मं सुगन्धि स्फुरितदशन रोचिर्मंञ्जरीकेसराढ्यम् ।
वचनमधुरसाशासंसजद्राजहंसं भृशमनयत बोधं बालभानुस्समुद्यन् ॥२७१॥
उस समय मरुदेवी का मुख एक कमल के समान जान पड़ता था क्योंकि वह कमल के समान ही अत्यंत सुंदर था, सुगंधित था और प्रकाशमान दाँतों की किरणमंजरीरूप केशर से सहित था तथा वचनरूपी पराग के रस की आशा से उसमें अत्यंत आसक्त हुए महाराज नाभिराज ही पास बैठे हुए राजहंस पक्षी थे । इस प्रकार उसके मुखरूपी कमल को उदित (उत्पन्न) होते हुए बालकरूपी सूर्य ने अत्यंत हर्ष को प्राप्त कराया था ।।271।।
“At that time, the face of Marudevi seemed like a lotus, for it was as beautiful, fragrant, and radiant as a lotus, with rays of sparkling teeth resembling a cluster of saffron. King Nābhirāj, who was deeply absorbed in the nectar of her speech, was sitting nearby like a royal swan. In this way, the sun-like child, rising from her lotus-like face, brought immense joy.”||271||
श्लोक ( Shlok ) 272
मुहुरमृतमिवास्या वक्त्रपूर्णेन्दुरुद्यद्-वचनमसृजदुचेलोंकच्चेर्लोकचेतोऽभिनन्दी।
नृपतिरपि सतृष्णस्त त्पिपासन् स रेमे स्वजनकुमुदषण्डैः स्वं विभक्तं यथास्वम् ॥२७२
अथवा उस मरुदेवी का मुख पूर्ण चंद्रमा के समान था क्योंकि वह भी पूर्ण चंद्रमा के समान सब लोगों के मन को उत्कृष्ट आनंद देने वाला था और चंद्रमा जिस प्रकार अमृत की सृष्टि करता है उसी प्रकार उसका मुख भी बार-बार उत्कृष्ट वचनरूपी अमृत की सृष्टि करता था । महाराज नाभिराज उसके वचनरूपी अमृत को पीने में बड़े सतृष्ण थे इसलिए वे अपने परिवाररूपी कुमुद-समूह के द्वारा विभक्त कर दिये हुए अपने भाग का इच्छानुसार पान करते हुए रमण करते थे । भावार्थ―मरुदेवी की आज्ञा पालन करने के लिए महाराज नाभिराज तथा उनका समस्त परिवार तैयार रहता था ।।272।।
“Or, the face of Marudevi was like the full moon, for it was just as the full moon brings supreme joy to the hearts of all beings. Just as the moon creates nectar, her face constantly created nectar in the form of excellent speech. King Nābhirāj, eager to drink the nectar of her speech, would enjoy it, taking as much as he desired, separated by his family, like a group of lotuses. The implication is that King Nābhirāj and his entire family were always ready to follow Marudevi’s commands.”||272||
श्लोक ( Shlok ) 273
इत्याविष्कृतमङ्गला भगवती देवीभिरात्तादरं दध्रेऽन्तः परमोदयं त्रिभुवनेऽप्याश्चर्यभूतं महः ।
राजैनं जिनभाविनं सुतरविं पद्माकरस्यानुयन् साकाङ्क्षः प्रतिपालयन् धृतिमधात् प्राप्तोदयं भूयसीम् ॥२७३॥
इस प्रकार जो प्रकटरूप से अनेक मंगल धारण किये हुए हैं और अनेक देवियाँ आदर के साथ जिसकी सेवा करती हैं ऐसी मरुदेवी परम सुख देने वाले और तीनों लोकों में आश्चर्य करने वाले भगवान् ऋषभदेवरूपी तेजःपुंज को धारण कर रही थी और महाराज नाभिराज कमलों से सुशोभित तालाब के समान जिनेंद्र होनेवाले पुत्ररूपी सूर्य की प्रतीक्षा करते हुए बड़ी आकांक्षा के साथ परम सुख देनेवाले भारी धैर्य को धारण कर रहे थे ।।273।।
“In this way, Marudevi, who outwardly bore many auspicious qualities and was served with reverence by many goddesses, was carrying the divine radiance of Lord Rishabhdev, who brings ultimate bliss and amazes all three realms. King Nābhirāj, adorned like a pond with lotuses, was eagerly awaiting the sun-like son, who would become the revered Jinendra, while bearing great patience that brought supreme happiness.”||273||
इत्यार्वे भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीते त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संमहे भगवत्स्वर्गावतरणवर्णनं नाम द्वादशं पर्व ॥१२॥
इस प्रकार श्रीआर्ष नाम से प्रसिद्ध भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रह में भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन करने वाला बारहवां पर्व समाप्त हुआ ।।12।।
“Thus ends the twelfth chapter of the collection of the Mahapurana, known as the Trishashtilakshana Mahapurana, composed by the revered Jin Sena Acharya, which describes the divine ascent of the Lord.”||12||
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261