आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
सरसिजनिभवक्त्रं पद्मकिञ्चल्कगौरं कमलदलविशाल व्यायतास्पन्दिनेत्रम् । सरसिरुहसमानामोदमच्छायमच्छस्फटिकमणिविभासि श्रीजिनस्याङ्गमीडे ॥१७२॥
श्रीजिनेंद्रभगवां के उस शरीर की स्तुति करता हूँ जिसका कि मुख कमल के समान है, जो कमल की केशर के समान पीतवर्ण हैं, जिसके टिमकाररहित नेत्र कमलदल के समान विशाल और लंबे हैं, जिसकी सुगंधि कमल के समान थी, जिसकी छाया नहीं पड़ती और जो स्वच्छ स्फटिकमणि के समान सुशोभित हो रहा था ।।172।।
I praise the divine body of Lord Jinendra, whose face resembles a lotus, whose complexion is golden like lotus pollen, whose calm, unwavering eyes are broad and elongated like lotus petals, whose fragrance matches that of a lotus, whose form casts no shadow, and who radiates the brilliance of a flawless crystal gem. ( 172)
श्लोक ( Shlok ) 173
नयनयुगमताम्रं वक्ति कोपव्यपायं भ्रकुटिरहितमास्यं शान्ततां यस्य शास्ति । मदनजय मपाङ्गालोकनापायसौम्यं प्रकटयत्ति यदङ्ग तं जिनं नन्न मीमि ॥१७३৷৷
जिनके ललाईरहित दोनों नेत्र जिनके क्रोध का अभाव बतला रहे हैं, भौंहों की टेढ़ाई से रहित जिनका मुख जिनकी शांतता को सूचित कर रहा है और कटाक्षावलोकन का अभाव होने से सौम्य अवस्था को प्राप्त हुआ जिनका शरीर जिनके कामदेव की विजय को प्रकट कर रहा है ऐसे उन जिनेंद्रभगवां को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ ।।173।।
I bow repeatedly to Lord Jinendra, whose eyes, devoid of redness, reveal the absence of anger, whose smooth, untwisted brows signify perfect serenity, and whose body, free from sidelong glances, embodies a state of supreme calm, manifesting his victory over desire. ( 173)
श्लोक ( Shlok ) 174
गात्रमनङ्ग भङ्गकृदतिसुरभिरुचिरं नेत्रमताम्रमत्यमलतररुचिविसरम् । वक्त्रमदष्टसद्दशन वसन मिव हसद्यस्य विभाति तं जिनमवनमत सुधियः ॥१७४॥
हे बुद्धिमान् पुरुषों, जिनका शरीर कामदेव को नष्ट करने वाला अतिशय सुगंधित और सुंदर है, जिनके नेत्र ललाईरहित तथा अत्यंत निर्मल कांति के समूह से सहित हैं, और जिनका मुख ओंठों को डसता हुआ नहीं है तथा हंसता हुआ-सा सुशोभित हो रहा है ऐसे उन वृषभजिनेंद्र को नमस्कार करो ।।174।।
O wise beings, bow to Lord Rishabhadev, whose fragrant and beautiful body vanquishes the influence of desire, whose eyes are free from redness and radiate supreme purity, and whose smiling face, untouched by harshness, shines with divine grace. (Verse 174)
श्लोक ( Shlok ) 175
सौम्यवक्त्रममलकमलदलनिभदृशं हेमपुञ्जसदृशवपुषमृषभमृषिपम् । रक्तपद्मरुचि भृदमलमृदुपदयुगं सन्न तोऽस्मि परमपुरुषमपरुषगिरम् ।।१७५॥
जिनका मुख सौम्य है, नेत्र निर्मल कमलदल के समान हैं, शरीर सुवर्ण के पुंज के समान है, जो ऋषियों के स्वामी हैं, जिनके निर्मल और कोमल चरणों के युगल लाल कमल की कांति धारण करते हैं, जो परम पुरुष हैं और जिनकी वाणी अत्यंत कोमल है ऐसे श्री वृषभ जिनेंद्र को मैं अच्छी तरह नमस्कार करता हूँ ।।175।।
I bow reverently to Lord Rishabhadev, whose gentle face radiates serenity, whose eyes resemble pure lotus petals, whose body gleams like a mass of gold, who is the lord of sages, whose spotless and tender feet bear the luster of red lotuses, who is the supreme being, and whose speech is supremely soft and melodious. ( 175)
श्लोक ( Shlok ) 176
स जयति यस्य पादयुगलं जयत्पङ्कजं विलसति पद्मगर्भ मधिशय्य सल्लक्षणम् । मनसिजरागमर्दनसहं जगत्प्रीणनं सुरपतिमौलिशेखरगलद्रजः पिञ्जरम् ॥१७६॥
जिनके चरण-युगल कमलों को जीतने वाले हैं, उत्तम-उत्तम लक्षणों से सहित हैं, कामसंबंधी राग को काट करने में समर्थ हैं, जगत् को संतोष देनेवाले हैं, इंद्र के मुकुट के अग्रभाग से गिरती हुई माला के पराग से पीले-पीले हो रहे हैं और कमल के मध्य में विराजमान कर सुशोभित हो रहे हैं ऐसे भगवान् वृषभदेव सदा जयवंत हों ।।176।।
May Lord Rishabhadev always be victorious, whose lotus-like feet surpass even the most exquisite lotuses, who possess supreme auspicious marks, who are capable of cutting away worldly attachments, who bring peace to the world, whose feet are tinged with the golden pollen of garlands falling from Indra’s crown, and who appear radiantly seated upon a lotus. (176)
श्लोक ( Shlok ) 177
जयति वृषभो यस्योतुङ्गं विभाति महासनं हरिपरिधृतं रत्नानद्धं परिस्फुरदंशुकम् । अधरितजगन्मेरोर्लीलां विडम्बयदुच्चकैर्नतसुरतिरोटाग्र ग्रावद्युतीरिव तर्जयत्॥१७७॥
जो बहुत ऊँचा है, सिंहों के द्वारा धारण किया हुआ है, रत्नों से जड़ा हुआ है, चारों ओर चमकती हुई किरणों से सहित है, संसार को नीचा दिखला रहा है, मेरुपर्वत की शोभा की खूब विडंबना कर रहा है और जो नमस्कार करते हुए देवों के मुकुट के अग्रभाग में लगे हुए रत्नों की कांति की तर्जना करता-सा जान पड़ता है ऐसा जिनका बड़ा भारी सिंहासन सुशोभित हो रहा है वे भगवान् वृषभदेव सदा जयवंत रहे ।।177।।
May Lord Rishabhadev always be victorious, whose magnificent throne is lofty, upheld by lions, adorned with precious jewels, radiating brilliant rays of light in all directions, surpassing the grandeur of the entire universe, outshining Mount Meru, and seeming to mock the radiance of the gems adorning the crowns of bowing celestial beings. ( 177)
श्लोक ( Shlok ) 178
समग्रां “वैदग्धी सकलश शभृन्मण्डलगतां सितच्छत्रं भाति त्रिभुवनगुरोर्यस्य विहसत् । जयत्येष श्रीमान् वृषभजिनराण्णिर्जितरिपुर्नम द्देवेन्द्रोद्यन्मुकुटमणिघृष्टा ङ्घ्रिकमलः ॥१७८॥
तीनों लोकों के गुरु ऐसे जिन भगवान् का सफेद छत्र पूर्ण चंद्रमंडलसंबंधी समस्त शोभा को हँसता हुआ सुशोभित हो रहा है जिन्होंने घातियाकर्मरूपी शत्रुओं को जीत लिया है जिनके चरणकमल नमस्कार करते हुए इंद्रों के दैदीप्यमान मुकुटों में लगे हुए मणियों से घर्षित हो रहे हैं और जो अंतरंग तथा बहिरंग लक्ष्मी से सहित हैं ऐसे श्री ऋषभ जिनेंद्र सदा जयवंत रहें ।।178।।
May Lord Rishabhadev always be victorious, the supreme guru of the three worlds, whose white parasol outshines the beauty of the full moon, who has conquered the enemy in the form of destructive karmas, whose lotus feet are gently rubbed by the radiant jewels embedded in the crowns of bowing Indras, and who is adorned with both inner and outer prosperity. ( 178)
श्लोक ( Shlok ) 179
जयत्यमरनायकैर सकृदर्चिताङ्घ्रिद्वयः सुरोत्करकराधुतैश्चमरजोत्करैर्वीजितः । गिरीन्द्रशिखरे गिरीन्द्र इव योऽभिषिक्तः सुरैः पयोब्धिशुचिवारिभिः शशिकराङ्कुरस्पर्धिभिः ॥१७९॥
इंद्रों ने जिनके चरणयुगल की पूजा अनेक बार की थी, जिन पर देवों के समूह ने अपने हाथ से हिलाये हुए अनेक चमरों के समूह ढुराये थे और देवों ने मेरु पर्वत पर दूसरे मेरु पर्वत के समान स्थित हुए जिनका, चंद्रमा की किरणों के अंकुरों के साथ स्पर्धा करने वाले क्षीरसागर के पवित्र जल से अभिषेक किया था वे श्री ऋषभ जिनेंद्र सदा जयवंत रहें ।।179।।
May Lord Rishabhadev always be victorious, whose lotus feet have been worshipped countless times by Indras, upon whom divine beings have waved numerous chowries with their own hands, and who, standing on Mount Meru like another Meru itself, was ceremoniously bathed by the gods with the pure waters of the Ksheer Sagar, whose moonlit waves rival the rays of the moon. ( 179)
श्लोक ( Shlok ) 180
यस्य समुज्ज्वला गुणगणा इव रुचिरतरा भान्त्यभितो मयूखमिवहा गुणसलिलनिधेः । विश्व जनीनचारुचरितः सकलजगदिनः सोऽवतु मध्यपङ्कजरविर्वृषभजिनविभुः ॥१८०॥
गुणों के समुद्रस्वरूप जिन भगवान के उज्ज्वल और अतिशय दैदीप्यमान किरणों के समूह गुणों के समूह के समान चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं, जिनका सुंदर चरित्र समस्त जीवों का हित करने वाला है, जो सकल जगत् के स्वामी हैं और जो भव्य जीवरूपी कमलों को विकसित करने के लिए सूर्य के समान हैं ऐसे श्री वृषभ जिनेंद्र देव हम सब की रक्षा करें ।।180।।
May Lord Rishabhadev, the ocean of virtues, protect us all—whose radiant and resplendent rays shine gloriously in all directions like a brilliant aura of virtues, whose divine character is dedicated to the welfare of all beings, who is the supreme lord of the entire universe, and who, like the sun, causes the lotus-like souls of the blessed beings to blossom. (180)
श्लोक ( Shlok ) 181
यस्याशोकश्चल किसलयश्चित्रपत्रप्रसूनो भाति श्रीमान् मरकतमयस्कन्धबन्धोज्ज्वलाङ्गः । सान्द्रच्छायः सकलजनताशोकविच्छेदनेच्छः सोऽयं श्रोशो जयति वृषभो मध्यपद्माकरार्कः ॥१८१॥
जिसके पल्लव हिल रहे हैं, जिसके पत्ते और फूल अनेक वर्ण के हैं, जो उत्तम शोभा से सहित है, जिसका स्कंध मरकतमणियों से बना हुआ है, जिसका शरीर अत्यंत उज्ज्वल है, जिसकी छाया बहुत ही सघन है, और समस्त लोगों का शोक नष्ट करने की जिसकी इच्छा है ऐसा जिनका अशोकवृक्ष सुशोभित हो रहा है और जो भव्य जीवरूपी कमलों के समूह को विकसित करने के लिए सूर्य के समान हैं ऐसे वे बहिरंग और अंतरंग लक्ष्मी के अधिपति श्री वृषभ जिनेंद्र सदा जयवंत रहें ।।181।।
May Lord Rishabhadev, the master of both external and internal prosperity, ever be victorious—whose Ashoka tree stands gloriously with swaying buds, multi-colored leaves and flowers, supreme beauty, a trunk made of emeralds, an exceedingly radiant body, and an immensely dense shade, ever desiring to eradicate the sorrows of all beings. Just as the sun blossoms the lotus-like souls of the blessed beings, so too does His grace uplift the world. ( 181)
श्लोक 182 से 191
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |