आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 |
श्लोक 82 से 92 वन की शांति
सिंह-हरिण बैर छोड़ साथ रहते थे। बाघ चमरियों के बाल सुलझाते थे। हरिण बाघनियों का दूध पीते थे। हाथी कमल चढ़ाते थे। शांति किरणों ने पशुओं को वश किया। उपवास में भूख न हुई। इंद्रों के आसन काँपने लगे। छह माह क्षणभर से व्यतीत हुए। नमि-विनमि सेवा को आए।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 82 to 92
श्लोक ( Shlok ) 82
मृगारित्वं समुत्सृज्य सिंहाः संहतवृत्तयः । बभूवुर्गजयूथेन माहात्म्यं तद्धि योगजम् ॥८२॥
सिंह हरिण आदि जंतुओं के साथ बैरभाव छोड़कर हाथियों के झुंड के साथ मिलकर रहने लगे थे सो यह सब भगवान के ध्यान से उत्पन्न हुई महिमा ही थी ।।82।।
Lions, having abandoned their enmity with deer and other creatures, began living peacefully among herds of elephants. This was indeed a divine marvel brought about by the Lord’s meditation. ॥82॥
श्लोक ( Shlok ) 83
कण्टकालग्न बालाग्राश्चमरीश्च मरीमृजाः। नखरैः स्वैरहो व्याघ्राः सानुकम्पं व्यमोचयन् ।।८३।।
अहा, कैसा आश्चर्य था कि जिनके बालों के अग्रभाग काँटों में उलझ गये थे और जो उन्हें बार-बार सुलझाने का प्रयत्न करती थीं ऐसी चमरी गायों को बाघ बड़ी दया के साथ अपने नखों से छुड़ा रहे थे अर्थात् उनके बाल सुलझा कर उन्हें जहाँ-तहाँ जाने के लिए स्वतंत्र कर रहे थे ।।83।।
Ah! What a wonder it was that tigers, filled with compassion, were gently untangling the hair of Chauri cows caught in thorns with their claws, helping them free themselves and move about freely. ॥83॥
श्लोक ( Shlok ) 84
प्रस्तुवाना महाव्याघ्रीरुपेत्य मृगशावकाः । स्वजनन्यास्थया स्वैरं पीत्वा स्म सुखमासते ।।८४।।
हरिण के बच्चे दूध देती हुई बाघनियों के पास जाकर और उन्हें अपनी माता समझ इच्छानुसार दूध पीकर सुखी होते थे ।।84।।
The fawns would approach the lactating tigresses, considering them their mothers, and blissfully drink milk to their heart’s content. ॥84॥
श्लोक ( Shlok ) 85
पदयोरस्य वन्येभाः समुत्फुल्लं सरोरुहम् । ढोकयामासुरानीय तपःशक्तिरहो परा ॥८५॥
अहा, भगवान के तपश्चरण की शक्ति बड़ी ही आश्चर्यकारक थी वन के हाथी भी फूले हुए कमल लाकर उनके चरणों में चढ़ाते थे ।।85।।
Ah! The power of the Lord’s austerities was truly astonishing. Even the elephants of the forest would bring blooming lotuses and offer them at His feet. ॥85॥
श्लोक ( Shlok ) 86
बभौ राजीवमारक्तं करिणां पुष्कराश्रितम् । पुष्करश्रियमाम्रेडी कुर्वदभर्तुरुपासने ॥८६॥
जिस समय वे हाथी फूले हुए कमलों-द्वारा भगवान् की उपासना करते थे उस समय उनके सूंड के अग्रभाग में स्थित लाल कमल ऐसे सुशोभित होते थे मानो उनके पुष्कर अर्थात सूंड के अग्रभाग की शोभा को दूनी कर रहे हों ।।86।।
When the elephants worshiped the Lord with blooming lotuses, the red lotuses at the tips of their trunks appeared so splendid, as if they were doubling the beauty of their Pushkara—the tips of their trunks. ॥86॥
श्लोक ( Shlok ) 87
प्रशमस्य विभोरङ्गात् विसर्पन्त इवांशकाः । “प्रसहय वशमानिन्युरवशानपि तान् मृगान् ॥८७॥
भगवान् के शरीर से फैलती हुई शांति की किरणों ने कभी किसी के वश न होने वाले सिंह आदि पशुओं को भी हठात् वश में कर लिया था ।।87।।
The rays of tranquility emanating from the Lord’s body had effortlessly brought even the otherwise uncontrollable lions and other wild animals under His sway. ॥87॥
श्लोक ( Shlok ) 88
अनाशुषोऽपि नास्यासीत् क्षुद्वाधा भुवनेशिनः । संतोषभावनोत्कर्षाञ्जयद् गृद्धि मगृध्नुतां ॥८८॥
यद्यपि त्रिलोकीनाथ भगवान् उपवास कर रहे थे―कुछ भी आहार नहीं लेते थे तथापि उन्हें भूख की बाधा नहीं होती थी, सो ठीक ही है, क्योंकि संतोषरूप भावना के उत्कर्ष से जो अनिच्छा उत्पन्न होती है वह हरएक प्रकार की इच्छाओं (लंपटता) को जीत लेती है ।।88।।
Although the Lord of the three worlds was fasting—consuming no food at all—He did not experience the suffering of hunger. And rightly so, for the supreme state of contentment gives rise to a sense of detachment, which conquers all forms of desire. ॥88॥
श्लोक ( Shlok ) 89
चलन्ति स्म तदेन्द्राणामासनान्यस्य योगतः । चित्रं हि महतां धैर्य जगदाकम्पकारणम् ॥८९॥
उस समय भगवान् के ध्यान के प्रताप से इंद्रों के आसन भी कंपायमान हो गये थे । वास्तव में यह भी एक बड़ा आश्चर्य है कि महापुरुषों का धैर्य भी जगत् के कंपन का कारण हो जाता है ।।89।।
At that time, due to the radiance of the Lord’s meditation, even the thrones of the Indras trembled. Indeed, it is truly astonishing that the steadfast patience of great souls can become the cause of the world’s upheaval. ॥89॥
श्लोक ( Shlok ) 90
इति षण्मासनि र्वर्त्स्यत्प्रतिमायोगमापुषः । स कालः क्षणवद्भर्तुरगमद् धैर्यशालिनः ॥९०॥
इस तरह छह महीने में समाप्त होने वाले प्रतिमा योग को प्राप्त हुए और धैर्य से शोभायमान रहने वाले भगवान् का वह लंबा समय भी क्षणभर के समान व्यतीत हो गया ।।90।।
Thus, having attained the Pratima Yoga, which lasted for six months, and remaining radiant with patience, the Lord experienced that long period as if it had passed in merely a moment. ॥90॥
श्लोक ( Shlok ) 91 – 92
अत्रान्तरे किलायातां कुमारौ सुकुमारकौ सूनू कच्छमहाकच्छनृपयोर्निकटं गुरोः ॥९१॥
नमिश्च विनमिश्चेति प्रतीतौ भक्तिनिर्भरौ। भगवत्पादसंसेवां कर्तुकामो युवेशिनौ ॥९२॥
इसी के बीच में महाराज कच्छ, महाकच्छ के लड़के भगवान के समीप आये थे । वे दोनों लड़के बहुत ही सुकुमार थे, दोनों ही तरुण थे, नमि तथा विनमि उनका नाम था और दोनों ही भक्ति से निर्भर होकर भगवान् के चरणों की सेवा करना चाहते थे ।।91-92।।
In the meantime, Maharaj Kachcha’s sons, Nami and Vinami, approached the Lord. Both were exceedingly delicate and youthful. Filled with deep devotion, they wished to serve at the feet of the Lord with utmost reverence. ॥91-92॥
श्लोक 93 से 101
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
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आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 |