आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61 मरुदेवी की महिमा
उसके केश राहु समान, चोटी फूल बिखेरती थी। वह यशस्विनी, दीर्घायु, संतानवती थी। गुणों की खान, पुण्यवती, सौभाग्य सीमा, पातिव्रत्य परम थी। इंद्र ने उसका विवाह कराया। वह नाभिराज को प्रिय थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
कचभारो बभौ तस्या विनीलकुटिलायतः । मुखेन्दुग्रासलोभेन विधुंतुद इवाश्रितः ॥५२॥
उसके अतिशय काले, टेढ़े और लंबे केशों का समूह ऐसा शोभायमान होता था मानो मुखरूपी चंद्रमा को ग्रसने के लोभ से राहु ही आया हो ।।52।।
Her exceedingly dark, wavy, and long locks appeared so enchanting as if Rahu himself had come, tempted by the desire to devour her moon-like face.
श्लोक ( Shlok ) 53
विस्त्रस्तकबरीबन्धविगलत्कुसुमोत्करैः । सोपहारामिव क्षोणीं चक्रे चंक्रमणेषु सा ॥५३॥
वह मरुदेवी चलते समय कुछ-कुछ ढीली हुई अपनी चोटी से नीचे गिरते हुए फूलों के समूह से पृथ्वी को उपहार सहित करती थी ।।53।।
As the desert goddess walked, the slightly loosened braid of her hair shed clusters of flowers, offering gifts to the earth with every step she took.
श्लोक ( Shlok ) 54
समसुप्रविभक्ताङ्गमित्यस्या वपुरूर्जितम् । स्त्रीसर्गस्य प्रतिच्छन्दभावेनेव विधिर्व्यधात् ॥५४॥
इस प्रकार जिसके प्रत्येक अंग उपांग की रचना सुंदर है ऐसा उसका सुदृढ़ शरीर ऐसा अच्छा जान पड़ता था मानो विधाता ने स्त्रियों की सृष्टि करने के लिए एक सुंदर प्रतिबिंब ही बनाया हो ।।54।।
Thus, with each of her limbs and features exquisitely crafted, her graceful and well-proportioned body appeared as if the Creator had fashioned a perfect reflection to serve as the ideal form for creating all women.
श्लोक ( Shlok ) 55
सुयशाः सुचिरायुश्च सुप्रजाश्च सुमङ्गला । । पतिवत्नी च या नारी सा तु तामनुवर्णिता ॥५५॥
संसार में जो स्त्रियाँ अतिशय यश वाली, दीर्घ आयु वाली, उत्तम संतान वाली, मंगलरूपिणी और उत्तम पति वाली थी वे सब मरुदेवी से पीछे थीं, अर्थात् मरुदेवी उन सबमें मुख्य थी ।।55।।
In the world, all women who were exceedingly renowned, long-lived, blessed with noble offspring, auspicious in nature, and graced with an excellent husband were surpassed by Marudevi—she was the foremost among them all.
श्लोक ( Shlok ) 56
सा खनिर्गुणरत्नानां साऽवनिः पुण्यसंपदाम् । पावनी श्रुतदेवीव” साऽनधीत्यैव पण्डिता ॥५६॥
वह गुणरूपी रत्नों की खान थी, पुण्यरूपी संपत्तियों की पृथिवी थी, पवित्र सरस्वती देवी थी और बिना पढ़े ही पंडिता थी ।।56।।
She was a treasure trove of virtues, the very embodiment of sacred prosperity, a pure incarnation of Goddess Saraswati, and a scholar even without formal learning.
श्लोक ( Shlok ) 57
सौभाग्यस्य परा कोटिः सौरूप्यस्य परा धृतिः सौहार्दस्य परा प्रीतिः सौजन्यस्य परा गतिः ॥५७॥
वह सौभाग्य की परम सीमा थी, सुंदरता की उत्कृष्ट पुष्टि थी, मित्रता की परम प्रीति थी और सज्जनता की उत्कृष्ट गति (आश्रय) थी ।।57।।
She was the ultimate embodiment of fortune, the pinnacle of beauty, the purest essence of friendship, and the supreme refuge of virtue.
श्लोक ( Shlok ) 58
कुसृतिः कामतत्त्वस्य कलागमसरित्स्रुतिः । “प्रसृतिर्यशसां साऽऽसीत् सतीत्वस्य प्रराभृतिः॥५८॥
वह कामशास्त्र की सजेता थी, कलाशास्त्ररूपी नदी का प्रवाह थी, कीर्ति का उत्पत्तिस्थान थीं और पातिव्रत्य धर्म की परम सीमा थी ।।58।।
She was the elegance of the art of love, the flowing river of fine arts, the very source of glory, and the ultimate embodiment of wifely devotion.
श्लोक ( Shlok ) 59
तस्याः किल समुद्वाहे सुरराजेन चोदिताः । सुरोत्तमा महाभूत्या चक्रुः कल्याणकौतुकम् ॥५९॥
उस मरुदेवी के विवाह के समय इंद्र के द्वारा प्रेरित हुए उत्तम देवों ने बड़ी विभूति के साथ उसका विवाहोत्सव किया था ।।59।।
At the time of Marudevi’s wedding, the noble gods, inspired by Indra, celebrated her marriage with great splendor and magnificence.
श्लोक ( Shlok ) 60
पुण्यसम्पत्तिरेवास्या जननीत्वमुपागता । ‘सखीभूयं गता लज्जा गुणाः परिजनायिताः ॥६०॥
पुण्यरूपी संपत्ति उसके मातृभाव को प्राप्त हुई थी, लज्जा सखी अवस्था को प्राप्त हुई थी और अनेक गुण उसके परिजनों के समान थे । भावार्थ―पुण्यरूपी संपत्ति ही उसकी माता थी, लज्जा ही उसकी सखी थी और दया, उदारता आदि गुण ही उसके परिवार के लोग थे ।।60।।
The wealth of virtue became her mother, modesty took the form of her companion, and numerous virtues stood by her like family members.
Meaning: Her mother was none other than the wealth of virtue, her dearest friend was modesty itself, and qualities like compassion and generosity were her true relatives.
श्लोक ( Shlok ) 61
रूपप्रभावविज्ञानैरिति रूढिं परांगता । भर्त्तु र्मनोगजालाने भेजे साऽऽलान यष्टिताम् ॥६१॥
रूप प्रभाव और विज्ञान आदि के द्वारा वह बहुत ही प्रसिद्धि को प्राप्त हुई थी तथा अपने स्वामी नाभिराज के मनरूपी हाथी को बाँधने के लिए खंभे के समान मालूम पड़ती थी ।।61।।
Through her beauty, influence, and wisdom, she attained great fame and appeared like a pillar meant to tether the elephant of her husband Nabhiraja’s heart.
श्लोक 62 से 71
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51