आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 182 विषय सुख की आलोचना
विषय सुख पराधीन, बाधायुक्त, कर्मबंधक है। यह विष समान, खाज खुजलाने जैसा है। चंदन लेप से अस्थायी राहत मिलती है, पर स्थायी सुख नहीं। कुत्ते, कीड़े आदि का प्रेम सुख नहीं। यह केवल रोग प्रतिकार है।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 172 to 182
श्लोक ( Shlok ) 172
मनोनिवृतिमेवेह सुखं वाञ्छन्ति कोविदाः । तत्कुतो विषयान्धानां नित्यमायस्तचेतसाम् ॥१७२॥
विद्वान् पुरुष उसी सुख को चाहते हैं जिसमें कि विषयों से मन की निवृत्ति हो जाती है―चित्त संतुष्ट हो जाता है, परंतु ऐसा सुख उन विषयांध पुरुषों को कैसे प्राप्त हो सकता है जिनका चित्त सदा विषय प्राप्त करने में ही खेद-खिन्न बना रहता है ।।172।।
“Wise individuals seek only that happiness which arises from detachment from sensual pleasures and brings true contentment to the mind. But how can such bliss be attained by those blinded by desires, whose minds remain constantly restless in pursuit of worldly pleasures?”
श्लोक ( Shlok ) 173
विषयानुभवे सौख्यं यत्पराधीनमङ्गिनाम् । साबाधं सान्तरं बन्धकारणं दुःखमेव तत् ।।१७३।।
विषयों का अनुभव करने पर प्राणियों को जो सुख होता है वह पराधीन है, बाधाओं से सहित है व्यवधानसहित है और कर्मबंधन का कारण है, इसलिए वह सुख नहीं है किंतु दुःख ही है ।।173।।
“The pleasure that beings experience from indulging in sensual objects is dependent, accompanied by obstacles, filled with interruptions, and a cause of karmic bondage. Therefore, it is not true happiness but, in reality, suffering.”
श्लोक ( Shlok ) 174
आपातमात्ररसिका विषया विषदारुणाः । तदुद्भवं सुखं नॄणां कण्डूकण्डूयनोपमम् ।।१७४।।
ये विषय विष के समान अत्यंत भयंकर हैं जो कि सेवन करते समय ही अच्छे मालूम होते हैं । वास्तव में उन विषयों से उत्पन्न हुआ मनुष्यों का सुख खाज खुजलाने से उत्पन्न हुए सुख के समान है अर्थात् जिस प्रकार खाज खुजलाते समय तो सुख होता है परंतु बाद में दाह पैदा होने से उलटा दुःख होने लगता है उसी प्रकार इन विषयों के सेवन करने से उस समय तो सुख होता है किंतु बाद में तृष्णा की वृद्धि होने से दुःख होने लगता है ।।174।।
“Sensual pleasures are as dangerous as poison—they may seem enjoyable at the moment of indulgence, but in reality, the happiness derived from them is like the relief from scratching an itch. Just as scratching brings temporary pleasure but later causes burning and pain, similarly, indulging in sensual objects provides fleeting joy but ultimately leads to increased craving and suffering.”
श्लोक ( Shlok ) 175
दग्धव्रणे यथा सान्द्रचन्दनद्रवचर्चनम् । किंचिदाश्वासजननं तथा विषयजं सुखम् ।।१७’५।।
जिस प्रकार जले हुए घाव पर घीसे हुए गीले चंदन का लेप कुछ थोड़ा-सा आराम उत्पन्न करता है उसी प्रकार विषय-सेवन करने से उत्पन्न हुआ सुख उस समय कुछ थोड़ा-सा संतोष उत्पन्न करता है । भावार्थ―जब तक फोड़े के भीतर विकार विद्यमान रहता है तब तक चंदन आदि का लेप लगाने से स्थायी आराम नहीं हो सकता इसी प्रकार जब तक मन में विषयों की चाह विद्यमान रहती है तब तक विषय-सेवन करने से स्थायी सुख नहीं हो सकता । स्थायी आराम और सुख तो तब प्राप्त हो सकता है जब कि फोड़े के भीतर से विकार और मन के भीतर से विषयों की चाह निकाल दी जाये । अहमिंद्रों के मन से विषयों की चाह निकल जाती है इसलिए वे सच्चे सुखी होते हैं ।।175।।
“Just as applying wet sandalwood paste on a burnt wound provides only temporary relief, similarly, the pleasure derived from sensual indulgence offers momentary satisfaction. As long as the infection remains within a wound, true healing cannot occur—likewise, as long as the mind harbors desires for sensual objects, lasting happiness is impossible. True and permanent peace can only be attained when the infection of craving is completely removed. Since the Ahmindras have freed their minds from such desires, they experience true bliss.”
श्लोक ( Shlok ) 176
दुष्टव्रणे यथा क्षार-शस्त्रपाताद्युपक्रमः । प्रतीकारो रुजां जन्तोस्तथा विषयसेवनम् ।।१७६।।
जिस प्रकार विकारयुक्त घाव होने पर उसे क्षारयुक्त शस्त्र से चीरने आदि का उपक्रम किया जाता है उसी प्रकार विषयों की चाहरूपी रोग उत्पन्न होने पर उसे दूर करने के लिए विषय-सेवन किया जाता है और इस तरह जीवों का यह विषय-सेवन केवल रोगों का प्रतिकार ही ठहरता है ।।176।।
“Just as an infected wound is treated by cutting it open with a medicinal blade, similarly, when the disease of sensual craving arises, indulgence in sensual pleasures is merely an attempt to counteract that affliction. Thus, sensual indulgence is not true enjoyment but merely a temporary remedy for an underlying ailment.”
श्लोक ( Shlok ) 177
प्रियाङ्गनाङ्गसंसर्गाद् यदीह सुखमङ्गिनाम् । ननु पक्षिमृगादीनां तिरश्चामस्तु तत्सुखम् ॥१७७॥
यदि इस संसार में प्रिय स्त्रियों के स्तन, योनि आदि अंग के संसर्ग से ही जीवों को सुख होता हो तो वह सुख पक्षी, हरिण आदि तिर्यंचों को भी होना चाहिए ।।177।।
“If true happiness in this world were derived solely from contact with the breasts, womb, and other parts of beloved women, then birds, deer, and other lower creatures should also experience the same kind of happiness.”
श्लोक ( Shlok ) 178
शुनीमिन्द्रमहे पूतिव्रणीभूतकुयोनिकाम् । अवशं सेवमानः श्वा सुखी चेत् स्त्रीजुषां सुखम् ॥१७८॥
यदि स्त्रीसेवन करने वाले जीवों को सुख होता हो तो कार्तिक के महीने में जिसकी योनि अतिशय दुर्गंधयुक्त फोड़ों के समान हो रही है ऐसी कुत्ती को स्वच्छंदतापूर्वक सेवन करता हुआ कुत्ता भी सुखी होना चाहिए ।।178।।
“If beings who indulge in women truly experience happiness, then a dog, freely engaging with a female dog whose womb emits an extremely foul odor like festering wounds in the month of Kartik, should also be considered happy.”
श्लोक ( Shlok ) 179 – 180
निम्बद्रुमे यथोत्पन्नः कीटकस्तद्रसोपभुक् । मधुरं तद्रसं वेत्ति तथा विषयिणोऽप्यमी ॥ १७९॥
संभोगजनितं खेदं श्लाघमानः सुखास्थया । तत्रैव रतिमायान्ति भवावस्करकीटकाः ॥१८०॥
जिस प्रकार नीम के वृक्ष में उत्पन्न हुआ कीड़ा उसके कड़वे रस को पीता हुआ उसे मीठा जानता है उसी प्रकार संसाररूपी विष्ठा में उत्पन्न हुए ये मनुष्यरूपी कीड़े, स्त्री-संभोग से उत्पन्न हुए खेद को ही सुख मानते हुए उसकी प्रशंसा करते हैं और उसी में प्रीति को प्राप्त होते हैं । भावार्थ―जिस प्रकार नीम का कीड़ा नीम के कड़वे रस को आनंददायी मानकर उसी में तल्लीन रहता है अथवा जिस प्रकार विष्ठा का कीड़ा उसके दुर्गंधयुक्त अपवित्र रस को उत्तम समझकर उसी में रहता हुआ आनंद मानता है उसी प्रकार यह संसारी जीव संभोगजनित दुःख को सुख मानकर उसी में तल्लीन रहता है ।।179-180।।
*”Just as a worm born in a neem tree drinks its bitter sap and perceives it as sweet, in the same way, these human worms, born in the filth of the world, consider the suffering arising from sensual indulgence as happiness, praise it, and become attached to it.
Meaning—Just as a neem worm remains engrossed in the bitter sap of the neem tree, thinking it to be pleasurable, or just as a worm in filth finds joy in its foul and impure surroundings, similarly, worldly beings mistake the suffering caused by sensual indulgence for happiness and become deeply immersed in it.”*
श्लोक ( Shlok ) 181 – 182
विषयानुभवात् पुंसां रतिमात्रं प्रजायते । रतिश्चेत् सुखमायातं नन्व मेध्यादनेऽपि तत् ॥१८१॥
यथामी रतिमासाद्य विषयाननुभुञ्जते । तथा श्वशूकरकुलं तद्रत्यैवात्त्यमेधकम् ॥१८२॥
विषयों का सेवन करने से प्राणियों को केवल प्रेम ही उत्पन्न होता है । यदि वह प्रेम ही सुख माना जाये तो विष्ठा आदि अपवित्र वस्तुओं के खाने में भी सुख मानना चाहिए क्योंकि विषयी मनुष्य जिस प्रकार प्रेम को पाकर अर्थात् प्रसन्नता से विषयों का उपभोग करते हैं उसी प्रकार कुत्ता और शूकरों का समूह भी तो प्रसन्नता के साथ विष्ठा आदि अपवित्र वस्तुएं खाता है ।।181-182।।
“By indulging in sensual pleasures, beings experience only attachment. If this attachment itself is considered happiness, then one must also consider eating filth and other impure substances as happiness. After all, just as sensual humans indulge in pleasures with delight, so too do dogs and pigs consume filth with apparent satisfaction.”
श्लोक 183 से 191
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171