भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 92 असह्य दुःख और आयु
नारकी कहाँ जाएँ, यहाँ वेदना असह्य, आयु लंबी है। मानसिक संताप मृत्यु का संशय देता है। चार पृथ्वियों में उष्ण, पाँचवीं में उष्ण-शीत, छठी-सातवीं में शीत वेदना है। बिलों की संख्या और आयु क्रमशः बढ़ती है।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 82 to 92
श्लोक ( Shlok ) 82
दुस्सहा वेदनास्तीव्रा प्रहारा दुर्धरा इमे । अकाले दुस्त्यजाः प्राणा दुर्निवाराश्च नारकाः ॥८२॥
यहाँ की वेदना इतनी तीव्र है कि उसे कोई सह नहीं सकता, मार भी इतनी कठिन है कि उसे कोई बरदाश्त नहीं कर सकता । ये प्राण भी आयु पूर्ण हुए बिना छूट नहीं सकते और ये नारकी भी किसी से रोके नहीं जा सकते ।।82।।
“The agony here is so intense that no one can endure it, and the torment so severe that no one can withstand it. These lives cannot end until their destined time is complete, and these hellish beings cannot be restrained by anyone.”
श्लोक ( Shlok ) 83
क्व यामः क्व नु तिष्ठामः क्वास्महे क्व नु शेमहे । यत्र यत्रोपसर्पामस्तत्र तत्राधयोऽधिकाः ॥८३॥
ऐसी अवस्था में हम लोग कहाँ जायें ? कहाँ खड़े हों कहाँ बैठें और कहाँ सोवें ? हम लोग जहाँ-जहाँ जाते हैं वहाँ-वहाँ अधिक-ही-अधिक दुःख पाते हैं ।।83।।
“In such a condition, where can we go? Where can we stand, sit, or lie down? Wherever we go, we only encounter greater and greater suffering.”
श्लोक ( Shlok ) 84
इत्यपारमिदं दुःखं तरिष्यामः कदा वयम् । नाब्धयोऽप्युपमानं नो जीवितस्यालघीयसः ॥८४॥
इस प्रकार यहाँ के इस अपार दुःख से हम कब तिरेंगे पार होंगे हम लोगों की आयु भी इतनी अधिक है कि सागर भी उसके उपमान नहीं हो सकते ।।84।।
“When will we ever cross this immense ocean of suffering? Our lifespan is so long that even the vast ocean cannot be compared to it.”
श्लोक ( Shlok ) 85
इत्यनुध्यायतां तेषां योऽन्तस्तापोऽनुसन्ततः । स एव प्राणसंशीतिं तानारोपयितुं क्षमः ॥८५॥
इस प्रकार प्रतिक्षण चिंतवन करते हुए नारकियों को जो निरंतर मानसिक संताप होता रहता है वही उनके प्राणों को संशय में डाले रखने के लिए समर्थ है अर्थात् उक्त प्रकार के संताप से उन्हें मरने का संशय बना रहता है ।।85।।
“In this way, as the hellish beings constantly dwell on such thoughts, they experience relentless mental agony, which is enough to keep their very lives in a state of uncertainty — constantly on the verge of death yet unable to die.”
श्लोक ( Shlok ) 86
किमत्र बहुनोक्तेन यद्यद् दुःखं सुदारुणम् । तत्तत्पिण्डीकृतं तेषु दुर्मोचेः पापकर्मभिः ॥८६॥
इस विषय में और अधिक कहने से क्या लाभ है ? इतना ही पर्याप्त हैं कि संसार में जो-जो भयंकर दुःख होते हैं उन सभी को, कठिनता से दूर होने योग्य कर्मों ने नरकों में इकट्ठा कर दिया है ।।86।।
“What is the use of saying more on this matter? It is enough to say that all the dreadful sufferings of the world have been gathered in hell by the karmas that are extremely difficult to overcome.”
श्लोक ( Shlok ) 87
अक्ष्णोर्निमेषमात्रं च न तेषां सुखसंगतिः । दुःखमेवानुबन्धीदृग् नारकाणामहर्निशम् ॥८७॥
उन नारकियों को नेत्रों के निमेष मात्र भी सुख नहीं है । उन्हें रात-दिन इसी प्रकार दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ता है ।।87।।
“Those hellish beings do not experience even a moment’s comfort. Day and night, they endure nothing but continuous suffering.”
श्लोक ( Shlok ) 88
नानादुःखशतावर्ते मग्नानां नरकार्णवे । तेषामास्तां सुखावाप्तिस्तस्स्मृतिश्च दवीयसी ॥८८॥
नाना प्रकार के दुःखरूपी सैकड़ों आवर्तों से भरे हुए नरकरूपी समुद्र में डूबे हुए नारकियों को सुख की प्राप्ति तो दूर रही उसका स्मरण होना भी बहुत दूर रहता है ।।88।।
“Immersed in the hellish ocean filled with countless whirlpools of suffering, the hellish beings are far from attaining any happiness; even the mere recollection of it remains a distant thought.”
श्लोक ( Shlok ) 89
शीतोष्णनरकेष्वेषां दुःखं यदुपजायते । तदसह्यमचिन्त्यं च बत्त केनोपमीयते ॥८९॥
शीत अथवा उष्ण नरकों में इन नारकियों को जो दुःख होता है वह सर्वथा असह्य और अचिंत्य है । संसार में ऐसा कोई पदार्थ भी तो नहीं है जिसके साथ उस दुःख की उपमा दी जा सके ।।89।।
“The suffering experienced by these hellish beings in the cold or hot hells is utterly unbearable and beyond imagination. There is nothing in the world that can be compared to such torment.”
श्लोक ( Shlok ) 90
शीतं षष्ठयां च सप्तम्यां पञ्चम्यां तद् द्वयं मतम् । पृथिवीषूष्णमुद्दिष्टं चतसृष्वादिमासु च ॥९०॥
पहले की चार पृथ्वीयों में उष्ण वेदना है । पाँचवीं पृथ्वी में उष्ण और शीत दोनों वेदनाएँ हैं अर्थात् ऊपर के दो लाख बिलों में उष्ण वेदना है और नीचे के एक लाख बिलों में शीत वेदना है । छठी और सातवीं पृथ्वी में शीत वेदना है । यह उष्ण और शीत की वेदना नीचे-नीचे के नरकों में क्रम-क्रम से बढ़ती हुई है ।।90।।
“In the first four layers of the earth, there is the torment of heat. In the fifth layer, there are both heat and cold torments — the upper two hundred thousand burrows have heat torment, while the lower one hundred thousand burrows have cold torment. The sixth and seventh layers are characterized by cold torment. The intensity of both heat and cold torments increases progressively in the lower hells.”
श्लोक ( Shlok ) 91 – 92
त्रिंशत्पञ्चहताः पञ्चत्रिपन्च दश च क्रमात् । तिस्रः पञ्चभिरूनैका लक्षाः पञ्च च सप्तसु ॥९१॥
नरकेषु बिलानि स्युः प्रज्वलन्ति महान्ति च । नारका येषु पच्यन्ते कुम्भीष्विव दुरात्मकाः ॥92
उन सातों पृथ्वीयों में क्रम से तीस लाख, पच्चीस लाख, पंद्रह लाख, दस लाख, तीन लाख, पाँच कम एक लाख और पाँच बिल हैं । ये बिल सदा ही जाज्वल्यमान रहते हैं और बड़े-बड़े हैं । इन बिलों में पापी नारकी जीव हमेशा कुंभीपाक (बंद घड़े में पकाये जाने वाले जल आदि) के समान पकते रहते हैं ।।91-92।।
“In those seven layers of the earth, there are, respectively, thirty lakh, twenty-five lakh, fifteen lakh, ten lakh, three lakh, ninety-five thousand, and five burrows. These burrows are always blazing and vast in size. In these burrows, the sinful hellish beings continuously suffer, boiling like beings cooked in tightly sealed vessels filled with water and other substances, similar to the torment of Kumbhipaka.”
श्लोक 93 से 101
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81