भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 195 स्वर्गीय भोग
छहों जीव ललितांगदेव समान भोग भोगते हैं। श्रीधर को देवांगनाएँ चरण दबातीं, कटाक्ष बाण चलातीं। वह संतुष्ट रहता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 192 to 195
श्लोक ( Shlok ) 192
प्रभाकर विमानेऽभून्न कुलार्यों मनोरथः । मनोरथशतावाप्तदिव्य भोगोऽमृताशनः ॥१९२
और नकुल का जीव प्रभाकर विमान में मनोरथ नाम का देव हुआ जो कि सैकड़ों मनोरथों से प्राप्त हुए दिव्य भोगरूपी अमृत का सेवन करने वाला था ।।192।।
The being who was once a mongoose became a deity named Manoratha, residing in the celestial vehicle Prabhakara. He enjoyed the divine nectar of pleasures obtained through countless fulfilled desires. (192)
श्लोक ( Shlok ) 193
इति पुण्योदयात्तेषां स्व लोकसुखभोगिनाम् । रूपसौन्दर्य भोगादिवर्णना ललिताङ्गवत् ॥१९३॥
इस प्रकार पुण्य के उदय से स्वर्गलोक के सुख भोगने वाले उन छहों जीवों के रूप, सौंदर्य, भोग आदि का वर्णन ललितांगदेव के समान जानना चाहिए ।।193।।
Thus, due to the rise of their merits, these six beings enjoyed the bliss of heaven. Their forms, beauty, pleasures, and other attributes should be understood to be as magnificent as those of Lalitangadeva. (193)
श्लोक ( Shlok ) 194
इत्युच्चैः प्रमदोदयात् सुरवरः श्रीमानसौ श्रीधरः स्वर्गश्रीनयनोत्सवं शुचितरं विभ्रद्व पुर्भास्वरम् ।
कान्ताभिः कलभाषिणीभिरुचितान् भोगान् मनोरञ्जनान् भुञ्जानः सततोत्सवैररमत स्वस्मिन् विमानोत्सवे ॥१९४॥
इस प्रकार पुण्य के उदय से स्वर्गलक्ष्मी के नेत्रों को उत्सव देने वाले, अत्यंत पवित्र और चमकीले शरीर को धारण करने वाला वह ऋद्धिधारी श्रीधर देव मधुर वचन बोलने वाली देवांगनाओं के साथ मनोहर भोग भोगता हुआ अपने ही विमान में अनेक उत्सवों द्वारा क्रीड़ा करता था ।।194।।
Thus, due to the rise of his merits, the prosperous Shridhara Deva, who possessed a radiant and pure form that delighted the eyes of the goddess of heaven, enjoyed enchanting pleasures with sweet-voiced celestial maidens. He indulged in numerous celebrations and playful activities within his own celestial vehicle. (194)
श्लोक ( Shlok ) 195
कान्तानां करपल्लवैर्मृदुतलैः संवाह्यमानक्रमःतद्वक्त्रेन्दुशुचिस्मितांशुसलिलैः संसिच्यमानो मुहुः ।
‘सभ्रूविभ्रमतत्कटाक्षविशिखैर्लक्ष्यीकृतोऽनुक्षणं भोगाङ्गैरपि सोतृपत् प्रमुदितो वत्स्र्यज्जिनः श्रीधरः ॥ १९५॥
कभी देवांगनाएँ अपने कोमल करपल्लवों से उसके चरण दबाती थीं, कभी अपने मुखरूपी चंद्रमा से निकलती हुई मंद मुसकान की किरणोंरूपी जल से बार-बार उसका अभिषेक करती थीं और कभी भौंहों के विलास से युक्त कटाक्षरूपी बाणों का उसे लक्ष्य बनाती थीं । इस प्रकार आगामी काल में तीर्थंकर होने वाला वह प्रसन्नचित्त श्रीधरदेव भोगोपभोग की सामग्री से प्रत्येक क्षण संतुष्ट रहता था ।।195।।
Sometimes the celestial maidens gently pressed his feet with their soft lotus-like hands. At times, they anointed him repeatedly with the rays of their gentle smiles, resembling streams of moonlight emanating from their moon-like faces. Occasionally, they targeted him with playful glances, like arrows adorned with the charm of their arched brows. Thus, the blissful Shridhara Deva, destined to become a future Tirthankara, remained constantly content with various pleasurable enjoyments. (195)
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षण श्रीमहापुराण संग्रहे श्रीमतीवनजङ्घार्यसम्यग्दर्शनोत्पत्तिवर्णनं नाम नवमं पर्व ॥9॥
इस प्रकार आर्षनाम से प्रसिद्ध भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण श्रीमहापुराणसंग्रह में श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन करने वाला नवां पर्व समाप्त हुआ ।।9।।
Thus concludes the ninth chapter, narrating the attainment of right faith (Samyagdarsana) by Arya Shrimati and Vajrajangha, from the revered Trishashti Lakshana Shrimahapurana, composed by the esteemed Acharya Bhagavanjinsen, renowned in the sacred tradition. (9)
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 |