आदिपुराण भाग – 2 पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
श्लोक 1 से 11
गंगा नदी की महिमा और भरत की दृष्टि
महाराज भरत ने गंगा नदी पर दृष्टि डाली, जो स्वच्छ जल से उनके लिए पादोदक प्रदान करती सी प्रतीत हुई। सारथि ने गंगा की तुलना ऋषभदेव की वाणी से की, जो संसार को आनंदित और पापों को नष्ट करती है। गंगा हिमवान् पर्वत और समुद्र को पवित्र करती है। यह जंगली हाथियों को शांत करती है, जैसे सम्यग्ज्ञान मुनियों को अहंकार से मुक्त करता है। गंगा का प्रवाह समुद्र द्वारा धारण किया जाता है, जो इसकी पवित्रता और निर्मलता को दर्शाता है। यह हिमवान् की कीर्ति के समान है और आकाशगंगा कहलाती है।
श्लोक 12 से 21
गंगा की शोभा और शरद् ऋतु
गंगा नदी तटवर्ती वनों से नीले वस्त्र धारण किए सी सुशोभित है। हंसों की पंक्तियां इसकी सुवर्णमय करधनी और सहायक नदियां इसकी सखियां प्रतीत होती हैं। यह राजलक्ष्मी के समान पूज्य और प्रेम उत्पन्न करने वाली है। गंगा वनवेदिका को धारण करती है। शरद् ऋतु में सप्तपर्ण वृक्ष सुगंध बिखेरते हैं, बाण वृक्ष कामी चित्त को आकर्षित करते हैं, और तालाबों में नील कमल शरद् लक्ष्मी के मुख समान खिलते हैं। भौंरे कमलों में आसक्त हैं।
श्लोक 22 से 31
प्रकृति और गंगा की शोभा
भौंरे कमल के पराग से पीले होकर कामरूपी अग्नि के स्फुलिंग समान हैं। स्थल कमल शरद् लक्ष्मी के तंबू प्रतीत होते हैं। हंस कमल को स्थल समझकर पानी में डूब जाता है, मृणाल को मक्खन समझकर बच्चों को देता है, और चकवी को न देखकर करुण स्वर में रोता है। गंगा के किनारे सप्तपर्ण वृक्ष चंदोवा की शोभा धारण करते हैं। गंगा की लहरों से उठा पवन थकान हरता है और वनों को हिलाता है।
श्लोक 32 से 41
वन और देव क्रीड़ा
गंगा का पवन जल की बूंदों से अतिथि सत्कार करता प्रतीत होता है। वन दुर्गम और देवों द्वारा अधिष्ठित है, जहां लतागृह फूलों की शय्याओं से सुशोभित हैं। देव और देवांगनाएं मंदार वृक्षों की छाया में चंद्रकांत शिलाओं पर क्रीड़ा करते हैं। किन्नर, सिद्ध, और विद्याधरियां संगीत, नृत्य, और विलास से वन की शोभा बढ़ाते हैं। ऋतुओं का समूह वन में एकत्र होकर उत्सव जैसा प्रतीत होता है।
श्लोक 42 से 51
वन में ऋतुओं की शोभा
अशोक और आम्र वृक्ष फूलों से विद्याधरियों और कोकिलों की शोभा बढ़ाते हैं। चंपक वृक्ष वसंत में कामदेव के दीपक समान खिलते हैं। भौंरे और कोयल कामदेव की सेना के बाजे और नगाड़े प्रतीत होते हैं। माधवी और मालती लताएं वसंत और ग्रीष्म की सुगंध से भौंरों को चंचल करती हैं। वर्षा ऋतु में कदंब और केतकी की सुगंध वायु में फैलती है। मयूर, कोयल, और हंस विभिन्न शब्दों से वन को जीवंत बनाते हैं।
श्लोक 52 से 61
वन का संगीतमय वातावरण
भौंरे किन्नरियों के गीतों, कोयल सिद्धों की वीणा, और हंस विद्याधरियों के नूपुरों का अनुकरण करते हैं। मयूर नृत्य करते हैं, और हंसों के शब्द सुबह सोए हुए पक्षियों को जगाते हैं। लतागृह चंद्रकांत शिलाओं और फूलों की शय्याओं से देवों के नंदन वन समान प्रीतिकर हैं। वन के बाहर दुर्गम जंगल है, जहां सेना के क्षोभ से मृग भयभीत होकर भागते हैं।
श्लोक 62 से 71
वन्य जीवों का क्षोभ
सेना के क्षोभ से हाथी, सर्प, और अजगर भयभीत हैं। शुकर और गैंडा सेना को व्याकुल करते हैं। सिंह, भैंसा, और अन्य क्रूर जीव वन से निकलकर सेना का भय बढ़ाते हैं। अष्टापद नामक जीव छलांग मारकर भी दुखी नहीं होता। मृग और खरगोश भय से इधर-उधर दौड़ते हैं, जिससे सेना का क्षोभ बढ़ता है।
श्लोक 72 से 81
वन्य जीव और वन की शोभा
कृष्णसार मृग और हरिण सेना के बीच छिपते हैं। घायल हरिण समूह भरत से जीव पालन का आग्रह करता प्रतीत होता है। मयूर अपनी पूंछ से वन की शोभा बढ़ाते हैं। हरिण रथ के शब्द सुनकर भी मार्ग से नहीं हटते। स्त्रियां हरिणियों के नेत्रों और पूंछों में अपनी शोभा देखती हैं। वन जीवों के सह-अस्तित्व से शांत रहता है। घने वृक्षों की छाया सैनिकों को सूर्य की तीव्रता से बचाती है, मानो वनलक्ष्मी ने मंडप सजाए हों।
श्लोक 82 से 91
वन की शोभा और सेना की तुलना
गंगा के किनारे स्वच्छ तालाब वन-लक्ष्मी की प्याऊ जैसे प्रतीत होते हैं, जो गर्मी और क्लेश दूर करते हैं। सारथि ने वन की तुलना भरत की सेना से की, जिसमें बाण-असन वृक्ष धनुषों, गैंडा-हाथी तलवारधारी सैनिकों, और विशालता सेना की अनंतता को दर्शाते हैं। भरत ने वन को पार किया, बिना इसकी लंबाई का आभास हुए। घोड़ों की धूलि दिशाओं को परदे सी ढक रही थी। सैनिकों के कवच और स्त्रियों के वस्त्र धूल से रंगे थे। मध्याह्न में सूर्य विजिगीषु राजा सा प्रतापी और निर्मल था। पक्षी और हंस गर्मी से वृक्षों की छाया में शरण लेते थे।
श्लोक 92 से 101
मध्याह्न की गर्मी और प्रकृति
जंगली हाथी और शूकर गर्मी से सरोवरों में शरण लेते थे। हंस मृणाल से ढके और चकवा शेवाल से नीले कुरते सा प्रतीत होता था। राजहंस कमल के छत्र तले गोते लगाते थे। सूर्य की तीव्रता नदियों के किनारों पर हंसों को असंतोष देती थी। सूर्य, मध्यस्थ होकर भी संतापकारी था। रानियों के मुख पर पसीने की बूंदें कमल पर ओस सी शोभा बढ़ाती थीं, मानो मोती पिघलकर तरल हो गए हों।
श्लोक 102 से 111
रानियों और सेना की स्थिति
रानियों के मुख पर पसीने की बूंदें सौंदर्य रस को पुष्ट करती थीं। घोड़ों के मुख पर फेन और खुर स्खलित हो रहे थे। उत्तम घोड़े तीव्र वेग, सुंदर गमन, और बुद्धि-बल से युक्त थे, जो धूलि से रजस्वला पृथ्वी को घृणा करते हुए दौड़ते थे। पैदल सैनिक जूतों से कांटे-पत्थर लांघते, रथ-घोड़ों से तेज चलते थे। शक्ति, लट्ठ, भाला, और तलवारधारी योद्धा स्पर्धा में जल्दी दौड़ते थे।
श्लोक 112 से 121
सेना का उत्साह और मार्ग की अव्यवस्था
योद्धा जोर-जोर से चिल्लाकर मार्ग खाली कराते थे, घोड़ों, हाथियों, और रथों से बचने को कहते थे। एक दुष्ट हाथी और उलटा रथ मार्ग रोक रहे थे। घबड़ाया ऊंट और खच्चर से गिरी स्त्री अव्यवस्था दर्शाते थे। एक तरुण पुरुष वेश्या के मुख से चकित होकर गिरा, और बूढ़ा कुट्टिनी के पीछे तरुण सा व्यवहार करता था। सैनिक बातचीत में मग्न होकर शिबिर पहुंचे, बिना परिश्रम का आभास।
श्लोक 122 से 131
शिबिर की ओर प्रस्थान
मध्याह्न में सूर्य रानियों के मुख की कान्ति मलिन करता था, पर छत्ररत्न और रथ के कारण भरत को गर्मी का कष्ट नहीं हुआ। रथ का वेग और वृद्धों की कथाओं ने मार्ग को सरल बनाया। ध्वजा मार्ग सूचित करती थी। अन्य राजा कठिनाई से भरत के रथ के समीप पहुंचे। शिबिर के रावडी तंबू, चांदी के खंभे, और स्थलकमल जैसे अग्रभाग मनोहर थे।
श्लोक 132 से 141
शिबिर और बाजार की शोभा
शिबिर की कटीली बाड़ियां भरत के निष्कंटक राज्य का प्रतीक थीं। वृक्षों पर टंगे पलान और डेरे शोभा बढ़ाते थे। बाजार में तोरण, ध्वजाएं, और रत्नों की राशि थी। भरत ने रत्नों को देखकर निधियों की संख्या को प्रसिद्धि मात्र माना। बाजार समुद्र सा था, जिसमें घोड़े लहरें, तलवारें मछलियां, और हाथी मगर थे। राजमार्ग राजकुमारों से भरा था।
श्लोक 142 से 152
शिबिर का वैभव और भरत की आराधना
शिबिर का आंगन रत्नों, रथों, घोड़ों, और हाथियों से सुशोभित था, जो बगीचे और सभामंडप सा प्रतीत होता था। द्वारपाल भीड़ को हटाते थे, और मंगलमय शब्द सरस्वती की उपस्थिति दर्शाते थे। शिबिर की अनोखी शोभा भरत को आश्चर्यचकित करती थी। लक्ष्मीपति भरत ने पताकाओं और मंगल-द्रव्यों से युक्त तंबू में प्रवेश किया। सेना शांत होकर शिबिर में बसी। पूर्व दिशा के राजाओं ने धन, कन्याएं, और वस्तुएं भेंटकर भरत की सेवा की, जबकि अन्य राजा दूर से प्रणाम करते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 27 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथ व्यापारयामास दृशं तत्र विशाम्पतिः । प्रसन्नैः सलिलैः पाद्यं वितरन्त्यामिवात्मनः ॥१॥
अथानन्तर वहांपर जो स्वच्छ जलसे अपने लिये (भरतके लिये) पादोदक प्रदान करती हुई सी जान पड़ती थी ऐसी गङ्गा नदीपर महाराज भरतने अपनी दृष्टि डाली ॥१॥
“Thereafter, King Bharata cast his gaze upon the river Ganga, which appeared as if she was offering her pure waters as pādodaka (water for washing the feet) for him.” (1)
श्लोक ( Shlok ) 2
व्यापारितदृशं तत्र प्रभुमालोक्य सारथिः । प्राप्तावसरमित्यूचे वचेश्चेतोऽनुरञ्जनम् ॥२॥
उस समय सारथिने महाराज भरतको गङ्गापर दृष्टि डाले हुए देखकर चित्तको प्रसन्न करनेवाले निम्नलिखित समयानुकूल वचन कहे ॥२॥
“At that moment, seeing King Bharata gazing upon the Ganga, the charioteer spoke the following timely and pleasing words to gladden his heart.” (2)
श्लोक ( Shlok ) 3
इयमाह्लादिताशेष भुवना देवनिम्नगा । रजो विधुन्वती भाति भारतीव स्वयम्भुवः ॥३॥
हे महाराज ! यह गङ्गा नदी ठीक ऋषभदेव भगवान्की वाणीके समान जान पड़ती है, क्योंकि जिस प्रकार ऋषभदेव भगवान्की वाणी समस्त संसारको आनन्दित करती है उसी प्रकार यह गङ्गा नदी भी समस्त लोकको आनन्दित करती है और ऋषभदेव भगवान्की वाणी जिस प्रकार रज अर्थात् पापोंको नष्ट करनेवाली है उसी प्रकार यह गङ्गा नदी भी रज अर्थात् धूलिको नष्ट कर रही है ॥ ३॥
“O King! This river Ganga seems just like the divine speech of Lord Rishabhadeva—for just as His words bring joy to the entire world, so too does this Ganga gladden all beings. And just as His speech destroys raja (impurities or sins), so too does this Ganga wash away raja—the dust and defilements.” (3)
श्लोक ( Shlok ) 4
पुनातीयं हिमाद्रिं च सागरं च महानदी। प्रसूतौ च प्रवेशे च गम्भीरा निर्मलाशया ॥४॥
गंभीर तथा निर्मल जलसे भरी हुई यह गङ्गा नदी उत्पत्तिके समय तो हिमवान् पर्वतको पवित्र करती है और प्रवेश करते समय समुद्रको पवित्र करती है ॥४॥
“Filled with deep and pure waters, this river Ganga sanctifies Mount Himavan at her source and purifies the ocean as she enters it.” (4)
श्लोक ( Shlok ) 5
इमां वनगजाः प्राप्य निर्वान्त्येते मदश्च्युतः। मुनीन्द्रा इव सद्विद्यां गम्भीरां तापविच्छिदम् ॥५॥
जिस प्रकार गंभीर और सन्तापको नष्ट करनेवाली सद्विद्या (सम्यग्ज्ञान) को पाकर बड़े बड़े मुनि लोग मद अर्थात् अहंकार छोड़ कर मुक्त हो जाते हैं उसी प्रकार ये जंगली हाथी भी इस गंभीर तथा संतापको नष्ट करनेवाली गङ्गा नदीको पाकर मद अर्थात् गण्डस्थलसे झरनेवाले तोय विशेषको छोड़कर शान्त हो जाते हैं ।।५।।
“Just as great sages, upon attaining profound and sorrow-dispelling true knowledge, renounce pride and attain liberation, in the same way, these wild elephants, upon encountering the deep and heat-relieving river Ganga, abandon the streaming ichor from their temples and become calm.” (5)
श्लोक ( Shlok ) 6
इतः पिबन्ति वन्येभाः पयोऽस्याः कृतनिःस्वनाः । इतोऽमी पूरयन्त्येनां मुक्तासाराः शरद्धनाः ॥६॥
इधर ये वनके हाथी शब्द करते हुए इसका पानी पी रहे हैं और इधर जलकी वृष्टि करते हुए ये शरदऋतुके मेध इसे भर रहे हैं ।। ६ ।।
“Here, the forest elephants are drinking its waters with loud trumpeting, and there, the autumn clouds are filling it by showering rain.” (6)
श्लोक ( Shlok ) 7
अस्याः प्रवाहमम्भोधिर्धत्ते गाम्भीर्ययोगतः । असोढं विजयार्धेन तुङ्गेनाप्यचलात्मना ॥७॥
अत्यन्त ऊंचा और सदा निश्चल रहनेवाला विजयार्थ पर्वत भी जिसे धारण नहीं कर सका है ऐसे इसके प्रवाहको गम्भीर होनेसे समुद्र सदा धारण करता रहता है ।।७।।
“Even the lofty and ever-still Mount Vijaya could not contain its flow, yet the ocean constantly bears it due to its profound depth.” (7)
श्लोक ( Shlok ) 8
अस्याः पयःप्रवाहेण नूनमन्वितृड् भवेत्। क्षारेण पयसा स्वेन दह्यमानान्तराशयः ॥८॥
संभव है कि अपने खारे जलसे जिसका अन्तःकरण निरन्तर जलता रहता है ऐसा समुद्र इस गङ्गा नदी के जलके प्रवाहसे अवश्य ही प्यासरहित हो जायेगा ।।८।।
“It is possible that the ocean, whose heart constantly burns with its own salty waters, will surely become free from thirst through the flow of this river Ganga.” (8)
श्लोक ( Shlok ) 9
पद्महदाद्धिमवतः प्रसन्नादिव मानसात् । प्रसूता पप्रथे पृथ्व्यां शुद्धजन्मा हि पूज्यते । ९।॥
यह गङ्गा प्रसन्न मनके समान निर्मल हिमवान् पर्वतके पद्म नामक सरोवरसे निकल-कर पृथिवीपर प्रसिद्ध हुई है सो ठीक ही है क्योंकि जिसका जन्म शुद्ध होता है वह पूज्य होता ही है ।।९।।
“This river Ganga, emerging from the lotus-like lake named Padma in the pure and serene Himalayas, has become renowned on earth. And rightly so—for that which has a pure origin is indeed worthy of reverence.” (9)
श्लोक ( Shlok ) 10
व्योमापगामिमां प्राहुर्वियत्तः पतितां क्षितौ । गङ्गादेवीगृहं विप्वगाप्लाव्य स्वजलप्लवैः ॥१०॥
यह गङ्गा अपने जलके प्रवाहसे गङ्गादेवीके घरको चारों ओरसे भिगोकर आकाश-से अर्थात् हिमवान् पर्वतके ऊपरसें पृथिवीपर पड़ी है इसलिये इसे आकाशगङ्गा भी कहते हैं ।।१०।।
“This river Ganga, with its flow of water, drenches the home of Goddess Ganga from all sides, descending from the sky, that is, from the Himalayas, to the earth below. Therefore, it is also called Akashaganga (the Ganga of the sky).” (10)
श्लोक ( Shlok ) 11
बिभर्ति हिमवानेनां शशांककरनिर्मलाम् । आ सिन्धोः प्रसृतां कीर्तिमिव स्वां लोकपावनीम् ॥११॥
“This Ganga, which is as pure as the rays of the moon, extends to the ocean and purifies all beings, is borne by the Himalayas, just as it bears its own glory.” (11)
जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल है, समुद्रतक फैली हुई है और लोकको पवित्र करनेवाली है ऐसी इस गङ्गाको यह हिमवान् अपनी कीर्ति के समान, धारण करता है ॥११॥
श्लोक 12 से 21
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 |
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150