आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 |
श्लोक 142 से 151 नगरवासियों का विस्मय
नगाड़े, नृत्य, और गीतों से उत्सव चला। लोग इसे स्वर्ग या इंद्रजाल मानते थे। नीलांजना के नृत्य से वैराग्य जागा। भगवान वन में स्वतंत्रता के लिए गए।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
महत्पुण्यमहो भर्तुरवाङ् मनसगोचरम् । पश्यता निमिषानेतान् प्रप्रणम्रानितोऽमुतः ॥१४२॥
अहा, भगवान का पुण्य बहुत ही बड़ा है वह न तो वचन से ही कहा जा सकता है और न मन से ही उसका विचार किया जा सकता है । इधर-उधर भक्ति के भार से झुके हुए―प्रणाम करते हुए इन देवों को देखो ।।142।।
Ah! The Lord’s merit is truly immense—it can neither be expressed in words nor conceived by the mind. Look at these celestial beings, bowed down with the weight of their devotion, offering their salutations in reverence. ( 142)
श्लोक ( Shlok ) 143
इतो मधुरगम्भीरं ध्वनन्त्येते सुरानकाः । इतो मन्द्रं मृदङ्गानामुच्चैरुच्चरति ध्वनिः ॥१४३॥
इधर ये देवों के नगाड़े मधुर और गंभीर शब्दों से बज रहे हैं और इधर यह मृदंगों का गंभीर तथा जोर का शब्द हो रहा है ।।143।।
Here, the celestial drums are resounding with sweet and deep tones, while there, the mridangas are producing a profound and powerful sound. ( 143)
श्लोक ( Shlok ) 144
इतो नृत्यमितो गीतमितः संगीत मङ्गलम् । इतश्चामरसंघात इतश्चामरसंहतिः ॥ १४४॥
इधर नृत्य हो रहा है, इधर गीत गाये जा रहे हैं, इधर संगीत मंगल हो रहा है, इधर चमर ढुलाये जा रहे हैं और इधर देवों का आगर समूह विद्यमान है ।।144।।
Here, dance is being performed; there, songs are being sung. On one side, auspicious music is being played, while on another, fans (chamaras) are being waved. Meanwhile, a great assembly of celestial beings is present. ( 144)
श्लोक ( Shlok ) 145
संचारी किमयं स्वर्गः ‘साप्सरास्सविमानकः । किं वापूर्वमिदं चित्रं लिखितं व्योम्नि केनचित् ॥१४५॥
क्या यह चलता हुआ स्वर्ग है जो अप्सराओं और विमानों से सहित है अथवा आकाश में यह किसी ने अपूर्व चित्र लिखा है ।।145।।
Is this a moving heaven, adorned with Apsaras and celestial chariots? Or is it an unprecedented painting drawn in the sky by someone? ( 145)
श्लोक ( Shlok ) 146
किमिन्द्र जालमेतत्स्यादुतास्मन्मतिविभ्रमः । अदृष्टपूर्वमाश्चर्यमिदमीदृग्न जातुचित् ॥१४६॥
क्या यह इंद्रजाल है―जादूगर का खेल है अथवा हमारी बुद्धि का भ्रम है । यह आश्चर्य बिलकुल ही अदृष्टपूर्व है―ऐसा आश्चर्य हम लोगों ने पहले कभी नहीं देखा था ।।146।।
Is this an illusion—some magical feat of a sorcerer, or merely a deception of our minds? This wonder is entirely unprecedented—we have never witnessed such a marvel before. (146)
श्लोक ( Shlok ) 147
इति कैश्चित्तदाश्चर्यं पश्यद्भिः प्राप्तविस्मयैः । स्वैरं संजल्पितं पौरर्जल्पाकैः सविकल्पकैः ॥१४७॥
इस प्रकार अनेक विकल्प करने वाले तथा बहुत बोलने वाले नगर-निवासी लोग भगवान के उस आश्चर्य (अतिशय) को देखकर विस्मय के साथ यथेच्छ बातें कर रहे थे ।।147।।
Thus, the townspeople, making various conjectures and speaking endlessly, were expressing their thoughts freely in astonishment upon witnessing the extraordinary marvel of the Lord. ( 147)
श्लोक ( Shlok ) 148
यदा प्रभृति देवोयमवतीर्णो धरातलम् । तदा प्रभृति देवानां न गत्यागतिविच्छिदा ॥१४८॥
अनेक पुरुष कह रहे थे कि जब से इन भगवान ने पृथ्वी तल पर अवतार लिया है तब से यहाँ देवों के आने-जाने में अंतर नहीं पड़ता―बराबर देवों का आना-जाना बना रहता है ।।148।।
Many people were saying, “Ever since the Lord has incarnated on Earth, there has been no interruption in the coming and going of the celestial beings—their visits have remained constant.” ( 148)
श्लोक ( Shlok ) 149
नृत्यं नीलाञ्जनाख्यायाः पश्यतः सुरयोषितः । उदपादि विभोर्भोगिवैराग्यमनिमित्तकम् ॥१४९।।
नीलांजना नाम की देवांगना का नृत्य देखते-देखते ही भगवान को बिना किसी अन्य कारण के भोगों से वैराग्य उत्पन्न हो गया है ।।149।।
Merely by watching the dance of the celestial maiden named Nīlāñjanā, the Lord has, without any other cause, developed complete detachment from worldly pleasures. ( 149)
श्लोक ( Shlok ) 150
तत्कालो पनतैर्मान्यैः सुरैलोंकान्तिकाह्वयैः । बोधितस्यास्य वैराग्ये दृढमासञ्जितं मनः ।।१५०॥
उसी समय आये हुए माननीय लौकांतिक देवों ने भगवान को संबोधित किया जिससे उनका मन वैराग्य में और भी अधिक दृढ़ हो गया है ।।150।।
At that very moment, the honorable Laukāntika deities addressed the Lord, further strengthening His mind in renunciation. ( 150)
श्लोक ( Shlok ) 151
विरक्तः कामभोगेषु स्वशरीरेऽपि निःस्पृहः । सवस्तुवाहनं राज्यं तृणवन्मन्यतेऽधुना ॥१५१॥
काम और भोगों से विरक्त हुए भगवान् अपने शरीर में भी निःस्पृह हो गये हैं अब वे महल सवारी तथा राज्य आदि को तृण के समान मान रहे हैं ।।151।।
Having renounced desire and worldly pleasures, the Lord has become completely detached even from His own body. Now, He regards the palace, royal procession, and kingdom as mere blades of grass. ( 151)
श्लोक 152 से 161
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 |