महाबल (विद्याधर) – पर्व 4 – श्लोक 132 से 141 महाबल का जन्म
ललितांग (ऐशान स्वर्ग का देव) –पर्व 5 – श्लोक 252 से 261 महाबल का देवत्व
वज्रजंघ (राजा जंबूद्वीप के विदेह क्षेत्र में पुष्कलावती देश के उत्पलखेटक नगर ) पर्व 6 – श्लोक 22 से 31 ललितांगदेव की मृत्यु और पुनर्जन्म
आर्य (उत्तरकुरु भोगभूमि का निवासी) पर्व 9– श्लोक 32 से 41 उत्तरकुरु और कल्पवृक्ष
श्रीधर ( ऐशान स्वर्ग देव) पर्व 9– श्लोक 182 से 191 स्वर्ग में जन्म
सुविधि (राजा) पर्व 10 – श्लोक 112 से 122 शतबुद्धि का उद्धार और पुनर्जन्म
अच्युतेंद्र पर्व 10 –श्लोक 162 से 171 सुविधि के व्रत और स्वर्ग
वज्रनाभि ( पुंडरीकिणी नगरी चक्रवर्ती) पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 अच्युतेंद्र का स्वर्ग से च्युत होना
अहमिंद्र (सर्वार्थसिद्धि विमान ) पर्व 11 – श्लोक 103 से 111 वज्रनाभि की तपस्या और उपशम
ऋषभदेव ( नाभिराज-मरुदेवी के पुत्र ) पर्व 12 – श्लोक 82 से 91 ऋषभदेव के अवतरण की तैयारी
आप पूर्व दसवें भव में महाबल विद्याधर थे , नौवें भव में ऐशान स्वर्ग के ललितांग देव थे, आठवें भव में वज्रजंघ नाम के राजा थे, पर्व 14 – श्लोक 48
आप पूर्व सातवें भव में भोगभूमिज आर्य थे, छठे भव में श्रीधर नाम के देव थे , पाँचवें भव में श्रीधर नाम के राजा थे , चौथे भव में अच्युत स्वर्ग के इंद्र थे पर्व 14 – श्लोक 49
आप पूर्व तीसरे भव में वज्रनाभि नाम के चक्रवर्ती , दूसरे भव में सर्वार्थसिद्धि विमान को प्राप्त कर उसके स्वामी थे पर्व 14 – श्लोक 50
महाबल आदि दश अवतारों में अंतिम परमौदारिक शरीर को धारण करने वाले नाभिराज के पुत्र वृषभदेव परमेष्ठी हुए हैं पर्व 14 – श्लोक 51