आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
श्लोक 182 से 192 विद्याधरों की स्वीकृति और पुण्य
धरणेंद्र ने विद्याधरों को आज्ञा दी। विद्याधरों ने कार्य स्वीकार किया। धरणेंद्र ने उन्हें विद्याएँ दीं। वे संतुष्ट हो भोग भोगते थे। विद्याधर उनकी सेवा करते थे। नमि और विनमि ने श्रेणियों को वश किया। पुण्य से उन्हें विभूति मिली। भगवान वृषभदेव की भक्ति से यह सुख प्राप्त हुआ।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 182 to 192
श्लोक ( Shlok ) 182 –183
मर्ता नमिर्भवतु संप्रति दक्षिणस्याः श्रेण्या दिवः शतमखोऽधिपतिर्यथैव । श्रेण्यां भवेद्विनमिरप्यवनम्यमानो विद्याधरैरवहितै श्चिरमुत्तरस्याम् ॥१८२॥
देवो जगद्गुरुरसौ वृषभोऽनुमत्य श्रीमानिमौ प्रहितवान् जगतां विधाता । तेनानयोः खचरभूपतयोऽनुरागादाज्ञां वहन्तु शिरसेत्यवदत् फणीन्द्रः ॥१८३॥
राज्याभिषेक के बाद धरणेंद्र ने विद्याधरों से कहा कि जिस प्रकार इंद्र स्वर्ग का अधिपति है उसी प्रकार यह नमि अब दक्षिण श्रेणी का अधिपति हो और अनेक सावधान विद्याधरों के द्वारा नमस्कार किया गया यह विनमि चिरकाल तक उत्तर-श्रेणी का अधिपति रहे । कर्मभूमिरूपी जगत् को उत्पन्न करने वाले जगद्गुरु श्रीमान् भगवान वृषभदेव ने अपनी सम्मति से इन दोनों को यहाँ भेजा है इसलिए सब विद्याधर राजा प्रेम से मस्तक झुकाकर इनकी आज्ञा धारण करें ।।182-183।।
“After the coronation, Dharanendra addressed the Vidyadharas, saying, ‘Just as Indra is the lord of heaven, so shall Nami be the ruler of the southern realm. And Vinami, honored by many vigilant Vidyadharas, shall remain the sovereign of the northern realm for eternity. These two have been sent here with the consent of the world-preceptor, the illustrious Lord Rishabhadeva, who gave rise to the karmabhoomi (the land of action). Therefore, let all the Vidyadhara kings bow their heads with love and faithfully abide by their command.'”
श्लोक ( Shlok ) 184
तत्पुण्यतो गुरुवियोगनिरूपणाच्च नागादिभर्तुरुचितादनुशासनाच्च । ते तत्तथैव खचराः “प्रतिपेदिरे द्राक् कार्य हि सिद्धयति महद्भिरधिष्टितं यत् ॥१८४॥
उन दोनों के पुण्य से तथा जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव की आज्ञा के निरूपण से और धरणेंद्र के योग्य उपदेश से उन विद्याधरों ने वह सब कार्य उसके कहे अनुसार ही स्वीकृत कर लिया था सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषों के द्वारा हाथ में लिया हुआ कार्य शीघ्र ही सिद्ध हो जाता ।।184।।
“Due to the merit of both princes, the decree of the world-preceptor Lord Rishabhadeva, and the wise guidance of Dharanendra, the Vidyadharas accepted everything as instructed. This was only natural, for any task undertaken by great souls swiftly reaches completion.”
श्लोक ( Shlok ) 185
गान्धार पन्न गपदोपपदे च विद्ये दत्वा फणा वदधिपो विधिवत्स ताभ्याम् । धीरो विसर्ज्य नयविद्विनत्तौ कुमारौ स्वावासमेव च जगाम कृतेष्ट कार्यः ॥१८५॥
इस प्रकार नयों को जानने वाले धीर-वीर धरणेंद्र ने उन दोनों को गांधारपदा और पन्नगपदा नाम की दो विद्याएं दी और फिर अपना कार्य पूरा कर विनय से झुके हुए दोनों राजकुमारों को छोड़कर अपने निवासस्थान पर चला गया ।।185।।
“In this way, the wise and courageous Dharanendra, who understood the essence of new sciences, bestowed upon both princes the two great Vidyas—Gandharpada and Pannagpada. Having thus fulfilled his duty, he humbly took his leave and returned to his abode, leaving the two princes behind.”
श्लोक ( Shlok ) 186
अथ गत्वति तस्मिन्नागराजेऽगराजे धृति मधिकमधत्तां तो युवानौ युवानौ ।
मुहुरुपद्धत नानानून भोगैर्न भोगैर्मुकुलित करमौलिव्यक्तमाराध्यमानौ ॥ १८६॥
तदनंतर धरणेंद्र के चले जाने पर नाना प्रकार के संपूर्ण भोगोपभोगों को बार-बार भेंट करते हुए विद्याधर लोग हाथ जोड़कर मस्तक नवाकर स्पष्ट रूप से जिनकी सेवा करते हैं ऐसे वे दोनों कुमार उस पर्वत पर बहुत ही संतुष्ट हुए थे ।।186।।
“Thereafter, after Dharanendra’s departure, the two princes felt immensely satisfied on the mountain, as the Vidyadharas, with folded hands and bowed heads, explicitly served them while repeatedly offering various kinds of luxurious enjoyments and pleasures.”
श्लोक ( Shlok ) 187
नियतिमिव खगाद्रे र्मेखलां तामलङ्घ्यां सुकृतिजननिवासावाप्तनाकानुकाराम् । जिनसमवसृतिं वा विश्व लोकाभिनन्द्यां नमिविनमिकुमारावध्य वात्तामुदात्ताम् ॥१८७॥
जो अपने-अपने भाग्य के समान अलंघनीय है, पुण्यात्मा जीवों का निवारन होने के कारण जो स्वर्ग का अनुकरण करती है तथा जो जिनेंद्र भगवान के समवसरण के समान सब लोगों के द्वारा वंदनीय है ऐसी उस विजयार्ध पर्वत की मेखला पर वे दोनों राजकुमार सुख से रहने लगे थे ।।187।।
“Those two princes lived happily on the girdle of the Vijayardha mountain, which, like their own fate, was insurmountable, which imitated heaven by being a refuge for virtuous beings, and which, like the Samavasarana of Lord Jina, was revered by all.”
श्लोक ( Shlok ) 188
विद्यासिद्धि विधिनियमितां मानयन्तौ नयन्तौ विद्यावृद्धैः सममभिमतामर्थ सिद्धिंं प्रसिद्धिम् । विद्याधीनान् षडृत्तुसुखदान्निर्विशन्तौ च भोगान् तौ तत्रादो स्थितिमभजतां खेचरैः संविभक्ताम् ॥१८८॥
जिन्होंने स्वयं विधिपूर्वक अनेक विद्याएं सिद्ध की हैं और विद्या में बड़े-बड़े पुरुषों के साथ मिलकर अपने अभिलषित अर्थ को सिद्ध किया है ऐसे वे दोनों ही कुमार विद्याओं के अधीन प्राप्त होने वाले तथा छहों ऋतुओं के सुख देने वाले भोगों का उपभोग करते हुए उस पर्वत पर विद्याधरों के द्वारा विभक्त की हुई स्थिति को प्राप्त हुए थे । भावार्थ―यद्यपि वे जन्म से विद्याधर नहीं थे तथापि यहाँ जाकर उन्होंने स्वयं अनेक विद्याएं सिद्ध कर ली थीं और दूसरे विद्यावृद्ध मनुष्यों के साथ मिलकर वे अपना अभिलषित कार्य सिद्ध कर लेते थे इसलिए विद्याधरों के समान ही भोगोपभोग भोगते हुए रहते थे ।।188।।
“Having themselves mastered numerous sciences through proper methods and having achieved their desired goals by collaborating with great scholars, both princes attained a status among the Vidyadharas on that mountain. Enjoying pleasures that came under the sway of their acquired knowledge and providing comfort in all six seasons, they lived there, indulging in luxuries like the Vidyadharas.
Meaning—Although they were not born as Vidyadharas, they mastered many sciences upon arriving there. By associating with knowledgeable scholars, they accomplished their desired tasks and thus lived a life of enjoyment similar to that of the Vidyadharas.”
श्लोक ( Shlok ) 189
आज्ञामू हुः खचरनरपाः सन्नतैरुत्तमाङ्गैर्यूनोः सेवामनुनयपरामेनयोराचरन्तः । क्वेमौ जातौ स्व च पदमिदं न्यक्कृतारातिचक्रं खे खेन्द्राणां घटयति नृणां पुष्यमेवात्मनीनम् ॥१८९।।
इन दोनों कुमारों को प्रसन्न करने वाली सेवा करते हुए विद्याधर लोग अपना-अपना मस्तक झुकाकर उन दोनों की आज्ञा धारण करते थे । गौतम स्वामी राजा श्रेणिक से कहते हैं कि हे राजन् ये नमि और विनमि कहाँ तो उत्पन्न हुए और कहाँ उन्हें समस्त शत्रुओं को तिरस्कृत करने वाला यह विद्याधरों के इंद्र का पद मिला । यथार्थ में मनुष्य का पुण्य ही सुखदायी सामग्री को मिलाता रहता है ।।189।।
“The Vidyadharas, bowing their heads, dutifully obeyed the commands of these two princes while serving them with devotion.
Gautama Swami, speaking to King Shrenik, said: ‘O King, consider the journey of Nami and Vinami—born in one place and yet rising to the exalted position of Indra among the Vidyadharas, one that casts aside all enemies. Truly, it is a man’s merit that continually brings him fortune and happiness.'”
श्लोक ( Shlok ) 190
नमिरन मयदुच्चेर्भोगसंपत्प्रतीतान् गगनचरपुरीन्द्रान् दक्षिणश्रेणिभाजः । विनमिरपि विनम्रानातनोति स्म विश्वान् खचरपुर वरेशानुत्तरश्रेणिभाजः ॥ १९०॥
नमि कुमार ने बड़ी-बड़ी भोगोपभोग की संपदाओं को प्राप्त हुए दक्षिण श्रेणी पर रहने वाले समस्त विद्याधर नगरियों के राजाओं को वश में किया था और विनमि ने उत्तरश्रेणी पर रहने वाले समस्त विद्याधर नगरियों के राजाओं को नम्रीभूत किया था ।।190।।
“Prince Nami, having attained immense wealth and luxuries, brought all the kings of the Vidyadhara cities in the southern region under his control. Similarly, Vinami subdued all the kings of the Vidyadhara cities residing in the northern region.”
श्लोक ( Shlok ) 191
तावित्थं प्रविभज्य राजतनयौ वैद्याधरी तां श्रियं भुञ्जानौ विजयार्धपर्वततटे निष्कण्टकं तस्थतुः ।
पुण्यादित्यनयोर्विभूतिरभवल्लोकेशपादाश्रितोः पुण्यं तेन कुरुध्वमभ्युदयदां लक्ष्मी समाशंसवः ॥१९१॥
इस प्रकार वे दोनों ही राजकुमार विद्याधरों की उस लक्ष्मी को विभक्त कर विजयार्ध पर्वत के तट पर निष्कंटक रूप से रहते थे । हे भव्य जीवो, देखो, भगवान् वृषभदेव के चरणों का आश्रय लेने वाले इन दोनों कुमारों को पुण्य से ही उस प्रकार की विभूति प्राप्त हुई थी इसलिए जो जीव स्वर्ग आदि लक्ष्मी प्राप्त करना चाहते हैं वे एक पुण्य का ही संचय करें ।।191।।
“Thus, both princes, having distributed the wealth of the Vidyadharas, lived peacefully on the banks of Mount Vijayardha, free from all obstacles. O noble souls, behold! These two princes attained such great prosperity solely due to their merit, having taken refuge at the feet of Lord Rishabhadeva. Therefore, those who desire the riches of heaven and beyond should accumulate only virtue.”
श्लोक ( Shlok ) 192
नत्वा देवमिमं चराचरगुरुं त्रैलोक्यनाथार्चितं भक्तौ तौ सुखमापतुः समुचितं विद्या धराधीश्वरौ ।
तस्मादादिगुरुं प्रणम्य शिरसा भक्यार्चयन्त्वङ्गिनो वाञ्छन्तः सुखमक्षयं जिनगुणप्राप्तिं च नैश्रेयसीम् ॥१९२॥
चर और अचर जगत् के गुरु तथा तीन लोक के अधिपतियों-द्वारा पूजित भगवान् वृषभदेव को नमस्कार कर ही दोनों भक्त विद्याधरों के अधीश्वर होकर उचित सुख को प्राप्त हुए थे इसलिए जो भव्य जीव मोक्षरूपी अविनाशी सुख और परम कल्याणरूप जिनेंद्र भगवान् के गुण प्राप्त करना चाहते हैं वे आदिगुरु भगवान् वृषभदेव को मस्तक झुकाकर प्रणाम करें और उन्हीं की भक्तिपूर्वक पूजा करें ।।192।।
“By bowing to Lord Rishabhadeva, the revered Guru of the moving and non-moving worlds and the master worshipped by the rulers of the three realms, both devoted princes attained rightful sovereignty over the Vidyadharas and experienced supreme happiness. Therefore, noble souls who seek the eternal bliss of liberation and the supreme virtues of Lord Jinendra should bow their heads in reverence to the Adi-Guru, Lord Rishabhadeva, and worship Him with utmost devotion.”
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसं ग्रहे नमिविनमिराज्यप्रतिष्ठापनं नामेकोनविशतितमं पर्व ॥१९॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण श्री महापुराणसंग्रह में नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन करने वाला उन्नीसवां पर्व समाप्त हुआ ।।19।।
“In this way, the nineteenth canto, which describes the attainment of kingship by Nami and Vinami in the sacred Mahapurana Sangraha composed by the revered Acharya Jinsean, comes to an end.”
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन
पर्व 20 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181