भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
श्लोक 182 से 191 अच्युतेंद्र का रूप और स्वर्ग (भाग 2)
ऊरु कदली-स्तंभ, चरण तालाब समान थे। वह 159 विमानों, 33 त्रायस्त्रिंश, 10,000 सामानिक, 40,000 आत्मरक्षक देवों से युक्त था। तीन परिषदें थीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
सुवर्णकदलीस्तम्मविभ्रमं रुचिमानशे । तस्योरुद्वितयं चारु सुरनारीमनोहरम् ॥१८२॥
देवांगनाओं के मन को हरण करने वाले उसके दोनों सुंदर ऊरु सुवर्ण कदली के स्तंभों का संदेह करते हुए अत्यंत शोभायमान हो रहे थे ।182।।
“His two beautiful thighs, capable of captivating the hearts of celestial maidens, shone brilliantly, resembling pillars of golden plantains, leaving one in doubt as to whether they were truly limbs or divine golden stems.”
श्लोक ( Shlok ) 183
तस्य पादद्वये लक्ष्मीः काप्यभूदब्ज शोभिनि । नखांशुस्वच्छसलिले सरसीव झषाङ्किते ॥१८३॥
उस इंद्र के दोनों चरण किसी तालाब के समान मालूम पड़ते थे क्योंकि तालाब जिस प्रकार जल से सुशोभित होता है उसी प्रकार उसके चरण भी नखों की किरणोंरूपी निर्मल जल से सुशोभित थे, तालाब जिस प्रकार कमलों से शोभायमान होता है उसी प्रकार उसके चरण भी कमल के चिह्नों से सहित थे और तालाब जिस प्रकार मच्छ वगैरह से सहित होता है उसी प्रकार उसके चरण भी मत्स्य रेखा आदि से युक्त थे । इस प्रकार उसके चरणों में कोई अपूर्व ही शोभा थी ।।183।।
“Indra’s feet appeared like a serene pond. Just as a pond is adorned with crystal-clear water, his feet gleamed with the radiant glow of his toenails. Just as a pond is beautified by blooming lotuses, his feet bore auspicious lotus markings. And just as a pond is home to fish and other aquatic creatures, his feet were graced with divine symbols like the Matsya Rekha (fish-shaped lines). In this way, his feet possessed an extraordinary and unparalleled splendor.”
श्लोक ( Shlok ) 184
इत्युदारतरं बिभ्रद् दिव्यं वैक्रियिकं वपुः । स तत्र बुभुजे भोगानच्युतेन्द्रः स्वकल्पजान् ॥१८४॥
इस तरह अत्यंत श्रेष्ठ और सुंदर वैक्रियिक शरीर को धारण करता हुआ वह अच्युतेंद्र अपने स्वर्ग में उत्पन्न हुए भोगों का अनुभव करता था ।।184।।
“Thus, possessing an exceptionally magnificent and radiant Vaikriyika (divine, transformative) body, Achyutendra experienced the celestial pleasures that manifested in his heaven.”
श्लोक ( Shlok ) 185
इतो रज्जूः षडुत्पत्य कल्पोऽस्त्यच्युतसंज्ञकः । सोऽस्य भुक्तिरभूत् पुण्यात् पुण्यैः किं नुन लभ्यते १८५
वह अच्युत स्वर्ग इस मध्यलोक से छह राजु ऊपर चलकर है तथापि पुण्य के उदय से वह सुविधि राजा के भोगोपभोग का स्थान हुआ सो ठीक ही है । पुण्य के उदय से क्या नहीं प्राप्त होता ? ।।185।।
“Achyuta heaven is located six Raju above this middle world, yet due to the rise of his meritorious karma, it became the abode of King Suvidhi’s divine pleasures. Indeed, what cannot be attained through the fruition of merit?”
श्लोक ( Shlok ) 186
तस्य भुक्तौ विमानानां परिसंख्या मता जिनैः । शतमेकमथैकान्न पष्टिश्च परमागमे ॥१८६॥
उस इंद्र के उपभोग में आने वाले विमानों की संख्या सर्वज्ञ प्रणीत आगम में जिनेंद्रदेव ने एक-सौ उनसठ कही है ।।186।।
“In the omnisciently proclaimed Agamas, Lord Jinedra has stated that the number of celestial chariots (Vimanas) available for the enjoyment of that Indra is 159.”
श्लोक ( Shlok ) 187
त्रयोविंशं शतं तेपु विमानेषु प्रकीर्णकाः । श्रेणीबद्धास्ततोऽन्ये स्युरतिरुन्द्राः सहेन्द्रकाः ॥१८७॥
उन एक सौ उनसठ विमानों में एक सौ तेईस विमान प्रकीर्णक हैं, एक इंद्रक विमान है और बाकी के पैंतीस बड़े-बड़े श्रेणीबद्ध विमान हैं ।।187।।
“Among those 159 celestial chariots (Vimanas), 123 are Prakirnaka (scattered or miscellaneous) Vimanas, one is the Indraka Vimana, and the remaining 35 are large, tiered Vimanas.”
श्लोक ( Shlok ) 188
त्रयस्त्रिंशदथास्य स्युस्त्रायस्त्रिंशाः सुरोत्तमाः । ते च पुत्रीयितास्तेन स्नेहनिर्भरया धिया ॥१८८॥
उन इंद्र के तैंतीस त्रायस्त्रिंश जाति के उत्तम देव थे । वह उन्हें अपनी स्नेह-भरी बुद्धि से पुत्र के समान समझता था ।।188।।
“That Indra had thirty-three supreme deities of the Trayastrimsha class, whom he regarded with affectionate wisdom, considering them as his own sons.”
श्लोक ( Shlok ) 189
अयुतप्रमिवाश्चास्य सामानिकसुरा मताः । ते ह्यस्य सदृशाः सर्वेः भोगैरांज्ञा तु भिद्यते ॥१८९॥
उसके दश हजार सामानिक देव थे । वे सब देव भोगोपभोग की सामग्री से इंद्र के ही समान थे परंतु इंद्र के समान उनकी आज्ञा नहीं चलती ।।189।।
“He had ten thousand Samanika deities. While they were equal to Indra in enjoying divine pleasures, they did not possess his supreme authority.”
श्लोक ( Shlok ) 190
आत्मरक्षाश्च तस्योक्ताश्चत्वार्यें वायुतानि वै । तेऽप्यङ्गरक्षकैस्तुल्या विभावायैव वर्णिताः ॥१९०॥
उसके अंगरक्षकों के समान चालीस हजार आत्मरक्षक देव थे । यद्यपि स्वर्ग में किसी प्रकार का भय नहीं रहता तथापि इंद्र की विभूति दिखलाने के लिए ही वे होते हैं ।।190।।
“He had forty thousand Atmarakshaka deities who served as his personal guards. Although there is no fear in heaven, they exist solely to showcase Indra’s grandeur and divine majesty.”
श्लोक ( Shlok ) 191
अन्तःपरिषदस्याद्या सपादं सतमिष्यते । मध्यमार्द्ध तृतीयं स्याद् बाह्या तद् द्विगुणा मता ॥१९१
अंत-परिषद, मध्यमपरिषद् और बाह्यपरिपद् के भेद से उस इंद्र की तीन सभाएं थीं । उनमें से पहली परिषद् में एक सौ पच्चीस देव थे, दूसरी परिषद् में दो सौ पचास देव थे और तीसरी परिषद् में पाँच सौ देव थे ।।191।।
“That Indra had three assemblies, classified as Antah-Parishad (inner council), Madhyama-Parishad (middle council), and Bahya-Parishad (outer council). The first council comprised 125 deities, the second had 250 deities, and the third consisted of 500 deities.”
श्लोक 192 से 201
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181