भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141
श्लोक 142 से 151 व्रतों का स्वरूप
मुनि ने कहा कि अनशन तप कर्म नष्ट करता है। जिनेंद्रगुणसंपत्ति व्रत में तीर्थंकर के 63 गुणों (16 कारण भावनाएँ, 5 कल्याणक, 8 प्रातिहार्य, 34 अतिशय) के लिए 63 उपवास होते हैं। श्रुतज्ञान व्रत में ज्ञान के 158 भेदों (28 मतिज्ञान, 11 अंग, आदि) के लिए 158 उपवास होते हैं। इनका फल केवलज्ञान और स्वर्ग है।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
क्रम कृतानां कर्मणामार्यें सहसा ‘परिपाचनम् । तपोऽनशनमाम्नातं विधियुक्तमुपोषितम् ॥१४२॥
हे आर्य, विधिपूर्वक किया गया यह अनशन तप, किये हुए कर्मों को बहुत शीघ्र नष्ट करनेवाला माना गया है ।।142।।
“O noble one, this fast, performed according to the proper rites, is considered a penance that quickly destroys the accumulated karmas.”142
श्लोक ( Shlok ) 143 – 144
तोर्थकृत्वस्य पुण्यस्य कारणानीह षोडश । कल्याणान्यत्र पञ्चैव प्रातिहार्याष्टकं तथा ।।१४३॥
अतिशेषाश्चतुस्त्रिशदिमानुद्दिश्य सद्गुणान् । या साऽनुष्ठीयते भव्येः संपञ्जिनगुणादिका ॥१४४॥
तीर्थंकर नामक पुण्य प्रकृति के कारणभूत सोलह भावनाएँ, पाँच कल्याणक, आठ प्रातिहार्य तथा चौंतीस अतिशय इन तिरसठ गुणों को उद्देश्य कर जो उपवास व्रत किया जाता है उसे जिनेंद्रगुणसंपत्ति कहते हैं । भावार्थ―इस व्रत में जिनेंद्र भगवान् के तिरसठ गुणों को लक्ष्य कर तिरसठ उपवास किये जाते हैं जिनकी व्यवस्था इस प्रकार है―सोलह कारण भावनाओं की सोलह प्रतिपदा, पंच कल्याणकों की पाँच पंचमी, आठ प्रातिहार्यों की आठ अष्टमी और चौंतीस अतिशयों की बीस दशमी तथा चौदह चतुर्दशी इस प्रकार तिरसठ उपवास होते हैं ।।143-144।।
“The fasting vow, which is undertaken with the intention of focusing on the sixty-three virtues—sixteen Bhāvanas (thoughts) arising from the nature of the Tīrthaṅkara, five Kalyāṇakas (auspicious events), eight Prātihāryas (honorifics), and thirty-four Atishayas (extraordinary attributes)—is called the Jinedra-guṇasaṃpatti vow.
Explanation: In this vow, the sixty-three virtues of Lord Jīnā (Tīrthaṅkara) are focused upon, with sixty-three fasts performed. These are organized as follows: sixteen fasts for the sixteen cause-related Bhāvanas, five for the five Kalyāṇakas, eight for the eight Prātihāryas, twenty for the thirty-four Atishayas (split as twenty in the tenth day and fourteen in the fourteenth day), making up a total of sixty-three fasts.”143-144
श्लोक ( Shlok ) 145
उपवासदिनान्यत्र त्रिषष्टिर्मुनिभिर्मता । श्रुत्तन्नानोपवासस्य स्वरूपमधुनोच्यते ॥१४५॥
पूर्वोक्त प्रकार से जिनेंद्रगुणसंपत्तिनामक व्रत में तिरसठ उपवास करना चाहिए ऐसा गणधरादि मुनियों ने कहा है । अब इस समय श्रुतज्ञान नामक उपवास व्रत का स्वरूप कहा जाता है ।।145।।
Thus, it has been stated by the Ganadharas and other monks that one should observe sixty-three fasts as part of the vow called Jinedra-guṇasaṃpatti. Now, let me explain the form of the vow of fasting known as Śrutajñāna.”145
श्लोक ( Shlok ) 146 – 150
“अष्टाविंशतिमप्येकादश द्वो च यथाक्रमम् ।अष्टाशीतिमयैकं च चतुर्दश च पञ्च च ॥१४६॥
विद्धि षड्द्वयेकसंख्यां च म त्यादिज्ञानपर्ययात् । नामोद्देशक्रमश्चैषां ज्ञानानामिस्यनुस्मृतः ॥१४७।
मतिज्ञानमथैकादशाङ्गानि परिकर्म च । सूत्रमाद्यनुयोगं व पूर्वाण्यपि च चूलिकाम् ॥१४८॥
अवधि च मनःपर्ययाख्यं केवलमेव च । ज्ञानभेदान् प्रतीत्येमान् श्रुतज्ञानमुपोष्यते ॥१४९॥
दिनानां सतमत्रेष्टमष्टापञ्चाशताधिकम् । विद्धि त्वमेतावालम्ब्य तपोऽनशनमाचर ॥१५०॥
अट्ठाईस, ग्यारह, दो, अठासी, एक, चौदह, पाँच, छह, दो और एक इस प्रकार मतिज्ञान आदि भेदों की एक सौ अठावन संख्या होती है । उनका नामानुसार क्रम इस प्रकार है कि मतिज्ञान के अट्ठाईस, अंगों के ग्यारह, परिकर्म के दो, सूत्र के अट्ठासी, अनुयोग का एक, पूर्व के चौदह, चूलिका के पाँच, अवधिज्ञान के छह, मनःपर्ययज्ञान के दो और केवलज्ञान का एक―इस प्रकार ज्ञान के इन एक सौ अट्ठावन भेदों की प्रतीति कर जो एक सौ अट्ठावन दिन का उपवास किया जाता है उसे श्रुतज्ञान उपवास व्रत कहते हैं । हे पुत्रि, तू भी विधिपूर्वक ऊपर कहे हुए दोनों अनशन व्रतों को आचरण कर ।।146-150।।
“There are one hundred fifty-eight divisions of knowledge, such as Mati-jnana (knowledge of the mind), and others, classified as follows: twenty-eight for Mati-jnana, eleven for Anga (limbs of knowledge), two for Parikarma (ritual actions), eighty-eight for Sutra (scriptural knowledge), one for Anuyoga (proper conduct), fourteen for Purva (early scriptures), five for Chulika (miscellaneous knowledge), six for Avadhi-jnana (clairvoyance), two for Manahparyaya-jnana (knowledge of others’ thoughts), and one for Kevalajñana (omniscient knowledge).
Based on the understanding of these one hundred fifty-eight divisions, a fast of one hundred fifty-eight days is performed, which is known as the Śrutajñāna fast.
O daughter, you should also properly practice the two fasting vows mentioned above.”146-150
श्लोक ( Shlok ) 151
उशन्ति ज्ञानसाम्राज्यं विध्योः फलमथैनयोः । स्वर्गाद्यपि फलं प्राहुरेनयोरनुषङ्गजम् ॥१५१॥
हे पुत्रि, इन दोनों व्रतों का मुख्य फल केवलज्ञान की प्राप्ति और गौण फल स्वर्गादि की प्राप्ति है ।।151।।
“O daughter, the primary result of these two vows is the attainment of Kevalajñāna (omniscient knowledge), and the secondary result is the attainment of heavenly realms and other auspicious results.”
151
श्लोक 152 से 161
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141
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