भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 अजगर का उद्धार और शतबल की कथा
मणिमाली के उपदेश से अजगर का मोह नष्ट हुआ। उसने पश्चाताप कर विषयासक्ति छोड़ी, आहार त्यागा, और मृत्यु पर देव बना। उसने मणिमाली को रत्नहार दिया, जो महाबल के कंठ में है। स्वयंबुद्ध ने तीसरी कथा शुरू की: शतबल, महाबल के दादा, ने प्रजा को सुशासित किया। राज्य पुत्र को सौंपकर वे भोगों से विरक्त हुए, श्रावक व्रत लिए, और समाधिमरण से देव बने।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
नमोऽस्तु तदसासंगविमुखाय स्थिरात्मने । तपोधनगणायेति निनिन्द विषयानसौ ॥१३२॥
जो इस विषय रस की आसक्ति से विमुख रहकर अपने आत्मा को अपने आपमें स्थिर रखते हैं ऐसे मुनियों के समूह को नमस्कार हो । वृक्ष का राजा मणिमाली ने विषयों की निंदा की ।।132 ।।
“Salutations to the assembly of sages who, remaining detached from the attractions of sensory pleasures, keep their soul firmly established within themselves. The king of trees, Manimali, denounced sensual pleasures.”
श्लोक ( Shlok ) 133
अथासौ पुत्र निर्दिष्टधर्मवाक्यांशुमालिना । गलिताशेषमोहान्धतमसः समजायत ॥१३३।।
“Afterward, the dense darkness of delusion, like a deep shadow, was completely dispelled by the sun-like rays of the words of righteousness spoken by his son.”
श्लोक ( Shlok ) 134
ततो धमौंषधं प्राप्य स कृतानुशयः शत्रुः । बदाम विषयौत्सुक्यं महाविषमिवोल्वणम् ॥ १३४॥
“The python deeply repented for its past life and, by taking the medicine of righteousness, abandoned the dreadful attachment to sensual pleasures, which was like deadly poison.”
श्लोक ( Shlok ) 135
स परित्यज्य संवेगादाहारं सशरीरकम् । जीवितान्ते तनुं हित्वा दिविजोऽभून्महर्दिकः ॥१३५॥
उसने संसार से भयभीत होकर आहार-पानी छोड़ दिया, शरीर से भी ममत्व त्याग दिया और उसके प्रभाव से वह आयु के अंत में शरीर त्याग कर बड़ी ऋद्धि का धारक देव हुआ ।।135।।
“Frightened by the cycle of worldly existence, he gave up food and water, renounced attachment to his body, and, as a result, at the end of his life, he left his body and was reborn as a deity endowed with great powers and prosperity.”
श्लोक ( Shlok ) 136
ज्ञात्वा च भवमागत्य संपूज्य मणिमालिने । मणिहारमता सावुन्मि षन्मणिदीधितिम् ॥ १३६॥
उस देव ने अवधिज्ञान के द्वारा अपने पूर्व भव जान मणिमाली के पास आकर उसका सत्कार किया तथा उसे प्रकाशमान मणियों से शोभायमान एक मणियों का हार दिया ।।136।।
“With his avadhi-jnana (clairvoyant knowledge), the deity recalled his previous birth, approached Manimali, honored him, and gifted him a garland of radiant gems, adorned with luminous jewels.”
श्लोक ( Shlok ) 137
स एष भवतः कण्ठे हारो रत्नांशुमासुरः । लक्ष्यतेऽद्यापि यो लक्ष्म्याः प्रहास इव निर्मलः ॥१३७॥
रत्नों की किरणों से शोभायमान तथा लक्ष्मी के हास के समान निर्मल वह हार आज भी आपके कंठ में दिखायी दे रहा है ।।137।।
That necklace, radiant with the rays of gems and as pure as the smile of Goddess Lakshmi, is still seen adorning your neck today.”
श्लोक ( Shlok ) 138
तथैवमपरं राजन् यथावृतं निगद्यते । सन्ति यद्दर्शिनोऽद्यापि वृद्धाः केचन खेचराः ॥१३८॥
हे राजन्, इसके सिवाय एक और भी वृत्तांत मैं ज्यों का त्यों कहता हूँ । उस वृत्तांत के देखने वाले कितने ही वृद्ध विद्याधर आज भी विद्यमान हैं ।।138।।
O King, apart from this, there is yet another account that I narrate exactly as it happened. Many elderly Vidyadharas who witnessed it are still present today.”
श्लोक ( Shlok ) 139
आसीच्छतबलो नाम्ना भवदीयः पितामहः । प्रजा राजन्वतीः कुर्वन् स्वगुणै राभिगामिकैः ।।१३९ ll
शतबल नाम के आपके दादा हो गये हैं जो अपने मनोहर गुणों के द्वारा प्रजा को हमेशा सुयोग्य राजा से युक्त करते थे ।।139।।
“Your grandfather, named Shatbal, was known for his admirable virtues and always ensured that the people were governed by a capable and righteous king.”
श्लोक ( Shlok ) 140
स राज्यं सुचिरं भुक्त्वा कदाचिद् भोगनिःस्पृहः । भवत्पितरि निक्षिप्तराज्यभारो महोदयः ॥१४० ll
उन भाग्यशाली शतबल ने चिरकाल तक राज्य भोग कर आपके पिता के लिए राज्य का भार सौंप दिया था और स्वयं भोगों से निःस्पृह हो गये थे ।।140।।
“The fortunate Shatbal, after enjoying the kingdom for a long time, entrusted the responsibilities of the throne to your father and became detached from worldly pleasures.”
श्लोक ( Shlok ) 141
सम्यग्दर्शनपूतात्मा गृहीतोपासकामतः । निबद्धसुरलोकायुर्विशुद्धपरिणामतः ॥ १४१॥
उन्होंने सम्यग्दर्शन से पवित्र होकर श्रावक के व्रत ग्रहण किये थे और विशुद्ध परिणामों से देवायु का बंध किया था ।।141।।
“Having purified himself through right faith (Samyagdarshan), he accepted the vows of a Shravak (lay follower) and, with pure intentions, secured a divine lifespan through his actions.”
श्लोक 142 से 151
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
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