आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 91 उत्तर श्रेणी के नगर
प्रत्येक नगरी के एक करोड़ गाँव थे। गाँव धानों और ईखों से हरे थे। नगरों का अंतर 195 योजन था। उत्तर श्रेणी में अंतर 178 योजन था। उत्तर में 60 नगर थे, जैसे अर्जुनी, वारुणी, और चंद्रपुर। ये स्वर्गीय थे। यहाँ के मनुष्य देवकुमार और स्त्रियाँ अप्सराएँ सी थीं। पर्वत तीनों लोकों की शोभा धारण करता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 72 to 91
श्लोक ( Shlok ) 72
ग्रामार्णा कोटिरेका स्यात् परिवारः पुरं प्रति । तथा खेटमडम्बादिनिवेशश्च पृथग्विधः ॥७२॥
इन नगरियों में से प्रत्येक नगरी के प्रति एक-एक करोड़ गाँवों का परिवार है तथा खेट मडंब आदि की रचना जुदी-जुदी है ।।72।।
Each of these cities is accompanied by a network of ten million (one crore) villages, and the layout of forts, marketplaces, and other structures varies uniquely from city to city. ॥72॥
श्लोक ( Shlok ) 73
अकृष्टपच्यैः कलमैः धान्यैरन्यैश्च सम्भृताः । पुण्ड्रेक्षुवनसंछन्नसीमानो निगमाः सदा ॥७३॥
वे गाँव बिना बोये पैदा होने वाले शाली चावलों से तथा और भी, अनेक प्रकार के धानों से सदा हरे-भरे रहते हैं तथा उनकी सीमाएँ पौंडा और ईखों के वनों से सदा ढकी रहती हैं ।।73।।
Those villages remain ever lush and green with naturally growing Shali rice and various other types of grains. Their borders are always covered with dense forests of sugarcane and Paunda trees. ॥73॥
श्लोक ( Shlok ) 74
पुराणमन्तरं चात्र स्यात् पञ्चनवतं शतम् । प्रमाणयोजनोद्दिष्टं मानमाप्तैर्निदर्शितम् ॥७४॥
इस विजयार्ध पर्वत पर बसे हुए नगरों का अंतर भी सर्वज्ञ देव ने प्रमाण योजन के नाप से 195 योजन बतलाया है ।।74।।
The omniscient deity has measured and declared that the distance between the cities situated on Vijayardha Mountain is 195 yojanas, according to the standard unit of measurement. ॥74॥
श्लोक ( Shlok ) 75
पुराणि दक्षिणश्रेण्यां यथैतानि तथैव वै। भवेयुरुत्तरश्रेण्यामपि तानि समृद्धिभिः ॥७५॥
जिस प्रकार दक्षिण श्रेणी पर इन नगरों की रचना बतलायी है ठीक उसी प्रकार उत्तर श्रेणी पर भी अनेक विभूतियों से युक्त नगरों की रचना है ।।75।।
Just as the cities on the southern range have been described, in the same manner, the northern range is also adorned with magnificent cities, enriched with numerous glorious treasures and wonders. ॥75॥
श्लोक ( Shlok ) 76
किन्त्वन्तरं पुराणां स्यात् तत्रैकैकं प्रमाणतः । योजनानां शतं चाष्ट सप्ततिश्चैव साधिका ॥७६॥
किंतु वहाँ पर नगरों का अंतर प्रमाण योजन से कुछ अधिक एक सौ अठहत्तर योजन है ।।76।।
However, the distance between the cities there is slightly more, measuring 178 yojanas, according to the standard unit of measurement. ॥76॥
श्लोक ( Shlok ) 77
तेषां व नामनिर्देशो भवेदयमनुक्रमात् । पश्चिमां दिशमारभ्य यावत् षष्टितमं” पुरम् ॥७७॥
पश्चिम दिशा से लेकर साठवें नगर तक उन नगरों के नाम अनुक्रम से इस प्रकार हैं;।।77।।
From the western direction up to the sixtieth city, the names of these cities, in sequential order, are as follows: ॥77॥
श्लोक ( Shlok ) 78 – 87
अर्जुनी चारुणी चैव सकैलासा च वारुणी। विद्युत्प्रभं किलिकिलं चूडामणि शशिप्रभे ॥७८॥
वंशालं पुष्पचूलं च हंसगर्भबलाहकौ । शिवंकरं च श्रीहर्म्यं चमरं शिवमन्दिरम् ॥७९॥
वसुमत्कं वसुमती नाम्ना सिद्धार्थकं परम् । शत्रुजयं ततः केतुमालाख्यं च भवेत् पुरम् ॥८०॥
सुरेन्द्रकान्तमन्यत् स्यात्ततो गगननन्दनम् । अशोकान्या विशोका च वीतशोका च सत्पुरी ॥८१॥
अलका तिलकाख्या च तिलकान्तं तथाम्बरम् । मन्दिरं कुमुदं कुन्दमतो गगनवल्लभम् ॥८२॥
द्युभूमितिलके पुर्यौ पुरं गन्धर्वसाह्वयम् । मुक्ताहारः सनिमिषं चाग्निज्वालमतः परम् ॥८३॥
महाज्वालं च विज्ञेयं श्रीनिकेतो जयाह्वयम् । श्रीवासो मणिवज्राख्यं भद्राश्वं सधनञ्जयम् ॥८४॥
गोक्षीर फेनमक्षोभ्यं गिर्यादिशिखराह्वयम् । धरणी धारणी दुर्ग दुर्धराख्यं सुदर्शनम् ॥८५॥
महेन्द्राख्यपुरं चैव पुरं विजयसाह्वयम् । सुगन्धिनी च वज्रार्धतरं रत्नाकराह्वयम् ॥८६॥
भवेद् रत्नपुरं चान्त्यमुत्तरस्यां पुराणि वै । श्रेण्यां स्वर्गपुरश्रीणि भान्त्येतानि महान्त्यलम् ॥८७॥
1 अर्जुनी, 2 वारुणी, 3 कैलासवारुणी, 4 विद्युत्प्रभ, 5 किलिकिल, 6 चूड़ामणि, 7 शशिप्रभा, 8 वंशाल, 9 पुष्पचूड़, 10 हंसगर्भ, 11 बलाहक, 12 शिवंकर, 13 श्रीहर्म्य, 14 चमर, 15 शिवमंदिर, 16 वसुमत्क, 17 वसुमती, 18 सिद्धार्थक, 19 शत्रुंजय, 20 केतुमाला, 21 सुरेंद्रकांत, 22 गगननंदन, 23 अशोका, 24 विशोका, 25 वीतशोका, 26 अलका, 27 तिलका, 28 अंबरतिलक, 29 मंदिर, 30 कुमुद, 31 कुंद, 32 गगनवल्लभ, 33 द्युतिलक, 34 भूमितिलक, 35 गंधर्वपुर, 36 मुक्ताहार, 37 निमिष, 38 अग्निज्वाल, 39 महाज्वाल, 40 श्रीनिकेत, 41 जय, 42 श्रीनिवास, 43 मणिवज्र, 44 भद्राश्व, 45 भवनंजय, 46 गोक्षीर, 47 फेन, 48 अक्षोभ्य, 49 गिरिशिखर, 50 धरणी, 51 धारण, 52 दुर्ग, 53 दुर्धर, 54 सुदर्शन, 55 महेंद्रपुर, 56 विजयपुर, 57 सुगंधिनी, 58 वज्रपुर, 59 रत्नाकर और 60 चंद्रपुर । इस प्रकार उत्तर श्रेणी में ये बड़े-बड़े साठ नगर सुशोभित हैं इनकी शोभा स्वर्ग के नगरों के समान है ।।78-87।।
These sixty grand cities in the northern range are as follows:
- Arjuni
- Varuṇī
- Kailāsavāruṇī
- Vidyutprabha
- Kilikil
- Chūḍāmaṇi
- Shashiprabha
- Vanshāl
- Pushpachūḍ
- Hansagarbha
- Balāhak
- Shivankar
- Shrīharmya
- Chamara
- Shivamandir
- Vasumatka
- Vasumatī
- Siddhārthaka
- Shatruñjaya
- Ketumālā
- Surendrakānta
- Gagannandana
- Ashoka
- Vishoka
- Vītashoka
- Alaka
- Tilaka
- Ambaratilaka
- Mandira
- Kumuda
- Kunda
- Gaganavallabha
- Dyutilaka
- Bhūmitilaka
- Gandharvapura
- Muktāhāra
- Nimiṣa
- Agnijvāla
- Mahājvāla
- Shrīniketa
- Jaya
- Shrīnivāsa
- Maṇivajra
- Bhadrāshva
- Bhavananjaya
- Gokṣhīra
- Phena
- Akṣhobya
- Girishikhara
- Dharanī
- Dhāraṇa
- Durga
- Durdhara
- Sudarshana
- Mahendrapura
- Vijayapura
- Sugandhinī
- Vajrapura
- Ratnākara
- Chandrapura
These sixty majestic cities of the northern range are as resplendent as the celestial cities of heaven. ॥78-87॥
श्लोक ( Shlok ) 88
पुराणीन्द्रपुराणीव सौधानि स्व र्विंमानतः । प्रति प्रतिपुरं व्यस्त विभवं प्रतिवैभवम् ॥८८॥
ये नगर इंद्रपुरी के समान हैं और बड़े-बड़े भवन स्वर्ग के विमानों के समान हैं । यहाँ का प्रत्येक नगर शोभा की अपेक्षा दूसरे नगर से पृथक् ही मालूम होता है तथा हर एक नगर का वैभव भी दूसरे नगर के वैभव की अपेक्षा पृथक मालूम होता है अर्थात् यहाँ के नगर एक-से-एक बढ़कर हैं ।।88।।
These cities are as magnificent as Indra’s celestial abode, and their grand palaces resemble the divine aerial chariots of heaven. Each city stands out with its unique splendor, distinct from the others. Similarly, the grandeur of each city appears different from the magnificence of the rest, making them one more glorious than the other. ॥88॥
श्लोक ( Shlok ) 89
नराः सुरकुमाराभा नार्यश्चाप्सरसां समाः । सर्वर्तुविषयान् भोगान् भुञ्जतेऽमी यथोचितम् ॥८९॥
यहाँ के मनुष्य देवकुमारों के समान हैं और स्त्रियाँ अप्सराओं के तुल्य हैं । ये सभी स्त्री-पुरुष अपने-अपने योग्य छहों ऋतुओं के भोग भोगते हैं ।।89।।
The men here are like divine princes, and the women are comparable to celestial nymphs (Apsaras). All these men and women enjoy the pleasures of all six seasons, indulging in delights that suit their nature and desires. ॥89॥
श्लोक ( Shlok ) 90
इति पुराणि पुराणकवीशिनामपि वचोभिरशक्यनुतीन्ययम् । दधदधित्यकया गिरिरुच्चकैः द्युवसतेः श्रियमाह्वयते ध्रुवम् ॥९०॥
इस प्रकार यह विजयार्ध पर्वत ऐसे-ऐसे श्रेष्ठ नगरों को धारण कर रहा है कि बड़े-बड़े प्राचीन कवि भी अपने वचनों-द्वारा जिनकी स्तुति नहीं कर सकते । इसके सिवाय यह पर्वत अपने ऊपर की उत्कृष्ट भूमि से ऐसा मालूम होता है मानो स्वर्ग की लक्ष्मी को ही बुला रहा हो ।।90।।
Thus, this Vijayardha Mountain holds such magnificent and splendid cities that even the greatest ancient poets fail to fully praise them with their words. Moreover, with its exquisite and superior land, this mountain appears as if it is inviting the very Goddess of Wealth (Lakshmi) from heaven. ॥90॥
श्लोक ( Shlok ) 91
गिरिरयं गुरुभिः शिखरैर्दिवं प्रविपुलेन तलेन च भूतलम् । दधदुपान्तचरैः खचरोरगैः प्रथयति त्रिजगच्छ्रियमेकतः ॥९१॥
यह पर्वत अपने बड़े-बड़े शिखरों से स्वर्ग को धारण कर रहा है, अपने विस्तृत तलभाग से अधोलोक को धारण कर रहा है और समीप में ही घूमने वाले विद्याधर तथा धरणेंद्रों से मध्यलोक की शोभा धारण कर रहा है । इस प्रकार यह एक ही जगह तीनों लोको की शोभा प्रकट कर रहा है ।।91।।
This mountain, with its lofty peaks, upholds the heavens, with its vast base, supports the netherworld, and with the Vidyaadharas and Dharanendras roaming nearby, enhances the beauty of the Middle World. In this way, it manifests the splendor of all three worlds in one place. ॥91॥
श्लोक 92 से 101
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कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71