आदिपुराण प्रथमं पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 1 by Acharya Jinasena
पर्व 1 में अर्हंत की महिमा, काव्य का महत्व, और पुराण की परंपरा का वर्णन हैं।
संक्षिप्त सारांश (श्लोक 1 से 210)
अनंतचतुष्टय और अष्टप्रातिहार्य से युक्त श्री अर्हंतदेव को नमस्कार है। जिनेंद्र सूर्य-से अज्ञान नष्ट करते हैं। वृषभदेव ने वैभव को तुच्छ मानकर दीक्षा ली। उनके साथ हजारों राजाओं ने तप सहे। केवलज्ञान से वे प्रकाशित हुए। अजितनाथ से महावीर तक तीर्थंकरों और गणधरों की स्तुति हुई। त्रेसठ शलाकापुरुषों का पुराण संग्रह करने का संकल्प लिया। यह ग्रंथ प्राचीन और कल्याणकारी है। अल्पज्ञ ग्रंथकार भक्ति से इसे कहता है। सिद्धसेन, समंतभद्र जैसे कवियों का सम्मान किया गया। धर्मकथा से युक्त काव्य प्रशंसनीय है। सज्जन गुण और दुर्जन दोष ग्रहण करते हैं। काव्य अलंकार और गुणों से युक्त हो। यह धर्मकथा कल्पलता-सी फलदायी और सरोवर-सी गंभीर है। कथा में सात अंग होते हैं। वक्ता सदाचारी और निपुण हो। श्रोता गाय-हंस जैसे उत्तम हों। तृतीय काल में ऋषभदेव कैलास पर आए। देवों ने पूजा की। समवसरण में केवलज्ञान प्राप्त हुआ। भरत ने स्तुति कर प्रश्न पूछे। वे तीर्थंकर, चक्रवर्ती, और युगों का स्वरूप जानना चाहते हैं। सभा ने प्रशंसा की। भगवान की वाणी से पुराण कहा गया। यह एकरूप होकर अनेकरूप हुई। वृषभसेन ने इसे पुराण बनाया। महावीर और गौतम ने इसे प्रकाशित किया। यह गुरुपरंपरा से चला। यह पुण्य, यश, और मोक्ष देता है। ग्रंथकर्ता इसे शक्ति से कहता है। यह मिथ्यामत नष्ट कर जयशील रहे।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 1
श्लोक 1: अर्हंतदेव को नमस्कार
अनंतचतुष्टय और अष्टप्रातिहार्य से युक्त जिन्होंने केवलज्ञानरूपी साम्राज्य प्राप्त किया, जो धर्मचक्र धारक, लोकत्रय के अधिपति, और संसार के भय को नष्ट करने वाले हैं, ऐसे श्री अर्हंतदेव को नमस्कार है।
श्लोक 2 से 15 जिनेंद्र की महिमा
जिनेंद्रदेव को सूर्य के समान प्रकाशक और नमस्कार योग्य बताया गया। उनकी महिमा अजेय है, वे मिथ्यादृष्टि का खंडन करते हैं। भगवान वृषभदेव ने साम्राज्य को तुच्छ मानकर मुनिदीक्षा ली। उनके साथ हजारों राजाओं ने दीक्षा ली। कच्छ आदि राजाओं ने वल्कल पहने, तप सहे, और कर्मनिर्जरा की। उनकी जटाएँ ध्यानाग्नि से शोभायमान थीं। सुर-असुर उन्हें चलते मेरु पर्वत मानते थे। श्रेयांस के दान से रत्नवर्षा हुई। केवलज्ञान से वे सभा में सूर्य समान हुए और समीचीन धर्म का उपदेश दिया।
श्लोक 16 से 25 तीर्थंकर और पुराण का संकल्प
अजितनाथ से महावीर तक 23 तीर्थंकरों और गणधरों को नमस्कार। श्रुतस्कंधरूपी वृक्ष की उपासना की प्रेरणा। त्रेसठ शलाकापुरुषों (तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण आदि) के पुराण का संग्रह करने का संकल्प। यह ग्रंथ प्राचीन, महान्, और कल्याणकारी है, इसलिए महापुराण कहलाता है। यह आर्ष, सूक्त, और इतिहास रूप है।
श्लोक 26 से 35 ग्रंथकार का विनय
गणधरदेव द्वारा रचित महापुराण को अल्पज्ञानी कवि भक्ति से कहने का प्रयत्न करता है। यह गंभीर समुद्र है, जिसमें वह तैरने की हास्यास्पद कोशिश करता है। प्राचीन कवियों ने मार्ग सुगम बनाया, जैसे सिंह के बाद हिरण, हाथी के बाद बच्चे चलते हैं। वह उनकी सहायता से इस समुद्र को पार करना चाहता है।
श्लोक 36 to 45 कवियों की प्रशंसा
यदि प्रमाद से भूल हो तो विद्वान् क्षमा करें। सज्जन गुण ग्रहण करें, जैसे समुद्र से रत्न लेते हैं। सिद्धसेन आदि कवियों की समानता कांच और मणि जैसी। समंतभद्र, श्रीदत्त आदि महाकवियों को नमस्कार, जो मिथ्यामत को नष्ट करते हैं और यशस्वी हैं।
श्लोक 46 से 55 महाकवियों का सम्मान
यशोभद्र, प्रभाचंद्र, शिवकोटि, जटासिंहनंदि, काणभिक्षु, देवाचार्य आदि कवियों की स्तुति। ये विद्वानों में श्रेष्ठ, तपोलक्ष्मी से युक्त, और काव्य के मर्मज्ञ हैं। उनके वचन शास्त्रों को प्रकाशित करते हैं। भट्टाकलंक, वादिसिंह आदि के गुण मणिमाला समान हैं।
श्लोक 56 से 65 वीरसेन और कविता की महत्ता
वीरसेन, जयसेन आदि गुरुओं की प्रशंसा, जो धवलाटीका रचते हैं और शास्त्रज्ञ हैं। कविता धर्म से संबंधित होनी चाहिए, अन्यथा पाप का कारण बनती है। मिथ्यादृष्टि काव्य सज्जनों को संतुष्ट नहीं करता। कुछ कवि हास्यास्पद प्रयास करते हैं।
श्लोक 66 से 75 कवियों की कमियाँ
अयोग्य कवि दूसरों की नकल करते हैं या अधूरी रचना करते हैं। कुछ शब्दों से सुंदर, पर अर्थहीन काव्य रचते हैं। शास्त्रज्ञान बिना काव्य करना साहस है। बुद्धिमानों को धर्मोपदेशी काव्य करना चाहिए। उत्तम कवि दोषों से नहीं डरता, जैसे सूर्य उलूक से।
श्लोक 76 से 85 सज्जन-दुर्जन का स्वभाव
कवि को अपना प्रयोजन सिद्ध करना चाहिए, सबको संतुष्ट करना असंभव। लोग शब्द, अर्थ, समास आदि में भिन्न रुचि रखते हैं। सज्जन गुण, दुर्जन दोष ग्रहण करते हैं। दुर्जन निर्दोष कथा को दूषित करते हैं, सज्जन दोषयुक्त को निर्दोष बनाते हैं।
श्लोक 86 से 95 काव्य का स्वरूप
दुर्जन धर्मकथा से दुखी, सज्जन प्रसन्न होते हैं। मिथ्यादृष्टि को ओषधि अरुचिकर लगती है। दुर्जन स्वभाव से टेढ़े, सज्जन जगत को सज्जन नहीं बना पाते। सज्जनता-दुर्जनता का स्वभाव बताया। कवि सज्जनों के आश्रय से काव्य समुद्र पार करना चाहता है।
श्लोक 96 से 105 महाकाव्य की परिभाषा
काव्य अलंकार, रस, और मौलिक होना चाहिए। रीति, लालित्य, रसहीन काव्य ग्रामीण भाषा है। महाकवि प्राचीन इतिहास और धर्म रचते हैं। शब्द, रस, छंद सुलभ होने से कविता में दरिद्रता नहीं। कवि को महाकवियों की छाया लेनी चाहिए। प्रतिभा और गुणों से काव्य यश देता है।
श्लोक 106 से 116 काव्य और धर्मकथा की महिमा
धर्मकथा यश और पुण्य का मूलधन है। यह कथा धर्मशास्त्र से संबंधित है। इसमें ऋषभनाथ जैसे महापुरुषों का चरित्र है। यह कल्पलता-सी फलदायी, सरोवर-सी गंभीर, आकाशगंगा-सी पवित्र, और दर्पण-सी प्रतिबिंबित है। यह मिथ्यामत नष्ट करती और वैराग्य बढ़ाती है। इसे सज्जन सुनें।
श्लोक 117 से 126 कथा और वक्ता के लक्षण
कथा में धर्म, अर्थ, काम का वर्णन होता है। धर्मयुक्त सत्कथा है। अधर्मकथा पाप का कारण है। सद्धर्मकथा स्वर्ग-मोक्ष देती है। इसके सात अंग हैं। द्रव्य, क्षेत्र, तीर्थ, काल, भाव, फल, और प्रकृत इनका विस्तार होगा।
श्लोक 127 से 136 वक्ता की योग्यताएँ
वक्ता सदाचारी, स्थिरबुद्धि, और इंद्रिय-नियंत्रक हो। उसकी वाणी स्पष्ट, निर्मल, और प्रिय हो। वह उदाहरणों और भाषाओं में निपुण हो। वक्ता अंग न हिलाए, न हँसे, और हितकारी वचन बोले। वह चार प्रकार की कथाएँ कहे।
श्लोक 137 से 146 श्रोता के लक्षण
श्रोता धर्म सुनने में तत्पर हो। चौदह प्रकार के श्रोता हैं। गाय और हंस जैसे उत्तम, मिट्टी और तोता जैसे मध्यम, अन्य अधम हैं। श्रोता गुण-दोष बताए। उसे सांसारिक फल न चाहें। शुश्रूषा आदि आठ गुण श्रोताओं में हों।
श्लोक 147 से 156 कथावतार का प्रारंभ
कथा से पुण्य, स्वर्ग, और मोक्ष मिलता है। तृतीय काल में ऋषभदेव कैलास पर आए। देवों ने उनकी पूजा की। केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इंद्र ने समवसरण बनाया। भरत ने भगवान को नमस्कार कर स्तुति की। सभा संतुष्ट हुई।
श्लोक 157 से 166 भरत की प्रशंसा
सभा भगवान से प्रबोध पाकर शोभित हुई। उनकी वाणी अज्ञान नष्ट करती है। भरत उनके दर्शन और वचन से कृतार्थ हुए। धर्मोपदेश मेघवर्षा-सा है। भगवान सब तत्त्व बताते हैं। भरत और प्रश्न पूछना चाहते हैं।
श्लोक 167 से 171 भरत का प्रश्न
भक्ति से भरत भगवान से पूछते हैं। वे तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, बलभद्र, और प्रतिनारायणों का चरित्र सुनना चाहते हैं। उनके नाम, गोत्र, लक्षण, और संख्या जानना चाहते हैं।
श्लोक 172 से 180 प्रश्न का विस्तार
भरत युगों, मनुओं, लोक, काल, और वंशों का स्वरूप जानना चाहते हैं। वे संशय नष्ट करने की प्रार्थना करते हैं। सभा ने प्रश्न की प्रशंसा की। देवों ने भरत पर पुष्पवृष्टि की।
श्लोक 181 से 190 भगवान का उपदेश
इंद्र ने भरत को धन्य कहा। भगवान प्रश्न समझकर वाणी से पुराण कहने लगे। उनकी ध्वनि आश्चर्यकारी थी। यह एकरूप होकर भी अनेकरूप हुई। उनकी वाणी सभा को संतुष्ट करती है। भरत के प्रश्नों का क्रमशः उत्तर दिया।
श्लोक 191 से 200 पुराण की परंपरा
भगवान ने शलाकापुरुषों का चरित्र कहा। वृषभसेन ने इसे पुराण बनाया। यह अजितनाथ से महावीर तक प्रकाशित हुआ। चतुर्थ काल में महावीर विपुलाचल पर आए। श्रेणिक ने पूछा। गौतम ने वर्णन किया। गौतम, सुधर्म, जंबू ने परंपरा चलाई।
श्लोक 201 से 210 ग्रंथ की प्रामाणिकता
महावीर मूलकर्ता और गौतम उत्तरकर्ता हैं। यह पुराण प्रमाणभूत और कल्याणकारी है। इसका अध्ययन से शांति, आरोग्य, कर्मनिर्जरा होती है। यह पुण्य, यश, और मोक्ष देता है। ग्रंथकर्ता वृषभसेन के मार्ग पर चलता है। यह पुराण सूर्य-सा मिथ्यामत नष्ट कर मोक्षमार्ग प्रकाशित करता है।
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